रविवार, 5 दिसंबर 2010

कहानी ऐसे बनी – १५ :: भला नाम ठिठपाल

हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतिम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रही इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं करण समस्तीपुरी।

रूपांतर :: मनोज कुमार

ऊँह...ऊँह....... जय हो महाराज की ! ओह रे ओह... ! आज तो मुढ़ी, लाई, तिल और गुड़ की सोंधी सुगंध से चारो दिशाएँ ग़म-ग़म कर रही हैं। रवि की फसल निकल आई थी। इस बार इन्द्र महराज धोखा दे दिए। पटवन तो अब विश्कर्मा बाबा के भरोसे है। चर का गेहूं कमौनी भी मांग रहा है। घर में सब उसी मे बीजी थे। सबसे छोट तो हम ही थे। इस बार सुभद्रा फुआ के यहाँ तिल-संक्रांति का भार लेकर जाने का डिउटी हमारा ही लगा। अन्दर से तो हम भी यही चाहते थे। बुआ के यहाँ खूब मान-दान होता था। दो-दो भौजी थी .... हंसी-मजाक में कैसे दिन रात कट जाता था कि पता भी नहीं चलता था। हफ्ता-दस दिन तक किताब-कॉपी में भी माथा-पच्ची नहीं करनी पड़ती थी। पीरपैंती वाली भौजी के हाथ का बनाया तर माल पर छक के जीभ फेरते थे और घूरा के पास बैठ के मुफ़्त में भाषण हांकते थे। हम भी सुबह-सुबह ही तैयार हो गए।

वैसे तो इस बार सुखार पड़ गया लेकिन खिलहा चौरी में कुछ पानी लगा था। बाबा उस में छिटुआ तुलसीफूल धान बोये थे। चढ़ते अगहन कट्ठे-मन फसल आ गई थी घर में। गरमा, बकोल और पूसा-36 का तो की तो ढेर लग गई थी लेकिन तुलसीफुल कोठी में बचा कर रखा गया था, पर्व-त्यौहार, पाहून-कुटुम्ब के लिए। बाबा के आदेश पर तिल-संक्रांति के लिए उसी धान का चूरा कुटवाया था। तुलसीफुल धान का चूरा .... समझिये कि एक हफ्ता से पूरा टोला खुश्बू से तर था। अखारा पर के यद्दु राय आधा मन दूध पहुंचा गए थे पिछले हफ्ते। उसी दूध का दही जमाया गया था। दोपहर में ही एक बोरा लाई-तिलकुट, चूरा-मुढ़ी और बड़े तसले में जमा दही भर कर धनपत महतो के साथ हम सुभद्रा फुआ के घर का रास्ता पकड़े।

चार कोस पर तो था फुआ का घर। सूरज ढलते-ढलते पहुँच गए। दरवाजे पर खोखाई मंडल बड़ा घूरा फूँक रहे थे। हमें देखते ही बौआ-बौआ कर के दौड़े। धनपत के माथा पर से दही का तसला उतारे। दही का तसला और चूरा-मुढ़ी वाला बोरिया अन्दर रख के दोनों आदमी घूरा में बीड़ी सुलगाने लगे। हमें तो फ्री पास मिला था सो सीधे अन्दर पहुँच गए। वहाँ भी दूर से ही जरुआ गुड़ की सुगंध आ रही थी। ऊँह बुआ चश्मा पहन कर डायरेक्शन दे रही थी और दोनों भौजी झटपट गुड़ के पाक में तिल, मुढ़ी और चूरा की लाई बनाने में जुटी थी। साथ में कोनैला वाली इधर-उधर कर टहल बजा रही थी। हमको देखते ही पीरपैंती वाली भौजी चूल्हे के पास से मजाक का तान छोड़ने लगी। हम कुछ सकपकाए कि आकर हमरा हाथ पकड़ क्र सीधे चूल्हे के पास पहुँच गयी। हम बुआ के पैर छुए और वहीं एक पीढी पर बैठ गए।

उधर काला तिल चन-चन उड़ रहा था। छोटकी भौजी मुढ़ी को गुड़ में लपेट रही थी। हंसी-मजाक में पीरपैंती वाली भौजी एक-एक कर लाई-तिलबा हमें टेस्ट कराये जा रही थी। तभी उधर से साला ठिठपलवा पहुँच गया। अरे भौजी के भाई का नाम था ठिठपाल। बड़ा सुपात्र था। हमलोग इतना मजाक करते थे लेकिन बेचारा हँसते रहता था। सामने वाली पीढी पर बैठ गया। हाल समाचार हुआ। अब हमको भी मज़ाक करने वाला मिल गया था। तब से तो भौजी सब हमको चाट के साफ़ किये हुई थी, अब हम सारा कसार ठिठपाल पर निकालने लगे। बहुत हंसी-मजाक हुआ लेकिन ठिठपलवा उखरा नहीं। फिर हम एकदम सटा के एक मजाक किये। उससे पूछे, यह बताओ कि तुम्हारा नाम ठिठपाल क्यों पड़ा ? दुनिया में नाम का अकाल पड़ गया था क्या जो ऐसा नाम रख लिया। साला जैसा ठिठिया हुआ रहता है वैसा ही नाम रख लिया है ठिठपाल !

