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मंगलवार, 22 जनवरी 2013

प्रेरक प्रसंग-40 :: यह गाजा-बाजा किसलिए?

प्रेरक प्रसंग-40

यह गाजा-बाजा किसलिए?

1930 के अप्रैल के महीने की बात है। गांधी जी के नेतृत्व में दाण्डी कूच (नमक सत्याग्रह) पूरा हो चुका था और अब खजूर का पेड़ काटने का सत्याग्रह चल रहा था। कराडी नामक गांव में पड़ाव था। एक छोटी सी झोपड़ी में गांधी जी रहते थे। एक दिन सुबह-सुबह गांव वालों ने बड़ा जुलूस निकाला। जुलूस में महिलाएं भी थीं। बाजे बज रहे थे। पुरुषों के हाथ में फल, फूल, पैसे थे। गांधी जी ने सोचा ये कैसा जुलूस है? ये सारे लोग क्या सत्याग्रह करने जा रहे हैं? गांधी जी झोपड़ी से बाहर निकले। तभी उनकी जय-जयकार होने लगी। उन लोगों ने गांधी जी को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और अपना उपहार गांधी जी के चरणों में समर्पित कर दिया।

गांधी जी ने पूछा, “कैसे आए? यह गाजा-बाजा किसलिए?”

जुलूस के नेता ने कहा, “महात्मा जी, हमारे गांव में हमेशा पानी का अकाल रहता है। गर्मी के दिन आते ही कुएं सूख जाते हैं। पानी की बड़ी किल्लत रहती है। लेकिन यह बड़े आश्चर्य की बात है कि हमारे गांव में आपके चरण पड़ते ही सारे कुओं में पानी भर आया है। यह देख आपके प्रति हमारे हृदय भक्ति भाव से भर आए हैं।”

गांधी जी ने कठोरता और नाराजगी से कहा, “तुम लोग पागल हो। मेरे आने का और इस पानी का क्या संबंध है? ईश्वर पर मेरा अधिकार थोड़े ही है? उसके पास आपकी वाणी का जो मूल्य है, उतना ही मेरी वाणी का है।”

कुछ क्षण रुककर गांधी जी ने कहा, “यह देखो, पेड़ पर कौआ बैठने और पेड़ टूटने का संयोग हो आए तो क्या यह कहोगे कि कौए ने पेड़ तोड़ दिया? और भी कई कारण होते हैं। तुम्हारे कुएं में पानी आया, पृथ्वी के गर्भ में कुछ भी उथल-पुथल हुई होगी और नया झरना फूटा होगा। व्यर्थ में बाल-कल्पना न करो। तुम सबके सब लोग पहले सूत कातने लगो। भारत मां को कपड़ा चाहिए न?”

सारे लोग प्रणाम करके चले गए। गांधी जी खजूर का पेड़ काटने के सत्याग्रह में लग गए।

शनिवार, 18 अगस्त 2012

प्रेरक प्रसंग-39 : संयम का पाठ


प्रेरक प्रसंग-39
संयम का पाठ

बात 1926 की है। गांधी जी दक्षिण भारत की यात्रा पर थे। उनके साथ अन्य सहयोगियों के अलावा काकासाहेब कालेलकर भी थे। वे सुदूर दक्षिण में नागर-कोइल पहुंचे। वहां से कन्याकुमारी काफ़ी पास है। इस दौरे के पहले के किसी दौरे में गांधी जी कन्याकुमारी हो आए थे। वहां के मनोरम दृष्य ने उन्हें काफ़ी प्रभावित किया था। गांधी जहां ठहरे थे, उस घर के गृह-स्वामी को बुलाकर उन्होंने कहा, “काका को मैं कन्याकुमारी भेजना चाहता हूं। उनके लिए मोटर का प्रबंध कर दीजिए।”

कुछ देर के बाद उन्होंने देखा कि काकासाहेब अभी तक घर में ही बैठे हैं, तो उन्होंने गृहस्वामी को बुलाया और पूछा, “काका के जाने का प्रबंध हुआ या नहीं?”

