रविवार, 19 अगस्त 2012

साँझ के बादल


साँझ के बादल
धर्मवीर भारती
 25-12-1926 - 04-09-1997
ये अनजान नदी की नावें
जादू के-से पाल
उड़ाती
आतीं
मंथर चाल।

नीलम पर किरनों
की साँझी
एक न डोरी
एक न माँझी,
फिर भी लाद निरंतर लातीं
सेंदुर और प्रवाल!

कुछ समीप की
कुछ सुदूर की
कुछ चंदन की
कुछ कपूर की,
कुछ में गेरू कुछ में रेशम
कुछ में केवल जाल।

ये अनजान नदी की नावें
जादू के-से पाल
उड़ाती
आतीं
मंथर चाल .. .. .. ..

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर कविता.....

    सादर
    अनु

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  2. कितना सुन्दर शब्द चित्र..आभार!

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  3. खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर आधारित है जो कि खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है, स्वरों में
    कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं, पंचम इसमें वर्जित है, पर हमने इसमें अंत में पंचम का प्रयोग भी किया है, जिससे इसमें राग बागेश्री भी झलकता है.

    ..

    हमारी फिल्म का संगीत
    वेद नायेर ने दिया है... वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा
    जंगल में चिड़ियों कि
    चहचाहट से मिलती है.
    ..
    Feel free to surf my site ; खरगोश

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  4. बहुत ही अच्छा कविता है हम इसे पसंद करते है

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