शनिवार, 11 सितंबर 2010

साहित्यकार - दुष्यंत कुमार

साहित्यकार - दुष्यंत कुमार

जन्म -- 1 सितंबर, 1933

मृत्यु – 30 दिसंबर, 1975

स्थान – राजपुर-नवादा, बिजनौर (उ.प्र.)

शिक्षा – एम.ए. (हिन्दी) इलाहाबाद

वृत्ति – सरकारी नौकरी और खेती

 

कृतियां

सूर्य का स्वागत कविता संग्रह

आवाजों के घेरे में (कविता)

जलते हुए वन का वसंत (कविता)

एक कंठ विषव्यापी (काव्य नाटक)

छोटे-छोटे सवाल (उपन्यास)

आंगन में एक वृक्ष (उपन्यास)

दुहरी जिंदगी (उपन्यास)

मन के कोण (एकांकी)

मसीहा मर गया (नाटक)

साये में धूप अंतिम काव्य संग्रह

कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे, लोगों की बुनियादी जरूरतों के हिमायती बनकर, .... दो टूक, स्पष्ट और सीधी बात करने के लिए।

श्री दुष्यंत कुमार जी का जन्म इसी महीने (सितंबर) की पहली तारीख़ को था। उनका पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी थी। उनका जन्म 1 सितंबर 1933, को उत्तर प्रदेश के बिजनौर में हुआ और देहावसान 30 सितंबर 1975, को भोपाल में। 

दुष्यंत जी का पहला कविता संग्रह सूर्य का स्वागत 1957 में आया था। यह वह समय था जब एक तरफ़ ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली, दोनों भोपाल के प्रगतिशील शायर थे, का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। वहीं दूसरी तरफ़ हिन्दी में अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की नयी (कठिन) कविताओं का बोलबाला था। ... और एक और दल था जो उस समय आम आदमी के लिए लिखता था, बाबा नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि। ऐसे समय में दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे, लोगों की बुनियादी जरूरतों के हिमायती बनकर, .... दो टूक, स्पष्ट और सीधी बात करने के लिए।

हो     गई     पीर   पर्वत   सी,   पिघलनी     चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

दुष्‍यंत कुमार हिंदी ग़ज़ल के प्रथम विकास पुरूष हैं, जिन्‍होंने हिंदी साहित्‍य के मिजाज के साथ-साथ कविता के मिजाज को भी बदल दिया।

अगर ग़ौर से देखा जाए तो हम पाते हैं कि शमशेर बहादुर सिंह के बाद हिंदी ग़ज़ल में एक नवीन धारा का उदय होता है। यह धारा यथार्थवादी ग़ज़ल का है। यथार्थवादी ग़ज़लों के साथ ही दुष्यंत कुमार जी का युग आरंभ होता है। दुष्‍यंत युग में जीवन की परिवर्तित परिस्थितियां और आपात् काल के अनुशीलन के फलस्‍वरूप जिन साहित्यिक रूपों का सृजन हुआ, उनमें दुष्‍यंत की ग़ज़लें नवदिशोन्‍मुख हुई। यह कहना अतिशियोक्ति नहीं होगी कि दुष्‍यंत कुमार हिंदी ग़ज़ल के प्रथम विकास पुरूष हैं, जिन्‍होंने हिंदी साहित्‍य के मिजाज के साथ-साथ कविता के मिजाज को भी बदल दिया। “मैं” शैली में जीवन की तरंगित अनुभूतियों का ऐसा आख्‍यान उन्होंने लिखा है कि पढ़ने वाला इसे उनकी आत्‍मकथा मान बैठे।

उनकी रचनाओं से पता चलता है कि हौंसले से भरपूर और हिम्मत न हारने की शख्सियत थे। उनकी रचनाएं आम इंसान की तड़प आक्रोश को व्यक्त करती थीं। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है

इस नुमाइश में मिला वह चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा कौन, तो बोला कि हिंदुस्तान हूँ।

लोकतांत्रिक मूल्यों के लिहाज से सत्तर का दशक एक निर्णयाक दौर था। उस दौरान उन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा क्रांतिकारी बिगुल बजाने और आशा की किरण चारों ओर फैलाने का काम किया।