किसी को काम सौंपने के बाद उसके बारे में दर्याफ़्त करते रहना बापू की आदत में शुमार नहीं था। फिर भी उन्होंने ऐसा किया। यह स्पष्ट कर रहा था कि कन्याकुमारी से गांधी जी काफ़ी प्रभावित थे। स्वामी विवेकानन्द भी वहां जाकर भावावेश में आ गए थे और समुद्र में कूद कर कुछ दूर के एक बड़े पत्थर तक तैरते गए थे।

काकासाहेब ने बापू से पूछा, “आप भी आएंगे न?”

बापू ने कहा, “बार-बार जाना मेरे नसीब में नहीं है। एक दफ़ा हो आया इतना ही काफ़ी है।”

इस जवाब से काकासाहेब को दुख हुआ। वे चाहते थे कि बापू भी साथ जाएं। बापू ने काकासाहेब को नाराज देख कर गंभीरता से कहा, “देखो, इतना बड़ा आंदोलन लिए बैठा हूं। हज़ारों स्वयंसेवक देश के कार्य में लगे हुए हैं। अगर मैं रमणीय दृश्य देखने का लोभ संवरण न कर सकूं, तो सबके सब स्वयंसेवक मेरा ही अनुकरण करने लगेंगे। अब हिसाब लगाओ कि इस तरह कितने लोगों की सेवा से देश वंचित होगा? मेरे लिए संयम रखना ही अच्छा है।”122
(साभार : बापू की झांकियां काकासाहेब कालेलकर)

रविवार, 3 जून 2012

सफाई ईश्वर का रूप है


प्रेरक प्रसंग-38
सफाई ईश्वर का रूप है


गांधी जी सफाई पसंद व्यक्ति थे। उनका मानना था कि सफाई ईश्वर का रूप है। वे घर में तो सफाई रखते ही थे, सार्वजनिक सफाई का भी उन्हें काफ़ी ख़्याल रहता था। वे तो अंदर और बाहर दोनों निर्मल रखते थे, रखना चाहते थे।

बात उन दिनों की है जब गांधी जी यरवदा जेल में थे। जेल के अधिकारियों से उन्होंने अपने लिए एक खास काम मांग रखा था। वे कपड़े सीते थे। कर्मयोगी तो वे थे ही, लगन और निष्ठा से अपना यह काम भी किया करते थे।

एक दिन जेल का एक प्रमुख अधिकारी उनसे मिलने आया। गांधी जी जहां बैठकर सूत कातते थे, वहां तक वह अधिकारी जूते पहन लर चला आया। उसने गांधी जी से हाल-चाल पूछा। गांधी जी ने प्रसन्नता से उत्तर दिया। कुछ देर रुक कर वह अधिकारी चला गया।

उस अधिकारी के जाते ही, गांधी जी उठकर कमरे से बाहर गए और एक बाल्टी पानी भरकर ले आए। जेल का वह अधिकारी जहां तक जूते पहने हुए गया था, वहां तक उन्होंने फ़र्श को धोया, लिपाई की, साफ कर दिया। एक सहयोगी की नज़र इस पर पड़ी, तो उसने पूछा, “बापू! यह आप क्या कर रहे हैं?”

गांधी जी ने कहा, “यह मेरे उठने-बैठने का स्थान है। क्या उसे साफ न रखूं?”

उस सहयोगी ने पूछा, “किसने गंदा कर दिया?”

गांधी जी ने कहा, “जेल के अधिकारी आए थे। बात करते-करते वे यहां तक आए। उन्होंने जूते पहन रखे थे। इसलिए इसे साफ कर रहा हूं।”

सहयोगी ने सुझाव दिया, “आपको उन्हें मना कर देना चाहिए था। आपने उनसे कहा क्यों नहीं? आप दरवाज़े के पास एक तख़्ती लगा दीजिए कि जूते बाहर उतारकर आएं।”

गांधी जी ने कहा, “नहीं, यह तो हर एक के समझने की बात है। जाने दो। बहुत दिनों के बाद आज लिपाई की। ऐसा अवसर मुझे कौन देगा? जेल के अधिकारी के प्रति मुझे आभार मानना चाहिए कि उन्होंने मुझे ऐसे सत्कार्य का अवसर दिया, मेरे हाथ से सफाई की सेवा हुई।”

यह कहकर गांधी जी हंसते-हंसते अपना हाथ धोने लगे।
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रविवार, 13 मई 2012

