सोमवार, 28 नवंबर 2011

कुरुक्षेत्र …. द्वितीय सर्ग ( भाग – 1 ) रामधारी सिंह ‘ दिनकर'




आयी हुई मृत्यु से कहा अजेय भीष्म ने कि
'योग नहीं जाने का अभी है, इसे जानकर,
रुकी रहो पास कहीं'; और स्वयं लेट गये
बाणों का शयन, बाण का ही उपधान कर!
व्यास कहते हैं, रहे यों ही वे पड़े विमुक्त,
काल के करों से छीन मुष्टि-गत प्राण कर।
और पंथ जोहती विनीत कहीं आसपास
हाथ जोड़ मृत्यु रही खड़ी शास्ति मान कर।
श्रृंग चढ जीवन के आर-पार हेरते-से
योगलीन लेटे थे पितामह गंभीर-से।
देखा धर्मराज ने, विभा प्रसन्न फैल रही
श्वेत शिरोरुह, शर-ग्रथित शरीर-से।
करते प्रणाम, छूते सिर से पवित्र पद,
उँगली को धोते हुए लोचनों के नीर से,
"हाय पितामह, महाभारत विफल हुआ"
चीख उठे धर्मराज व्याकुल, अधीर-से।
"वीर-गति पाकर सुयोधन चला गया है,
छोड़ मेरे सामने अशेष ध्वंस का प्रसार;
छोड़ मेरे हाथ में शरीर निज प्राणहीन,
व्योम में बजाता जय-दुन्दुभि-सा बार-बार;
और यह मृतक शरीर जो बचा है शेष,
चुप-चुप, मानो, पूछता है मुझसे पुकार-
विजय का एक उपहार मैं बचा हूँ, बोलो,
जीत किसकी है और किसकी हुई है हार?
"हाय, पितामह, हार किसकी हुई है यह?
ध्वंस -अवशेष पर सिर धुनता है कौन?
कौन भस्मराशि में विफल सुख ढूँढता है?
लपटों से मुकुट के पट बुनता है कौन?
और बैठ मानव की रक्त-सरिता के तीर
नियति के व्यंग-भरे अर्थ गुनता है कौन?
कौन देखता है शवदाह बन्धु-बान्धवों का?
उत्तरा का करुण विलाप सुनता है कौन?
"जानता कहीं जो परिणाम महाभारत का,
तन-बल छोड़ मैं मनोबल से लड़ता;
तप से, सहिष्णुता से, त्याग से सुयोधन को
जीत, नयी नींव इतिहास कि मैं धरता।
और कहीं वज्र गलता न मेरी आह से जो,
मेरे तप से नहीं सुयोधन सुधरता;
तो भी हाय, यह रक्त-पात नहीं करता मैं,
भाइयों के संग कहीं भीख माँग मरता।
"किन्तु, हाय, जिस दिन बोया गया युद्ध-बीज,
साथ दिया मेर नहीं मेरे दिव्य ज्ञान ने;
उलट  दी मति मेरी भीम की गदा ने और
पार्थ के शरासन ने, अपनी कृपान ने;
और जब अर्जुन को मोह हुआ रण-बीच,
बुझती शिखा में दिया घृत भगवान ने;
सबकी सुबुद्धि पितामह, हाय, मारी गयी,
सबको विनष्ट किया एक अभिमान ने.
 
"कृष्ण कहते हैं, युद्ध अनघ है, किन्तु मेरे
प्राण जलते हैं पल-पल परिताप से;
लगता मुझे है, क्यों मनुष्य बच पाता नहीं
दह्यमान इस पुराचीन अभिशाप से?
और महाभारत की बात क्या? गिराये गये
जहाँ छल-छद्म से वरण्य वीर आप-से,
अभिमन्यु-वध औ' सुयोधन का वध हाय,
हममें बचा है यहाँ कौन, किस पाप से?


क्रमश:


प्रथम सर्ग ( भाग - 1 )( भाग -2)

15 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय दिनकर जी की कालजयी रचना का सराहनीय प्रस्तुतिकरण .
    हार्दिक आभार .

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  2. रामधारी सिंह दिनकर की यह रचना मानवीय मूल्यों एवं नैतिक शिक्षाओं के विए अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है । धन्यवाद ।

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  3. इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें.

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  4. युद्ध में केवल हारती ममता है और परिवार नष्‍ट होता है। लेकिन कुरुक्षेत्र हर व्‍यक्ति के मन में न जाने क्‍यों बसा है?

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  5. एक युद्ध बहुत कुछ ले जाता है अपने साथ उसका बहुत सुन्दर चित्रण किया है दिनकर जी ने…………आभार्।

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  6. पढ़ रहे हैं मन से ..फिर से ..धन्यवाद यहाँ पढवाने का.

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  7. हिंदी साहित्य की प्रतिनिधि रचना पढवाने का विशेष आभार... अब कुरुक्षेत्र के बारे में हम तो कुछ अधिक कहने योग्य हैं नहीं...

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  8. यह रचना तो बस एक अनुभव है..जिसके विषय में कुछ भी कहना शब्दों से परे है.. गर्व है मुझे कि उस पावन भूमि पर मैंने जन्म लिया जहाँ इस कवि ने अपनी काव्य-सर्जना की!!

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  9. दिनकर जी का कुरुक्षेत्र युद्ध-मनोविज्ञान पर आधारित खण्डकाव्य है। उनकी यह काफी रोचक और बोधगम्य है।

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  10. दिनकर जी कि ये रचना तो लाजबाब है ही ..

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  11. hamesha se itihas gavaah raha hai ki yudhh aur abhiman ki agni me sab jal jata hai....lekin aaj bhi ham is saty ko bhool jate hain aur sab kuchh isi agni me hom kiye jate hain. ham se bada moorkh kaun hoga ?

    sachet karne ko to bahut kuchh hai is KURUKSHETR abhivyakti me fir bhi koi jaag paye to ?????

    aabhar ise ham tak pahunchane ke liye.

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  12. हाय, पितामह, हार किसकी हुई है यह
    शाश्वत प्रश्न।

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