शुक्रवार, 4 मार्च 2011

पुस्तक चर्चा :: अंधायुग

पुस्तक चर्चा

अंधायुग

धर्मवीर भारती द्वारा रचित यह एक गीतिनाटिका है। इसमें मिथकीय आख्यान का पुनःसृजन किया गया है। कथा का आधार महाभारत है। कथा का संबंध अट्ठारह दिनों तक चले महाभारत युद्ध के अट्ठारहवें दिन की घटनाओं से है। महाभारत जो कि एक प्राचीन महाकाव्य है, उसके चरित्रों और घटनाओं को आधुनिक संदर्भ में पुनःसृजित किया गया है। कथाकार की प्रेरणा और परिप्रेक्ष्य आधुनिक है – भले ही कथानक प्राचीन हो। इसमें समकालीन राजनीतिक संदर्भ भी है।

मिथक क्या है?

‘मिथक’ यूनानी शब्द ‘मिथ’ का हिन्दीकरण है। इसे दन्तकथा, पुराख्यान आदि के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। मिथक परिवर्तनशील नहीं होता। यह अतर्क्य रीति से ज्यों का त्यों स्वीकृत किया जाता है। अज्ञेय के अनुसार मिथक किसी भी जाति की सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का महत्वपूर्ण अस्त्र है। ‘मिथक’ देश कालातीत होते हैं। किसी विशेष देशकाल में केवल ऐसे ही मिथक स्वीकृत होते हैं जो जनमानस में रचे बसे हों। जिसकी प्रासंगिकता लोगों के बीच जानी और पहचानी जाती हो। अन्यथा प्रयुक्त मिथक अर्थ की जगह अनर्थ की जड़ बन जा सकते हैं। इसलिए एक साहित्यकार से अपेक्षा की जाती है कि वह प्रयुक्त मिथक की प्रासंगिकता पर अच्छी तरह सोच-विचार करले कि मिथकों की प्रासंगिकता युग का यथार्थ बोध करा रही है या नहीं।

अंधायुग में मिथक या पौराणिक कथा उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी कि नया युगबोध। यह कृति वर्तमान युग को संकेत करती है कि यह युग अंधायुग है। अंधा, यानी विवेक और बुद्धि से अंधे हैं। कर्तव्यहीनता, भ्रष्टाचार, बेईमानी, आत्महत्या, आदि के इस युग में जो शासक वर्ग है, वह इनसे अंधों के समान आंखें बंद कर बैठा है। लोगों के भावनाओं की हत्या हो रही है। इस नगर में स्वार्थ, लोभ, लालच के अनेक प्रकार के विवर हैं, अंतरगुफाएं हैं, गलियां हैं। इसके कारण लोगों का मन ही अंधा है। स्वार्थ, विवेकहीनता, कर्तव्यहीनता ने लोगों की आंखों पर पट्टियां बांध रखी है। भाईचारा समाप्त हो गया है, नौकरशाही, भाई-भतीजावाद और कर्त्तव्यविमुखता का बोलबाला है।

कवि ने युद्ध के बाद संस्कृति के विसंस्कृतिकरण, निराशा और पराजय से उपजी मानसिकता, रक्तपात, विध्वंस, कुरूपता, हिंसा, नृशंसता, ह्रासोन्मुख मनोवृत्ति आदि गिरते और ध्वस्त होते मानव मूल्यों के हमेशा अपनी दृष्टि में रखा है। सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों का विघटन किसी भी जाति और संस्कृति के लिए बहुत बड़ा खतरा होता है और वहीं ऐसे मिथक की ज़रूरत होती है जिसे विसंस्कृतिकरण के आक्रमण के विरोध में अस्त्र की तरह हाथ में उठाया जा सके। कवि शुरु में ही कहता है,

युद्धोपरांत

यह अंधायुग अवतरित हुआ

जिसमें स्थितियां, मनोवृत्तियां, आत्माएं सब विकृत हैं

एक बहुत पतली सी डोरी मर्यादा की

पर वह भी उलझी है दोनों पक्षों में

अंधायुग में तुलना की गई है महाभारत युग से। महाभारत में 18 दिनों के युद्ध हुआ था। यह घटनाक्रम 18वें दिन का है। कथानक अंतिम रात्रि की है। दुर्योधन की हत्या हो चुकी है। उसके बाद का जो युग है, वह अंधा युग है। द्रोह, पराजय, बदला, हतोत्साह, निराशा प्रजा में व्याप्त है। शासक वर्ग में हतोत्साह की भावना है। इस युद्ध में दोनों पक्षों ने नियमों का उल्लंघन किया। ग़लत निर्णय लिये गए। ग़लत कार्य किया गया। दूसरे विश्वयुद्ध का ध्वंस और तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना का त्रास, दोनों मिलकर जिस मानसिकता का निर्माण करते हैं, ‘अंधायुग’ के शुरु के अंशों में उसी की अभिव्यक्ति है।