चटनी का स्वाद

प्रेरक प्रसंग-36
चटनी का स्वाद

बात उस समय की है जब देश का स्वाधीनता संग्राम अपने चरम पर था। गांधी जी के आह्वान पर देश के हर वर्ग के लोग उनके साथ आगे आए। इनमें कई राजा-महाराजा भी थे। एक दिन काशी के महाराज गांधी जी के आश्रम आए और उन्होंने गांधी जी से कहा, “बापू! मैं भी राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होना चाहता हूं।”

गांधी जी ख़ुश हुए। उन्होंने कहा, “यह तो बहुत अच्छी बात है। आप जैसे राजा लोग यदि आगे आएंगे, तो उनके साथ प्रजा भी आगे आएगी। एक राजा अपने साथ लाखों प्रजा साथ लेकर आएगा।”

भोजन के समय गांधी जी ने महाराज को भी साथ खाने को कहा। आश्रम का सादा भोजन सबके लिए परोसा गया। राजा के लिए भी। लेकिन राजा की थाली में एक चीज़ नहीं दी गई जो गांधी जी की थाली में थी। वह थी एक चटनी। गांधी जी उस चटनी को बड़े मज़े ले-ले कर खा रहे थे। 
जब महाराजा ने यह देखा तो वे पूछ बैठे, “यह चटनी मुझे नहीम दी गई?”

गांधी जी बोले, “आपको भी चटनी चाहिए?” उन्होंने एक चम्मच चटनी महाराजा की थाली में डाल दी। महाराज ने स्वाद लेने की अधीरता में ढेर सारी चटनी एक बार में ही मुंह में भर लिया। मुंह में चटनी के जाते ही उनके मुंह का स्वाद बिगड़ने लगा। उन्हें अब न तो निगलते बन रहा था और न ही उगलते। उन्होंने पूछा, “बापू ये चटनी तो बहुत कड़वी है। नीम की है क्या?”

बापू ने कहा, “हां, नीम की ही है। मैं तो सालों से इसे खा रहा हूं। आप भि अगर अपने मुंह का स्वाद नहीं बदलेंगे, तो आन्दोलन के कष्ट को कैसे भोग सकेंगे।”

महाराज बापू के कहे का आशय समझ चुके थे। मन को कड़ा कर वे भी चटानी के स्वाद का आनंद लेने लगे।

रविवार, 6 मई 2012

प्रेरक प्रसंग-35 : पश्चाताप


प्रेरक प्रसंग-35
पश्चाताप

बात 1926 की है। गांधी जी उन दिनों साबरमती आश्रम में रहा करते थे। दीनबंधु सी.एफ़. एण्ड्रूज़ भी उन दिनों वहीं थे। दीनबन्धु दया के सागर थे, दूसरों का दुख देख वे द्रवित हो जाते थे।

एक दिन मालाबार की ओर से कांग्रेस कमेटी का मंत्री गांधी जी के पास आया। उसने सार्वजनिक कोष का बहुत-सा धन लोकसेवा में ख़र्च किया था। लेकिन हिसाब-किताब में वह कच्चा था। सारा जमा-ख़र्च वह ठीक से पेश न कर पाया। हजार रुपये की बात थी। स्थानीय कार्यकारिणी का निर्णय था, “जमा-ख़र्च पेश करो या फिर पैसे भरो।”

उसने कहा, “इतने पैसे कहां से दूं?”

सदस्य ने कहा, “हम क्या बताएं? सार्वजनिक काम का हिसाब-किताब ठीक से रखना चाहिए था।”

उसने कहा,“बापू के पास जाता हूं। वे कह दें, तब तो मानोगे?”

सदस्य ने कहा, “हां मान लेंगे।”

वह मंत्री गांधी जी के पास पहुंचा। उनको उसने सारी बातें बताकर बोला, “बापू! मैं स्कूल की नौकरी छोड़कर सार्वजनिक सेवा के लिए अपने आपको समर्पित कर चुका हूं। मैंने एक भी पैसा अपने काम में नहीं लगाया है।”

गांधी जी ने कहा, “तुम जो कह रहे हो वह सच हो सकता है। लेकिन तुम्हें पैसे भरने चाहिए। सार्वजनिक काम में व्यवस्थितता बहुत ज़रूरी है।”

मंत्री बोला, “मुझसे भूल हो गई। इसका मेरे मन में पश्चाताप है। ग़लती तो हो गई, लेकिन अब क्या हो?”

