शनिवार, 26 मार्च 2011

महादेवी वर्मा की काव्य संवेदना

२६ मार्च, उनके जन्म दिवस पर प्रस्तुत है

महादेवी वर्मा की काव्य संवेदना

महादेवी वर्मा छायावाद की एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं। काव्य रचनाओं में वे प्रायः अंतर्मुखी रही हैं। अपनी व्यथा, वेदना और रहस्य भावना को ही उन्होंने मुखरित किया है। उनकी कविता का मुख्य स्वर आध्यात्मिकता है। महादेवी ने एक दिव्य सत्ता के दर्शन हर कहीं, हरेक उपादान में किए हैं। उस अलौकिक प्रिय से मिलन की इच्छा ने उन्हें उद्वेलित किया। रहस्य के आवरण मे इसकी अभिव्यक्ति हुई।

महादेवी के काव्य का मूल भाव प्रणय है। उनकी कविताओं में उदात्त प्रेम का व्यापक चित्रण मिलता है। अलौकिक प्रिय के प्रति प्रणय की भावना, नारी सुलभ संकोच और व्यक्तिगत तथा आध्यात्मिक विरह की अनुभूति उनके प्रणय के विविध आयाम है। उनका प्रणय व्यापार एक महारास का रूप ले लेता है और उसमें रहस्यात्मकता आ जाती है।

अंधेरों से झरता स्मित पराग

प्राणों में गूंजा नेह-राग,

सुख का बहता मलयज समीर!

घुल-घुल जाता यह हिम-दुराव,

गा-गा उठते चिर मूक भाव,

आली सिहर-सिहर उठता शरीर!

उनकी कविताओं में सौन्दर्य के विविध रूपों का भी मनोहर चित्रण हुआ है। वे सत्य को प्राप्र्ति का साधन मानती हैं। उनकी सौन्दर्यानुभूति प्रकृति तथा मानव जीवन दोनों की ओर आकृष्ट होती है। वे प्रकृति के विभिन्न रूपों में विराट के सौन्दर्य का दर्शन करती हैं। उनकी जीवन दृष्टि मानवीय गुणों से सम्पृक्त और संवेदनाओं से अनुप्राणित हैं। महादेवी जी की रचनाओं में मुक्ति की उड़ान स्पष्ट, असीम और अनंत है, भाषा और शिल्प के स्तर पर भी। उनके गीत काव्य में संवेदना का सहज प्रत्यक्षीकरण हुआ है। अभिव्यक्ति के स्तर पर उन्होंने प्रतीक का सहारा लिया है। काव्य संवेदना की निर्मिति में उनके व्यक्तिगत एकाकीपन की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। वेदना के विविध रूपों की उपस्थिति उनके काव्य जगत की विशिष्टता है। उन्होंने अखिल ब्रह्मांड में सौन्दर्य के दर्शन किए। उसे अपने गीतों में स्थान दिया। सौन्दर्य की अभिव्यंजना द्वारा आनंद की सृष्टि सफलतापूर्वक किया। व्यथा-वेदना से आनंद की ओर यह प्रस्थान उनकी काव्य-यात्रा का सार है। सम्यक्‌ वेदनानुभूति का प्रस्फुटन आनंद में होता है।

हंस देता जब प्रात, सुनहरे अंचल में बिखरा रोली।

लहरों की बिछलन पर जब मचली पड़ती किरणें भोलीं।

तब कलियां चुपचाप उठा कर पल्लवों के घुंघट सुकुमार,

छलकी पलकों से कहती हैं कितना मादक है संसार!

उनकी वेदना के उद्गम के बारे में निश्चित तौर पर कहना संभव नहीं है।

“शलभ मैं शापमय वर हूं, किसी का दीप निष्ठुर हूं”

उनके अंतस में लगता है अथाह पीड़ा पल रही थी। विचित्र सा सूनापन था। स्वेच्छा से चयन किया गया एकाकीपन था। पीड़ा का साम्राज्य ही उनके काव्य संसार की सौगात है।

“साम्राज्य मुझे दे डाला, उस चितवन ने पीड़ा का”

