सोमवार, 16 जनवरी 2012

कुरुक्षेत्र … चतुर्थ सर्ग .. ( भाग – २ ) रामधारी दिनकर सिंह



युगों से विश्व में विष - वायु बहती आ रही थी ,
धरित्री मौन हो दावाग्नि सहती आ रही थी ;
परस्पर वैर - शोधन के लिए तैयार थे सब ,
समर का खोजते कोई बड़ा आधार थे सब |

कहीं था जल रहा कोई किसी की शूरता से |
कहीं था क्षोभ में कोई किसी की क्रूरता से |
कहीं उत्कर्ष ही नृप का नृपों को सालता था
कहीं प्रतिशोध का कोई भुजंगम पालता था |

निभाना पर्थ - वध का चाहता राधेय  था प्रण|
द्रुपद था चाहता गुरु द्रोण से निज वैर - शोधन |
शकुनी को चाह थी , कैसे चुकाए ऋण पिता का ,
मिला दे धूल में किस भांति कुरु-कुल की पताका |

सुयोधन पर न उसका प्रेम था, वह घोर छल था ,
हितू बन कर उसे रखना ज्वलित केवल अनल था
जहाँ भी आग थी जैसी , सुलगती जा रही थी ,
समर में फूट पड़ने के लिए अकुला रही थी |

सुधारों से स्वयं भगवान के जो - जो चिढे थे
नृपति वे क्रुद्ध होकर एक दल में जा मिले थे |
नहीं शिशुपाल के वध से मिटा था मान उनका ,
दुबक कर था रहा धुन्धुंआँ द्विगुण अभिमान उनका|

परस्पर की कलह से , वैर से , हो कर विभाजित 
कभी से दो दलों में हो रहे थे लोग सज्जित |
खड़े थे वे ह्रदय में प्रज्ज्वलित अंगार ले कर ,
धनुज्याँ को चढा कर , म्यान में तलवार ले कर |

था रह गया हलाहल का यदि
                               कोई रूप अधूरा ,
किया युधिष्ठिर , उसे तुम्हारे
                           राजसूय ने पूरा |

इच्छा नर की और , और फल
                          देती उसे नियति है |
फलता विष पीयूष - वृक्ष में ,
                      अकथ प्रकृति की गति है |

तुम्हें बना सम्राट देश का ,
                         राजसूय के द्वारा ,
केशव ने था ऐक्य- सृजन का
                           उचित उपाय विचारा |

सो , परिणाम और कुछ निकला ,
                              भडकी आग भुवन  में |
द्वेष अंकुरित हुआ पराजित
                               राजाओं के मन में |

समझ न पाए वे केशव के
                           सदुद्देश्य निश्छल को |
देखा मात्र उन्होंने बढ़ाते
                             इन्द्रप्रस्थ के बल को |

पूजनीय को पूज्य मानने
                            में जो बाधा - क्रम है ,
वही मनुज का अहंकार है ,
                             वही मनुज का भ्रम है |

क्रमश:

12 टिप्‍पणियां:

  1. कुरुक्षेत्र को पुनः यहाँ पढना सुखद लग रहा है ...!

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  2. पूजनीय को पूज्य मानने
    में जो बाधा - क्रम है ,
    वही मनुज का अहंकार है ,
    वही मनुज का भ्रम है

    आपका यह पोस्ट कुछ सीखने के लिए प्रेरित करता है। मेरे नए पोस्ट " हो जाते हैं क्यों आद्र नयन" पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  3. ये जो मन है हमारा,सौ परेशानियों की जड़ है। इसकी इच्छित एकाग्रता हासिल होने के बाद भी, साधना के गुह्यतर स्तरों में, पुनः उसे व्यष्टि-भाव में प्राप्त करने का कार्य शुरू होता है.

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  4. सशक्त और प्रभावशाली रचना|

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  5. पूजनीय को पूज्य मानने
    में जो बाधा - क्रम है ,
    वही मनुज का अहंकार है ,
    वही मनुज का भ्रम है |
    कितना सशक्त ....

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  6. बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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  7. हर अंक लाजवाब!! अद्भुत् कृति।

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  8. दिनकर रथ पर आप ... बस पढ़ रही हूँ

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  9. प्रशंसनीय रचना है ये राष्ट्रकवि की

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