गांधी जी बोले, “पैसा भरना ही एक मात्र उपाय है।”

वह युवक रोने लगा। पास ही दीनबन्धु खड़े थे। वे दुखी होकर बोले, “बापू! यह आदमी पश्चाताप कर रहा है। आप उससे इतनी कठोरता से क्यों बोलते हैं।”

गांधी जी ने कहा, “पश्चाताप केवल मन में होने से क्या लाभ? दोष का परिमार्जन हो, तो ही कहा जा सकेगा कि वास्तविक पश्चाताप हुआ। यह कुछ नहीं। इस युवक को अपनी भूल सुधारनी चाहिए। जनसेवक है यह।”

गांधी जी प्रेम-सागर थे। लेकिन समय आने पर वे कर्तव्य-निष्ठुर हो जाते थे। कभी-कभी तो कठोरता के साथ किये गए इंकार में ही अपार करुणा होती है।
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रविवार, 29 अप्रैल 2012

एक माँ को मिला बेटा


प्रेरक प्रसंग-34

एक माँ को मिला बेटा
 प्रस्तुत कर्ता : मनोज कुमार
मृत्यु से किसे भय नहीं लगता। लेकिन जीवन-मृत्यु तो ईश्वर  के हाथ है। गांधी जी मृत्यु को ईश्वर की कृपा मानते थे। अपने उपवास के दौरान उन्होंने कई बार यह बात कही, “यदि मैं मर जाऊँ तो इसे भी ईश्वर की कृपा मानिए।”

बात 1917 की है। बिहार प्रांत के चम्पारण ज़िले में गांधी जी किसानों के अन्दोलन को नेतृत्व प्रदान कर रहे थे। गोरे ज़मिन्दार सरकार की मदद से उन पर भारी जुल्म ढाया करते थे। एक बार एक जवान किसान को लाठी से पीटा गया। उसका सिर फूट गया। बाद में उसकी मृत्यु हो गई।

उसकी मां बूढ़ी थी। वह उसका इकलौता बेटा था। उसके ऊपर तो दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा। वह बापू के पास गई और फूट-फूट कर रोने लगी। बोली, “मेरा इकलौता बेटा चला गया। आप तो महात्मा हैं। उसे किसी तरह जिला दीजिए।”

गांधी जी क्या कर सकते थे? उन्होंने गम्भीर स्वर में कहा, “माँ, मैं तुम्हारे बेटे को कैसे ज़िन्दा कर दूँ? मुझमें ऐसी शक्ति कहां है? हां जो कर सकता हूं वह ज़रूर करूंगा। मैं उसके बदले तुम्हें दूसरा बेटा दूँगा।”

इतना कह कर बापू ने उस बूढ़ी माँ के कांपते हाथ अपने सिर पर रख लिए और उससे कहा, “लो लाठी-चार्ज में गांधी मर गया। तुम्हारा बेटा ज़िन्दा है और वह तुम्हारे सामने खड़ा है, तुम्हारा आशीर्वाद मांग रहा है।”

उस माँ की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। उसने बापू को पास खींच लिया और अपने कलेजे से लगा लिया। उनका सिर अपनी गोद में लेकर बोली, “मेरे बापू! मेरे लाल! तुम सौ साल जियो!”
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रविवार, 22 अप्रैल 2012

प्रेरक प्रसंग-33 : बरबादी की वेदना

प्रेरक प्रसंग-33

बरबादी की वेदना

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प्रस्तुत कर्ता : मनोज कुमार

हम एक ग़रीब देश के निवासी हैं। कोई भी उपयोगी चीज़ नष्ट करना राष्ट्र की हानि ही है। उसमें खाने-पीने की चीज़ की हानि तो पाप ही माना जाना चाहिए।

