शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

इतिहास :: मुग़ल काल में सत्ता का संघर्ष

मुग़ल काल में सत्ता का संघर्ष

IMG_0531मनोज कुमार

मुगल शासन व्‍यवस्‍था में उतराधिकार का कोई नियम नहीं था। फलतः सुलतान के मरते ही शहजादे गद्दी के लिए आपस में संघर्ष किया करते थे। मुगल साम्राज्‍य के इतिहास में गद्दी के दावे के लिए अनेक गृह युद्ध हुए हैं जिन्‍होंने मुगलों की शक्ति और प्रतिष्‍ठा को भारी क्षति पहुंचाई।

बाबर और हुमायूं ने भारत में मुगल राजवंश की स्‍थापना तो कर दी थी परंतु वे इसे स्‍थायित्‍व नहीं दे पाये। अकबर ने इस काम को पूरा किया। उसने राज्‍य के विस्‍तार के अलावा इसके सुदृढ़ीकरण की भी व्‍यवस्‍था की पर उसके जीवनकाल में ही जहांगीर ने गद्दी पर अधिकार करने के लिए विद्रोह कर दिया था, अकबर ने उसे समझा-बुझाकर शांत किया था।

जहांगीर के शासनकाल में शहजादों के विद्रोह ने बड़ा विकृत रूप धारण कर लिया। उसके शासनकाल में पहला विद्रोह शहजादा खुसरो का हुआ था परंतु जहांगीर ने अपनी काबिलियत से उसे दबा दिया। खुसरो की सहायता करने के अपराध में जहांगीर ने सिखों के गुरू अर्जुन देव जी को फांसी की सजा दी। इससे मुगल सिख संबंध अच्‍छे नहीं रहे। खुसरो के विद्रोह से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण खुर्रम का विद्रोह था। नूरजहां अपने दामाद शहरयार को गद्दी दिलवाना चाहती थी। इसलिए शहजादा खुर्रम ने विद्रोह कर दिया। हालांकि उसने बाद में जहांगीर से माफी मांग ली पर उसके इस विद्रोह के कारण मुगलों को कंधार खोना पड़ा।

शाहजहां ने अपने भाइयों व भतीजों का वध करके गद्दी हासिल की थी। बाप के चरण चिह्नों पर चलते हुए औरंगजेब ने भी यही इतिहास दुहराया। खुद औरंगजेब के शासनकाल में शहजादों के विद्रोह ने सम्राट को परेशान किये रखा। ऐसे विनाशकारी संघर्षों में धन-जन की भारी हानि हुई और साम्राज्‍य को गहरा धक्‍का लगा। इन सभी गद्दी के दावों के लिए हुए युद्धों में से जो शाहजहां के बेटों के बीच लड़ा गया, वह कई अर्थों में विशिष्‍ट था। पहली बात तो यह कि शासक के जीवित रहते हुए उत्तराधिकार का जो विद्रोह हुआ, वह शाहजहां के समय में जितने लंबे समय तक चला और जितने विस्‍तृत क्षेत्र में यह संघर्ष हुआ, ऐसा इसके पूर्व कभी नहीं हुआ। इस संघर्ष में एक विद्रोही राजकुमार विजयी होता है और स्‍वयं सत्ता संभाल लेता है। जब मुगलकाल में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष की बात होती है तो हमारा ध्‍यान बरबस यहीं आ टिकता है।

यह लड़ाई 1657-58 ई. के बीच हुई थी। हालांकि औरंगजेब के चार बेटे थे, पर यह लडाई मुख्‍य रूप से शाहजहां के पुत्र दारा और औरंगजेब के बीच लड़ी गई थी। दारा सबसे बड़ा था और हमेशा शाहजहां के साथ रहता था तथा उत्तरी भारत का उत्तराधिकारी भी था। वह उदार और दयालु स्‍वाभाव का था। शाहजहां उससे बहुत प्‍यार करता था। दूसरा बेटा शाह शुजा बंगाल का शासक था लेकिन वह अकर्मण्‍य एवं विलासी था। तीसरा औंरगजेब दक्षिण का शासक था। वह सैनिक गुणों एवं कूटनीतिज्ञता में माहिर था। चौथा मुराद गुजरात एवं मालवा का शासक था। उसमें भी सैनिक एवं प्रशासनिक योग्‍यता का अभाव था।