कैसे कैसे   मंजर सामने    आने    लगे हैं

गाते   गाते    लोग     चिल्लाने      लगे हैं।

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,

ये कंवल के   फूल    कुम्हलाने    लगे    हैं।

असुविधाजनक सच को कहने की दीवानगी अन्यत्र कहीं नहीं दिखती, मानों उनका कविता के द्वारा आंखो में आखें डालकर बात करने का जोखिम भरा अंदाज़ था।

विपरीत परिस्थितियों में अंत तक जूझने का हौसला, सही बात कहने की हिम्मत और सबसे बड़ी बात कि सरकारी सेवा में रहकर भी दो टूक बात कहने का साहस था उनके पास। हालाकि वे सरकारी तंत्र का कोपभाजन बने पर दबाव और दमन उनकी कलम रोक न सके! यही बुलंद इरादा, पक्का हौसला उनकी रचनाओं में भी दिखता है -

कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

इसी तरह शासनतंत्र के ढुलमुल रवैये पर उन्होंने तीखा प्रहार करते हुए कहा था,

कहां       तो तय था चिराग हरेक घर के लिए,

कहां        चिराग   मयस्सर नहीं शहर    के लिए।

यहां         दरख्तों के        साये में    धूप लगती है,

चलो      यहां     से      और        उम्र भर के लिए।

वे मुतमइन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता,

मैं     बेकरार    हूं   आवाज के     असर    के लिए।

आत्मसम्मान और स्वाभिमान के धनी दुष्यंत जी ताउम्र दिखावे, वनावटीपन से दूर रहे और कहते रहे

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा

मैं सजदे में नहीं था,    आपको     धोखा हुआ होगा।

यहां       तो सिर्फ     गूंगे और    बहरे लोग     बसते हैं,
खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा।

यहाँ    तक आते-आते सूख        जाती है कई नदियाँ
हमें मालूम है       पानी   कहाँ        ठहरा     हुआ होगा

***

इस    नदी     की धार में ठंढी हवा आती तो है,

नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक     चिनगारी      कहीं से    ढूंढ लाओं दोस्तों,

इस दिए में तेल से भींगी हुई बाती तो है।

संम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता जयप्रकाश नारायण से भी प्रभावित रहे और उनके लिए उन्होंने कहा

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो

इस अंधेरी    कोठरी में एक  रोशनदान है।

अगर सच कहा जाए तो असुविधाजनक सच को कहने की दीवानगी अन्यत्र कहीं नहीं दिखती, मानों उनका कविता के द्वारा आंखो में आखें डालकर बात करने का जोखिम भरा अंदाज़ था।

इस     शहर में वो काई     बारात हो या      वारदात

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं है खिड़कियां

***

मत      कहो आकश      में   कुहरा घना है,

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

एक और पहलू है। उन दिनों उबाऊ, नीरस और आकर्षणविहीन नई कविता भी लिखा जाना शुरु हो चुका था। इनके ऊपर दुष्यंत जी का कहना था,

उस     नई     कविता पे     मरती नहीं है   लड़कियां

इसलिए इस अखाड़े में नित गजल गाता हूं मैं!

सिर्फ़ ४२ वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने जो अपार ख्याति अर्जित की, उससा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है, तभी तो मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली उनके बारे में लिखते हैं

"दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है."

दुष्यंत ने केवल देश के आम आदमी से ही हाथ नहीं मिलाया उस आदमी की भाषा को भी अपनाया और उसी के द्वारा अपने दौर का दुख-दर्द गाया...