बात 1930 की है। बापू की दांडी यात्रा शुरू हो चुकी थी। बापू जहां पहुंचते हज़ारों लोग एकत्र होते और उनका संदेश सुनते। गरमी के दिन थे। तरबूजों का मौसम था। एक पड़ाव पर लोग गाड़ियों में भर-भर कर तरबूज लाए। फल इतने थे कि लोग बरबाद कर रहे थे। आधे खाकर फेक दे रहे थे। बापू ने यह सब देखा। उन्हें दुख हुआ। वे गम्भीर हो गए। उनके प्रवचन का समय आया। हज़ारों स्त्री-पुरुष उनकी बातें सुनने को इकट्ठे थे। बापू ने मंच से कहना शुरू किया,

“मैंने भारत के वाइसराय को पत्र लिखा है कि जनता की आमदनी जब प्रतिदिन दो आना है, तब आपका रोज़ाना सात सौ रुपए वेतन लेना ठीक नहीं है। यहां तो एक रुपए में आठ लोगों की गुजर होती है। आपके सात सौ रुपए में कम से कम पांच-छह हज़ार लोगों का पेट भर जाएगा। यानी आप पांच-छह हज़ार लोगों का खाना छीनते हैं। मैंने वाइसराय के पास देश की ग़रीबी की बात कही। उनकी फिजूलख़र्ची की आलोचना की। लेकिन यहां क्या देखता हूं?

“सैंकड़ों फल बरबाद हुए। साथियों के लिए फल लाना था तो थोड़े से लाते। लेकिन गाड़ी भर-भर कर लाए। अब मैं वाइसराय की आलोचना किस मुंह से करूं? यों फिजूलखर्च करना पाप है। आप लोगों ने मेरा सर नीचा कर दिया। देश में एक तरफ़ भुखमरी है, आधा पेट खाकर जीनेवाले लोग हैं और यहां मेरी स्वातन्त्र्य-यात्रा में इस तरह की बरबादी होती है। अपनी वेदना मैं कैसे व्यक्त करूं? फिर से ऐसा पाप नहीं करना।”

बापू जब चुप हुए तो लोगों का सिर झुका हुआ था। अनेक लोगों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

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रविवार, 15 अप्रैल 2012

प्रेरक प्रसंग-32 : अंधविश्वास को मिटा देना है!

प्रेरक प्रसंग-32

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प्रस्तुत कर्ता : मनोज कुमार

gandhi (10)साबरमती आश्रम में कई बच्चों को चेचक हो गया। बच्चों के इस दुख से बापू काफ़ी द्र्वित हुए। उन बच्चों की सेवा बापू स्वयं करते थे। उन्हें रोज़ गरम पानी में पोटाशियम परमैग्नेट मिलाकर टब में स्नान कराते थे।

उन दिनों गांधी जी के पोते कनु गांधी को चेचक निकली थी। गांधी जी ने उनके लिए भी वही इलाज करने को कहा। कनु गांधी की दादी ने यह सुनकर कहा, “आपको मालूम नहीं क्या, चेचक में पानी छुलाने की भी मनाही की गई है। और आप हैं कि इसे पानी के टब में बिठाने की बात कर रहे हैं। ऐसा नहीं होगा। इससे ‘माता’ नाराज़ हो जाएंगी।”

बापू ने उन्हें समझाते हुए कहा, “भाभी आप मत घबड़ाएं। ये सब अंधविश्वास है। पानी में नहलाने से ‘माता’ नाराज़ नहीं होतीं। इस आश्रम कई बच्चों को चेचक निकली है। सबका यही इलाज मैंने किया है। आज तक तो किसी से ‘माता’ नाराज़ नहीं हुईं। फिर वो कनु से कैसे नाराज़ हो जाएंगी। हमें इन पुराने रीति-रिवाज़ों, अंधविश्वासों और मान्यताओं को छोड़ना चाहिए। अगर हम ही इसे नहीं छोड़े तो हम दूसरों को कैसे कह सकेंगे? आप परेशान न हों, इसे कुछ नहीं होगा।”

कनु की दादी को गांधी जी पर पूरा विश्वास था। उन्होंने गांधी जी की बात मान ली। कनु को गरम पानी की टब में बिठाकर स्नान कराया गया। सात दिनों के बाद कनु एकदम स्वस्थ और तंदरुस्त हो गए। दादी भी काफ़ी खुश हुईं।

