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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

प्रेरक प्रसंग-23 कुर्ता क्यों नहीं पहनते?

प्रेरक प्रसंग-23

कुर्ता क्यों नहीं पहनते?

प्रस्तुत कर्ता : मनोज कुमार

1919-20 में गांधीजी देश के सबसे बड़े राजनैतिक नेता बन गए। आपने आचार-विचार से उन्होंने लोगों को मोहित कर रखा था। लोग उन्हें महात्मा के रूप में श्रद्धा और भक्ति अर्पित करते थे। स्वेच्छा से अपनाई हुई गरीबी, सादगी, विनम्रता और साधुता आदि गुणों के कारण वह कोई ऐसे अतीतकालीन ऋषि प्रतीत होते थे।

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गांधी जी की हर बात किसी खास मकसद से होती थी। उनके कपड़ों के फ़र्क़ को ही देखें, तो उनके जीवन की क्रांति समझ में आ जाएगी। जब वे बैरिस्टर थे, तब एकदम यूरोपियन पोशाक पहनते थे। बाद में उन्होंने उसका त्याग कर दिया। अफ़्रीका में सत्याग्रह के समय सत्याग्रही पोशाक धारण करने लगे।

जब भारत लौटे, तब काठियावाड़ की पारंपरिक पगड़ी धारण करते थे, धोती पहनते थे। जब उन्हें यह ख्याल आया कि एक पगड़ी में कई टोपियां बन सकती हैं, तब वे टोपी पहनने लगे। इसी टोपी को गांधी टोपी कहा जाने लगा।

फिर उन्होंने कुर्ता और टोपी का त्याग भी कर दिया। केवल एक पंछिया पहनकर ही रहा करते थे। यह पंछिया पहनकर ही वे लंदन में सम्राट पंचम जॉर्ज से मिलने उनके राजमहल गए थे। इसे देखकर चर्चिल नाराज हो गए थे। लेकिन उस महात्मा की आत्मा तो ग़रीब से ग़रीब लोगों से एकरूप होने के लिए छटपटाती रहती थी।

एक बार गांधी जी एक स्कूल के किसी कार्यक्रम में गए थे। महात्मा तो बड़े ही विनोदी स्वभाव के थे। छात्रों के साथ हंसी-मज़ाक़ चल रहा था। एक लड़के ने प्रश्न किया, “आपने कुर्ता क्यों नहीं पहना है? मैं अपनी मां से कहूं क्या? वह कुर्ता सी देगी। आप पहनेंगे न? मेरी मां के हाथ का सिला कुर्ता आप पहनेंगे?”

बापू ने कहा, “ज़रूर पहनेंगे। लेकिन एक शर्त है बेटा! मैं कोई अकेला नहीं हूं।”

बच्चे को उत्सुकता हुई, पूछा, “तब और कितने चाहिए? मां दो सी देगी।”

बापू ने जवाब दिया, “बेटा, मेरे चालीस करोड़ भाई-बहन हैं। चालीस करोड़ लोगों के बदन पर कपड़ा आएगा, तब मेरे लिए भी कुर्ता चलेगा। तुम्हारी मां चालीस करोड़ कुर्ते सी देंगी?”

बापू ने बच्चे की पीठ प्यार से थपथपाई और वहां से चल दिए। विद्यालय के गुरु और छात्र अपनी आंखों के सामने राष्ट्र के दरिद्रनारायण को देखकर स्तम्भित रह गए। बापू राष्ट्र के साथ एकरूप हुए थे।

***

रविवार, 29 जनवरी 2012

प्रेरक प्रसंग-21 : हर काम भगवान की पूजा

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हर काम भगवान की पूजा

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प्रस्तुत कर्ता : मनोज कुमार

बात 1917 की है। साबरमती आश्रम अभी-अभी शुरू हुआ था। गांधी जी का देश में उन दिनों उतना नाम नहीं था। दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह का उनका प्रयोग सफल रहा था। दक्षिण अफ़्रीका से जब वे भारत लौटे तो उनके राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले ने सलाह दी कि पहले भारत को समझने के लिए सारा भारत घूमो। भारत के विभिन्न भागों में घूमकर उन्होंने साबरमती के तट पर आश्रम बनाकर साधना करना आरंभ किया था।

कभी-कभार वे अहमदाबाद के बाररूम चले जाते। वहां वकीलों और अन्य लोगों से मिलते, आश्रम की कुछ चर्चाएं किया करते। गांधी जी की ओर कोई खास ध्यान नहीं देता। धीरे-धीरे कुछ वकीलों में गांधी जी और उनके आश्रम के बारे में जानने की जिज्ञासा बढ़ती गई। गांधी जी के पास आश्रम में कुछ काम मांगने और करने की उनमें से कुछ की इच्छा हुई।

अन्य लोगों के साथ, एक दिन बापू आश्रम के काम में वयस्त थे। बापू तो कर्म योगी थे। खुद ही अपना सारा काम किया करते थे। गांधी जी और विनोबा भावे जी साथ-साथ एक ही चक्की पर बैठकर अनाज पीसते थे। स्वावलंबन के अनूठे मिसाल थे वे। लेकिन जिस दिन की घटना है उस दिन पिसाई नहीं, अनाज सफ़ाई चल रही थी। सफ़ाई हो जाने के बाद पिसाई होना था। गांधी जी, विनोबा जी और अन्य कई लोग अनाज साफ़ कर रहे थे।

जिन वकीलों की ऊपर चर्चा की गई है, उनमें से कुछ वकील लोग आश्रम आए। उनके बैठने के लिए खजूर की चटाई बिछाई गई। गांधी जी ने उन्हें आमंत्रित करते हुए कहा, “आइए-आइए, बैठिए।”

उनमें से एक वकील बोला, “हम बैठने नहीं आए हैं। हम आपके आश्रम का कुछ-न-कुछ काम करने के विचार से आए हैं।”

गांधी जी ने प्रसन्नता से कहा, “ठीक है। बड़ी ख़ुशी की बात है।” इतना कहकर दो-तीन थलियों में अनाज लेकर उन वकीलों के सामने रख दिया और बोले, “यह अनाज साफ़ कीजिए। और हां अच्छी तरह से साफ़ कीजिएगा।”

एक वकील चौंक कर बोला, “हम क्या यह ज्वार-बाजरा साफ़ करते बैठेंगे?”

