शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

कुरुक्षेत्र ... पंचम सर्ग .... भाग–2 --और --3 / रामधारी सिंह 'दिनकर'


प्रस्तुत भाग में युद्ध समाप्त होने पर जब युधिष्ठिर विजयी हो कर लौटते हैं और द्रौपदी उनकीअगवानी करने के लिए खड़ी हैं ... उस समय की उनकी मनोदशा को कवि ने अपने शब्दों में वर्णित किया है ...

इस काल – गर्भ में किन्तु , एक नर ज्ञानी
है खड़ा कहीं पर भरे दृगों में पानी ,
रक्ताक्त दर्प को पैरों तले दबाये ,
मन में करुणा का स्निग्ध प्रदीप जलाए ।
 
सामने प्रतीक्षा – निरत जयश्री बाला
सहमी सकुची है खड़ी लिए वरमाला ।
पर , धर्मराज कुछ जान नहीं पाते हैं ,
इस रूपसी को पहचान नहीं पाते हैं ।
 
कौंतेय भूमि पर खड़े मात्र हैं तन से ,
हैं चढ़े हुये अपरूप लोक में मन से ।
वह लोक , जहां विद्वेष पिघल जाता है
कर्कश , कठोर कालायस गल जाता है ;
 
नर जहां राग से होकर रहित विचरता ,
मानव , मानव से नहीं परस्पर डरता ;
विश्वास – शांति का निर्भय राज्य जहां है ,
भावना स्वार्थ की कलुषित त्याज्य जहां है ।
 
जन – जन के मन पर करुणा का शासन है
अंकुश सनेह का , नय का अनुशासन है ।
है जहां रुधिर से श्रेष्ठ अश्रु निज पीना ,
साम्राज्य  छोड़ कर भीख मांगते जीना ।
 
वह लोक जहां शोणित का ताप नहीं है ,
नर के सिर पर रण का अभिशाप नहीं है ।
जीवन समता की छांह – तले पलटा है ,
घर – घर पीयूष – प्रदीप जहां जलता है ।
 
अयि विजय ! रुधिर से क्लिन्न वासन है तेरा ,
यम दृष्टा से क्या भिन्न दशन है तेरा ?
लपटों की झालर झलक रही अंचल में ,
है धुआं ध्वंस का भरा कृष्ण कुंतल में ।
 
ओ कुरुक्षेत्र की सर्व-ग्रासिनी व्याली ,
मुख पर से तो ले पोंछ रुधिर की लाली ।
तू जिसे वरण करने के हेतु विकल है ,
वह खोज रहा कुछ और सुधामय फल है ।
 
वह देख वहाँ , ऊपर अनंत अंबर में ,
जा रहा दूर उड़ता वह किसी लहर में
लाने धरणी के लिए सुधा की सरिता ,
समता प्रवाहिनी , शुभ्र स्नेह – जल – भरिता ।
 
सच्छान्ति जागेगी इसी स्वप्न के क्रम से ,
होगा जग कभी विमुक्त इसी विध यम से ।
परिताप दीप्त होगा विजयी के मन में ,
उमड़ेंगे जब करुणा के मेघ नयन में ;
 
जिस दिन वधको वध समझ जयी रोएगा
आँसू से तन का रुधिर – पंक धोएगा ;
होगा पथ उस दिन मुक्त मनुज की जय का
आरम्भ भीत धरणी के भाग्योदय का ।
 
संहार सुते ! मदमत्त जयश्री वाले !
है खड़ी पास तू किसके वरमाला ले ?
हो चुका विदा तलवार उठाने वाला ,
यह है कोई साम्राज्य लुटाने वाला ।
 
रक्ताक्त देह से इसको पा न सकेगी
योगी को मद – शर मार जगा न सकेगी ।
होगा न अभी इसके कर में कर तेरा ,
यह तपोभूमि , पीछे छूटा घर तेरा ।
 
लौटेगा जब तक यह आकाश – प्रवासी ,
आएगा तज निर्वेद –भूमि सन्यासी ,
मद – जनित रंग तेरे न ठहर पाएंगे
तब तक माला के फूल सूख जाएँगे ।
 
क्रमश:
 


 भाग ----3 

प्रस्तुत भाग में  जब पितामह भीष्म युद्ध समाप्ति के बाद युधिष्ठिर को समझाते हैं कि यह युद्धआवश्यक था तो युद्ध के पश्चात के वीभत्स दृश्यों को देख युधिष्ठिर के मन के भावों का कवि ने सटीक वर्णन किया है ...

