सोमवार, 17 दिसंबर 2012

मधुशाला .... भाग - 11 / हरिवंश राय बच्चन

जन्म -- 27 नवंबर 1907 
निधन -- 18 जनवरी 2003 

मधुशाला ..... भाग ---11 

ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला
पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,
हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जीव्हा भूले
कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१।

मेरे अधरों पर हो अंतिम  वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२।

मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।।८३।

और चिता पर जाये उंढेला पत्र न घृत का, पर प्याला
कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालों को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४।

नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिय , पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की 
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।

ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला,
पंडित अपनी पोथी भूला, साधू भूल गया माला,
और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,
किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६।

यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला,
चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला,
स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल,
ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७।

पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों - साकी बाला,
नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला,
साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है,
कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।।८९।

जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।

क्रमश: 


7 टिप्‍पणियां:

  1. संगीता जी मधुशाला को पढवाने का धन्यवाद । वैसे शायद मैं इसे नही पढ पाती ।

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  2. ...कविवर बच्चन जी की कितनी सुन्दर रचना आपने पेश की है!..पढ़ कर मन प्रसन्न हुआ!

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  3. जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
    जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
    जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
    जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।

    ्वाह …………अनमोल कृति है।

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  4. और आदरणीय बच्चन जी को सलाम सहित...देखें टक्कर की मेरी-श्याम मधुशाला ....

    श्याम मधुशाला

    शराव पीने से बड़ी मस्ती सी छाती है ,
    सारी दुनिया रंगीन नज़र आती है ।
    बड़े फख्र से कहते हैं वो ,जो पीता ही नहीं ,
    जीना क्या जाने ,जिंदगी वो जीता ही नहीं ।।

    पर जब घूँट से पेट में जाकर ,
    सुरा रक्त में लहराती ।
    तन के रोम-रोम पर जब ,
    भरपूर असर है दिखलाती ।

    होजाता है मस्त स्वयं में ,
    तब मदिरा पीने वाला ।
    चढ़ता है उस पर खुमार ,
    जब गले में ढलती है हाला।

    हमने ऐसे लोग भी देखे ,
    कभी न देखी मधुशाला।
    सुख से स्वस्थ जिंदगी जीते ,
    कहाँ जिए पीने वाला।

    क्या जीना पीने वाले का,
    जग का है देखा भाला।
    जीते जाएँ मर मर कर,
    पीते जाएँ भर भर हाला।

    घूँट में कडुवाहट भरती है,
    सीने में उठती ज्वाला ।
    पीने वाला क्यों पीता है,
    समझ न सकी स्वयं हाला ।

    पहली बार जो पीता है ,तो,
    लगती है कडुवी हाला ।
    संगी साथी जो हें शराबी ,
    कहते स्वाद है मतवाला ।

    देशी, ठर्रा और विदेशी,रम-
    व्हिस्की, जिन का प्याला।
    सुंदर-सुंदर सजी बोतलें ,
    ललचाये पीने वाला।

    स्वाद की क्षमता घट जाती है ,
    मुख में स्वाद नहीं रहता ।
    कडुवा हो या तेज कसैला ,
    पता नहीं चलने वाला।

    बस आदत सी पड़ जाती है ,
    नहीं मिले उलझन होती।
    बार बार,फ़िर फ़िर पीने को ,
    मचले फ़िर पीने वाला।

    पीते पीते पेट में अल्सर ,
    फेल जिगर को कर डाला।
    अंग अंग में रच बस जाए,
    बदन खोखला कर डाला।

    निर्णय क्षमता खो जाती है,
    हाथ पाँव कम्पन करते।
    भला ड्राइविंग कैसे होगी,
    नस नस में बहती हाला।

    दुर्घटना कर बेठे पीकर,
    कैसे घर जाए पाला।
    पत्नी सदा रही चिल्लाती ,
    क्यों घर ले आए हाला।

    बच्चे भी जो पीना सीखें ,
    सोचो क्या होनेवाला, ।
    गली गली में सब पहचानें ,
    ये जाता पीने वाला।

    जाम पे जाम शराबी पीता ,
    साकी डालता जा हाला।
    घर के कपड़े बर्तन गिरवी ,
    रख आया हिम्मत वाला।

    नौकर सेवक मालिक मुंशी ,
    नर-नारी हों हम प्याला,
    रिश्ते नाते टूट जायं सब,
    मर्यादा को धो डाला।

    पार्टी में तो बड़ी शान से ,
    नांचें पी पी कर हाला ।
    पति-पत्नी घर आकर लड़ते,
    झगडा करवाती हाला।

    झूम झूम कर चला शरावी ,
    भरी गले तक है हाला ।
    डगमग डगमग चला सड़क पर ,
    दिखे न गड्डा या नाला ।

    गिरा लड़खडाकर नाली में ,
    कीचड ने मुंह भर डाला।
    मेरा घर है कहाँ ,पूछता,
    बोल न पाये मतवाला।

    जेब में पैसे भरे टनाटन ,
    तब देता साकी प्याला ।
    पास नहीं अब फूटी कौडी ,
    कैसे अब पाये हाला।

    संगी साथी नहीं पूछते ,
    क़र्ज़ नहीं देता लाला।
    हाथ पाँव भी साथ न देते ,
    हाला ने क्या कर डाला।

    लस्सी दूध का सेवन करते ,
    खस केसर खुशबू वाला।
    भज़न कीर्तन में जो रमते ,
    राम नाम की जपते माला।

    पुरखे कहते कभी न करना ,
    कोई नशा न चखना हाला।
    बन मतवाला प्रभु चरणों का,
    राम नाम का पीलो प्याला।

    मन्दिर-मस्जिद सच्चाई पर,
    चलने की हैं राह बताते।
    और लड़ खडा कर नाली की ,
    राह दिखाती मधुशाला।

    मन ही मन हैं सोच रहे अब,
    श्याम' क्या हमने कर डाला।
    क्यों हमने चखली यह हाला ,
    क्यों जा बैठे मधुशाला॥








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    1. श्याम गुप्त जी ,
      बेहतरीन प्रस्तुति है आपकी ...

      लेकिन बच्चन जी की हाला और मधुशाला केवल शराब को इंगित नहीं करती ....कहीं वो जीवन को ही हाला बता रहे हैं और कहीं भाव सुमनोन के अंगूरों से बनी हाला की बात करते हैं ... उनकी मधुशाला बहुआयामी है ।

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  5. दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं ,

    पीड़ा में आनंद जिसे हो आये मेरी मधुशाला .


    जहां कहीं मिल बैठे हम तुम वहीँ रही हो मधुशाला .

    सार संक्षेप है यही मधुशाला का

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