जिएँ तो अपने बगीचे में      गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

इस आम आदमी का रूप उनकी इस ग़ज़ल में देखिए

हो गई है     पीर पर्वत-सी     पिघलनी       चाहिए,

इस   हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज    यह दीवार,     परदों की तरह हिलने लगी,

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में,

हाथ     लहराते हुए     हर    लाश चलनी     चाहिए।

सिर्फ़ हंगामा    खड़ा      करना   मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि   ये      सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं          तो तेरे सीने            में सही,

हो कहीं भी आग,     लेकिन आग      जलनी चाहिए।

25 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
    sundar nahi atisundar badhai

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  2. हां तो तय था चिराग हरेक घर के लिए, कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए। यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहां से और उम्र भर के लिए। वे मुतमइन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता, मैं बेकरार हूं आवाज के असर के लिए।
    फ़ुरसत से फ़ुरसत में … अमृता प्रीतम जी की आत्मकथा …पढिए!

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  3. दुष्यंत कुमार जी का परिचय और उनकी रचनाएँ बहुत अच्छी लगीं ...

    उनकी धारदार लेखनी से चुनी हुई पंक्तियाँ बहुत शानदार हैं ..

    इस नुमाइश में मिला वह चीथड़े पहने हुए
    मैंने पूछा कौन, तो बोला कि हिंदुस्तान हूँ।

    ***********
    ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा
    मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।
    यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं,
    खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा।

    बहुत सटीक संकलन किया है ...

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  4. सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

    मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

    मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

    हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

    गणेशचतुर्थी और ईद की मंगलमय कामनाये !

    अच्छी पंक्तिया लिखी है आपने ...

    .
    इस पर अपनी राय दे :-
    (काबा - मुस्लिम तीर्थ या एक रहस्य ...)
    http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_11.html

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  5. इतनी महान शख्सियत से परिचय कराने के लिये आपकी आभारी हूँ।
    गज़ब का लेखन था …………हर युग मे कालजयी ।
    आज भी उतनी ही प्रासंगिक जितनी तब थीं।
    किसी एक के बारे मे क्या कहें सभी रचनायें इंसान को सोचने को विवश करती हैं…………दर्द फ़ूट फ़ूट कर निकला है।

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  6. बहुत अच्छा लगा यह पोस्ट.
    ईद की बधाई.

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  7. अच्छा, मेहनत कर के लिखा गया ये लेख प्रभावी लगा.

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  8. राजभाषा ब्लॉग हिंदी साहित्य के श्रेष्ठंतम ब्लॉग है क्योंकि साहित्य को जितनी गंभीरता से प्रस्तुत यहाँ किया जा रहा है वो अन्यत्र नहीं है... आज दुष्यंत कुमार के बारे में शोधात्मक आलेख ना केवल साहित्य में रूचि रखने वालों के लिए है बल्कि आम आदमी के लिए भी कि किस प्रकार साहित्य में आड़ आदमी के सरोकारों का प्रतिनिधित्व होता है.. और आज उसका सर्वथा आभाव है... ग़ज़ल उर्दू साहित्य का बना दिया गया था.. लेकिन उसे हिंदी साहित्य में ए़क विधा के रूप में स्थापित करने वालों में दुष्यंत कुमार जी का नाम सबसे ऊपर आता है... मनोज जी जितनी महनत आपन कर रहे हैं वह नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा श्रोत बनेगा ए़क दिन... सुंदर आलेख के लिए आपका साधुवाद

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  9. चुनिंदा गज़लें ही पढ़ी हैं दुष्यंत कुमार जी की, लेकिन जितनी पढ़ी हैं सभी बहुत असरदार।
    परिचय करवाया आपने, आभार स्वीकार करें।

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  10. दुष्यंत को जितनी बार पढो लगता है पहली बार पढ़ रहें हों