लेकिन वह ज़रा भी नहीं उखरा। बड़े इत्मीनान से जवाब दिया। बोला, "करणजी ! अभी आप दुनिया देखे कहाँ हैं ? यहाँ तो, आवत को जावत देखा, धनपत माथ पोआल ! लक्ष्मी तन पर वस्त्र नाहे, भला नाम ठिठपाल !!" हम तो उसका फकरा सुन कर चुप ही हो गए। फिर इसका मतलब पूछे तब उसने विस्तार से समझाया। कहा देखिये, यही खोखाई मंडल है न उसको जब जाना होगा तो बोलता है, 'आते हैं दुल्हिन जी !' और हम आपके यहाँ भी देखे हुए हैं। धनपत महतो माथा पर धान का पुआल ढो रहा था। धान जाए आपके घर में और पोआल उसके माथा पर ! फिर वह काहे का धनपत? और इसी कोनैला वाली का बेटा है न, लक्ष्मी। शौक से बेटा का नाम लक्ष्मी तो रख ली लेकिन कहाँ आयी लक्ष्मी बेचारी के घर में ? देखिये, इस माघ महीना की ठंडी में भी उसको पहनने के लिए भर बदन कपड़ा नहीं है। बेचारा लक्ष्मी जूट का बोडिया ओढ़ के ठंडी काट रहा है। तो ऐसा नाम से क्या मतलब हुआ ? आँख के अंधा नाम नयन सुख रहने से हमारा भला नाम ठिठपाल। ठिठियाते रहते हैं तो नाम है ठिठपाल। नाम का कुछ मतलब तो भला हुआ।

हम तो उसकी बात सुन कर अचरज से मुंह फारे उसी को निहारते रह गए। ठिठपाल तो बड़ा ज्ञानी निकला। देखिये, कितना दुरुस्त बात कह दिया। वैसे तो यह दुनिया ही उल्टी है। कहेगा पुर्व तो चलेगा पच्छिम। लेकिन बात कुछ सार्थक होनी चाहिए। अब सही में गुण के विपरीत नाम रहने से क्या फ़ायदा ? आखिर नाम का कुछ प्रभाव रहना चाहिए। नहीं तो बात वही हुई न कि नाम बड़े पर दर्शन थोड़े ! "आवत को जावत देखा, धनपत माथ पोआल ! लक्ष्मी तन पर वस्त्र नहीं, भला नाम ठिठपाल !!" हम तो रह-रह कर ठिठपाल का दोहा याद कर इतना हँसे कि तिलवा सरक गया। लेकिन आप सिर्फ हंस के नहीं रह जाइए। ठिठपाल के इस कहावत का सारांश यही है कि 'नाम से कोई बड़ा नहीं होता, काम से बड़ा होता है।' जब काम ही छोटा हो तो नाम बड़ा लेकर क्या?' समझे ! तो अब आप भी जाइए तिलबा लाई समाप्त कर दीजिये। हम भी चलते हैं, भौजी खाने के लिए आवाज़ दे रही हैं। देर होगी तो फिरर गरियायेगी। जय राम जी की !!

5 टिप्‍पणियां:

  1. ठिठपाल जी के बात बिल्कुल सच्ची , वो एकदम सही बात कहे. काम , नाम पर हमेशा भारी होत है. संस्मरण बहुत अच्छा लागल.

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  2. 'नाम से कोई बड़ा नहीं होता, काम से बड़ा होता है।' जब काम ही छोटा हो तो नाम बड़ा लेकर क्या?'

    बिल्कुल सच बात तो कह दी।

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  3. काम से ही आदमी बड़ा होता है ...सही बात ..पर कभी कभी नाम का प्रभाव भी पड़ता है ...

    वैसे तो दिनिया में अक्सर यही देखने में आता है नाम बड़े और दर्शन छोटे ...अच्छी कहनी ...

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  4. करन बाबू की नाम महिमा सुनकर काका हाथरसी का एक लम्बी कविता याद आ गई, जिसमें उन्होंने अलग अलग नामों की महिमा बाँची थी!!

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