गांधी जी बोले, “जी हां! इस समय तो यही कम चल रह है।”

क्या करते बेचारे? वे तो सफ़ेदपोश लोग थे। अनाज साफ़ करने लगे। कुछ देर बाद नमस्कार कर चले गए। फिर दुबारा आश्रम में कोई काम मांगने नहीं आए।

इस घटना में जो सबसे प्रमुख बात है वह यह कि गांधी जी की नज़रों में आज़ादी की लड़ाई लड़ना, छुआछूत का निवारण के लिए उपवास रखना जितना महत्व का काम था, उतने ही महत्व का काम था दाल-चावल बीनना भी। उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा कि यह तो औरतों के द्वारा किया जाने वाला तुच्छ काम है। उनका कहना था,

“सेवा का हर काम पवित्र काम है। हर काम में अपनी आत्मा उड़ेल दो। कर्म को ठीक से करना, यही परमेश्वर की पूजा है। यही मोक्ष है।”

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रविवार, 15 जनवरी 2012

प्रेरक प्रसंग-19 : मल परीक्षा – बापू का आश्चर्यजनक प्रयोग

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प्रस्तुत कर्ता : मनोज कुमार

DSCN1514साबरमती आश्रम में ब्रिटेन से आई मेडलिन स्लेड यानी मीरा बहन वहां रहते-रहते बापू की नाक भी बन गईं। उनकी गरुड़-सी नाक उनके चौड़े चेहरे पर बेडौल-सी लगती थी लेकिन उनकी घ्राण-शक्ति बहुत तेज़ थी। बापू गंध के मामले में कच्चे थे। उनकी नाक केवल सांस लेने और चश्मे के टिकाने के काम आती थी। घ्राण अनुभूति के मामले में वे मीरा बहन पर निर्भर हो गए। इस मामले में एक बड़ा ही अद्भुत और रोचक किस्सा है।

एक दिन मीरा बहन हड़बड़ी में नहाकर अपने खुले बालों पर साड़ी का पल्लू ठीक करते निकलीं। अपने साथी सहायक सुमंगल को कहा, “बापू से पहले हम लोगों को वहां पहुंच जाना चाहिए। आप जानते हैं, वे वक़्त के कितने पाबंद हैं।”

आश्रम के बगीचे में पुरुषों के शौचालय के सामने श्याम इंतज़ार करता हुआ खड़ा था। वह एक दलित युवक था। बापू ने दस साल की एक दलित बच्ची को गोद लिया था। श्याम आश्रम में दलित वर्ग का दूसरा सदस्य था। वह पच्चीस साल का था। उसका काला चेहरा चेचक से भरा था। अपनी उम्र से बड़ा दिखता था। उसे अनेक बीमारियां घेरे रहती थीं। कारण का पता ही नहीं चलता। उसकी इन रहस्मय बीमारियों पर से परदा उठाने का जिम्मा बापू ने खुद लिया। वे एक ऐसे डॉक्टर की भूमिका निभाते जो उपचार की प्रचलित विधियों से हट कर अपने प्रयोग करता था। वे कहा करते थे उन्हें ये प्रयोग स्वतंत्रता संघर्ष जितने ही प्रिय थे। इनमें उन्हें वही आनंद मिलता जो स्वतंत्रता संघर्ष में मिलता। किसी बीमार आश्रमवासी की जांच करने और उसका उपचार करने में बापू को जितनी ख़ुशी मिलती ही उतनी शायद ही किसी और काम में मिलती होगी।

बापू अपने पत्राचार का काम खत्म करके टहल रहे थे। टहलते-टहलते वे सहसा रुक गए। अपने साथ टहलने वाले अन्य व्यक्ति से उन्होंने कहा, “मुझे थोड़ी देर की छुट्टी लेनी होगी। एक लड़के के मल की परीक्षा करनी है। … आप लोग चलें, मैं काम पूरा होने के बाद फिर लौटूंगा।”

DSCN1378वे मगनवाड़ी के बाग की तरफ़ मुड़ गए जहां मीरा, सुमंगल और श्याम इंतज़ार कर रहे थे। बापू, श्याम जिसे भाऊ भी कहा जाता था, की बीमारी के कारण का पता लगाने के लिए उसके मल की जांच करने की आश्चर्यजनक क्रिया करने वाले थे। भाऊ पर बापू का प्रयोग चल रहा था। भाऊ को अपच और पेचिश की शिकायत रहती थी। बापू के द्वारा बदल-बदल कर भिन्न-भिन्न खूराक पर उसे रखा जा रहा था। कोई विशेष लाभ न देख उसके मल की परीक्षा यह देखने के लिए की जाने वाली थी कि भोजन का कौन पदार्थ बिना पचा बाहर निकल गया है।

भाऊ का मल ज़मीन पर मलमल के एक कपड़े पर रखा था। उसके मल की जांच शुरू हुई। इस जांच में श्याम सहायक की भूमिका निभा रहा था। बापू पास खड़ी मीरा से कह रहे थे, “ज़रा सोचो मीरा, हमारे कितने ग़रीब देशवासी श्याम की तरह अपच और पेचिश के शिकार होते हैं। साफ़-सफ़ाई और स्वास्थ्य संबंधी शिक्षण ही इसका एक समाधान है। दूसरा समाधान है सस्ती और आसानी से उपलब्ध साग-सब्जी का आहार, जिसे ग़रीब लोग ख़रीद सकते हैं।

भाऊ उस बारीक साफ़ कपड़े को ताने हुए था। बापू एक टहनी से मलमल के कपड़े पर बिखरे श्याम के पीले मल को कुरेद कर जांच कर रहे थे। झुके रहने के कारण उनका गोलाकार, कमानी वाला चश्मा उनकी नाक की नोंक कर फिसल आया। चश्मे को नाक पर ऊपर चढ़ाते हुए उन्होंने कहा, “इसकी और सफ़ाई की ज़रूरत है।” उन्होंने चश्मा उतारकर उसके शीशों को अपनी धोती के छोर से साफ़ किया।