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रविवार, 8 अप्रैल 2012

प्रेरक प्रसंग-31 : साधारण दिखने वाले व्यक्ति


प्रेरक प्रसंग-31

साधारण दिखने वाले व्यक्ति


नील साहबों के आतंक को समझने के लिए गांधी जी चंपारण आना चाहते थे। उस वक़्त आचार्य जे.बी. कृपलानी जी मुज़फ़्फ़रपुर के कॉलेज में पढाते थे। गांधी जी से उनका परिचय था। लिहाजा गांधी जी ने कृपलानी जी को पत्र लिख कर अपने आने का कारण और समय बताया। चूंकि बिहार में कृपलानी जी ही उनके जानने वाले थे, इसलिए गांधी जी ने उनसे मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे स्टेशन पर मिलने को कहा।

कृपलानी जी और उनके अनुयायी छात्र ट्रेन के रुकने पर गांधी जी को ढूंढ़ने लगे। उनकी कल्पना में गांधी जी प्रथम श्रेणी से उतरते हुए विशिष्ट व्यक्तियों की तरह होने चाहिए थे। पर गांधी जी तीसरे दर्ज़े में एक आम आदमी की तरह खादी वस्त्र में थे। जो छात्र गांधी जी को तलाश रहे थे, वे अचरज में पड़ गए जब एक साधारण दिखने वाले व्यक्ति ने अपना परिचय गांधी के रूप में दिया।

आम आदमी जैसे दिखने वाल इस राजनेता ने अपने थोड़े दिनों के प्रवास में नील साहबों का आतंक खत्म कर दिया। आम जनता को भय मुक्त कर दिया। आम आदमी जैसे दिखने वाले गांधी जी ने यह सब किया अहिंसा और सत्य के सहारे। अपनी राजनीति को उन्होंने कसौटी पर कसा।
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रविवार, 1 अप्रैल 2012

प्रेरक प्रसंग-30 : पुन्नीलाल नाई और गांधी जी

प्रेरक प्रसंग-30

 पुन्नीलाल नाई और गांधी जी

प्रस्तुत कर्ता : मनोज कुमार

आज के प्रेरक प्रसंग में एक दुर्लभ तस्वीर और रोचक प्रसंग पेश कर रहा हूं। यह वाकया गांधी जी का लोगों को प्रोत्साहित करने का एक अद्भुत उदाहरण है। बात 1939 की है। उस समय गांधी जी देश के ही नहीं सारे विश्व के शिखर के नेता थे। ऐसे में भी वे साधारण से साधारण लोगों को भी प्रोत्साहित करने का कोई मौक़ा वे नहीं चूकते थे। ऐसा भी नहीं कि वे यह सब दिखावे के लिए करते थे। यह सब उनकी जीवन शैली के अंग थे। तभी तो वे कहते थे कि “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है”!

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उन दिनों गांधी जी इलाहाबाद में थे। आनंद भवन में ठहरे थे। अवसर था, कमला नेहरू स्मारक औषधालय का शिलान्यास का। बात 23 नवम्बर 1939 की है। गांधी जी को दाढ़ी बनवाने के लिए एक नाई की ज़रूरत थी। जवाहरलाल नेहरू जी के निजी सचिव उपाध्याय जी ने एक नाई को बुलवाया। उस नाई का नाम पुन्नीलाल था। उपाध्याय जी ने उन्हें गांधी जी के पास जाने के पहले खादी के कपड़े पहनने के लिए दिया। जल्दबाजी में किए गए इस काम के कारण कपड़े पुन्नीलाल को फिट नहीं आ रहे थे, फिर भी उन्हें पहनकर पुन्नीलाल खाफ़ी ख़ुश था।

वह आनंद भवन की दूसरी मंजिल पर पहुंचा। वहां गांधी जी अखबार पढ़ रहे थे। नाई को देखकर बोले, “अरे, तुम आ गए! तुम अच्छा बाल-दाढ़ी बनाते हो न?”

