बुधवार, 23 मार्च 2011

महादेवी वर्मा की गद्य कृतियां

महादेवी वर्मा के जन्म दिवस 26 मार्च पर हम इस ब्लॉग पर महादेवी जी से संबंधित पोस्ट डालेंगे। आज इस शृंखला की पहली प्रस्तुति है …

महादेवी वर्मा की गद्य कृतियां

संस्कृत की एक उक्ति है, ‘गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति।’ गद्य को कवियों की कसौटी माना जा सकता है। भामह ने ‘गद्यं च पद्यं च’ के रूप में काव्य को विभाजित किया था। दण्डी आदि आचार्यों ने भी गद्य को रचनात्मक महत्त्व दिया। हिन्दी साहित्य का आधुनिक युग धीरे-धीरे इतना गद्यमय हो गया कि कविता के लिए अस्तित्व का संकट आ गया। मुक्त-छंद और छंद-मुक्ति की जड़े बहुत गराई तक समाई गई। आज तो ऐसा ही लगता है कि साहित्य को कविता के ही लिए नहीं वरन्‌ अपने अस्तित्व के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग के बाद हिन्दी साहित्य छायावाद युग तक आया। इस युग में काव्य-प्रधान आन्दोलन दिखाई दिया। इस युग में कविता के साथ-साथ गद्य की समग्र विधाओं में भी योगदान हुआ। प्रसाद, निराला और पन्त के साथ-साथ महादेवी वर्मा के गद्य को इनके काव्य से कम करके नहीं आंका जा सकता।

· श्रीमती महादेवी वर्मा का जन्म फ़र्रुख़ाबाद (उत्तर प्रदेश) में होली के दिन 26 मार्च सन्‌ 1907 में हुआ था।

· सन्‌ 1933 में प्रयाग विश्वविद्यालय से एम.ए. की उपाधि प्राप्त कर इन्होंने प्रयाग महिला विद्यापीठ की आचार्य का पदभार ग्रहण किया।

· विविध साहित्यिक,शैक्षिक और सामाजिक सेवाओं के लिए भारत सरकार ने उन्हें “पद्म भूषण” अलंकार से सम्मानित किया।

· महादेवी जी छायावाद की प्रतिनिधि रचनाकार हैं। इनकी कविताओं में वेदना का स्वर प्रधान है। इनकी कविताओं में भाव, संगीत तथा चित्र का अपूर्व संयोग है। उनकी गद्य रचनाओं में चिन्तन की सृजनशीलता स्पष्ट दिखाई देती है। ऐसा कहीं नहीं दिखता कि कविता कुछ दूसरी बात कहती हो और गद्य दूसरी दिशा में प्रवर्तित हुआ हो। गद्य में उनकी वैचारिक दृष्टि स्पष्ट रूप से सामने आती है। उनके गद्य में क्रान्ति और आक्रमण के बीज भी मिलते हैं जो निराला में स्पष्ट मुखर हुआ। नारी होने के कारण उन्हें सामान्यतया कोमलता और वेदना का प्रतीक माना जाता है। परन्तु इनके गद्य साहित्य को देखने से पता चलता है कि इसमें कोमलता और कठोरता का अद्भुत सन्तुलन है। सैद्धान्तिक विभेद का उत्तर उन्होंने अपने तर्कों द्वारा सटीक रूप से दिया। किन्तु अगर समग्र रूप में उनके गद्य साहित्य को देखें तो पाते हैं कि उन्होंने भारतीय संस्कारों में ही अपनी पहचान बनाई और शक्ति अर्जित की। महादेवी की दृष्टि आंसू और हंसी दोनों को एक साथ देखती थी जैसा उनके स्वभाव में था। संवेदन की गहराई और व्याप्ति पर उनकी निगाह एक साथ जाती है। उनका गद्य किसी प्रकार उनकी कविता से कम नहीं है। कुछ जगह तो वह कविता से भी ऊपर उठ जाता है। संस्कृति, देश, भाषा, साहित्य, समाज, नारी जीवन, राष्ट्रीयता सब कुछ को अपनी लेखनी में समेटा है उन्होंने। ऐसा कोई भी विषय नहीं जिस पर उनकी नज़र न गई हो।