मीरा बहन ने सुमंगल की ओर देख कर सिर हिलाया और शौचालय के दरवाज़े पर रखे पानी के घड़े की ओर इशारा किया। घड़े के किनारे से लंबी मूठ लगा टिन का डिब्बा लटक रहा था। सुमंगल ने उस कपड़े पर पानी गिराना शुरू किया, तो मीरा बेन ने एक चम्मच से मल को मथना और धीरे-धीरे धोना शुरू किया। छन-छन कर गंदा पीला पानी मलमल के कपड़े से नीचे गिरने लगा और कपड़े पर मल का वह भाग रह गया जो अब पानी में घुल कर छन नहीं सकता था। यह सब इसलिए किया जा रहा था ताकि पता चले किए कौन-से खाद्य उसमें हैं जो पच नहीं पाए और इसलिए उन्हें भोजन से काटा जाना चाहिए।

बापू ने फिर से उस कपड़े में रह गए मल के अवशेष को कुरेद-कुरेद कर देखना शुरु किया। मीरा बहन इस क्रिया की एक प्रमुख पात्र थीं। जहां बापू की घ्राणेन्द्रिय प्रायः एकदम निश्चेष्ट थीं, वहां मीरा बहन की घ्राण-शक्ति अत्यंत प्रखर समझी जाती थी। जब कोई खाद्य तत्व पहचान में नहीं आता, कहीं कोई संदेह होता, तो आंखों से निरीक्षण कर रहे बापू मीरा बेन की घ्राण विशेषता का सहारा लेते। बापू मल के उस अवशेष में से कोई रेशा या कोई छोटा टुकड़ा उस सींक पर उठाते और मीरा बहन झुक कर उसे ज़ोरों से सूंघती। बापू जिस टुकड़े या रेशे को पहचान नहीं सकते थे उसे सूंघ कर मीरा बहन बताती थीं कि वह किस मूल खाद्य पदार्थ का विकृत रूप या अवशेष है।

मीरा बहन की घ्राण विशेषता उनका नैसर्गिक गुण तो था ही, पर उन्होंने बचपन से इसपर शान भी चढ़ाया। बचपन से उनकी आदत थी कि सड़े गले फूल पत्ते को सूंघ-सूंघ कर वे उन्हें पहचाना करतीं। अलग-अलग जगह, अलग-अलग पशु-पक्षियों और वनस्पत्तियों की गंध भी अलग-अलग होते हैं। मीरा बहन कई गंधों के मिश्रण में से किसी खास गंध की पहचान कर सकती थीं।

सूरज चमक रहा था। पक्षी कलरव कर रहे थे। श्याम के मल की दुर्गंध चारों ओर फैल रही थी। धूप की गरमी से बदबू तेज होती जा रही थी। बापू और मीरा बहन इन सब से बेखबर अपने काम में मग्न थे।

काफ़ी देर बाद भी सभी खाद्य तत्वों का पता नहीं लगा सका और कुछ के बारे में संदेह रह गया, क्योंकि मल और उसके जल की दुर्गंध इतनी प्रबल थी कि मीरा बहन की घ्राणेन्द्रिय भी उस दुर्गंध के आवरण में छिपी खाद्य-गंधों का अन्वेषण नहीं कर पा रही थी। तब बापू ने निर्देश दिया, “इसे कुछ देर धूप में सूखने दो ताकि मल की गंध उड़ जाए। मीरा की नाक अलग-अलग खाद्य पदार्थों की गंध पहचान सकती है।” बापू का ख्याल था कि सब अवशिष्ट टुकड़ों और रेशों के धूप में सुखा लिए जाने पर मल की दुर्गंध लुप्त हो जागी और विभिन्न खाद्य पदार्थ की गन्ध बनी रह जाएगी जिसके कारण उनकी पहचान की जा सकेगी।

श्याम के कंधे को थपथपाते हुए बापू बोले, “यहीं बैठना और देखना कि कौवे न आएं।” इतना करने के बाद बापू, मीरा बहन और सुमंगल लौट आए। भाऊ के उस मलावशेष के सूख जाने पर वे पुनः वहां गए और सभी खाद्य पदार्थों की गंध पहचानी जा सकी। अब यह स्पष्ट हो चुका था कि भाऊ की पाचन-शक्ति किन खाद्य पदार्थों को पचा सकती है और किन को नहीं। उसे किन खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए, इसकी सलाह बापू ने दी। भाऊ का रोग धीरे-धीरे दूर हुआ।

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रविवार, 8 जनवरी 2012

प्रेरक प्रसंग-18 : बच्चों के साथ तैरने का आनंद

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प्रस्तुत कर्ता : मनोज कुमार

डाउनलोड करेंगांधी जी को बच्चों की संगति में बड़ा आनंद आता था। ब्च्चों के साथ को वे भगवान का साथ मानते थे। वे बच्चों के साथ हंसते-खेलते, विनोद करते थे।

एक मद्रासी बच्चे ने एक बार उनसे ज़िद की, “कॉफ़ी पिलाओ!”

ख़ुश होकर बापू ने ख़ुद ही कॉफ़ी बनाई। उस बच्चे को पिलाया। पर बापू इतने से ही कहां संतुष्ट होने वाले थे। बड़े प्यार से उस बच्चे से उन्होंने पूछा, “क्या तेरे लिए और कुछ बना दूं? इडली खाएगा? दोसा बना दूं?”

गांधी जी बहुत अच्छे रसोइया थे। यह बात जग ज़ाहिर थी। जीवन की सब उपयोगी बातें वे जानते थे।

1926 में घटित एक मज़े का किस्सा आपको बताता हूं। बापू खादी के प्रचार-प्रसार के दौरे पर से आराम की दृष्टि से कुछ दिनों के लिए साबरमती आश्रम लौट कर आए थे। साबरमती नदी कलकल-छलछल करती हुई बह रही थी। आश्रम के सदस्य उस नदी में स्नान करने जाते थे। एक दिन बच्चों ने उन्हें घेर लिया। एक बच्च बोला, “बापू जी, आज आपको भी तैरने चलना चाहिए।”

बापू मुस्कुराने लगे।

दूसरा बच्चा बोला, “सचमुच! मज़ा आएगा!! आज बापू को लिए बिना हम नहीं छोड़ेंगे।”

बापू हंस पड़े।

तीसरा बच्चा विनोद करने लगा, “लेकिन बापू तैरना भूल गए होंगे!”

बापू ठहाका लगाने लगे।

पहला बच्चा बोला, “तैरना कोई भूलता है? बापू, आप चलेंगे न? हमें देखना है आप कैसे तैरते हैं?”

बापू ने कहा, “लोकमान्य तिलक अच्छे तैराक थे। गंगा की बाढ़ में वे कूद पड़े थे। तैरकर गंगा पार गए।”

दूसरा बच्चा बोला, “परन्तु लोकमान्य ने तो अभ्यास किया था। बापू, आज आप हमें तैरकर दिखाइए न। बड़ा मज़ा आएगा!”