नाई ने विनम्रता से मुस्कुराते हुए हां में सिर हिलाया। उसने पहले गांधी जी के बाल बनाए फिर दाढ़ी बनाने लगा। इस दौरान गांधी जी उसके साथ हंसी-मज़ाक़ करते रहे। बोले, “लगता है कि तुम हमेशा खादी पहनते हो।”

पुन्नीलाल मासूमियत से बोला, “नहीं। ये कपड़े तो मैंने आज ही पहने हैं।”

उसका सच बोलना गांधी जी को बहुत अच्छा लगा। इस बीच उपाध्याय जी भी वहां आ गए थे। उन्होंने गांधी जी की दाढ़ी बनाते हुए पुन्नीलाल का फोटो खींचा। दाढ़ी-बाल बन चुका था। गांधी जी को प्रणाम कर पुन्नीलाल जाने लगा। बापू ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “तुम अच्छा बाल बनाते हो।”

चुन्नीलाल ने भोलेपन से कहा, “तो मुझे सर्टीफिकेट दीजिए।”

बापू ने कहा, “जब तक तुम अच्छा काम करते रहोगे, तब तक सर्टीफिकेट की ज़रूरत ही क्या है?”

लकिन पुन्नीलाल तो फीछे ही पड़ गया। उसकी हठ के आगे गांधी जी राज़ी हो गए। उपाध्याय जी से काग़ज़ मंगवा कर गांधी जी ने लिखा,

आनंद भवन, इलाहाबाद

भाई पुन्नीलाल ने बड़े भाव से अच्छी तरह मेरी हजामत की है। उनका उस्तरा देहाती है और बग़ैर साबुन के हजामत करते हैं।

मो.क. गांधी

23.11.1939

पुन्नीलाल की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसे तो लगा कि दुनिया की सबसे क़ीमती चीज़ उसके हाथों में है। जवाहरलाल जी ने उसे दो रुपए दिए। उपाध्याय जी से फोटो तो मिला ही। एक भाई उसे सौ रुपए देने लगा। पुन्नीलाल ने लेने से मना कर दिया। बोला, “यह फोटो और यह प्रशस्तिपत्र मेरे लिए अनमोल हैं। और मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरा मेहनताना दो रुपए थे, वह तो नेहरू जी ने मुझे दे ही दिया है।”

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प्रेरक प्रसंग – 1 : मानव सेवा, प्रेरक-प्रसंग-2 : सहूलियत का इस्तेमाल, प्रेरक प्रसंग-3 : ग़रीबों को याद कीजिए, प्रेरक प्रसंग-4 : प्रभावकारी अहिंसक शस्त्र, प्रेरक प्रसंग-5 : प्रेम और हमदर्दी, प्रेरक प्रसंग-6 : कष्ट का कोई अनुभव नहीं, प्रेरक प्रसंग-7 : छोटी-छोटी बातों का महत्व, प्रेरक प्रसंग-8 : फूलाहार से स्वागत, प्रेरक प्रसंग-९ : बापू का एक पाप, प्रेरक-प्रसंग-10 : परपीड़ा, प्रेरक प्रसंग-11 : नियम भंग कैसे करूं?, प्रेरक-प्रसंग-12 : स्वाद-इंद्रिय पर विजय, प्रेरक प्रसंग–13 : सौ सुधारकों का करती है काम अकेल..., प्रेरक प्रसंग-14 : जलती रेत पर नंगे पैर, प्रेरक प्रसंग-15 : वक़्त की पाबंदी,प्रेरक प्रसंग-16 : सफ़ाई – ज्ञान का प्रारंभ, प्रेरक प्रसंग-17 : नाम –गांधी, जाति – किसान, धंधा ..., प्रेरक प्रसंग-18 : बच्चों के साथ तैरने का आनंद, प्रेरक प्रसंग-19 : मल परीक्षा – बापू का आश्चर्यजनक..., प्रेरक प्रसंग–20 : चप्पल की मरम्मत, प्रेरक प्रसंग-21 : हर काम भगवान की पूजा,प्रेरक प्रसंग-22 : भूल का अनोखा प्रायश्चित, प्रेरक प्रसंग-23 कुर्ता क्यों नहीं पहनते? प्रेरक प्रसंग-24 : सेवामूर्ति बापू प्रेरक प्रसंग-25 : आश्रम के नियमों का उल्लंघन प्रेरक प्रसंग–26 :बेटी से नाराज़ बापू प्रेरक प्रसंग-27 : अपने मन को मना लिया प्रेरक प्रसंग-28 : फ़िजूलख़र्ची प्रेरक प्रसंग-29 : एक बाल्टी पानी