चूंकि चारों बेटे चार अलग-अलग क्षेत्र के शासक थे तो ऐसा प्रतीत होता है कि शायद शाहजहां अपने बेटों के बीच राज्‍य का बंटवारा करना चाहता था। पर वास्‍तविकता क्‍या थी, कहा नहीं जा सकता। स्थिति ऐसी थी कि उत्‍तराधिकार की समस्‍या पर कभी भी लड़ाई हो सकती थी क्‍योंकि चारों के पास सैनिक थे और चारों गद्दी के लिए लालायित थे। ऐसी स्थिति में 16 सितंबर, 1657 ई. में शाहजहां जब सख्‍त बीमार पड़ा और उसके बचने की उम्‍मीद न के बराबर थी, तब चारों बेटों-दारा, शुजा, औरंगजेब और मुराद के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हो गया क्‍योंकि वे अपनी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे। सिंहासन प्राप्‍त करने की महत्‍वकांक्षा वाले उसके सभी पुत्र अपनी अपनी योजनाएं बनाने लगे। इसकी शुरूआत शुजा ने की। उसने बंगाल में स्‍वयं को सम्राट घोषित कर दिल्‍ली की ओर प्रस्‍थान किया। फिर क्‍या था – मुराद भी खुद को शासक घोषित कर दिल्‍ली की ओर चल पड़ा। औरंगजेब ने खुद को शासक तो घोषित नहीं किया, पर दिल्‍ली की ओर इस घोषणा के साथ चल पड़ा कि वह अपने बीमार पिता को देखने जा रहा है।

इधर शाहजहां की बीमारी के समय दारा उसके साथ दिल्‍ली में ही था। उसने शाहजहां की बीमारी की खबर को रोकने के प्रयास किए। साथ ही पिता को लेकर दिल्‍ली से आगरा आ गया। पर परिणाम उलटा हुआ। लोगों में यह अफवाह फैल गई कि शाहजहां वास्‍तव में मर गया है और दारा इस खबर को छिपाकर खुद को बादशाह घोषित करना चाहता है। इस बीच दारा की सेवा-सुश्रुषा में शाहजहां थोड़ा ठीक हुआ। उसे जब उत्तराधिकारी के संघर्ष की जानकारी लगी, तो उसने अपने बेटों को पत्र लिखा कि अपने-अपने क्षेत्र वापस लौट जाएं। वे स्‍वस्‍थ हैं। इस पर किसी ने भी ध्‍यान नहीं दिया। बल्कि औरंगजेब ने कहा कि यह पत्र जाली है। इधर शाहजहां ने संघर्ष टालने के इरादे से दारा को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया। पर इसका प्रभाव दारा के अन्‍य भाइयों पर विपरीत ही पड़ा और वे गद्दी पर अधिकार प्राप्‍त करने के लिए व्‍याकुल हो उठे।

इतिहास भी तो अपने आप को दुहराता है। मुगलों के बीच उत्तराधिकार का मामला, अधिकांशतः तलवारों के द्वारा ही निर्धारित हुआ था। शाहजहां ने भी तो खुद इस रास्‍ते गद्दी पाई थी। फिर उसके बेटे कहां चूकने वाले थे। युद्ध एवं रक्‍तपात अवश्‍यंभावी था। पर इस बार इसमें एक विशेषता थी। पहले के उत्तराधिकार का संघर्ष सम्राट की मृत्‍यु के पश्‍चात हुआ था। इस बार यह तब होने जा रहा था जबकि शाहजहां अभी जीवित था। इस युद्ध में न सिर्फ उसके चार बेटे ही लड़े बल्कि उसकी बेटियां ने भी परोक्ष रूप से हिस्‍सा लिया। जहांआरा ने दारा शिकोह की सहायता की तो रोशन आरा ने औरंगजेब की मदद की तथा गौहन आरा ने मुराद बख्‍श का पक्ष लिया।

औरंगजेब ने मुराद को अपने पक्ष में मिलाकर आपस में राज्‍य का बंटवारा कर लेने का समझौता किया तथा दोनों की मिलीजुली सेना आगरा की तरफ़ कूच कर कई। उधर शाह शुजा भी बनारस तक आ पहुंचा था। तब शाहजहां एवं दारा के पास उनको युद्ध में पराजित करने के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्‍होंने अपनी सेना भेजने का निश्‍चय किया।