बापू हंस रहे थे।

तीसरा बच्चा बोला, “बापू सिर्फ़ हंस रहे हैं। वे नहीं चलेंगे। ... चलिए न बापू। आज हमारे साथ तैरने चलिए न।”

गांधी जी इन्कार नहीं कर सके। जाने के लिए तैयार हो गए। बच्चे ख़ुश हो गए। तालियां बजने लगी।

गांधी जी बच्चे के साथबापू आगे-आगे, पीछे-पीछे सारा आश्रम। साबरमती नदी भी मानों ख़ुशी से ऊछल पड़ी हो। उसकी तरंगें नाच रहीं हो। आज बापू से उनका सामना जो होने वाला था। ब्रिटिश सत्ता से जूझने वाला वीर योद्धा आज साबरमती की लहरों से खेलनेवाला था।

बच्चे पानी में उतरे। एक चिल्लाया, “बापू, आइए, चलिए।”

गांधी जी कूद पड़े। उन्होंने सतर मारना शुरू किया। सप-सप पानी काटते हुए वे आगे बढ़ रहे थे। बच्चे आनंदविभोर होकर बापू की जयघोष करने लगे। तालियां बजाने लगी। कुछ तो गांधी जी का पीछा करके उन्हें छूने के लिए चल पड़े। सबको बड़ा मज़ा आया। सब आनंद से प्रफुल्लित थे।

55 वर्ष की आयु में गांधी जी ने डेढ़ सौ गज की दूरी तैरकर पार की। बच्चों की ख़ुशी के लिए बापू तैरने गए थे। ऐसे थे बापू! सबके लाड़ले राष्ट्रपिता!

रविवार, 25 दिसंबर 2011

प्रेरक प्रसंग-17 : नाम –गांधी, जाति – किसान, धंधा – बुनाई

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प्रस्तुतकर्ता : मनोज कुमार

gandhi (10)मार्च 1922 की बात है। बारडोली का सत्याग्रह स्थगित किया जा चुका था। गांधी जी को गिरफ़्तार करने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन आन्दोलन रोक देने के कारण गांधी जी के प्रति जनता और राष्ट्र के नेता क्षुब्ध हैं, यह देखकर उस प्रभावशाली नेता को जेल भेजने का निश्चय सरकार ने किया।

10 मार्च 1922 को गांधी जी को गिरफ़्तार किया गया और उनपर सरकार के विरुद्ध द्वेष फैलाने का अभियोग लगाया गया। अहमदाबाद की अदालत में मुकदमा चला। गांधी जी ने अपराध स्वीकार करते हुए कहा, “इस शासन के विरुद्ध असन्तोष पैदा करना मेरा धर्म है। बुराई से असहयोग करना वैसा ही फ़र्ज़ है जैसा अच्छा से सहयोग।”

इसके पहले लोकमान्य तिलक को छह वर्ष की सज़ा दी गयी थी। उसी उदाहरण को सामने रखकर न्यायाधीशों ने गांधी जी को भी छह वर्ष की सज़ा सुनाई। अब छह साल तक बाहर रहकर बापू देश को नेतृत्व देने वाले नहीं थे। महादेवभाई रोने लगे। तात्या साहब केलकर उन्हें धीरज बंधा रहे थे। दृश्य बड़ा ही हृदय विदारक था।

उधर बंगाल के एक गांव में एक मकान में एक संतरी रो रहा था। क्यों? वह भला क्यों रो रहा था?

उस मकान में क्रांतिकारी उल्लासकर दत्त रहते थे। अभी-अभी वे जेल से छूटे थे। अपने मकान के पहरेदार को रोते देख वे उसके पास गए। उसके हाथ में एक अख़बार था। क्रांतिकारी दत्त ने उससे पूछा, “क्यों रोते हो?”

पहरेदार ने कहा, “मेरी जाति के एक आदमी को छह वर्ष की सज़ा हुई है। वह बूढ़ा है। 54-55 वर्ष की उसकी उमर है। देखो, इस अख़बार में छपा है।”

अख़बार में गांधी जी के उस ऐतिहासिक मुकदमे की तफ़सील थी। गांधी जी ने मुकदमे के दौरान अपनी जाति किसान बतायी थी और धन्धा कपड़े की बुनाई लिखाया था। वह पहरेदार मुसलमान था। वह बुनकर जाति का था। यह ख़बर पढ़कर उसकी आंखें भर आई थी।

क्रांतिकारी दत्त की समझ में सारी बातें आ गई। वह अपने संस्मरण में लिखते हैं, “हम कैसे क्रांतिकारी हैं? सच्चे क्रांतिकारी तो गांधी जी हैं। सारे राष्ट्र के साथ वे एकरूप हुए थे। मैं किसान हूं, मैं बुनकर हूं, --- यह उनका शब्द राष्ट्रभर में पहुंच गया होगा। करोड़ों लोगों को यही लगा होगा कि हममें से ही कोई जेल गया। जनता से जो एकरूप हुआ, जनता से जिसने संपर्क जोड़ा, वही विदेशियों के बन्धन से देश को मुक्त कर सकता है। उस सच्चे महान क्रांतिकारी को प्रणाम!”

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रविवार, 18 दिसंबर 2011

प्रेरक प्रसंग-16 : सफ़ाई – ज्ञान का प्रारंभ

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प्रस्तुतकर्ता : मनोज कुमार

DSCN1508गांधी जी अफ़्रीका के सत्याग्रह में सफलता प्राप्त कर भारत लौट आए थे। अपने गुरु श्री गोखले के कथनानुसार वे समूचे भारत में घूम रहे थे। संयुक्त प्रांत में घूमते समय बिहार के कुछ लोग उनसे मिले। बिहार के चंपारण में गोरे ज़मींदारों ने भारी जुल्म मचा रखा था। बिहार के शिष्टमंडल के लोगों ने कहा, “गांधी जी, आप आइए, हमें रास्ता दिखाइए।”

गांधी जी बोले, “मैं ज़रूर आऊंगा। लेकिन आप लोगों को मेरी बात माननी होगी।”

उन्होंने स्वीकार किया, “जैसा आप कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे।”

“जेल जाने की तैयारी रखेंगे?”

