शनिवार, 20 अगस्त 2011

रोटी और संसद


धूमिल की कविता-3


रोटी और संसद


एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है।
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं
“यह तीसरा आदमी कौन है ?”
मेरे देश की संसद मौन है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. इन दिनों कई जगह देखा इस कविता को। कविता तो कविता है और मौन भी।

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  2. सुदामा पाण्डेय धूमिल एक कवि होने के नाते कवि-कर्म करके अपने मन में उठे भावों को इस उद्देश्य के निमित्त पेश किया था कि जन-मानस के अंत्तर्मन में शायद उनकी बातों का कुछ प्रभाव पड़े लेकिन अपनी ना समझी,अशिक्षा,देश की 'वोट बैंक' की राजनीति का शिकार होने के कारण हम आज तक कुछ भी समझ नही पाए हैं ,परिणामस्वरूप खामियाजा भुगत रहे हैं । जिन लोगों को हम संसद में भेजते हैं,वे हमारे प्रतिनिधि हैं। संसद में जाकर यदि वे अपना कर्तव्य भूल जाते है तो हम सबका क्या दोष है! एक भ्रष्ट सांसद को जांच एजेंसिया पकड़ती हैं एवं उस पर मुनासिब कार्रवाई की अनुमति लेने के लिए उनको भ्रष्ट लोगों के पास जाना पड़ता है। इसी लिए जनता की रोटी से खेलने वालों लोगों के विरूद्ध आज देश का हर आदमी अन्ना हजारे बन गया है । मेरी अपनी मान्यता है कि जब तक हमारे देश से भ्रष्टाचार नही मिटेगा तब तक धूमल जी की इस कविता की प्रासंगिकता यथावत बनी रहेगी । सामयिक पोस्ट की प्रस्तुति के लिए आपका विशेष आभार ।

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  3. पहले भी ये कविता पढ़ी है, आज भी प्रासंगिक है, ये तीसरा आदमी ही है जिसकी वजह से बाकी मध्यवर्ग कुलबुलाता रहता है, ग़रीबी रेखा के नीचे वाले और नीचे धंसते चले जाते हैं।

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  4. धूमिल जी ने चंद पंक्तियों में संसद के मौन पर गहरा कटाक्ष किया है .. अच्छी प्रस्तुति

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