· ‘स्मृति की रेखाएं’, ‘अतीत के चलचित्र’, ‘मेरा परिवार’ में उनका कविहृदय गद्य के माध्यम से व्यक्त हुआ है। इन ग्रंथों में उन्होंने कुछ उपेक्षित प्राणियों के चित्र अपनी करुणा से रंजित कर इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि हम उनके साथ आत्मीयता का अनुभव करने लगते हैं। संस्मराणत्मक कहानियां’ कह कर एक नयी विधा का सूत्रपात उन्होंने किया। कवि और कहानीकार के सम्मिलन से जो साहित्य की सृष्टि हुई है उसका उद्देश्य है – जीवन की मार्मिकता का संवेदनात्मक उद्घाटन। जन साधारण और साहित्यकार का यथार्थ एक नहीं होता। महादेवी की यथार्थ-दृष्टि आदर्श को ऐसे स्थापित करती है जैसे पृथ्वी पर आकाश। ‘मेरा परिवार’ में निरूपित संस्मरणों में आत्मीयता और सूक्ष्म चित्रण विशेष रूप से प्रभावित करता है। ‘अतीत के चलचित्र’ में उन्होंने अपने अतीत से सम्बद्ध आत्मीय व्यक्तियों की मार्मिक छवि अंकित की है। ‘सत्यम्‌ शिवं सुन्दरम्‌’ को विलोम क्रम से उन्होंने प्रस्तुत किया है। ममता सुन्दरता का प्रतीक है, शिव सरलता का स्वरूप तथा सत्य मनुष्यता का द्योतक। चलचित्रों के स्मरणीय पात्र सामान्य जीवन से लेकर विशिष्ट जीवन का स्मरण दिलाते हैं। उनमें कथात्मकता से अधिक संवेदनशीलता है।

· अपने पात्रों के रेखाचित्र में तो वे इतनी चित्रोपमता ला देती हैं कि पात्र प्रत्यक्ष सा खड़ा हो जाता है। महादेवी के शब्द चित्र असाधारण रूप से स्मरणीय बन गये हैं। भाव-स्मृति से उभरती हुई रूप-स्मृति सजग-असजग दोनों प्रकार से प्रकट की गयी है। कुछ उदाहरण देखिए

o धूप से झुलसा हुआ मुख ऐसा जान पड़ता है, जैसे किसी ने कच्चे सेव को आग की आंच पर पका लिया हो।

o कुत्ते के पिल्ले के समान ही वह घुटनों के बल खड़ा रहा और हंसने रोने की विविध मुद्रा का अभ्यास करता।

· ‘पथ के साथी’ में उस युग के प्रमुख साहित्यकारों के अत्यंत मार्मिक व्यक्ति-चित्र संकलित हैं। विश्वकवि रवीन्द्र के प्रति प्रणाम निवेदन के साथ हिन्दी कवि मैथिली शरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, निराला, जयशंकर प्रसाद, पन्त, तथा सियारामशरण गुप्त के संस्मरणों का आत्मीय संग्रह है। महादेवी ने इन साहित्यकारों की स्वनिर्मित रेखा-छवियां भी संकलन में संलग्न किया है जिससे उनकी प्रकॄति के साथ आकृति भी सामने आ जाती है।

· ‘शृंखला की कड़ियां’ में आधुनिक नारी की समस्याओं को प्रभावपूर्ण भाषा में प्रस्तुत कर उन्हें सुलझाने के उपायों का निर्देश किया गया है। इसमें नारी-संवेदना के बौद्धिक एवं सामाजिक पक्ष का उद्घाटन हुआ है। रूढिवादी समाज और पुरुष-प्रधान परम्परावादी दृष्टिकोण का उन्होंने तीव्र प्रतिवाद किया है। स्त्रियों के अधिकारों की लड़ाई में वे योद्धा की भांति सक्रिय हुईं। इस संग्रह में भारतीय नारी की विषम परिस्थितियों को अनेक बिन्दुओं से देखने का प्रयास किया है। इस संग्रह के द्वारा उन्होंने इस देश की नारी को सामाजिक स्तर पर रूढियों से मुक्त करने की घोषणा की।

· महादेवी जी की गद्य शैली प्रभावपूर्ण, चित्र्रत्मक तथा काव्यमयी है। इनकी भाषा संस्कृत-प्रधान है।

o उनकी विशिष्ट शैली के दो स्पष्ट रूप हैं – विचारात्मक और भावात्मक।

§ विचारात्मक गद्य में तर्क और विश्लेषण की प्रधानता है।

भावात्मक गद्य में कल्पना और अलंकृत वर्णनों की प्रधानता है।

16 टिप्‍पणियां:

  1. महादेवी वर्मा के विषय में रोचक और संग्रहणीय जानकारी ...आपका आभार

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  2. बहुत अच्छी श्रृंखला प्रारंभ की है .... उत्सुक हैं उनके बारे में और उनके लेखन के बारे में जानने के लिए .

