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सोमवार, 22 अगस्त 2011

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है


दुष्यंत कुमार त्यागी - 4

इस  नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक   चिंगारी  कहीं  से ढूँढ  लाओ दोस्तों,
इस  दिए में तेल  से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी  की पीर  गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर  साँझ ने सारे   नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन  मैदान  में  लेटी हुई  है  जो  नदी,
पत्थरों से,  ओट में  जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

रविवार, 24 जुलाई 2011

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए


दुष्यंत कुमार त्यागी

हो  गई  है  पीर   पर्वत-सी   पिघलनी  चाहिए,
इस  हिमालय  से  कोई  गंगा  निकलनी चाहिए।

आज  यह  दीवार,  परदों  की  तरह हिलने लगी,
शर्त  लेकिन  थी कि ये  बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में,
हाथ  लहराते  हुए  हर  लाश  चलनी   चाहिए।

सिर्फ़  हंगामा  खड़ा  करना मेरा  मकसद  नहीं,
मेरी  कोशिश  है  कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे  सीने  में  नहीं  तो  तेरे  सीने  में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन  आग जलनी चाहिए।

शनिवार, 23 जुलाई 2011

सूर्य का स्वागत


दुष्यंत कुमार त्यागी

सूर्य का स्वागत


आँगन में काई है,
दीवारें चिकनी हैं, काली हैं,
धूप से चढ़ा नहीं जाता है,
ओ भाई  सूरज! मैं क्या करूँ?
मेरा नसीबा ही ऐसा है!

खुली हुई खिड़की देखकर
तुम तो चले आए,
पर मैं अँधेरे का आदी,
अकर्मण्य ... निराश ...
तुम्हारे आने का खो चुका था विश्वास।

पर तुम आए हो स्वागत है!
स्वागत! ... घर की इन काली दीवारों पर!
और कहाँ?
हाँ, मेरे बच्चे ने
खेल-खेल में ही यहाँ काई खुरच दी थी
आओ यहाँ बैठो,
और मुझे मेरे अभद्र सत्कार के लिए क्षमा करो।
देखो! मेरा बच्चा
तुम्हारा स्वागत करना सीख रहा है।
                                (सूर्य का स्वागत से ..)

शनिवार, 11 सितंबर 2010

साहित्यकार - दुष्यंत कुमार

साहित्यकार - दुष्यंत कुमार

जन्म -- 1 सितंबर, 1933

मृत्यु – 30 दिसंबर, 1975

स्थान – राजपुर-नवादा, बिजनौर (उ.प्र.)

शिक्षा – एम.ए. (हिन्दी) इलाहाबाद

वृत्ति – सरकारी नौकरी और खेती

 

कृतियां

सूर्य का स्वागत कविता संग्रह

आवाजों के घेरे में (कविता)

जलते हुए वन का वसंत (कविता)

एक कंठ विषव्यापी (काव्य नाटक)

छोटे-छोटे सवाल (उपन्यास)

आंगन में एक वृक्ष (उपन्यास)

दुहरी जिंदगी (उपन्यास)

मन के कोण (एकांकी)

मसीहा मर गया (नाटक)

साये में धूप अंतिम काव्य संग्रह

कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे, लोगों की बुनियादी जरूरतों के हिमायती बनकर, .... दो टूक, स्पष्ट और सीधी बात करने के लिए।

श्री दुष्यंत कुमार जी का जन्म इसी महीने (सितंबर) की पहली तारीख़ को था। उनका पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी थी। उनका जन्म 1 सितंबर 1933, को उत्तर प्रदेश के बिजनौर में हुआ और देहावसान 30 सितंबर 1975, को भोपाल में। 

दुष्यंत जी का पहला कविता संग्रह सूर्य का स्वागत 1957 में आया था। यह वह समय था जब एक तरफ़ ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली, दोनों भोपाल के प्रगतिशील शायर थे, का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। वहीं दूसरी तरफ़ हिन्दी में अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की नयी (कठिन) कविताओं का बोलबाला था। ... और एक और दल था जो उस समय आम आदमी के लिए लिखता था, बाबा नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि। ऐसे समय में दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे, लोगों की बुनियादी जरूरतों के हिमायती बनकर, .... दो टूक, स्पष्ट और सीधी बात करने के लिए।

हो     गई     पीर   पर्वत   सी,   पिघलनी     चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

दुष्‍यंत कुमार हिंदी ग़ज़ल के प्रथम विकास पुरूष हैं, जिन्‍होंने हिंदी साहित्‍य के मिजाज के साथ-साथ कविता के मिजाज को भी बदल दिया।

अगर ग़ौर से देखा जाए तो हम पाते हैं कि शमशेर बहादुर सिंह के बाद हिंदी ग़ज़ल में एक नवीन धारा का उदय होता है। यह धारा यथार्थवादी ग़ज़ल का है। यथार्थवादी ग़ज़लों के साथ ही दुष्यंत कुमार जी का युग आरंभ होता है। दुष्‍यंत युग में जीवन की परिवर्तित परिस्थितियां और आपात् काल के अनुशीलन के फलस्‍वरूप जिन साहित्यिक रूपों का सृजन हुआ, उनमें दुष्‍यंत की ग़ज़लें नवदिशोन्‍मुख हुई। यह कहना अतिशियोक्ति नहीं होगी कि दुष्‍यंत कुमार हिंदी ग़ज़ल के प्रथम विकास पुरूष हैं, जिन्‍होंने हिंदी साहित्‍य के मिजाज के साथ-साथ कविता के मिजाज को भी बदल दिया। “मैं” शैली में जीवन की तरंगित अनुभूतियों का ऐसा आख्‍यान उन्होंने लिखा है कि पढ़ने वाला इसे उनकी आत्‍मकथा मान बैठे।