दारा के पुत्र सुलेमान शिकोह के नेतृत्‍व में एक सेना शाह सुजा को पराजित करने के लिए भेजी गई और दूसरी सेना राजा जसवंतसिंह के नेतृत्‍व में मालवा की तरफ़ औरंगजे‍ब एवं मुराद के खिलाफ युद्ध के लिए भेजी गई। सुलेमान शिकोह की सेना के हाथों शाह शुजा की पराजय हुई और वह बंगाल भाग गया परंतु अप्रैल, 1658 में राजा जसवंत सिंह के नेतृत्ववाली शाही सेना को औरंगजेब एवं मुराद के विरूद्ध धरमत के युद्ध में मुंह की खानी पड़ी। वास्‍तव में जसवंतसिंह को यह जानकारी नहीं थी कि उसे औरंगजेब एवं मुराद की मिलीजुली सेना का सामना करना पड़ेगा। वह तो सिर्फ मुराद की सेना की उम्मीद कर रहा था। फलतः उचित संसाधनों के अभाव में उन दोनों के संगठित सैन्‍य बल का मुकाबला वह नहीं कर पाया। यह विजय मुराद एवं औरंगजेब की हौसला अफजाई के लिए काफी थी । अब वे आगरा की तरफ बढ़ेब।

परिस्थिति की गंभीरता को भांपकर दारा ने भी मैदान ए जंग में कूदने का निर्णय लिया। उसने एक विशाल सेना इकट्ठी की एवं अपने बागी भाइयों का सामना करने चल दिया। जून, 1658 में दोनों पक्षों की सामूगढ़ में भिड़ंत हुई। औरंगजेब एवं मुराद की सेना एवं उनकी युद्ध-कुशलता के आगे दारा टिक न सका। उसकी बुरी तरह से हार हुई। निराश-हताश दारा शाहजहां से भी मिलने का साहस न जुटा सका और अपने परिवार के साथ दिल्‍ली की तरफ भाग गया और वहां से लाहौर चला गया। इस प्रकार औरंगजेब और मुराद की स्थिति काफी मजबूत हो गई। सामूगढ़ की लड़ाई ने दारा का भविष्‍य निर्धारित कर दिया। औरंगजेब ने आगरे के किले पर अधिपत्‍य जमाया तथा अपने पिता शाहजहां को बंदी बनाकर कैदखाने में डाल दिया, जहां शाहजहां अपनी मृत्‍यु पर्यन्‍त जनवरी 31,1666 ई. तक कैद में ही रहा। बाप बेटे के बीच पत्रों का आदान-प्रदान तो होता था पर दोनों में कभी आमना-सामना नहीं हुआ।

औरंगजेब काफी महत्त्वाकांक्षी था। उसने अपनी और गद्दी के बीच आनेवाली हर बाधा को दूर करने का निश्‍चय किया। आगरा के किले पर फतह के बाद औरंगजेब ने दारा पर खास ध्‍यान केंद्रित नहीं किया। अब उसके सामने मुख्‍य बाधा थी – मुराद एवं उसका सैन्‍य बल। मुराद स्‍वतंत्र रूप से रहने लगा था। अतः औरंगजेब को उसकी तरफ़ से खतरे का एहसास था। उसी तरह मुराद भी उसकी तरफ शंका की दृष्ष्टिकोण रखता थे। औरंगजेब ने अपने रास्‍ते से मुराद को हटाने का निर्णय लिया। उसने मुराद को कई बार दावत पर बुलाया, पर हर बार मुराद नकार जाता था। एक बार शिकार से लौटते हुए मथुरा के निकट एक रात की दावत के औरंगजेब के नयौते को उसने अपने एक अधिकारी की सलाह पर स्‍वीकार कर लिया। उस अधिकारी को औरंगजेब ने धन देकर अपनी तरफ मिला लिया था। मुराद को खासी तगड़ी दावत खाने को मिली। तत्पश्‍चात एक सुंदर दासी को मुराद की मालिश करने को भेजा गयास। काफी चालाकी से उसने मुराद को गहरी नींद सुला दिया एवं उसके सभी शस्‍त्र उसके पास से हटा दिए। इस प्रकार निहत्‍था मुराद आसानी से बंदी बना लिया गया।

औरंगजेब मथुरा से दिल्‍ली आ गया। बिना किसी प्रतिरोध के उसने दिल्‍ली पर अधिपत्‍य जमाया और राज्‍यभिषेक कर खुद को सम्राट घोषित कर दिया। दारा सामूगढ़ की हार के बाद भटकता रहा था। बाद में उसे भी पकड़ कर बंदी बना लिया गया तथा मृत्‍यु दंड दे दिया गया। शुजा भी बनारस की लड़ाई के बाद बंगाल लौटा। वहां भी औरंगजेब के द्वारा तंग किए जाने पर आसाम से होते हुए बर्मा गया और वहीं उसकी मृत्‍यु हो गई।