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  11. @ अरविन्द जी,

    आपकी इन बातों से पूरी तरह सहमत।
    इससे अच्छी टिप्पणी कुछ और हो ही नहीं सकती।

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  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  13. मनोज जी,
    कुछ व्यक्तिगत व्यस्तताओं के कारण थोड़ा अनियमित होता जा रहा हूँ. किंतु आपके इस आलेख पर प्रतिक्रिया न करूँ तो यह आपके प्रयास के प्रति हो न हो, उस महान कवि और शायर के प्रति बहुत बड़ा अपराध होगा. सच मानिए तो यह विषय मेरा था, बस कभी इस बहाने तो कभी उस बहाने छूटता चला गया.
    एक दौर था जब ग़ज़लों पर सिर्फ उर्दू या उर्दूदाँ शायरों का एकाधिकार था. यहाँ तक कि वे शायर, जिनकी मातृभाषा उर्दू नहीं थी, भी हिंदी में इस तरह का प्रयास करने वालों को अछूत मानते थे. स्वयम् फ़िराक़ गोरखपुरी (रघुपति सहाय) ने हिंदी में की जाने वाली शायरी को दोयम दर्ज़े की बताया था एक परिचर्चा में (संदर्भ मुझे स्मरण नहीं). जबकि सचाई यह थी कि उर्दू शायरी अपनी कठिन शब्दावलि और वर्ग विशेष की भाषा के कारण जन साधारण से कट गई थी. ग़ालिब को पसंद किए जाने और कालजयी होने का कारण उनकी सादा ज़ुबानी है.
    ऐसे दौर में दुष्यंत की शायरी आम बोलचाल के लहजे में लिखी शायरी है जो एक ठण्डी हवा के झोंके की तरह आई. कहते हैं ग़ज़ल का अर्थ है गुफ़्तगू करना. शाब्दिक न हो तो भी कहा जाता है कि यह विधा बातचीत करती है. दुष्यंत जी की ग़ज़लें इस परिभाषा पर शत प्रतिशत खरी उतरती हैं.

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  14. एक समय था और शायद आज भी उनके शेर क्रांति का ऐंथेम माने जाते हैं. उनका संकलन साये में धूप आज भी किसी पवित्र ग्रंथ का दर्ज़ा रखता है. यह बात सिर्फ दुष्यंत ही कह सकते हैं कि
    मैं जिसे ओढता बिछाता हूँ
    वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ.
    एक जंगल है तेरी आँखों में
    मैं कहीं राह भूल जाता हूँ.
    दुष्यंत शायर भी हैं, कवि भी और निबंधकार भी. हर विधा में महारत.
    मनोज जी आपने इस साहित्यकार को एक ब्लॉग पेज में समेटने की चेष्टा की है, जो सर्वथा प्रशंसनीय है. मात्र 42 साल के जीवन काल में पसरा हुआ यह कवि, लेखक और शायर शायद इन हदों से कहीं आगे है. आपका धन्यवाद और अनेक नवोदित शायरों की इस प्रेरणा सिंधु को नमन!!

    सलिल वर्मा

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  15. माफ कीजिएगा मनोज बाबू ई टिप्पणी त आधा पोस्ट बन गया...मगर का करें दुष्यंत जी के जैसा ब्यक्तित्व पर एक बार लिखन लगिए त कलम रुकबे नहीं करता है..आपको दू खण्ड में लिखना चाहिए था. दुष्यंत का कविता संसार और दुष्यंत के निबंध..
    खैर जो लिखे हैं ऊ सहज रूप से अतुलनीय है...
    राजभाषा हिंदी ब्लॉग पुष्पित पल्लवित हो यही कामना है!

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  16. dushyant kumar....apne aap me ek mahtvapurn urja srot hain hum logon ke liye ..kabhi kabhi unke sher to khun ko ubal dete hain ...ghazal hindi me likhne ki shuruwat karke inhone mere jaison ke liye bahut asaani kar di ...dushyant ji ko naman aur aap ko is umda prayaas ke liye badhayiyan ..aap ki aawaz adhiktam logon tak pahunche yai kaamna hai ....

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  17. कमाल की पोस्ट। इतनी सारी रचनाएं पढने को मिली। अभार।

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  18. बेहद आभार दुष्यंत कुमार जीसे जुड़े इस सुन्दर और रोचक आलेख के लिए..!

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  19. इतनी महान शख्सियत से परिचय कराने के लिये आभारी हूँ।

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  20. दुष्यंत कुमार जी का परिचय और उनकी रचनाएँ बहुत अच्छी लगीं !

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  21. सहेज कर रख लेगे
    हम इन्हें अपने खजाने में
    सदियों रहेगें
    हमारे मन में

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  22. बहुत बढ़िया प्रस्तुतिकरण

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