उनकी रचनाओं से पता चलता है कि हौंसले से भरपूर और हिम्मत न हारने की शख्सियत थे। उनकी रचनाएं आम इंसान की तड़प आक्रोश को व्यक्त करती थीं। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है

इस नुमाइश में मिला वह चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा कौन, तो बोला कि हिंदुस्तान हूँ।

लोकतांत्रिक मूल्यों के लिहाज से सत्तर का दशक एक निर्णयाक दौर था। उस दौरान उन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा क्रांतिकारी बिगुल बजाने और आशा की किरण चारों ओर फैलाने का काम किया।

कैसे कैसे   मंजर सामने    आने    लगे हैं

गाते   गाते    लोग     चिल्लाने      लगे हैं।

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,

ये कंवल के   फूल    कुम्हलाने    लगे    हैं।

असुविधाजनक सच को कहने की दीवानगी अन्यत्र कहीं नहीं दिखती, मानों उनका कविता के द्वारा आंखो में आखें डालकर बात करने का जोखिम भरा अंदाज़ था।

विपरीत परिस्थितियों में अंत तक जूझने का हौसला, सही बात कहने की हिम्मत और सबसे बड़ी बात कि सरकारी सेवा में रहकर भी दो टूक बात कहने का साहस था उनके पास। हालाकि वे सरकारी तंत्र का कोपभाजन बने पर दबाव और दमन उनकी कलम रोक न सके! यही बुलंद इरादा, पक्का हौसला उनकी रचनाओं में भी दिखता है -

कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

इसी तरह शासनतंत्र के ढुलमुल रवैये पर उन्होंने तीखा प्रहार करते हुए कहा था,

कहां       तो तय था चिराग हरेक घर के लिए,

कहां        चिराग   मयस्सर नहीं शहर    के लिए।

यहां         दरख्तों के        साये में    धूप लगती है,

चलो      यहां     से      और        उम्र भर के लिए।

वे मुतमइन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता,

मैं     बेकरार    हूं   आवाज के     असर    के लिए।

आत्मसम्मान और स्वाभिमान के धनी दुष्यंत जी ताउम्र दिखावे, वनावटीपन से दूर रहे और कहते रहे

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा

मैं सजदे में नहीं था,    आपको     धोखा हुआ होगा।

यहां       तो सिर्फ     गूंगे और    बहरे लोग     बसते हैं,
खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा।

यहाँ    तक आते-आते सूख        जाती है कई नदियाँ
हमें मालूम है       पानी   कहाँ        ठहरा     हुआ होगा

***

इस    नदी     की धार में ठंढी हवा आती तो है,

नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक     चिनगारी      कहीं से    ढूंढ लाओं दोस्तों,

इस दिए में तेल से भींगी हुई बाती तो है।

संम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता जयप्रकाश नारायण से भी प्रभावित रहे और उनके लिए उन्होंने कहा

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो

इस अंधेरी    कोठरी में एक  रोशनदान है।

अगर सच कहा जाए तो असुविधाजनक सच को कहने की दीवानगी अन्यत्र कहीं नहीं दिखती, मानों उनका कविता के द्वारा आंखो में आखें डालकर बात करने का जोखिम भरा अंदाज़ था।

इस     शहर में वो काई     बारात हो या      वारदात

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं है खिड़कियां

***

मत      कहो आकश      में   कुहरा घना है,

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

एक और पहलू है। उन दिनों उबाऊ, नीरस और आकर्षणविहीन नई कविता भी लिखा जाना शुरु हो चुका था। इनके ऊपर दुष्यंत जी का कहना था,

उस     नई     कविता पे     मरती नहीं है   लड़कियां

इसलिए इस अखाड़े में नित गजल गाता हूं मैं!

सिर्फ़ ४२ वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने जो अपार ख्याति अर्जित की, उससा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है, तभी तो मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली उनके बारे में लिखते हैं

"दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है."

दुष्यंत ने केवल देश के आम आदमी से ही हाथ नहीं मिलाया उस आदमी की भाषा को भी अपनाया और उसी के द्वारा अपने दौर का दुख-दर्द गाया...

जिएँ तो अपने बगीचे में      गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

इस आम आदमी का रूप उनकी इस ग़ज़ल में देखिए

हो गई है     पीर पर्वत-सी     पिघलनी       चाहिए,

इस   हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज    यह दीवार,     परदों की तरह हिलने लगी,

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में,

हाथ     लहराते हुए     हर    लाश चलनी     चाहिए।

सिर्फ़ हंगामा    खड़ा      करना   मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि   ये      सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं          तो तेरे सीने            में सही,

हो कहीं भी आग,     लेकिन आग      जलनी चाहिए।