सोमवार, 22 अगस्त 2011

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है


दुष्यंत कुमार त्यागी - 4

इस  नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक   चिंगारी  कहीं  से ढूँढ  लाओ दोस्तों,
इस  दिए में तेल  से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी  की पीर  गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर  साँझ ने सारे   नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन  मैदान  में  लेटी हुई  है  जो  नदी,
पत्थरों से,  ओट में  जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

15 टिप्‍पणियां:

  1. किसी जन-आंदोलन के लिए दुष्यंत की गज़लें Anthem की तरह जानी जाती हैं!! यह उनमें से एक है!!

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  2. बहुत सटीक .. जन्माष्टमी की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ !!

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  3. एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों,
    इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

    गजल की दुनिया में अपना वर्चस्व स्थापित करने वाले दुष्यंत कुमार त्यागी के गजल किसी भी परिस्थितियों के साथ तादाम्य स्थापित करने में सफल सिद्ध होते हैं । उनके गजल हमारे मन को एक असीम आनंद की अनुभूति से आंदोलित कर जाते हैं । गजल अच्छा लगा।
    धन्यवाद ।

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  4. दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
    और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।
    bahut sunder prastuti...
    abhar.

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  5. दुष्यंत जी की सशक्त रचना पढवाने के लिए आभार

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  6. कुछ हो न हो , खुला और बड़ा हृदय बहुत है ...
    बेहतरीन !

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  7. अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई तथा शुभकामनाएं !

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  8. एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
    यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

    वाह दुष्यंत जी को पढना हमेशा सुखद रहा है।

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  9. यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है sakaratmak soch...

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  10. सही समय पर पोस्ट की आपने प्यारी गज़़ल।

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  11. हमेशा की तरह दुष्यंत की दुष्यंतता।

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