सोमवार, 13 दिसंबर 2010

दलदल कुंठाओं का



उम्मीद -,
जन्म देती है
कुंठाओं को
और कुंठाएं
बिखेर देती है
रिश्तों को ।
जब तक
समझ आता है
ये बिखराव
हो जाती है देर
और फिर नयी कुंठा
जन्म ले लेती है।

यूँ ही
कुंठाओं के
दल - दल में
घिर जाता है इंसान ।
और जो रिश्ते
सांस लेते थे
उसके अन्दर
धंस जाते हैं
दल - दल में

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संगीता स्वरुप

24 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात कही है संगीता जी, उम्मीद कुंठाओं को जन्म देती है। वाह।

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  2. संघर्ष करने को प्रेरित करती कविता...

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  3. bahut sundar ....sach ko bayaan karti hai aapki ye kavita

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  4. सत्य वचन , उम्मीदे कुंठाओ को जन्म देती है और इन्सान उम्मीदों पर ही जीता है . उम्मीदों पर जीने वाले इन्सान और कुंठा का दामन चोली का साथ रहा है .

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  5. और जो रिश्ते
    सांस लेते थे
    उसके अन्दर
    धंस जाते हैं
    दल - दल में
    Kisee ke bhee saath aisa na ho! Badi bhayawah sthiti hoti hai ye!

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  6. उम्मीद -,
    जन्म देती है
    कुंठाओं को

    उम्मीद किस प्रकार कुंठाओं को जन्म देती है समझ नहीं आई संगीता जी .....??
    उम्मीद से तो सकारात्मक सोच होनी चाहिए न ...

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  7. उम्‍मीद ना करें तो जीए कैसे? इसलिए उम्‍मीद भी होगी, कुण्‍ठा भी जन्‍म ले‍गी और रिश्‍तों में टूटन भी आएगी। फिर नए बनेगे। तभी तो रोज नए रिश्‍तों की आवश्‍यकता होती है।

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  8. उम्मीद जब पूरी ना हो तो कुंठा ही तो उपजेगी जो रिश्तों के लिये दलदल बन जायेगी्…………एक बेहद गहरी अभिव्यक्ति।

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  9. पाठकों का आभार ....

    @ हरकीरत हीर जी ,

    जीवन में उम्मीदें कुंठा नहीं बनातीं ..लेकिन रिश्तों में बनती हैं ...यहाँ उम्मीद रिश्तों से जुडी हुयी हैं ...यदि हम किसी से उम्मीद करते हैं तो कुंठाएं जन्म लेती हैं ...

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  10. बढ़िया अभिव्यक्ति ....सुन्दर रचना

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  11. बहुत ही सटीक लिखा है ..उम्मीद पर फिर भी दुनिया कायम है..तो कुंठा भी रहेगी ही..ऐसा ही चलता रहेगा बस .

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  12. उम्मीद करना तो मानव स्वभाव है लेकिन भावात्मक रूप से निर्बल नहीं होना चाहिए क्योंकि टूटती हुई उम्मीदें अगर कुंठा में बदल जाती हैं तो सिर्फ रिश्ते ही नहीं टूटते बल्कि ये कुंठा खुद उस इंसान को भी मानसिक रूप से तोड़ देती है. उम्मीद तो करें लेकिन टूटने के विकल्प भी साथ में रखें ताकि फिर कष्ट न हो. पूरी हो तो ख़ुशी और न पूरी हो तो भी उतनी निराशा नहीं होगी कि कुंठित हो जाएँ.

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  13. बहुत गहरी और सच्ची बात कही है संगीताजी ! उम्मीदें जब टूटती हैं तो कुंठाओं को जन्म देती हैं और खोखले रिश्तों का टूटना इंसान को अवसाद की गहरी खाई में धकेल देता है ! बहुत ही भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी रचना ! बधाई एवं आभार !

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  14. बढिया प्रस्तूति,

    और जो रिश्ते
    सांस लेते थे
    उसके अन्दर
    धंस जाते हैं
    दल - दल में

    रिश्तों से ऊम्मीदे तृष्णा में बदल कर कुंठाओ को जन्म देने में समर्थ होते है।

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  15. दलदल की कुंठाएं या फिर कुंठाओं का दलदल ?

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  16. प्रकृति में सब कुछ परस्पर निर्भर है। उम्मीद आखिर छूटे तो कैसे?

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  17. जब हमारा अस्तित्‍व अपने अतीत, वर्तमान और भविष्‍य की उम्मीदों से जूझता हुआ खुद को ढूंढता रहता है तब समृतियों और वर्तमान के अनुभव एक-दूसरे के सामने आ खड़े होते हैं। ऐसे में यह समझना कठिन हो जाता है कि व्‍यक्ति कुंठित जीवन जी रहा है या जीवन ही कुंठित हो गई है। जब तक होश आता तब तक वह इस दलदल में धंस चुका होता है।

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  18. संगीता जी आपकी कविता अच्छी है । सच है जब उम्मीदों के साथ गहन स्नेह और विश्वास नही होता तब कुण्ठाएं जन्म ले लेतीं हैं ।

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  19. bahut mushkil hain is dal-dal se nikalna...roz roz nayi nayi kunthaayain janm leti hai aur insaan rishto rupi dal dal me aur adhik fansta chala jata hai...ek din ya to isi dal dal me saans chhod deta hai ya moh, tab kahin ja kar duzi raah ho pata hai.

    sunder varnan kunthaao se upji daldal ka.

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  20. उम्मीद -,
    जन्म देती है
    कुंठाओं को
    और कुंठाएं
    बिखेर देती है
    रिश्तों को ।
    vastavikta ke dharatal par aadhaarit sundar rachana..badhaai sangeeta ji!

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