बुद्धि बिलखते उर का चाहे जितना करे प्रबोध ,
सहज नहीं छोड़ती प्रकृति लेना अपना प्रतिशोध ।

चुप हो जाए भले मनुज का हृदय युक्ति से हार ,
रुक सकता पर , नहीं वेदना का निर्मम व्यापार ।

सम्मुख जो कुछ बिछा हुआ है ,निर्जन, ध्वस्त ,विषण्ण ,
युक्ति करेगी उसे कहाँ तक आँखों से प्रच्छ्न्न ?

चलती रही पितामह- मुख से कथा अजस्र ,अमेय ,
सुनते ही सुनते , आँसू में फूट पड़े कौंतेय ।

हाँ , सब हो चुका पितामह , रहा नहीं कुछ शेष ,
शेष एक आँखों के आगे है यह मृत्यु - प्रदेश -

जहां भयंकर भीमकाय शव - सा निस्पंद , प्रशांत ,
शिथिल श्रांत हो लेट गया है स्वयं काल विक्रांत ।

रुधिर - सिक्त - अंचल में नर के खंडित लिए शरीर ,
मृतवत्सला विषण्ण  पड़ी है धरा मौन , गंभीर ।

सड़ती हुई विषाक्त गंध से दम घुटता सा जान ,
दबा नासिका निकाल भागता है द्रुतगति पवमान ।

सीत - सूर्य अवसन्न डालता सहम - सहम कर ताप ,
जाता है मुंह छिपा घनों में चाँद चला चुपचाप ।

वायस , गृद्ध , शृगाल, स्वान , दल के दल  वन - मार्जार ,
यम के अतिथि विचरते सुख से देख विपुल  आहार ।

मनु का पुत्र बने पशु - भोजन ! मानव का यह अंत !
भरत - भूमि के नर वीरों की यह दुर्गति , हा , हंत !

तन के दोनों ओर झूलते थे जो शुंड विशाल ,
कभी प्रिया का कंठहार बन , कभी शत्रु का काल -

गरुड - देव के पुष्ट पक्ष - निभ दुर्दमनीय, महान ,
अभय नोचते आज उन्हीं को वन के जम्बुक , श्वान ।

जिस मस्तक को चंचु मार कर वायस रहे विदार ,
उन्नति - कोश जगत का था वह , स्यात ,स्वप्न -भांडार ।

नोच नोच खा रहा गृद्ध जो वक्ष किसी का चीर ,
किसी सुकवि का , स्यात , हृदय था स्नेह सिक्त गंभीर ।

केवल गणना ही नर की कर गया न कम विध्वंस ,
लूट ले गया है वह कितने ही अलभ्य  अवतंस ।

नर वरेण्य , निर्भीक , शूरता के ज्वलंत आगार ,
कला , ज्ञान , विज्ञान , धर्म के मूर्तिमान  आधार -

रण की भेंट चढ़े सब ; हृतरत्ना  वसुंधरा दीन ,
कुरुक्षेत्र से निकली है होकर अतीव श्रीहीन  ।

विभव , तेज , सौंदर्य , गए सब दुर्योधन के साथ ,
एक शुष्क कंकाल लगा    है मुझ पापी के हाथ ।

एक शुष्क कंकाल , मृतों के स्मृति - दंशन का शाप ,
एक शुष्क कंकाल , जीवितों के मन का संताप ।

एक शुष्क कंकाल , युधिष्ठिर की जय की पहचान ,
एक शुष्क कंकाल , महाभारत का अनुपम दान ।

  धरती वह , जिस पर कराहता है घायाल संसार ,
वह आकाश , भरा है जिसमें करुणा की चीत्कार।

महादेश वह  जहां सिद्धि की शेष बची है धूल ,
जलकर जिसके क्षार हो गए हैं समृद्धि के फूल ।

यह उच्छिष्ट प्रलय का , अहि - दंशित मुमूर्ष यह देश ,
मेरे हित श्री के गृह में , वरदान यही  था  शेष ।
 
क्रमश:

प्रथम सर्ग --        भाग - १ / भाग –२ 
द्वितीय  सर्ग  --भाग -- १ / भाग -- २ / भाग -- ३ 
तृतीय सर्ग  ---    भाग -- १ /ाग -२
चतुर्थ सर्ग ---- भाग -१    / भाग -२  / भाग - ३ /भाग -४ /भाग - ५ /भाग –6 /भाग –7 /भाग – 8 /भाग – 9
पंचम सर्ग ----भाग - 1



बुधवार, 22 दिसंबर 2010

भारतेन्दु युग की कविता

भारतेन्दु युग की कविता

मनोज कुमार

आज की कविता का अभिव्यंजना कौशल पर अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा था

भारतेंदु युग की भाषा पर कुछ नहीं लिखा , वहाँ तो गजब सम्प्रेषणीयता का आग्रह है . और यह भी कि ' सवाल यह है कि आपने क्‍या कहा है? ' , का भी !!

