गुरुवार, 13 मई 2010

नैया बीच नदिया डूबी जाए

संत कबीर की एक पंक्ति है –

नैया बीच नदिया डूबी जाए”

अर्थात् नदी नाव में डूबी जा रही है। यहां कबीर व्‍यक्ति के उस विकास की ओर संकेत कर रहे हैं जहां व्‍यक्ति की जीवनरूपी नौका इतनी विराट हो जाती है कि पूरा भवसिंधु (नदी) उसी में समाहित हो जाता है। उक्‍त विकास के स्‍वरूप को व्‍यक्‍त करने के लिए शायद “नदिया डूबी जाए” के कवि को इससे अच्‍छा बिम्‍ब नहीं मिला इसलिए उसने संत कबीरदास के ही बिम्‍ब को अपना लिया है। वैसे देखा जाए तो प्रत्‍यक्ष रूप से व्‍यक्ति जीवन के साथ ही भवसिंधु का अंत हो जाता है। यह हमारे राग द्वेष आदि पूर्ण विचार जब विकल्पहीन हो जाते हैं तो ही यह काल बिन्‍दु आता है। भवसिन्‍धु कुछ और नहीं बल्कि हमारा इन्‍द्रीयजनित व्‍यक्तिगत और समष्टिगत भाव जगत है, जो मृत्‍यु के साथ ही विलीन हो जाता है। इसके अतिरिक्‍त यह कविता जीवन और मृत्‍यु के बीच की रस्‍साकसी को भी व्‍यंजित करती दीखती है जिसे उपभोगजनित उल्‍लास और पीड़ा में पाया जाता है।

महाप्रकृति समस्‍त सृष्टि एवं उसके उत्‍स की विधायिका एवं नियामिका है। उसने सृष्टि की हर व्‍यष्टि (Unit) को स्‍वतंत्रता और परतंत्रता दोनों को मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान किया है। मनुष्‍य के रूप में हमें उन अधिकारों को समझने की अधिक शक्ति दी गई है। जिसे हमने सहस्त्राब्दियों से विभिन्‍न सभ्‍यताओं में विकसित होते देखा है। जिस सभ्‍यता में उन्‍हें सही दिश में समझा है और उनकी अनुकूलता बनाए रखी वह अधिक यशस्‍वी और दीर्घकालिक बनी रही।

कहावत है कि जहां से दूसरों की स्‍वतंत्रता प्रारंभ होती है वहां हमारी स्‍वतंत्रता समाप्‍त होती है चाहे वह भौतिक स्‍वतंत्रता हो या मानसिक स्‍वतंत्रता हो। हमारा मान-सम्‍मान या पहचान इसी से होती है। अपनी सृष्टि का महाप्रकृति बहुत सम्‍मान करती है, यदि समझा जाए तो।

इसी भाव-भूमि पर नदिया डूबी जाए कविता लिखी गई है।

 

नदिया डूबी जाए

-आचार्य परशुराम राय

स्वत्व

किस अचेतन की तली से

चेतना ने बाँग दी

कि

काल का घेरा कहीं से

टूटने को आ गया है।

नियति को देती चुनौतीJ0382930

विद्रोह करती वेदना,

आदिम इच्छा के

मात्र एक फल चख लेने की

काट रही सजा,

सृजन के कारागार से

अब बाहर निकल कर आ गई है।

Vista22सोच तो लेते कि

मुक्त शीतल मन्द पवन

जब भी करवट बदलेगा

महाप्रलय की बेला में

हिमालय की गोद भी

शरण देने से तुम्हें कतराएगी।झंझा

मेरे तो सौभाग्य और दुर्भाग्य की

सारी रेखाएं कट गई,

संस्कारों का विकट वन

जलाने से निकले

श्रम सीकर

अभी तक सूखे नहीं।

बन्धन मेरी सीमा नहीं,

मात्र बस ठहराव था।

28032010079साथ बैठकर रोया कभी

      तो मोहवश नहीं

      करुणा की धारवश।

जीवन की धार देख

नाव नदी में नहीं

नदी नाव में डूबने को है!

                                            **********

13 टिप्‍पणियां:

  1. यह कविता जीवन और मृत्‍यु के बीच की रस्‍साकसी को भी व्‍यंजित करती दीखती है जिसे उपभोगजनित उल्‍लास और पीड़ा में पाया जाता है।

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  2. जीवन की विडंबनाओ को दर्शाती के उत्तम रचना...

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  3. बहुत अच्छी रचना।
    किताबे ग़म में ख़ुशी का ठिकाना ढ़ूंढ़ो,
    अगर जीना है तो हंसी का बहाना ढ़ूंढ़ो।

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  4. जीवन के अनेक पहलुओं पर विचार करती अच्छी रचना

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  5. अच्छी कविता..
    मैं राजभाषा हिंदी से सम्बंधित पद पर ही कार्यरत हु और हिंदी की स्थिति के लिए कुछ करना चाहती हु .क्या मैं भी आपके ब्लॉग से जुड़ सकती हु ?

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  6. @ स्वाति जी ... क्या मैं भी आपके ब्लॉग से जुड़ सकती हु ?
    आपका सहर्ष स्वागत है। हम आपको ई-मेल से एक निमंत्रण भेज रहे हैं। इसे स्वीकर करते ही आप इस ब्लॉग के योगदान कर्ता हो जाएंगी और सुविधानुसार आप पोस्ट कर सकती हैं।

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  7. @@ स्वाति जी ... क्या मैं भी आपके ब्लॉग से जुड़ सकती हु ?
    आपके प्रोफ़ाइल में ई-मेल आई.डी. नहीं है। आप हमारे ई-मेल पर एक रेक्वेस्ट भेज दें!

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  8. बड़ा अच्छा कार्य कर रहे हैं ! मेरी हार्दिक शुभकामनायें !

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  9. दर्शनयुक्त उत्कृष्ट कविता..

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  10. जीवन के अनेक पहलुओं पर विचार करती अच्छी रचना.

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  11. वाह! प्रक्रिति से जीवन का सम्बन्ध! सुन्दर रचना।

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