प्रस्तुत संदर्भ जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बंधवों की मृत्यु से विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते हैं ---
भोगो तुम इस भांति मृत्ति को
दाग नहीं लग पाये
मिट्टी में तुम नहीं , वही
तुममें विलीन हो जाये ।
और सिखाओ भोगवाद की
यही रीति जन - जन को
करें विलीन देह को मन में
नहीं देह में मन को ।
मन का होगा आधिपत्य
जिस दिन मनुष्य के तन पर
होगा त्याग अधिष्ठित जिस दिन
भोग - लिप्त जीवन पर ।
कंचन को नर साध्य नहीं
साधन जिस दिन जानेगा
जिस दिन सम्यक रूप मनुज का
मानव पहचानेगा ।
वल्कल - मुकुट , परे दोनों के
छिपा एक जो नर है
अन्तर्वासी एक पुरुष जो
पिंडों से ऊपर है ।
जिस दिन देख उसे पाएगा
मनुज ज्ञान के बल से
रह न जाएगी उलझ दृष्टि जब
मुकुट और वल्कल से ।
उस दिन होगा सुप्रभात
नर के सौभाग्य उदय का
उस दिन होगा शंख ध्वनित
मानव की महा विजय का ।
धर्मराज , गंतव्य देश है दूर
न देर लगाओ
इस पथ पर मानव समाज को
कुछ आगे पहुंचाओ ।
सच है , मनुज बड़ा पापी है
नर का वध करता है
पर , भूलो मत , मानव के हित
मानव ही मरता है ।
लोभ , द्रोह , प्रतिशोध , वैर
नरता के विघ्न अमित हैं
तप , बलिदान , त्याग के संबल
भी न किन्तु , परिमित हैं ।
प्रेरित करो इतर प्राणी को
निज चरित्र के बल से
भरो पुण्य की किरण प्रजा में
अपने तप निर्मल से ।
मत सोचो दिन - रात पाप में
मनुज निरत होता है
हाय , पाप के बाद वही तो
पछताता रोता है ।
यह क्रंदन, यह अश्रु मनुज की
आशा बहुत बड़ी है
बतलाता है यह , मनुष्यता
अब तक नहीं मरी है ।
सत्य नहीं पातक की ज्वाला
में मनुष्य का जलना
सच है बल समेट कर उसका
फिर आगे को चलना ।
नहीं एक अवलंब जगत का
आभा पुण्य व्रती की
तिमिर - व्यूह में फंसी किरण भी
आशा है धरती की ।
फूलों पर आँसू के मोती
और अश्रु में आशा
मिट्टी के जीवन की छोटी
नपी - तुली परिभाषा ।
आशा के प्रदीप को जलाए चलो धर्मराज ,
एक दिन होगी मुक्त भूमि रण - भीति से ।
भावना मनुष्य की न राग में रहेगी लिप्त ,
सेवित रहेगा नहीं जीवन अनीति से ।
हार से मनुष्य की न महिमा घटेगी और ,
तेज न बढ़ेगा किसी मानव की जीत से ।
स्नेह - बलिदान होंगे माप नरता के एक ,
धरती मनुष्य की बनेगी स्वर्ग प्रीति से ।
समाप्त