“जी, हां।”

बात तय हो गयी और कुछ दिनों के बाद चंपारण सत्याग्रह के लिए वे दौड़ पड़े। श्री राजेन्द्र बाबू वगैरह बिहार के सत्याग्रही लोग उसी समय पहले-पहल गांधी जी से मिले। किसानों का काम तो शुरू हुआ, लेकिन गांधी जी को सारी जनता के अंदर चेतना जगानी थी। कई साथी स्वयंसेवकों से उन्होंने कहा, “आप लोग देहातों में जाएं और किसानों के बच्चों के लिए स्कूल चलाएं।”

DSCN1509कस्तूरबा भी चंपारण गयी थीं। एक दिन गांधी जी ने उनसे कहा, “तुम क्यों कोई स्कूल नहीं शुरू करती? किसानों के बच्चों के पास जाओ, उन्हें पढ़ाओ।”

कस्तूरबा बोलीं, “मैं क्या सिखाऊं? उन्हें कया मैं गुजराती सिखाऊं? अभी मुझे बिहार की हिन्दी आती भी तो नहीं।”

गांधी जी बोले, “बात यह नहीं है। बच्चों का प्राथमिक शिक्षण तो सफ़ाई का है। किसानों के बच्चे को इकट्ठा करो। उनके दांत देखो। आंखें देखो। उन्हें नहलाओ। इस तरह उन्हें सफ़ाई का पहला पाठ तो सिखा सकोगी। मां के लिए यह सब करना कठिन थोड़े ही है। यह सब करते-करते उनके साथ बातचीत करोगी, तो वे भी तुमसे बोलेंगे। उनकी भाषा तुम्हारी समझ में आने लगेगी और आगे जाकर तुम उन्हें ज्ञान भी दे सकोगी। लेकिन सफ़ाई का पाठ तो कल से ही उन्हें देना शुरू करो।”

कस्तूरबा अगले दिन से वही करने लगीं, बालगोपालों की सेवा का असीम आनन्द लूटने लगीं।

गांधी जी सफाई को ज्ञान का प्रारंभ मानते थे।

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रविवार, 13 नवंबर 2011

प्रेरक प्रसंग-11 : नियम भंग कैसे करूं?

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प्रस्तुत-कर्ता : मनोज कुमार

1929 की बात है। एक दिन गांधी जी को किसी विशेष कारण से शाम की प्रार्थना में पहुंचने में एक मिनट की देरी हो गई। आश्रम के प्रवेश द्वार पर जब वे पहुंचे तो वहां मौज़ूद व्यक्ति ने छोटा दरवाज़ा खोल दिया। उसने बापू से कहा कि आप प्रवेश कर जाएं। पर गांधी जी भीतर नहीं गए, वहीं खड़े रहे।

जब प्रार्थना समाप्त हुई तो वे प्रार्थना-स्थल पर पहुंचे। उन्होंने अपने भाषण में भाग न ले सकने का कारण बताते हुए कहा,

“मैं प्रर्थना-सभा में कैसे आ सकता था? प्रार्थना तो शुरु हो चुकी थी। मैंने ही तो यह नियम बनाया है कि प्रार्थना शुरु होने के बाद, प्रार्थना-सभा में कोई प्रवेश न करे। इसलिए तीनों प्रवेश द्वार पर जालीदार छोटे-छोटे दरवाज़े लगवा दिए गए हैं, जिन्हें बंद करने से दूर से ही पता चल जाए किए प्रार्थना शुरु हो गई है।”

बापू कहा करते थे, “प्रार्थना तो मेरी खुराक है। मैं पानी और खाने के बिना कई दिनों तक रह सकता हूं, लेकिन प्रार्थना के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता।”

DSCN1592उनका कहना था, कि जो मनुष्य आखिरी समय में जिसका चिन्तन करेगा, उसी की गति पाएगा। मतलब अन्त में राम का चिन्तन किया और राम-नाम लिया, तो वह राम को पाएगा। इस पर किसी ने उनसे पूछा कि जब ऐसा है तो फिर दिन में दो बार आप प्रार्थना क्यों करते है, बल्कि आखिर की घड़ी में राम-राम शब्द बोलेंगे, तो भी तो सद्गति हो ही जाएगी न।

गांधी जी ने उसे समझाया, “बात तो तुम ठीक कह रहे हो। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। यह समझ लेना चाहिए कि जिसने जीवन-भर राम-नाम का जप नहीं किया, उसके मुंह से आखिर में राम-नाम निकलेगा ही नहीं। आन्तिम समय में मुंह से राम-नाम निकले इसके लिए तो जीवन राममय बनाना होगा, तभी यह सम्भव है।”

बापू के मुंह से आन्तिम शब्द निकले थे --- हे राम! हे राम!

कितना राममय था बापू का सारा जीवन!

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रविवार, 9 अक्टूबर 2011

कष्ट का कोई अनुभव नहीं

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कष्ट का कोई अनुभव नहीं

प्रस्तुत कर्ता – मनोज कुमार

images (21) - Copyगांधी जी को बीमारों की सेवा करने का शौक तो बचपन से ही था। कोई अत्यंत बीमार हो और मृत्यु शय्या पर हो, और गाधी जी से मिलना चाहता हो तो असुविधा और कष्ट बर्दाश्त करके भी रोगी से मिलने चले जाते थे।

दिल्ली में एक मरणासन्न रोगिणी थीं। रोग से लड़ते-लड़ते उनके शरीर का ह्रास हो चुका था। केवल कुछ सांसें बाक़ी थीं। उन्होंने जीवन से बिदाई ले ली थी। लम्बी यात्रा करनी है ऐसा मानकर राम-राम करते अपने अंतिम दिन काट रही थी। रोगिणी ने घनश्यामदास बिड़ला से कहा, “क्या गांधी जी के दर्शन भी हो सकते हैं? जाते-जाते अन्त में उनसे मिल तो लूं।”

उन दिनों गांधी जी दिल्ली के आसपास भी नहीं थे। उनका दर्शन असम्भव था, पर अंतिम सांसें गिनते प्राणी की आशा पर पानी फेरना उचित न समझते हुए बिड़ला जी ने कहा, “देखेंगे। आपकी इच्छा ईश्वर शायद पूरी कर दे।”