विफल प्रेम का रुदन उनके काव्य की अंतर्वस्तु है। पीड़ा उनका प्रारब्ध है,

मेरी मदिरा मधुवाली, आकर सारी ढुलका दी

हंस कर पीड़ा से भर दी, छोटी जीवन की प्याली

अपनी पीड़ानुभूति को बहुत ही सहजता से वे व्यक्त करती हैं

“रात सी नीरव व्यथा, तन सी अगम कहानी”

दुख और वेदना के भाव आरोपित बिल्कुल नहीं हैं। इनका वरण तो कवयित्री ने स्वयं किया है। किन्तु यह वेदना नितांत व्यैक्तिक भी नहीं है। उनके वेदना का महल आध्यात्मिक और मानवतावादी भावभूमि पर टिका हुआ है। महादेवी ने दुख को आध्यात्मिक स्तर पर ही अपनाया। किसी दार्शनिक की तरह वे कहती हैं,

विजन वन में बिखरा कर राग, जगा सोते प्राणों की प्यास,

ढालकर सौरभ में उन्माद नशीली फैलाकर विश्वास,

लुभाओ इसे न मुग्ध वसन्त! विरागी है मेरा एकान्त!

और, तथागत की महाकरुणा का प्रभाव देखिए

अश्रुकण से डर सजाया त्याग हीरक हार,

भीख दुख की मांगने जो फिर गया प्रति द्वार

शूल जिसने फूल छू चन्दन किया सन्ताप,

सुनो जगाती है उसी सिद्धार्थ की पदचाप,

करुणा के दुलारे जाग!

महादेवी की कविताओं में रहस्यानुभूति के प्रत्येक चरण की अभिव्यक्ति मिलती है। वह प्रकृति व्यापार में विराट सत्ता का दर्शन करती हैं। उसके साथ रागात्मक संबंध स्थापित करती हैं, ‘जब असीम से हो जाएगा, मेरी लघु सीमा का मेल’

जो तुम आ जाते एक बार!

कितनी करुणा कितने संदेश

पथ में बिछ जाते बन पराग।

गाता प्राणों का तार-तार

अनुराग भरा उन्माद राग,

आंसू लेते वे पग पखार।

किन्तु उन्हें यथार्थ विरोधी रहस्यलोक में ही रहे आना कभी स्वीकार नहीं हुआ। वे अपनी संवेदनाओं को शोषित-उपेक्षित वर्ग से जोड़कर चलीं। उन्होंने अपने युग की मुक्ति आकांक्षा को अपनी रहस्यानुभूति में स्थान दिया। यह मुक्ति उनके लिए नारी मुक्ति भी थी।

तोड़ दो यह क्षितिज, मैं भी देख लूं उस ओर क्या है!

जा रहे जिस पंथ से युग-कल्प उसका छोर क्या है!

13 टिप्‍पणियां:

  1. महादेवी वर्मा जी को नमन ... उनकी कुछ काव्य झलकियाँ सुबह सुबह पढ़ कर ही दिन अच्छा हो गया ... और इनकी काव्य पंक्तियों पर सुन्दर विश्लेषण ..बहुत अच्छा लगा .

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  2. महादेवी वर्मा को नमन्…………उनके बारे मे पढकर अच्छा लग रहा है।

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  3. बहुत सुन्दर पंक्तियों का संकलन पेश किया है ....
    तोड़ दो यह क्षितिज, मैं भी देख लूं उस ओर क्या है! जा रहे जिस पंथ से युग-कल्प उसका छोर क्या है!

    कोई नहीं जानता ..उस पार क्या है ...महादेवी वर्मा क्या जानती थीं ...आज इस पार उनका जन्मदिन इतनी अहमियत लिए होगा ....

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  4. १९६७ में हाईस्कूल की पढ़ाई तक महादेवी जी का गद्य और पद्य खूब पढ़ा है अब आपने दोनों प्रस्तुत कर अतीत की याद दिला दी. हिन्दी साहित्य में महादेवी जी का अनुपम योगदान है और उसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा.

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  5. महादेवी जी की काव्य पंक्तियों से सजी ये पोस्ट एक उपहार सी लगी...
    बहुत बहुत शुक्रिया

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  6. एक महान कवियत्री की पंक्तियों का बहुत ही खूबसूरत विश्लेषण किया है आपने. सुबह सुबह इस उपहार का बहुत शुक्रिया.