इस रचना में सबसे महत्वपूर्ण बात है रचना में व्यक्त नया युगबोध। नए युगबोध के अनुसार सच और झूठ पर कोई निरपेक्ष या शाश्वत फैसला नहीं लिया जा सकता। आज के समय में एक-एक कर सारे मूल्य टूटते और बदलते जा रहे हैं। इसने हमारा विश्वास ही तोड़ डाला है। लोगों के जीने का एक बड़ा मनसिक सहारा उनसे छिन गया है। युयुत्सु की आत्महत्या उसी का परिणाम है। यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि मनुष्य चाहे सच का रास्ता चुने या झूठ का, दोनों का ही अंत दुखदायी होता है। सच का पक्ष लेकर युयुत्सु अपनों से भी अपमानित हुआ और तथाकथित सच के पक्ष में खड़े भीम के दुर्वचन भी उसे झेलने पड़े। उसने प्रजा की घृणा भी झेली। ... और युद्ध को जीतने वाला युधिष्ठिर भी सुखी नहीं है।

ऐसे भयानक महायुद्ध को

अर्द्धसत्य, रक्तपात, हिंसा से जीतकर

अपने को बिल्कुल हारा हुआ अनुभव कर

यह भी यातना ही है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के राजनीतिक घटनाक्रम को इस गीति-नाट्य में मिथकीय कौरवों-पांडवों के संघर्ष में परिणत कर देखा गया है। जैसा मूल्यों का संकट आज दिखाई दे रहा है, वैसे ही संकट की कल्पना कथाकार महाभारत की स्थिति में भी देखता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद लिखा गया यह नाटक उस समय के युद्ध को प्रतीक के रूप में प्रयोग करता है।

जब कृति का अन्त होता है तो कवि कहता है,

उस दिन जो अन्धा युग अवतरित हुआ जग पर

बीतता नहीं रह-रह कर दोहराता है

हर क्षण होती है प्रभु की मृत्यु कहीं न कहीं

हर क्षण अंधियारा गहरा होता जाता है।

यह इस मिथकीय आख्यान का मर्मबिन्दु है। कवि ने इसे दूसरे विश्वयुद्ध के बाद मानव की नियति और उसकी स्थिति में देखा। महाभारत युग से आज तक हम उन्हीं मानसिक यंत्रणाओं, रक्तपात, हिंसा और व्यर्थता के बोध के बीच विध्वंसों के अवशेष पर खड़े हैं और कर रहे हैं इंतज़ार नई कोंपलों के फूटने का। अन्धायुग में कवि ने जो प्रश्न उठाए हैं उनकी प्रासंगिकता आज भी कायम हैं।

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही कहा आपने - 'अन्धायुग में कवि ने जो प्रश्न उठाए हैं उनकी प्रासंगिकता आज भी कायम हैं।' वास्तव में आज के वातावरण में लगता है कि हम लोग उसी अंधे युग में जी रहे हैं. पुस्तक -चर्चा में महान साहित्यकार धर्मवीर भारती की इस कालजयी कृति पर सुंदर समीक्षात्मक आलेख के लिए आभार .

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  2. आपकी इस चर्चा से यह पुस्तक पढ़ने की उत्कंठा हो रही है ...सार्थक चर्चा ...

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  3. विस्तृत सार्थक चर्चा की है आपने धर्मवीर भारती के इस श्रेष्ठ काव्य कृति की.
    बहुत आभार इस आलेख के लिए.

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  4. अंधायुग एक कालजयी कृति है...कई बार इसका मंच पर भी मंचन हो चुका है...साध ही है एक बार इसकी मंच प्रस्तुति देखने की.

    बहुत ही सार्थक चर्चा की आपने

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  5. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (05.03.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  6. यह नाटिका हर रंगकर्मी के लिये एक स्वप्न साधन की तरह है.. कितने बड़े बड़े कलाकारों ने, कितने ही मंच पर इसको अभिनीत किया... मेरे लिये तो यह एक साहित्यिक कृति से कहीं अधिक नाट्य शास्त्र का एक ग्रंथ है.. इस प्रस्तुतिके लिये आभार!!

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  7. yuddh kee vibhishika aur trasdi par yah naatak aaj bhi prasangik hai jab teen chathai duniya yuddh ya chhadm yuddh me vyast hai...

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  8. "अँधायुग" काव्य नाटक धर्मवीर भारती जी का एक ऐसा नाटक है जिसमें शासन के विषय में बहुत सटीकता से विचार किया गया है ..जब शासक सब कुछ जानते हुए भी किसी मोहपाश में फंसकर सही बात को नजरंदाज कटा है तो प्रजा का क्या हश्र होता है ...इसे बहुत सटीकता से अभिव्यक्त किया है इस काव्य नाटक में .

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  9. युद्ध के बाद विजयी अहंकार और पराजय से आहत अहंकार दोनों मिलकर आलस्य और निराशा को जन्म देते हैं, जो अंधेपर के कारक हैं।

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  10. धर्मवीर भारती द्वारा रचित अन्धायुग गीतिनाटिका यह पुस्तक पढ़ी है मैंने.
    इस साहित्यिक कृति पर समीक्षात्मक आलेख के लिए आभार .

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  11. अंधायुग पर आपका समीक्षात्मक आलेख बहुत महत्वपूर्ण है....
    इस महत्वपूर्ण प्रस्तुति के लिए आपको बधाई।

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  12. महत्वपूर्ण प्रस्तुति के लिए बधाई।

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