भारतेन्दु युग में जहां ब्रजभाषा में साहित्य की रचना हो रही थी वहीं खड़ी बोली हिन्दी भी साहित्य की भाषा के रूप में स्थान ग्रहण कर रही थी।

1857 की क्रांति कुचल दी गई थी, और अंग्रेज़ी सत्ता की स्थापना के साथ विस्तार शुरु हो गया। सामंती भारत की की समाप्ति और औपनिवेशिक दासता का आगाज़ ... यानी शोषण ... शोषण ... और शोषण! इस शोषण के विरुद्ध राष्ट्रीय असंतोष को अपने ढंग से भारतेन्दु युग के रचनाकार पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से कर रहे थे। भारतेन्दु जी की ही पंक्तियां उद्धृत करें –

अंग्रेज़ी राज सुख साज सजे सब भारी।

पै धन विदेश चलिजात इहै अति ख्वारी॥

अंग्रेज़ राज के कारण भारत का बहुत बड़ा हित हुआ है लेकिन इस राज की सबसे बड़ी खराबी यह है कि देश का धन विदेश चला जाता है। उस काल की देशभक्ति को इस द्वन्द्व के संदर्भ में ही समझा सकता है। यहां यह भी स्पष्ट है कि इसके पहले के जो मुस्लिम शासक थे, वे चाहे जितने बुरे रहे हों, कम से कम देश का धन तो देश में ही रहता था। पर अगर गहराई से विश्लेषण करें तो पाते हैं कि भारतेन्दु की पहली पंक्ति एक रणनीतिक वक्तव्य है, असली मकसद तो उनका यह बताना है कि अंग्रेज़ भारत को लूट रहे हैं और बरबाद कर रहे हैं। तभी तो वो कहते हैं अंग्रेज़ी राज बाहर से चाहे जैसा भी क्यों न दिखता हो लेकिन वह देश का पूरा रस चूसने वाला है।

भीतर-भीतर सब रस चूसै,

हंसि हंसि के तन मन धन मूसे।

जाहिर बातन में अति तेज,

क्यों सखि साजन? नहिं अंग्रेज़॥

भारतेन्दु युग आधुनिक हिन्दी साहित्य का पहला चरण है। इस कालखण्ड के साहित्य को भारतेन्दु के व्यक्तित्व और कृतित्व की देन के कारण इसका नामाकरण भारतेन्दु युग हुआ। इस युग के गद्य को लेकर तो कोई दुविधा है ही नहीं। न कथ्य को लेकर न माध्यम भाषा को लेकर – क्योंकि इसके पहले गद्य की कोई पुष्ट परम्परा नहीं थी। हां, कविता को लेकर दुविधा है। पहले के भक्तिकाल एवं रीति काल की काव्य-परंपरा काफी सम्पन्न थी। इसे छोड़कर एकदम से नये कविता-पथ पर चल पड़ना उस युग के रचनाकारों, कवियों के लिए बड़ा ही असम्भव-सा काम था। इसलिए इस युग में भी भक्ति, श्रृंगार और नीति की कविताओं की भरमार है, भले ही भाषा ब्रजभाषा ही रही।

जहां, कवि परम्परा का ही अनुकरण कर रहे थे, वहीं कविता के नाम पर चमत्कार-सृष्टि भी कर रहे थे। महाराज कुमार बाबू नर्मदेश्वर प्रसाद सिंह ने ‘शिवा शिव शतक’ तथा स्वयं भारतेन्दु परम्परागत कविता लिख रहे थे। इन कविताओं में अनुभव की सजीवता और चमत्कार थे।