रविवार, 25 मार्च 2012

प्रेरक प्रसंग-29 : एक बाल्टी पानी

प्रेरक प्रसंग-29

एक बाल्टी पानी

प्रस्तुत कर्ता: मनोज कुमार

Gandhi (8)गांधी जी के विचारों में पर्यावरण की चिंता उनकी प्राथमिकता थी। उनका सारा जीवन और उनके सारे काम पर्यावरण के संरक्षण का उदाहरण है। गांधी जी की पर्यावरण-चिंता के मूल में गांव थे। वे गावों की आत्मनिर्भरता की पैरवी आजीवन करते रहे। वह मानते थे कि शहरों की स्फीत धमनियों में बहता हुआ रक्त दरअसल गांव की संकुचित होती धमनियों से बेरहमी से निचोड़ा गया रक्त है। विश्व के समृद्ध समाज की भूख पल-पल विकराल होती जा रही है। उस पर नियंत्रण बहुत ज़रूरी है। बिना इसके पर्यावरण की रक्षा की बात बेमानी है। आज सारा संसार पर्यावरण के प्रति संवेदनशील नज़र आता है, और इस कारण एक बार फिर से गांधी जी के विचार काफ़ी प्रासंगिक हो गए हैं।

इस विषय पर उनसे जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख करना चाहूंगा। एक बार इलाहाबाद के “आनन्द भवन” में गांधी जी नेहरू परिवार के अतिथि थे। उन्होंने स्नान के लिए जवाहरलाल नेहरू जी से पानी भेजने के लिए कहा। तुरन्त स्नानघर में दो बाल्टी पानी रख दिया गया। गांधी जी ने एक बाल्टी पानी लौटा दिया।

यह देख जवाहहरलाल नेहरू जी ने कहा, “बापू, यह गंगा-यमुना की नगरी है। यहां पानी की कमी नहीं है।”

गांधी जी ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, “ज़रूरत से ज़्यादा किसी चीज़ का उपयोग कर हम किसी ज़रूरतमंद को उसके प्राप्य से वंचित कर देते हैं। ऐसे काम मेरे अनुसार हिंसा की श्रेणी में आते हैं।”

बापू का मानना था कि “यदि हमें इस पृथ्वी को बचाकर रखना है तो प्राकृतिक संसाधनो का अनुशासित तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए।”

रविवार, 18 मार्च 2012

प्रेरक प्रसंग-28 : फ़िजूलख़र्ची

प्रेरक प्रसंग-28

फ़िजूलख़र्ची

मनोज कुमार

छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना गांधी जी की अद्वितीय विशेषता थी। चाहे वह कहीं भी हों, किसी भी परिस्थिति में हों, सत्य का प्रयोग तो वे हमेशा करते ही रहते थे। बात गोलमेज सम्मेलन के समय की है। गांधी जी प्रतिदिन भोजन के समय थोड़ा सा शहद लेते थे। एक दिन भारतीय दल को एक जगह भोजन के लिए निमंत्रण पर जाना पड़ा।

उस दिन गांधी जी का जहां भोजन था, वहां मीरा बहन हमेशा की तरह शहद की बोतल साथ ले जाना भूल गईं। खाने का समय हो चुका था। मीरा बहन को शहद की याद आई। बोतल तो निवास स्थल पर ही छूट गई थी। अब क्या किया जाए? उन्होंने फौरन किसी को पास की दूकान से शहद की बोतल खरीद कर मंगवा ली।

गांधी जी जब खाने बैठे, तो उन्हें शहद परोसा गया। उनका ध्यान नई बोतल पर गया। उन्होंने पूछा, “बोतल नई दिखती है। शहद की वह बोतल नहीं दिखाई दे रही।”

मीरा बहन ने डरते-डरते कहा, “हां, बापू! वह बोतल निवास स्थल पर ही छूट गई। उसलिए यह जल्दी से मंगवा ली।”

बापू गंभीर हो गए। बोले, “एक दिन शहद नहीं मिला होता, तो मैं भूखा थोड़े ही रह जाता। नई बोतल क्यों मंगवाई? हम जनता के पैसे पर जीते हैं। जनता के पैसे की फ़िजूलख़र्ची नहीं होनी चाहिए।”

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