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बुधवार, 23 नवंबर 2011

खेवली

धूमिलधूमिल की कविता-5

खेवली

वहाँ न जंगल है न जनतंत्र
भाषा और गूँगेपन के बीच कोई
दूरी नहीं है।
एक ठंडी और गाँठदार अंगुली माथा टटोलती है।
सोच में डूबे हुए चेहरों और
वहां दरकी हुई ज़मीन में
कोई फ़र्क नहीं हैं।

वहाँ कोई सपना नहीं है। न भेड़िये का डर।
बच्चों को सुलाकर औरतें खेत पर चली गई हैं।
खाये जाने लायक कुछ भी शेष नहीं है।
वहाँ सब कुछ सदाचार की तरह सपाट
और ईमानदारी की तरह असफल है।

हाय! इसके बाद
करम जले भाइयों के लिए जीने का कौन-सा उपाय
शेष रह जाता है, यदि भूख पहले प्रदर्शन हो और बाद में
दर्शन बन जाय।
और अब तो ऐसा वक्त आ गया है कि सच को भी सबूत के बिना
बचा पाना मुश्किल है।

बुधवार, 9 नवंबर 2011

धूमिल के जन्म दिन पर - किस्सा जनतंत्र

धूमिलधूमिल

जन्म : वाराणसी जनपद के एक साधारण से गांव खेवली में 9 नवम्बर, 1936 को।

धूमिल की कविता-5

किस्सा जनतंत्र

करछुल...
बटलोही से बतियाती है और चिमटा
तवे से मचलता है
चूल्हा कुछ नहीं बोलता
चुपचाप जलता है और जलता रहता है

औरत...
गवें गवें उठती है...गगरी में
हाथ डालती है
फिर एक पोटली खोलती है।
उसे कठवत में झाड़ती है
लेकिन कठवत का पेट भरता ही नहीं
पतरमुही (पैथन तक नहीं छोड़ती)
सरर फरर बोलती है और बोलती रहती है

बच्चे आँगन में...
आंगड़बांगड़ खेलते हैं
घोड़ा-हाथी खेलते हैं
चोर-साव खेलते हैं
राजा-रानी खेलते हैं और खेलते रहते हैं
चौके में खोई हुई औरत के हाथ
कुछ नहीं देखते
वे केवल रोटी बेलते हैं और बेलते रहते हैं

एक छोटा-सा जोड़-भाग
गश खाती हुई आग के साथ
चलता है और चलता रहता है
बड़कू को एक
छोटकू को आधा
परबती... बालकिशुन आधे में आधा
कुछ रोटी छै
और तभी मुँह दुब्बर
दरबे में आता है... 'खाना तैयार है?'
उसके आगे थाली आती है
कुल रोटी तीन
खाने से पहले मुँह दुब्बर
पेटभर
पानी पीता है और लजाता है
कुल रोटी तीन
पहले उसे थाली खाती है
फिर वह रोटी खाता है

और अब...
पौने दस बजे हैं...
कमरे में हर चीज़
एक रटी हुई रोज़मर्रा धुन
दुहराने लगती है
वक्त घड़ी से निकल कर
अंगुली पर आ जाता है और जूता
पैरों में, एक दंत टूटी कंघी
बालों में गाने लगती है

दो आँखें दरवाज़ा खोलती हैं
दो बच्चे टा टा कहते हैं
एक फटेहाल क्लफ कालर...
टाँगों में अकड़ भरता है
और खटर पटर एक ढड्ढा साइकिल
लगभग भागते हुए चेहरे के साथ
दफ्तर जाने लगती है
सहसा चौरस्ते पर जली लाल बत्ती जब
एक दर्द हौले से हिरदै को हूल गया
'ऐसी क्या हड़बड़ी कि जल्दी में पत्नी को चूमना...
देखो, फिर भूल गया।

सोमवार, 29 अगस्त 2011

जनतन्त्र के सूर्योदय में

धूमिलधूमिल की कविता-4

जनतन्त्र के सूर्योदय में

रक्तपात –
कहीं नहीं होगा
सिर्फ़ एक पत्ती टूटेगी!
एक कन्धा झुक जायेगा!
फड़कती भुजाओं और सिसकती हुई आँखों को
एक साथ लाल फीतों में लपेटकर
वे रख देंगे

काले दराज़ों के निश्चल एकान्त में
जहाँ रात में
संविधान की धाराएँ
नाराज़ आदमी की परछाईं को
देश के नक्शे में
बदल देती है

पूरे आकाश को
दो हिस्सों में काटती हुई
एक गूँगी परछाईं गुज़रेगी
दीवारों पर खड़खड़ाते रहेंगे
हवाई हमलों से सुरक्षा के इश्तहार
यातायात को
रास्ता देती हुई जलती रहेंगी
चौरस्तों की बस्तियाँ

सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा
पीला अन्धकार
शहर की समूची
पशुता के खिलाफ़
गलियों में नंगी घूमती हुई
पागल औरत के 'गाभिन पेट' की तरह
सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा पीला अन्धकार
और तुम
महसूसते रहोगे कि ज़रूरतों के
हर मोर्चे पर

