सोमवार, 6 दिसंबर 2010

पुरानी कविताएँ / नये सन्दर्भ

कुछ व्यंग रचनाएँ ले कर हाज़िर हुई हूँ . करीब 15  साल पुरानी रचना है. आप लोगों का स्नेह चाहूँगी.---- संगीता स्वरुप

" खड़ा हिमालय बता रहा है
डरो ना आँधी पानी से
खड़े रहो तुम अविचल हो कर
सब संकट तूफ़ानी से "



 


इन पंक्तियों का सार केवल
लालू यादव जी को समझ आया है
क्योंकि उन्हीं को हमने
इतने कांडों के बाद
अविचल पाया है

चाह नही मैं सुरबाला के
गहनो में गूँथा जाऊं
चाह नही प्रेमी माला में
बिन्ध प्यारी को ललचाऊं"






लगता है आसक्त हैं
इस कविता पर अटलबिहारी
तभी तो आज तक
वो हैं ब्रह्मचारी.

"चल पड़े जिधर दो डग मग से
चल पड़े कोटि पग उसी ओर"
पर आज की राजनीति में
नेता का रहा ओर ना छोर
आज तो हालत ये है कि
जिधर कोटि पग मुड़ जाएँ
उसी ओर नेता झुक जाएँ.
"रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
पानी गये ना उबरे, मोती मानुस चून. "

रहीम  जी ने
पानी की समस्या को
पहले ही समझ लिया था
इसी लिए सबसे
पानी रखने के लिए
कह दिया था
आज ना
ज़रूरत का पानी है,
और ना इंसान का
पानी रह गया है

वक़्त आज के
इस दौर को भी सह गया है

25 टिप्‍पणियां:

  1. संगीता जी, सुबह-सुबह इस पोस्ट पर नज़र गई। इसकी सजावट ने मन प्रफुल्लित कर दिया।
    बहुत अच्छी लगी।
    रचना पर तो बाद में कमेंट दूंगा, पहले इसकी साज-सज्जा के लिए बधाई।

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  2. सन्देश देती हुई पोस्ट ...आकर्षक साज सज्जा के साथ ...शुक्रिया

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  3. सभी व्यंग उमदा हैं। पहले दो लालू और अटल जी पर तो हंसी रोके नही रुक रही। लाजवाब बधाई।

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  4. कभी-कभी मन बच्‍चा बन जाता है और ऐसे ही व्‍यंग्‍य लिखा जाता है। अच्‍छे व्‍यंग्‍य है।

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  5. 2 good sangeeta ji 2 good pahla dusra to padhte hi bahut hasi main kahte hain kisi ko hansane se punya milta hai jo ki aaj aapko bahut milne wala hai ha ha ha

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  6. बहुत ही बढ़िया कटाक्ष..
    मनोज जी से सहमत..साज-सज्जा बहुत ही सुन्दर है

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  7. गज़ब के व्यंग्य्……………एक से बढकर एक हैं बहुत पसन्द आये……………और तस्वीरें भी बहुत ही सुन्दर हैं।

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  8. हा हा हा ..गज़ब..क्या लिखा है एक एक सटीक ..मजा आ गया.बनावट ,सजावट,लिखावट सब शानदार.

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  9. सभी बड़े ही सटीक व्यंग ! इतनी रोचक सचित्र पंक्तियों ने मन मोह लिया ! हर कटाक्ष बेजोड़ है ! बधाई !

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  10. वाह संगीता, क्या तुक मिली है माँ गए की इसको कहते हैं -' जहाँ न पहुंचे रवि, वहाँ पहुंचे कवि.' सटीक व्यंग्य और उसके साथ ये सज्जा काबिलेतारीफ है.

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  11. सभी व्यंग अच्‍छे हैं, बधाई

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  12. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना मंगलवार 07-12 -2010
    को छपी है ....
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

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  13. रचना की साज सज्जा काबिले तारीफ है...किसी चीज़ की प्रस्तुतीकरण ही उसमे चार चाँद लगा देता है जिसमे आपकी रचना प्रमाण स्वरुप है. बहुत चुन चुन के व्यंग्य किये हैं जो आज १५ साल बाद भी ज्यु के त्यु सटीक हैं.

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  14. इस रचना का व्यंग्य हास्य भी उत्पन्न करता है। शब्दों का खेल और आपकी सूझ-बूझ की दाद देनी पड़ेगी। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
    विचार-प्रायश्चित

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  15. सांगीता स्वरूप जी अभिनंदन इस अभिनव प्रयोग के लिए| पानी वाला तो सच में सर्वोत्तम लगा| बधाई|

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  16. संगीता दी! आज तो आपने वो दोहा याद दिला दियाः
    चलती चाकी देखके दिया कबीरा रोय,
    दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय!
    छात्र ने इसका अर्थ लिखाः
    पाटन कवि कहते हैं कि चलती चाकी के दो पाटों के बीच कबीरदास का हाथ फँस गया और वो जोर जोर से रोने लगे!!

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  17. सभी पाठकों का आभार ....

    @@@संवेदना के स्वर ,

    मुझे भी याद आ गया सूर का पद...

    सूरदास तब बिहँसी यसोदा ले उर कंठ लगायो ...
    विद्यार्थियों ने लिखा कि तब सूरदास ने हँस कर यशोदा जी को गले से लगा लिया ... :):)

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  18. रहीम जी ने
    पानी की समस्या को
    पहले ही समझ लिया था
    इसी लिए सबसे
    पानी रखने के लिए
    कह दिया था
    आज ना
    ज़रूरत का पानी है,
    और ना इंसान का
    पानी रह गया है

    बड़ी सही, सटीक और सामयिक बात कही है.क्या बात है.

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  19. बहुत सुन्दर वाल कविता!
    गुनगुनाने में अच्छा लगता है!

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  20. अति सुंदर!...एक नयापन ताजगी प्रदान कर रहा है!...अनेक शुभेच्छाएं!

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  21. This is called fusion. We can say it remix also.Sangeetaji ! this post has shown your ability to imagination-thinking-creativity together. Visit my pages too and guide me to do better on blogger pages.
    regards with congratulations.

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