शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

पहले मेरी माँ है !

                       आज मेरी माँ ने अंतिम साँस ली, फिर तो सारा घर दौड़ने लगा यह क्या हो गया? वह दादी माँ जिसने हमेशा उसको दुत्कारा था, पास बैठी रोने का नाटक कर रही थी। वह ताई जिसने उसको कभी चैन से रहने नहीं दिया। मेरे सर पर हाथ फिरा रही थी और वह हाथ मुझे हथोडे की तरह लग रहा था। मेरी बुआ तो मुझे लगता है कि अब कभी डांटेगी ही  नहीं और माँ के लिए नई साड़ी जो भी आती उसको खुद रख लेती , आज उनमें से के साड़ी लाकर माँ के पास रख दी थी. माँ की सारी चीजें जो कभी उसकी नहीं रहने दी, अब कभी उन पर नजर नहीं डालेगी।
                           सारे माहौल में गमी नजर आ रही थी और मेरे पिता तो कुर्सी पर मुंह लटकाए बैठे थे, लोग उनको सांत्वना दे रहे थे। यह वही पिता हैं जिन्होंने मेरी माँ को कभी इज्जत दी ही नहीं, एक नौकरानी की तरह उसको इस्तेमाल करते रहे और कभी उसने अपनी बात करने की कोशिश की तो एक ही जवाब था , तुमसे पहले मेरी माँ है, मेरी भाभी है और मेरी बहन है। तुम बहुत बाद में आई हो और इस लिए अपनी जगह वही रखो जहाँ पर मैं रखता हूँ।
               ये शब्द मेरी कानों में हमेशा पिघले हुए शीशे की तरह जाते रहे , जब से समझ आई है दिन में एक या दो बार यह शब्द सुनता ही रहा हूँ। मेरी माँ ने इसको कितना सुना होगा इसका हिसाब मेरे पास नहीं है। वो निर्दोष और निश्छल भाव से सबकी सेवा ही करती रही और उसको क्या मिला? आज इस उम्र में ही अपनी जिन्दगी पूरी करके और मुझे छोड़ कर चल दी। सब मुझे प्यार करते हैं। इनका अगर बस चलता तो और वे एक नौकरानी की कमी पूरी न कर रही होती तो कब की इस घर से धक्के मारकर निकाल दी जाती।
              सब सामान  इकठ्ठा हो चुका है , उनको अब ले जाना है। उनको बढ़िया साड़ी पहनाई  गई और सजाया भी जा रहा है। इतनी सुंदर लगते तो मैंने अपनी माँ को कभी नहीं देखा। कई कई दिन तक बाल बनाने का समय ही नहीं मिलता था। एक की फरमाइश पूरी कर रही है तो दूसरे ने अपनी फरमाइश उछाल दी । जल्दी जल्दी हाथ चला रही है और सबके ताने भी सुन रही है। माँ के घर कुछ किया भी था कि बस बैठी ही रही, हरामखोरी की आदत पड़ गई है।
               सब लोग उनको उठा कर जाने लगे, मुझे जाना है, यह सोच कर मैं सबके आते ही आगे चल दिया। उनकी चिता सजा रहे थे सब, उस पर लिटा दिया गया । अब सब कहने लगे की पिताजी मुखाग्नि दें। चल दिए अपने फर्ज को पूरा करने लेकिन पहले मेरी माँ हैं न। मुझमें न जाने कहाँ से साहस आ गया और मैं उनकी तरफ बढ़ा और आग से जलती हुई लकडी उससे ले ली,
            'अरे यह क्या करते हो? वह तो अब चली गई यह तो सिर्फ मिटटी रह गई है।' बड़े बूढे मुझे समझाने लगे लेकिन मेरी आंखों में अंगारे निकल रहे थे।
                'मैंने पिताजी को पीछे करते हुए कहा - 'यह पहले मेरी माँ है और इसको मैं ही भस्म करूंगा। आपकी माँ हमेशा आपके लिए पहले रही है तो आप उसके लिए बचे रहिए।
                    मैंने सच ही तो कहा है, यह सच मैं बचपन से आज तक सुनता रहा वही तो मैंने दुहराया है और अपनी माँ के आसुंओं और सिसकियों का गवाह में ही तो था। सो उसकी इस पीड़ा के अंत भी मैं ही करूगा। अलविदा मेरी माँ।

22 टिप्‍पणियां:

  1. कोई कुछ भी कहे /
    माँ ..../
    तुम माँ हो

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  2. दिल को छू लेने वाली संवेदनशील कहानी के लिए आभार .

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  3. बहुत मार्मिक .....आज तो रुला ही दिया आपने रेखा जी ...
    सच एक नारी क्या क्या नहीं सहती ....कहानी में एक सुकून मिला कि बेटे की भावनाएं जीवित थीं ..

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  4. दिल को छू लेने वाली संवेदनशील कहानी .. बहुत अच्‍छी अभिव्‍यक्ति !!

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  5. उफ़ ! निशब्द कर दिया ………………कुछ नही कह पाऊँगी।

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  6. ज्यादातर घरों की कहानी है ये। स्त्री जीवन विवशताओं का दूसरा नाम है।

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  8. न सिर्फ़ मार्मिक बल्कि हृदय द्रवित कर देने वाली लघुकथा।

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  9. ओह इतना कारुणिक कथा , अन्दर से झकझोर गयी , गला रुंध सा गया और आंखे नम हो गयी . अपने मार्मिकता को शब्दों ने ढाल दिया है .

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  10. आपकी पोस्ट की चर्चा कल (18-12-2010 ) शनिवार के चर्चा मंच पर भी है ...अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव दे कर मार्गदर्शन करें ...आभार .

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  11. रेखा जी, एक माँ की व्यथा कथा... दिल को छूने वाली, मगर सच!!

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  12. bahut hi gahri v marmik post .antim panktiyo ko padhtepadhte aankh me aasu aa hi gay. par bete ne apni maa ke saath anyay nahi hone diya.blkul shi kiya usne .
    ek maa ka dard sbse jyada
    kisne mahsus kiyabeta ya beti.ya fir jivan bhar sath nibhane ka vaada karne wala nam matr ka pati.
    poonam

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  13. ोह मार्मिक कथा। आँखें नम हो गयी। माँ बेटे दोनो को नमन।

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  14. dil ko chu lene wali post hai aapki..
    bahut hi acha laga pad kar..

    mere blog par bhi sawagat hai..
    Lyrics Mantra
    thankyou

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  15. इस बार के चर्चा मंच पर आपके लिये कुछ विशेष
    आकर्षण है तो एक बार आइये जरूर और देखिये
    क्या आपको ये आकर्षण बांध पाया ……………
    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (20/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  16. माँ भगवान का दूसरा रूप है , माँ को नमन । संवेदनशील पोस्ट , अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

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