दो दिनों बाद बिड़ला जी को सूचना मिली कि गांधी जी कानपुर से दिल्ली होते हुए अहमदाबाद जा रहे हैं। जिस गाड़ी से वे आ रहे थे वह सुबह चार बजे दिल्ली पहुंचती थी। अहमदाबाद की गाड़ी पांच बजे छूटती थी। केवल घण्टे भर का समय था। बीमार महिला दिल्ली से सोलह किलोमीटर की दूरी पर थी। एक घंटे में रोगी से मिलना और वापस स्टेशन पहुंचना लगभग असंभव था।

जाड़े का मौसम था। हवा काफ़ी तेज़ थी। उन दिनों मोटर गाड़ियां खुली छत वाली हुआ करती थीं। गांधी जी को सवेरे-सवेरे ऐसी गाड़ी में बत्तीस किलोमीटर का सफ़र कराना भी भयानक ही था। गांधी जी आ रहे हैं यह भी उस रोगिणी को मालुम नहीं था। इन सारी परिस्थिति के बीच उस बीमार महिला की गांधी जी की अंतिम इच्छा बिड़ला जी के सम्मुख थी। उन्होंने गांधी जी के गाड़ी से उतरते ही दबे स्वरों में पूछा, “आप आज ठहर नहीं सकते?”

गांधी जी ने कहा, “ठहरना मुश्किल है।”

बिड़ला जी हताश हो गये।

तुरत ही गांधी जी ने पूछा, “ठहरने के बारे में क्यों पूछा तुमने?”

बिड़ला जी ने कारण बताया। गांधी जी ने सुनते ही कहा, “चलो, अभी चलो!”

बिड़ला जी ने हिचकिचाते हुए कहा, “पर मैं आपको इस जाड़े में, ऐसी तेज़ हवा में, सुबह के वक़्त मोटर में बिठाकर कैसे ले जा सकता हूं?”

गांधी जी ने सहज भाव से कहा, “इसकी चिंता छोड़ो। मुझे मोटर में बिठाओ। समय खोने से क्या लाभ? चलो, चलो।”

9788170286684बिड़ला जी ने गांधी जी को मोटर में बैठाया। जाड़ा और ऊपर से पैनी हवा बेरहमी से अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे। सूर्योदय तो अभी हुआ नहीं था। रुग्णा के घर वे ब्रह्ममुहूर्त में वे पहुंचे। रुग्णा शय्या पर पड़ी ‘राम-राम’ जप रही थी। गांधी जी उसकी चारपाई के पास पहुंचे। बिड़ला जी ने उससे कहा, “गांधी जी आए हैं।”

उस महिला को विश्वास नहीं हुआ। हक्की-बक्की रह गई वो। सकपकाकर उठ कर बैठने की कोशिश करने लगी। पर उसमें शक्ति कहां थी? उसकी आंखों से दो बूंदें चुपचाप गिर गईं। उसकी आत्मा को क्या सुख मिला उसकी आंखें बता रही थीं।

वापस होत-होते गांधी जी की गाड़ी दिल्ली से छूट चुकी थी। मोटर से सफ़र करके आगे के स्टेशनों पर उन्होंने गाड़ी पकड़ी। गांधी जी को कष्ट तो हुआ, पर रोगी को जो शान्ति मिली, उस सन्तोष में गांधी जी को कष्ट का कोई अनुभव नहीं था।

रविवार, 25 सितंबर 2011

प्रभावकारी अहिंसक शस्त्र

प्रेरक प्रसंग-4

प्रभावकारी अहिंसक शस्त्र

मनोज कुमार

DSCN1454गांधी जी प्रायः सप्ताह में एक दिन मौन धारण किया करते थे और दिन होता था सोमवार। इसके द्वारा वे अपने गले को सुरक्षित रखना चाहते थे और अपने शरीर में साम्य। अपना मौन वे दो ही परिस्थिति में तोड़ सकते थे, एक जब किसी अनिवार्य मसले पर किसी उच्च अधिकारी से बात करनी हो, या दूसरे किसी बीमार आदमी की देखभाल करनी हो। उपवास के दौरान गांधी जी पानी में चुटकी भर सोडियम बाइकार्बोनेट मिलाकर लेते थे। वे मानते थे कि ग़रीब और निसहाय लोगों के लिए उपवास सबसे मज़बूत शस्त्र है। जब भी वे विकट परिस्थित में होते थे, इसका इस्तेमाल करते थे। उनके जीवन में बड़ी बड़ी सफलताएं इसके प्रयोग से हासिल हुईं। अपने सम्पूर्ण जीवन में उन्होंने सोलह बार उपवास ग्रहण किया। दो बार उनका उपवास 21 दिनों तक चला। उनहोंने स्वीकार किया है कि सार्वजनिक जीवन में खुद पर आरोपित इस तरह की यातना बहुत ही प्रभावकारी अहिंसक शस्त्र सिद्ध हुआ। इसके प्रयोग के वे सारे संसार में सबसे बड़े सिद्धान्तकार कहलाए। लेकिन उनका कहना था कि उपवास का निश्चय कुछ खास परिस्थितियों में लिया जाना चाहिए।

DSCN1415उपवास के दौरान उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत होती या कुछ सूचना देनी होती, तो काग़ज़ के टुकड़े पर लिखकर बताते थे। लेकिन काग़ज़ का यह टुकड़ा भी नया या कोरा नहीं होता था। बापू आए हुए पत्रों के पीछे, जिन पर कुछ लिखा हुआ न हो या लिफ़ाफों को खोलकर उनके अन्दर की ओर के बिना लिखे या बिना छपे वाले हिस्से पर लिखा करते थे। बापू का कहना था,

“हमें आवश्यकता से तनिक भी ज़्यादा उपयोग नहीं करना चाहिए। और हर चीज़ का इस्तेमाल किफ़ायत से करना चाहिए।”

रविवार, 18 सितंबर 2011

ग़रीबों को याद कीजिए

प्रेरक प्रसंग-3

ग़रीबों को याद कीजिए

ग़रीब लोग बापू के दिमाग में सबसे पहले आते थे। ईश्वर की सेवा का अर्थ उनके लिए ग़रीबों की सेवा था। उन दिनों मलेरिया महामारी के रूप में फैल जाती थी। लाखों लोग इससे जान गंवा बैठते थे। आश्रम में भी यह बीमारी हर साल आती थी। साबरमती आश्रम में एक बार बापू ने डॉक्टरों से पूछा कि मलेरिया की महामारी से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है?”