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  7. महादेवी जी के जन्म दिवस पर उनकी काव्य शैली पर की गई विवेचना और उनकी कविताओं की चुनी पंक्तियों से सजी ये पोस्ट मन को खुश कर गई।

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  8. गद्य और पद्य दोनों में ही महादेवी जी की समान गति रही है। वे एक बहुत अच्छी वक्ता भी थीं। मुझे याद है सत्तर के दशक में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में बिरला छात्रावास के वार्षिकोत्सव में वे मुख्य-अतिथि के रूप में आमन्त्रित थीं। उनके स्वतःस्फूर्त विचार सुनकर मन मुग्ध हो गया था। वे बोलती थीं तो लगता था कि उनका भाषण भी उतना ही प्रांजल और सारगर्भित था जितनी उनकी कविताएँ या गद्य।
    बहुत अच्छा विश्लेषण आपने किया है।

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. महादेवी वर्मा जी को सतसत नमन... सुन्दर पोस्ट... कल मैंने चर्चामंच पर महादेवी जी के गद्य पर आधारित आपकी पोस्ट रखी थी ... आज काव्य संवेदना पढ़ने को मिली...आभार ,

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  11. हिन्दी की महान कवियत्री को आपने उनकी जयन्ती पर याद किया और सबको उनकी याद दिलायी,इसके लिए आपको बहुत -बहुत धन्यवाद .आज के अधिकाँश प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया को तो राजनीतिक उठा-पटक , फ़िल्मी पुरुषों और फ़िल्मी औरतों के फूहड़ किस्सों , धन-कुबेरों ,यानी कि धन-लुटेरों की वैभवपूर्ण जीवन-शैली , क्रिकेट के सट्टेबाज खिलाड़ियों और हर प्रकार के गलत कार्यों से अमीर बन रहे लोगों के महिमा -गायन और महिमा-प्रदर्शन से फुर्सत नहीं है. तब आज का हिन्दी मीडिया देश के महान साहित्यकारों ,कवियों और अन्य महान रचनाकारों के बारे में जनता को भला क्या बताएगा ? बहरहाल आपने ब्लॉग पर महादेवी जी के बारे में सुंदर आलेख प्रस्तुत किया है. पुनः आभार.

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  12. नीर भरी दुःख की बदली महादेवीजी मेरी पसंदीदा साहित्याकारा रही हैं. मैं भाग्यशाली हूँ कि इनकी अधिकाँश रचनाएँ पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है. फर्रुखाबाद में २४ मार्च, १९०७ को अभिजात्य कायस्थ्य कुलोत्पन्ना महादेवी हिंदी साहित्य मे ऐसी अनुरक्त हुई कि कह बैठी "पीड़ा मे तुझको ढूंढा है तुझ में ढुढूंगी पीड़ा.." और जमाना इन्हें कह बैठा 'अभिनव मीरा' ! महज ९ वर्ष की बाल्यावस्था में महादेवी का विवाह इंदौर के रईस स्वरुप नारायण वर्मा से हो गया था किन्तु यह महादेवी की दृढ़ता ही थी कि न तो अबोध अवस्था मे हुए परिणय के बंधन में बंधीं और ना ही पुनर्विवाह किया. वे वर्मा जी को सदैव शुभ-चिन्तक मानती रही किन्तु पति नहीं ! एकाकी जीवन की यही पीड़ा प्रणय की तरलता ले उनकी कविताओं में अविरल प्रवाहित होती है. अभिनव मीरा ने पन्त, प्रसाद और निराला के साथ न केवल छायावाद के स्तम्भ-चतुष्टय का निर्माण किया अपितु पद्य के साथ-साथ गद्य मे भी अभिनव प्रयोग किये. ललित निबंध, रेखा चित्र और संस्मरण को साहित्यिक धरातल पर प्रतिष्ठित करने मे महादेवी का योगदान अतुलनीय है. महादेवी की करुना और संवेदना का क्षेत्र इतना व्यापक है कि इसमें बिंदा, बिट्टो, भाभी और घीसा जैसे निरीह मानव से लेकर गिल्लू, नीलकंठ, श्यामा आदि मानवेत्तर प्राणी भी उतनी ही आत्मीयता से जगह पाते हैं.
    महादेवीजी के जन्मदिवस पर हमसब को उनकी याद दिलाने के लिए आभार !

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