तुम्हारा शक
एक की नींद और
दूसरे की नफ़रत से
लड़ रहा है
अपराधियों के झुण्ड में शरीक होकर
अपनी आवाज़ का चेहरा टटोलने के लिए
कविता में
अब कोई शब्द छोटा नहीं पड़ रहा है:
लेकिन तुम चुप रहोगे
तुम चुप रहोगे और लज्जा के
उस गूंगेपन-से सहोगे –
यह जानकर कि तुम्हारी मातृभाषा
उस महरी की तरह है जो
महाजन के साथ रात-भर
सोने के लिए
एक साड़ी पर राज़ी है
सिर कटे मुर्गे की तरह फड़कते हुए
जनतन्त्र में
सुबह –
सिर्फ़ चमकते हुए रंगों की चालबाज़ी है
और यह जानकर भी तुम चुप रहोगे
या शायद वापसी के लिए पहल करनेवाले –

आदमी की तलाश में

एक बार फिर
तुम लौट जाना चाहोगे मुर्दा इतिहास में
मगर तभी –
य़ादों पर पर्दा डालती हुई सबेरे की
फिरंगी हवा बहने लगेगी

अख़बारों की धूल और
वनस्पतियों के हरे मुहावरे
तुम्हें तसल्ली देंगे
और जलते हुए जनतन्त्र के सूर्योदय में
शरीक़ होने के लिए
तुम चुपचाप अपनी दिनचर्या का
पिछला दरवाज़ा खोलकर
बाहर आ जाओगे
जहाँ घास की नोक पर
थरथराती हुई ओस की एक बूंद
झड़ पड़ने के लिए
तुम्हारी सहमति का इन्तज़ार
कर रही है।

शनिवार, 20 अगस्त 2011

रोटी और संसद


धूमिल की कविता-3


रोटी और संसद


एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है।
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं
“यह तीसरा आदमी कौन है ?”
मेरे देश की संसद मौन है।

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

शहर का व्याकरण


धूमिल
शहर का व्याकरण
शहर का व्याकरण ठीक करने के लिए
एक हल्लागाड़ी
गश्त कर रही है
चुनाव के इश्तहार से निकलकर
एक आदमी सड़क पर आ गया है
आसमान में सन्नाटा छा गया है

शाम के सात बजे हैं
भाषा के चौथे पहर में
‘मैं प्रभु हूँ’ का चेहरा उतार कर
वह विदूषक
उस शो-केस के सामने खड़ा है
जिसमें जूते
पान की गिलौरियों की तरह सजे हैं
और एक रर्रा विदेशी पर्यटक का
पीछा कर रहा है

उसकी ज़ुबान पर अपने यहाँ गाये जानेवाले
जंगल-गीत का प्यारा-सा छन्द है
(आगे सड़क बन्द है)
लाल बत्ती जल रही है
फर्माइशी गीतों की परिचित आवाज़ में
सीमा पर तैनात जवानों का हौसला
बुलन्द है

आज हर चीज़ एक नाम है
लोगों की सुविधा के लिए
बनिया सच्चाई है
यह महँगाई है
जिसने बाज़ार को चकमा दिया है
लोग आ रहे हैं जा रहे हैं
और ख़ुश हैं कि भीड़ सुख पा रहे हैं

मगर सुनो ! तुमने अपने कुत्ते को
दिन में क्यों खोल दिया है
इसके पहले कि वह पकड़ लिया जाय
और चीड़-फाड़ की
किसी धारणा को साबित करते हुए
अस्पताल में हलाल हो
अगर तुम उसे नगरपालिका की नज़र से
बचाना चाहते हो
उसके गले में एक पट्टा डाल दो

सचमुच मज़बूरी है
मगर ज़िन्दा रहने के लिए
पालतू होना ज़रूरी है।
***

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

कविता

धूमिल

 

 

 

 

 

 

 

धूमिल

कविता

उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे

कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं

और हत्या अब लोगों की रूचि नहीं –

आदत बन चुकी है

वह किसी गँवार आदमी की ऊब से

पैदा हुई थी और

एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ

शहर में चली गयी

 

एक सम्पूर्ण स्त्री होने के पहले ही

गर्भाधान की क्रिया से गुज़रते हुए

उसने जाना कि प्यार

घनी आबादीवाली बस्तियों में

मकान की तलाश है

लगातार बारिश में भींगते हुए

उसने जाना कि हर लड़की

तीसरे गर्भपात के बाद

धर्मशाला हो जाती है और कविता

हर तीसरे पाठ के बाद

 

नहीं – अब वहाँ कोई अर्थ खोजना व्यर्थ है

पेशेवर भाषा के तस्कर – संकेतों

और बैलमुत्ती इबारतों में

अर्थ खोजना व्यर्थ है

हाँ, हो सके तो बगल से गुज़रते हुए आदमी से कहो –

लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,

यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था

 

इस वक़्त इतना ही काफ़ी है

 

वह बहुत पहले की बात है

जब कहीं, किसी निर्जन में

आदिम पशुता चीखती थी और

सारा नगर चौक पड़ता था

मगर अब –

अब उसे मालूम है कि कविता

घेराव में

किसी बौखलाये हुए आदमी का

संक्षिप्त एकालाप है