डॉक्टरों ने सलाह दी, “मच्छरदानी लागाइए।”

बापू ने कहा, “डॉक्टर साहब, सभी लोगों को मच्छरदानी कहां मिलेगी? क्या कोई ऐसा तरीक़ा नहीं है जिससे ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति भी फ़ायदा उठा सके?”

डॉक्टर ने एक तरीक़ा सुझाते हुए कहा, “शरीर को चादर से ढक कर और मुंह पर मिट्टी का तेल मल कर सोइए। इससे मच्छर नहीं आएंगे।”

बापू ने इस राय को मान लिया। उन्होंने उसी दिन से मच्छरदानी लगाना छोड़ दिया। सोते समय अपने मुंह पर मिट्टी का तेल मलना शुरु कर दिया। और ज़मीन पर सोने लगे। एक विदेशी ने उन्हें ज़मीन पर सोये देख कर पूछा, “बापू, आप ज़मीन पर क्यों सोते हैं? मोटा गद्दा क्यों नहीं बिछाते?”

बापू ने जवाब दिया, “इसलिए कि मैं इस देश के लाखों ग़रीबों के साथ अपने को जोड़ सकूं।”

उन्होंने कहा था, “जब आपको किसी कार्य के बारे में दुविधा हो, उस समय आप देश के उस सबसे ग़रीब व्यक्ति के चेहरे की याद कीजिए जिसे आपने कभी देखा है और अपने से प्रश्न कीजिए कि जो कदम आप उठाने जा रहे हैं, उससे कोई लाभ होगा या नहीं?”

बापू ग़रीबों के लिए ही जिए और मरे।

रविवार, 11 सितंबर 2011

सहूलियत का इस्तेमाल

प्रेरक-प्रसंग-2

सहूलियत का इस्तेमाल

30 मार्च 1947

प्रस्तुत कर्ता : मनोज कुमार

गांधी जी मूलतः एक संवेदनशील व्यक्ति थे। अपने सिद्धांतों की कद्र करने वाले। वे आत्मा की आवाज़ सुनते थे। उनकी संवेदना, उनके तर्क और आध्यामिकता के बीच एक निष्पक्ष जज की तरह आ खड़ी होती थी। फिर उनकी सोच एक सिद्धांत की तरह सामने आती थी।

बापू लॉर्ड माउण्ट बैटन से मिलने जा रहे थे। नोआखाली और बिहार के ऐक्य-यज्ञ के बाद उनकी यह पहली यात्रा थी। वाइसरॉय की ओर से सूचना यह दी गई थी कि बापू को हवाई जहाज से दिल्ली पहुंचना है। पर बापू ने हवाई जहाज से जाने से इंकार कर दिया। बोले, “जिस वाहन में करोड़ों ग़रीब सफ़र नहीं कर सकते, उसमें मैं कैसे बैठ सकता हूं? मेरा काम तो रेल से भी अच्छी तरह चल जाता है। मैं रेल से ही आऊँगा।”

बापू ने यात्रा की तैयारी के लिए मनुबहन गांधी को आवश्यक निर्देश देते हुए कहा, “तुम्हें मेरे साथ आना है। सामान कम से कम लेना है। छोटे-से-छोटा तीसरे दर्ज़े का एक डब्बा पसंद कर लेना। मगर देखना, इसमें तुम्हारी कड़ी परीक्षा है, ख़्याल रखना!”

मनुबहन ने सामान तो कम-से-कम लिया, मगर डब्बा पसन्द करते समय उन्हें ख़्याल हुआ कि हर स्टेशन पर दर्शन करने वालों की भीड़ के कारण बापू घड़ी भर आराम नहीं कर पाएंगे। इसलिए उन्होंने दो भाग वाला एक डब्बा पसन्द किया। एक में सामान रख लिया और दूसरे में बापू के सोने-बैठने का इंतज़ाम कर दिया।

DSCN1429पटने से दिल्ली की गाड़ी सुबह 9.30 बजे चली। बापू 9.25 बजे स्टेशन पर आए। वहां लोगों की भीड़ उमड़ी पड़ी थी। गाड़ी पर चढ़ने के बाद बापू ने देखा कि गाड़ी खुलने में अभी पांच मिनट है। मिनट-मिनट का उपयोग करने वाले गांधी जी ने पांच मिनट में फ़ण्ड इकट्ठा कर लिया।

रेल से यात्रा शुरु हुई। 24 घंटे का रास्ता था। हर स्टेशन पर राष्ट्रपिता के दर्शन के लिए हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। पर बापू को इन सब तकलीफ़ों की फ़िकर ही कहां थी! बापू दिन में 10 बजे भोजन करते थे। मनुबहन सब तैयारियां करने के लिए डब्बे के दूसरे हिस्से में गयीं। थोड़ी देर के बाद बापू के पास आई। लिखने में व्यस्त बापू ने पूछा, “कहां थी?”

मनुबहन ने बताया, “खाना तैयार कर रही थी।”

बापू ने कहा, “ज़रा खिड़की के बाहर नज़र डालकर देखो।”

मनुबहन को लगा कुछ भूल ज़रूर हो गई है। उन्होंने खिड़की के बाहर देखा तो उन्हें लोग लटके हुए नज़र आए।

मिठी-सी झिड़की देकर बापू ने कहा, “क्या इस दूसरे कमरे के लिए तुमने कहा था?”

मनुबहन ने कहा, “जी हां। मेरा ख़्याल था कि अगर इसी कमरे में अपना काम करूँ, बरतन मलूँ, तो आपको तकलीफ़ होगी। इसलिए मैंने दो कमरे का डब्बा लिया।”

बापू कहने लगे, “कितनी कमज़ोर दलील है। इसी का नाम अंधा प्रेम है। तुम जानती हो न कि मेरी तकलीफ़ बचाने के लिए वाइसरॉय ने हवाई जहाज का इंतज़ाम किया गया था। किन्तु मैंने उसका उपयोग करने से इंकार कर दिया था। ऐसा करने के बाद स्पेशल रेलगाड़ी से सफ़र करने की व्यवस्था की गयी थी। लेकिन एक स्पेशल ट्रेन के पीछे कितनी गाड़ियां रुकें और हजारों का खर्च हो जाय? यह मुझसे कैसे सहा जाय? मैं तो बड़ा लोभी हूँ। मना कर दिया। आज तुमने सिर्फ़ दूसरा कमरा ही मांगा, लेकिन अगर सलून भी मांगती तो वह भी तुम्हें मिल जाता। मगर क्या यह तुम्हें शोभा देता? तुम्हारा यह दूसरा कमरा मांगना सलून मांगने के बराबर है। मैं जानता हूं कि तुम मेरे प्रति अत्यंत प्रेम की वजह से ही यह सब करती हो। लेकिन मुझे तुम्हें ऊपर चढ़ाना है, नीचे नहीं गिराना है। तुम्हें भी यह समझ लेना चाहिए।”