सन 1658 तक औरंगजेब के सभी विरोधी खत्‍म हो गये। गद्दी के सभी दावेदार समाप्‍त हो गए। उसकी स्थिति काफी मजबूत हो गई। उसने शाहजहां को बंदी बना लिया था और स्वयं को शासक घोषित कर चुका था।

गद्दी के उत्तराधिकार के इस संघर्ष का परिणाम बहुत बुरा रहा। ढेर सारे लोग मारे गए। इसके कारण साम्राज्‍य को आर्थिक एवं सैनिक, दोनों की भारी क्षति पहुंची। एक वर्ष तक मुगल साम्राज्‍य इसमें उलझा रहा। इससे साम्राज्‍य विरोधियों का मनोबल काफी बढ़ा। मराठा अपनी शक्ति को बढ़ाने लगे। उत्तर पश्चिमी सीमा पर अफगानियों ने विद्रोह किया। इस बीच दक्षिण भारत से भी मुगल साम्राज्‍य का ध्‍यान हटा रहा।

दूसरी ओर उत्तराधिकार के इस संघर्ष में इसकी सफलता अभूतपूर्व थी। इसकी सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि भविष्‍य में सत्ता पर अधिकार करने के लिए उत्तराधिकार का फैसला तलवार द्वारा ही संभव है।

इस तरह उत्तराधिकार का यह संघर्ष, मुगल साम्राज्‍य के लिए तात्‍कालिक और दूरगामी, दोनों ही तरह से, हानिकारक सिद्ध हुआ । औरंगजेब का 50 वर्ष का शासनकाल शांति और सुव्‍यवस्‍था की जगह समस्‍याओं का काल रहा। औरंगजेब के अंत तक साम्राज्‍य की एकाग्रता एवं संगठन समाप्‍त हो चुका था और महान मुगल साम्राज्‍य का पतन शुरू हो गया था। और उस पतन के बीज उत्तराधिकार के संघर्ष में ही छिपे थे। यह संघर्ष धीरे धीरे साम्राज्‍य को खोखला करता गया और एक दिन वह बीज विशाल वृक्ष बन कर उसके पतन की राह प्रशस्‍त कर गया।

15 टिप्‍पणियां:

  1. इतिहास कभी विषय तो नहीं रहा, किंतु कथा कहानियों की तरह पढना आनंददायक होता है.. यह आलेख भी रोचक और ज्ञानवर्धक है!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. 6/10

    बहुत कुशलता से तैयार एक पोस्ट में 'मुग़ल सल्तनत का इतिहास' काफी कुछ समेटे हुए है. जानकारीपूर्ण इस लेख को पढना रोचक है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ज्ञानवर्धक लेख.. इतिहास की किताबें इतनी सहज क्यों नहीं होती..

    उत्तर देंहटाएं
  4. दारा विशिष्ट साहित्यिक प्रतिभा का स्वामी था। बेकार कूदा युद्ध में।

    उत्तर देंहटाएं
  5. इतिहास विषय के रूप में कभी नहीं याद हुआ ...लेकिन यहाँ आपने बहुत अच्छे से सारी जानकारी उपलब्ध करा दी ...कहानी की तरह पढ़ गयी ..अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  6. मनोज जी, बहुत सुंदर विश्‍लेंशण किया है आपने।

    उत्तर देंहटाएं
  7. सारगर्भित पोस्ट ...इतिहास की जानकारी पाकर अपने अतीत में झांकने का अवसर यहाँ आकर मिलता है ....!
    शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  8. मुगल कालीन इतिहास के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला !!

    उत्तर देंहटाएं
  9. कविता की तरह इतिहास को समझाने और लिखने की कला है आपमें। इस विषय से दूर भागने वाले में भी इसे पढने की रुचि जगा दिए हैं आप, सिर्फ़ भाषा और शैली के कारण।

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत कुछ जानने को मिला और आगे के लिए भी उत्सुकता बढ़ गयी.

    शुक्रिया इस पोस्ट के लिए.

    उत्तर देंहटाएं
  11. I really like your blog.. very nice colors & theme. Did you make
    this website yourself or did you hire someone to do it for you?
    Plz respond as I'm looking to create my own blog and would like to know where u got this from. appreciate it
    my page: as quoted here

    उत्तर देंहटाएं

आप अपने सुझाव और मूल्यांकन से हमारा मार्गदर्शन करें