सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

पर्व कन्या पूजन का ...


कन्या पूजन का पर्व आया
सबने मिल नवरात्र मनाया
नौ दिन देवी को अर्घ्य चढाया
कन्या के पग पखार
माथे तिलक लगाया
धार्मिक ग्रंथों में कन्या को
देवी माना है
क्रमशः उनको - कुमारी , त्रिमूर्ति
कल्याणी , रोहणी, कलिका ,
चंडिका , शाम्भवी , दुर्गा
और सुभद्रा जाना है
पूजा - अर्चना कर
घर की समृद्धि चाही है
पर कन्या के जन्म से
घर में उदासी छाई है ।
नवरात्र में जिसकी
विधि- विधान से
पूजा की जाती है
कन्या-भ्रूण पता चलते ही
उसकी हत्या
कर दी जाती है ।
कैसा है हमारा ये
दोगला व्यवहार ?
पूजते जिस नारी को
करते उसी पर अत्याचार
धार्मिक कर्म - कांडों से
नहीं होगा उसका उद्धार
खोलने होंगे तुमको
निज मन के द्वार ।
जिस दिन तुम
मन से कन्या को
देवी मानोगे
तब ही तुम
सच्ची सुख - समृद्धि पाओगे.

22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    दुर्नामी लहरें, को याद करते हैं वर्ल्ड डिजास्टर रिडक्शन डे पर , मनोज कुमार, “मनोज” पर!

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  3. waah sangeeta ji waah ...... logon ke do roopon ka sahi khulasa kiya hai, bahut badhiyaa

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  4. बहुत सुंदर कविता. काश हमारी आँखें खुल जाती, ये दुनिया और भी खूबसूरत होती ..

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

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  6. "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता" तो हम सब उच्चारते हैं पर अमल कोई ही करता है.कन्या तो देवी-स्वरुप है और स्रष्टि का अनुपम उपहार !

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  7. नवरात्रि के पवन अवसर पर कन्याओं पर बेहतरीन कविता देना आपकी साफ सुथरी सूझ - बूझ को दर्शाता है.
    मेरा एक दोहा है:-
    हत्या करना भ्रूण की ,घोषित हो अपराध.
    इसके दुष्परिणाम को , समझ रहे एकाध.

    नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें

    समय हो तो कृपया मेरा ब्लॉग:kunwarkusumesh.blogspot.com देखें.

    कुँवर कुसुमेश

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  8. बिल्कुल सही कहा………………बेहद सुन्दर संदेश दिया है।

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  9. सुंदर कविता द्वारा मैयाजी का गुणगान एवं विस्तृत जानकारी!....बधाई!

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  10. एकदम जैसे आइना दिखा दिया समाज को .जो भी पढ़ेगा इसी एक बार तो जरुर सोचेगा.सार्थक सटीक रचना.

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  11. नवरात्र में जिसकी
    विधि- विधान से
    पूजा की जाती है
    कन्या-भ्रूण पता चलते ही
    उसकी हत्या
    कर दी जाती है

    बस यही असली सच है...
    कडवे सच को उजागर करती एक सार्थक कविता...

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  12. बहुत ही सार्थक और सारगर्भित रचना ! इसे विडम्बना ही कहिये की हमारे समाज में ऐसे दोहरे चरित्र वाले लोग रहते हैं जो बिना मन से समझे परम्पराओं के अनुसार देवी पूजन और कन्या पर्व तो मनाते हैं लेकिन व्यक्तिगत जीवन में ना तो उनका पालन करते हैं ना ही आदर ! इसीलिये समाज में कन्या भ्रूण ह्त्या जैसी विसंगतियां दिखाई देती हैं और कन्या के जन्म पर घर में उदासी छा जाती है !

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  13. tabhi to ab nau kanyayane jutana mushkil hone laga hai. kisaki pooja karen aur kisako bhojan karayen?
    bas apani manasikta badal len chahe pooja karen ya na karen.
    vaise isa kanya shakti ke apaman se ham gart men ja rahe hain.

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  14. सभी पाठकों का आभार ...आपके आनेसे हौसला बढा ...

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  15. समाज में फैली दुर्भावनाओ को उजागर करती एक सशक्त रचना.

    सभी देवियों के नाम सजा कर रचना को उत्कृष्टता प्रदान की है.

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  16. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  17. एक परम्परा जीवंत हो उठी आपकी कविता में.. साथ ही वह क्रूर परम्परा भी! जिस दिन इस महिषासुर का मर्दन होगा उस दिन सही अर्थों में नवरात्रि की पूर्णाहुति पर कन्या पूजन सार्थक हो पाएगा!

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  18. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  19. सर्व प्रथम संवेदनशील रचना के लिए बधाईईईई ...!
    इस देश में कन्या सिर्फ दान - बलिदान के लिया पाली जाती है, काल परिस्थिति भले बदल जाय, नाम - रूप भी बदल जाय परन्तु अंतिम गति तो वही है -- कन्या भोज, बलिदाम की वेदी और कन्या-दान के पूर्व की एक कड़ी है शायद? मैं जानता हूँ इसे कोई स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन लागू जोस्ज - खरोश, पूरे उत्साह से करेगा, प्रदर्शन भी करेगा, शर्माने के बाजे इतराएगा. बलि की बेदी पर कन्या भोज कराकर अपने ही हाथ से बिठाएगा.....क्या हममे कोई है ऐस्सा जो मेरा साथ निभाएगा ? ....इस विकृति के खिलाफ केवाल आवाज ही नहीं उठेगा बल्कि कुछ कर के दिखलाएगा ..इस बुराई को जड़ से मिटाएगा ...स्वागत है सबका. आप बुद्धिजीवी हैं पहला फर्ज तो हमी आपका बनता ही...........अच्छी रचना कुछ तो जरूर सोचेंगे ..जो मेरे जैसे बेवकूफ होंगे.....

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