सोमवार, 29 अगस्त 2011

जनतन्त्र के सूर्योदय में

धूमिलधूमिल की कविता-4

जनतन्त्र के सूर्योदय में

रक्तपात –
कहीं नहीं होगा
सिर्फ़ एक पत्ती टूटेगी!
एक कन्धा झुक जायेगा!
फड़कती भुजाओं और सिसकती हुई आँखों को
एक साथ लाल फीतों में लपेटकर
वे रख देंगे

काले दराज़ों के निश्चल एकान्त में
जहाँ रात में
संविधान की धाराएँ
नाराज़ आदमी की परछाईं को
देश के नक्शे में
बदल देती है

पूरे आकाश को
दो हिस्सों में काटती हुई
एक गूँगी परछाईं गुज़रेगी
दीवारों पर खड़खड़ाते रहेंगे
हवाई हमलों से सुरक्षा के इश्तहार
यातायात को
रास्ता देती हुई जलती रहेंगी
चौरस्तों की बस्तियाँ

सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा
पीला अन्धकार
शहर की समूची
पशुता के खिलाफ़
गलियों में नंगी घूमती हुई
पागल औरत के 'गाभिन पेट' की तरह
सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा पीला अन्धकार
और तुम
महसूसते रहोगे कि ज़रूरतों के
हर मोर्चे पर

तुम्हारा शक
एक की नींद और
दूसरे की नफ़रत से
लड़ रहा है
अपराधियों के झुण्ड में शरीक होकर
अपनी आवाज़ का चेहरा टटोलने के लिए
कविता में
अब कोई शब्द छोटा नहीं पड़ रहा है:
लेकिन तुम चुप रहोगे
तुम चुप रहोगे और लज्जा के
उस गूंगेपन-से सहोगे –
यह जानकर कि तुम्हारी मातृभाषा
उस महरी की तरह है जो
महाजन के साथ रात-भर
सोने के लिए
एक साड़ी पर राज़ी है
सिर कटे मुर्गे की तरह फड़कते हुए
जनतन्त्र में
सुबह –
सिर्फ़ चमकते हुए रंगों की चालबाज़ी है
और यह जानकर भी तुम चुप रहोगे
या शायद वापसी के लिए पहल करनेवाले –

आदमी की तलाश में

एक बार फिर
तुम लौट जाना चाहोगे मुर्दा इतिहास में
मगर तभी –
य़ादों पर पर्दा डालती हुई सबेरे की
फिरंगी हवा बहने लगेगी

अख़बारों की धूल और
वनस्पतियों के हरे मुहावरे
तुम्हें तसल्ली देंगे
और जलते हुए जनतन्त्र के सूर्योदय में
शरीक़ होने के लिए
तुम चुपचाप अपनी दिनचर्या का
पिछला दरवाज़ा खोलकर
बाहर आ जाओगे
जहाँ घास की नोक पर
थरथराती हुई ओस की एक बूंद
झड़ पड़ने के लिए
तुम्हारी सहमति का इन्तज़ार
कर रही है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुबह सुबह एक सुंदर रचना पढ़ने को मिली ,धन्यवाद

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  2. रक्तपात –
    कहीं नहीं होगा
    सिर्फ़ एक पत्ती टूटेगी !
    एक कन्धा झुक जायेगा !
    फड़कती भुजाओं और सिसकती हुई आँखों को
    एक साथ लाल फीतों में लपेटकर
    वे रख देंगे....

    बहुत सुन्दर सारगर्वित रचना प्रस्तुति....आभार

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  3. बहुत तीखे तेवर हैं ...

    झकझोर देने वाली प्रस्तुति

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  4. अब तो धूमिल की सब कविताएँ पढ़नी पड़ेंगी। ऐसा कवि और ऐसी कविता। कविता कम समझने के बावजूद धूमिल मेरे सबसे प्रिय कवियों में शामिल हो गये। आपने पढ़वाया, इसक लिए धन्यवाद। शानदार लेकिन यह शब्द तो इस कविता के लिए गलत है।

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