मनु बहन की आंखों से अविरल अश्रु की धार बह चली।

बापू ने देखा तो बोले, “मैं इधर तुम्हें यह बात कह रहा हूं और उधर तुम्हारी आंखों से पानी बह रहा है, वह नहीं बहना चाहिए। अब इन बातों का प्रायश्चित यही है कि तुम सब सामान इस कमरे में ले लो, और अगले स्टेशन पर स्टेशन मास्टर को मेरे पास बुलाना।”

थर-थर कांपते हुए मनु ने सामान हटाया। उन्हें यह चिन्ता भी सता रही थी कि बापू का काम सब कैसे होगा? घर के सब काम – पढ़ना, लिखना, मिट्टी का लेप लगाना, कातना, मनु को पढ़ाना – जैसे घर में होता था, वैसे ही ट्रेन में भी होते थे!

अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकने पर स्टेशन मास्टर को बुलाया गया। उससे बापू ने कहा, “यह मेरी पोती, बड़ी भोली है। शायद यह अभी तक मुझे समझ नहीं पाई है, इसलिए इसने दो कमरे चुन लिए। इसमें इसका दोष नहीं है, दोष मेरा ही है। क्योंकि मेरे शिक्षण में ही कुछ अधूरापन रह गया होगा। अब प्रायश्चित तो दोनों को मिलकर करना होगा। हमने दूसरा कमरा ख़ाली कर दिया है। जो लोग गाड़ी पर लटक रहे हैं, उनके लिए कमरे का उपयोग कीजिए। तभी मेरा दुख कम होगा।”

स्टेशन मास्टर ने बहुत मिन्नतें की। पर बापू कहां मानने वाले थे। स्टेशन मास्टर ने कहा कि उन लोगों के लिए वह दूसरा डब्बा जुड़वा देगा। बापू ने कहा, “हां, दूसरा डब्बा तो जुड़वा ही दीजिए, मगर इस कमरे का भी इस्तेमाल कीजिए। जिस चीज़ की हमें ज़रूरत न हो वह ज़्यादा मिल सकती हो, तो भी उसका उपयोग करने में हिंसा है। मिलनेवली सहूलियतों का दुरुपयोग करवाकर क्या आप इस लड़की को बिगाड़ना चाहते हैं?”

बेचारे स्टेशन मास्टर शर्मिन्दा हुए। उन्हें बापू का कहना मानना पड़ा।

बापू तो सारे हिन्दुस्तान के पिता ठहरे। वे आराम से बैठे रहें और उनके बच्चे लटकते हुए सफ़र करें, यह उनसे कैसे सहा जाता? इससे लटकते लोगों को जगह मिली और मनु बहन को यह अमूल्य सबक कि जो सहूलियतें मिल सकती हैं, उनमें से भी कम से कम अपने उपयोग में लेनी चाहिए। बापू ने ऐसे बारीक़ी भरे अहिंसा-पालन से ही अपने जीवन को गढ़ा था।

स्रोत : “बापू मेरी मां” - मनुबहन गांधी

रविवार, 28 अगस्त 2011

मानव सेवा

प्रेरक प्रसंग – 1

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सेवाग्राम आश्रम में एक दिन सुबह एक व्यक्ति बापू की झोपड़ी में आया। बापू उसे पहचान गये। वह एक राजनीतिक कार्यकर्ता था और कई बार जेल हो आया था। वे थे पंडित परचुरे शास्त्री। वे संस्कृत के महान विद्वान थे। उनको कुष्ठ रोग हो गया था। इस रोग से वे काफ़ी परेशान रहते थे। अछूत की भांति इधर-उधर घूमते रहते थे। तकलीफ़ काफ़ी बढ़ गई और वे अपने जीवन से उकता चुके थे। उन्होंने निश्चय किया कि वे अनशन करके अपना प्राण त्याग देंगे। वे हरिद्वार में बहुत दिनों तक एकांतवास भी करते रहे। उस दिन वे पैदल चलकर बापू के दर्शन करने आए थे।

बापू की बातें सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए। बोले, “अब मैंने आपके दर्शन कर लिए हैं। मैं वह सूत भी लाया हूं जो मैंने आपके लिए काता है। मैं आपको ख़ुद भेंट करना चाहता था। मैं आज रात एक पेड़ के नीचे आराम करूंगा। सुबह चला जाऊंगा।”

गांधी जी ने शास्त्री जी से कहा, “यह तुमने क्या सोच लिया। तुम्हें उपवास करके प्राण नहीं त्यागना है। मैं ऐसा नही करने दूंगा।”

DSCN1459बापू पर उसकी श्रद्धा का बहुत प्रभाव पड़ा। पूरी रात वे सोचते रहे कि उसे जाने दें या आश्रम में ही रख लें। आखिर उन्होंने निश्चय किया कि उसे आश्रम में ही रखेंगे। गांधी जी ने अपनी कुटिया से क़रीब 200 फुट की दूरी पर परचुरे शास्त्री जी के लिए एक कुटीर बनवाया। इस प्रकार वे दिन रात उनकी देख भाल करते थे। जब भी टहलते हुए उधर से गुज़रते उनका हाल-चाल पूछते। क्या खाना-पीना है, यह सब उन्हें बताते।

हर दिन की तरह एक दिन जब गांधी जी उनके पास गए और उनका हाल चाल पूछा तो शास्त्री जी ने बताया, “रात को बड़ा कष्ट हुआ। दर्द बहुत हो रहा था और नींद भी नहीं आई।”

गांधी जी अपनी कुटिया वापस आए और धूप में एक खटिया डाली। शास्त्री जी को बुला कर उस पर लिटाया। सरसों के तेल से उनकी मालिश करने लगे। पूरी एकाग्रता, प्यार और स्नेह से बात भी करते गए और उनकी मालिश भी। यह क्रम रोज़ ही चलता गया। शास्त्री जी को काफ़ी राहत मिली। फ़ायदा भी होने लगा।