एक ही गांव में बास सदा, घर पास रहौ नहिं जानती हैं।

पुनि पाचएं-सातएं आवत-जात, की आस न चित में आनती हैं।

हम कौन उपाय करैं इनको, ‘हरिचंद’ महा हठ ठानती हैं।

पिय प्यारे तिहारे निहोरे बिना, आंखियां दुखिया नहिं मानती हैं॥

लेकिन जहां इस युग में एक तरफ़ अधिकांशतः परम्परागत कविताएं ही लिखी जा रही थी, वहीं दूसरी तरफ़ इस युग के कई कवियों ने परम्परा से हट कर नए विषयों को लेकर नई भाववस्तु वाली कविताएं भी प्रचुर मात्रा में लिखी। ऐसे-ऐसे विषयों पर कविताएं रची गई जिसके बारे में पूर्ववर्ती काल के कवि सोच भी नहीं सकते थे। ग़रीबी, भूख, अकाल, रोग, कलह, खुशामद, कायरता, टैक्स, देश की दुर्दशा, छुआछूत, व्यभिचार, कुप्रथा, अशिक्षा, कूपमण्डूकता, रिश्वतखोरी, सिफ़ारिश, बेकारी ...आदि विषयों पर कविताएं लिखी गईं। मतलब उस समय के जीवन से जुड़ा ऐसा कोई भी पक्ष बाक़ी न रह गया। ऐसा लगता है कवि रचनाओं को रज़मर्रा के जीवन से जोड़कर देखते थे ... रचते थे। हम कह सकते हैं कि उनका प्रयास था परलौकिक जीवन-दृष्टि को हटाकर लौकिक जीवन-दृष्टि को स्थापित करना, जिसमें वे सफल भी हुए।

अपने अतीत और वर्तमान के आलोक में कहीं न कहीं उनके मन में पीड़ा थी, क्षोभ था-...! एक तरफ़ था अतीत का गौरव, दूसरी तरफ़ थी वर्तमान की दुर्दशा। इस दुर्दशा को देख कर, विचार कर उसके कारणों को अपनी रचना में समाहित करते ये रचनाकार समाज की जड़ता, रूढिप्रियता और कुरीतियों पर प्रहार करते रहे। वे समाज सुधारना तो चाहरे थे लेकिन उनके सामने द्वन्द्व और दुविधा थे, क्योंकि बाल-विवाह, विधवा-विवाह पर मतैक्य नहीं था। कर्मकाण्ड का विरोध समाज को सहज स्वीकार्य नहीं था। जबकि अंग्रेज़ों का दमन और आर्थिक शोषण असह्य था। मध्यकालीन अराजकता के परिप्रेक्ष्य में अंग्रेज़ राज के सुख-साज इसलिए उन्हें अस्वीकार्य था कि सारा धन विदेश चला जा रहा था। भारतेन्दु ने 1874 में स्वदेशी आन्दोलन भी चलाया। ‘अंधेर नगरी’ में चूरन बेचने वाले के माध्यम से उन्होंने कहा,

चूरन अमले सब जो खावैं।

दूनी रुशवत तुरत पचावैं॥

चूरन साहब लोग जो खाता।

सारा हिन्द हजम कर जाता।

चूरन पुलिस वाले खाते।

सब कानून हजम कर जाते॥

कविता का यह अंश आज भी प्रासंगिक है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बालमुन्द गुप्त, श्रीधर पाठक, चौधरी बदरीनारायण ‘प्रेमधन’. राधाचरण गोस्वामी, आदि इस युग के प्रगतिशील कवि थे।

गद्य में तो इस युग में खड़ी बोली अपना ली गई, पर कविता में ब्रजभाषा ही चलती रही। जहां एक ओर भारतेन्दु का कहना था कि ‘ब्रजभाषा में ही कविता करना उत्तम है’, वहीं दूसरी ओर बालकृष्ण भट्ट का मानना था कि, ‘खड़ी बोली में एक प्रकार का कर्कशपन है, उसके साथ कविता में सरसता लाना प्रतिभावान के लिए कठिन है तब तुकबन्दी करने वाले की कौन कहे।’

लेकिन जाने-अनजाने ही सही भारतेन्दु युग के कवि नाटकों आदि में प्रयुक्त कविताओं में खड़ी बोली का उपयोग करते रहे। साथ ही कुछ मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार, के अयोध्याप्रसाद खत्री जैसे भी थे जो खड़ी बोली पद्य का आन्दोलन चला रहे थे और उन्होंने ‘खड़ी बोली के पद्य’ भी प्रकाशित किया। बद में चलकर इसे आधुनिक हिन्दी कविता की भाषा में स्वीकृति तो मिली ही।

स्पष्ट है कि भारतेन्दु युग संक्रमण का काल था। हां, इस नए-पुराने की कदम ताल में पुराना पिछड़ रहा था, नया अगे बढ रहा था। अंतर्विरोध के रहते हुए भी इस युग ने नवयुग का मार्ग प्रशस्त किया। कविता को रोज़मर्रे के यथार्थ जीवन की समस्याओं से जोड़ा गया। जागरण का काम, भी इस युग की कविताओं ने किया। मध्यकालीन से आधुनिक बोध की तरफ़ प्रगतिशील क़दम भी इसी युग में बढे। अतः हम कह सकते हैं कि इस काल का साहित्य नवजागृत श्रेणी का साहित्य है।