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  3. Behad rochak lagee ye kadee...agalee kadiyon kaa intezaaar rahega.

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  4. महादेवी वर्मा के बिना आधुनिक हिन्दी साहित्य का उल्लेख अधूरा ही होगा। मेरे विचार से उनका गद्य--कहानी, संस्मरण ,रेखाचित्र आदि उनके काव्य से किसी तरह भी कम गरिमामय ,रोचक व पठनीय नही है । संस्कृतनिष्ठ भाषा होते हुए भी उनकी रचनाएं (गद्य-पद्य दोनों ही )जैसी सरस और प्रवाहमयी हैं वैसी अन्यत्र दुर्लभ हैं । रेखाचित्रों में तो उनका कोई मुकाबला नही । यह सही है कि वे भारतीय संस्कृति , नारी के कोमल उदार,स्नेहमय व संवेदनापूर्ण रूप की अमर गायिका हैं । हिन्दी साहित्य की इस महान कवियित्री व लेखिका के विषय में लेखमाला प्रस्तुत करने के लिये धन्यवाद ।

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  5. बहुत सुंदर श्रृख्ला का आगाज...महादेवी जी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला...आभार।

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  6. महादेवी वर्मा जी मेरी one of the fevt. रही हैं इस सुन्दर श्रृंखला के लिए आभार आगे की प्रतीक्षा है.

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  7. महादेवी वर्मा जी का परिचय पाकर ह्रदय प्रसन्नचित है । कक्षा आठ में , कवि-सम्मलेन में मुझे 'महादेवी वर्मा' जी का रोल दिया गया । मेरी कविता थी - " मैं नीर भरी , दुःख की बदली"....मेरी टीचर कह-कह कर थक गयीं की आवाज़ में थोडा दुःख लाओ , अब मैं क्या करती , दुखी होना मेरी फितरत में ही नहीं है .... लेकिन कवि सम्मलेन देखने के बाद दर्शकों ने खूब तालियाँ बजायीं , बोले-- "महादेवी वर्मा बहुत क्यूट है "

    Smiles...

    .

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  8. जयशंकर 'प्रसाद', बच्चन, राही मासूम रजा,गुलज़ार आदि मेरे प्रिय कवि लेखक रहे हैं. गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर इनकी लेखनी की महारत शब्दों से परे है.. महादेवी जी तो बचपन से नमनीय रही हैं. कोर्स की किताबों से लेकर इनके साहित्य भण्डार तक.. राजभाषा पर यह विषय अच्छा अनुभव रहा!

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  9. आह...... अद्भुत ! थोड़ा नोस्टालजिक भी हो गया. स्नातक और स्नातकोत्तर के वर्षों में लौटता सा महसूस किया. बहुत अच्छा... ! शुक्र है परसों ही महादेवीजी का जन्मदिन है..... अगली कड़ी के लिए अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी. धन्यवाद !!!

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  10. बहुत अच्छी श्रृंखला प्रारंभ की है ………महादेवी वर्मा को पढना और जानना बेहद उत्सुकता पूर्ण रहेगा……………आभार्।

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  11. साहित्यिक जगत की जानकारी देती ये पोस्ट अच्छी लगी ..

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  12. महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की महान लेखिका थी जानकारी विस्तृत करने के लिए आभार

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  13. बहुत ही सारगर्वित प्रस्तुति ...आभार

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  14. बहुत अच्छी श्रृंखला प्रारंभ की है महादेवी जी हिन्दी साहित्य में आधुनिक मीरा के नाम से विख्यात है. उनकी रचना बहू आयामी और शैली भी विविधता लिए हुए आवश्यक मोड़ को स्वीकार करती है परन्तु भाव अवाम अर्थ बोध में उसका प्रभाव नहीं पड़ता. उनकी रचनाये मार्मिक तो हैं ही बहुत ही गूढ़ भावों की व्यंजना करती हैं. श्रृंखला के माध्यम से उन्हें और भी गहरी से समझाने को मिलेगा ऎसी अपेक्षा है और स्वागत है इस प्रयास का.

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