शुक्रवार, 10 जून 2011

स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यास

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भ्रमवश कुछ लोगों द्वारा 1950 के बाद के दशक को आंचलिक उपन्यासों का दशक मान लिया गय। वास्तव में यह दशक एक नये प्रकार के मुक्ति आन्दोलन से जुड़ा हुआ था। यह मुक्ति वैक्तिक भी है, सामाजिक भी। पुराने नैतिक मूल्यों से मुक्त होकर व्यक्ति खुले में सांस लेना चाहता है। देश विभाजन की समस्याएं और उसकी चिंता भी इस दशक के उपन्यासों के विषय रहे। कुल मिलाकर 1950-60 के दशक के उपन्यासों में प्रयोगात्मक विशेषता पाई जाती है। इसमें तीन पीढियों की सर्जनात्मकता का योगदान है।

१. प्रेमचंदोत्तर रचनाकार :

जैनेन्द्र, इलाचंद्र जोशी, अज्ञेय, यशपाल, मन्मथनाथ गुप्त, भगवती चरण वर्मा, वृन्दावन लाल वर्मा, अमृतलाल नागर आदि।

स्वंत्रता प्राप्ति के बाद देश के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में व्यापक परिवर्तन हुआ। विभाजन के बाद की त्रासादी दंगे के रूप में देश झेल रहा था। साथ ही आज़ाद भारत के निर्माण और विकास की प्रक्रिया भी चल रही थी। सो देश में परिवर्तन, विघटन और निर्माण की प्रक्रिया शुरु हुई। अज़ादी के जो मीठे-कड़वे अनुभव हुए उन सबको केन्द्र में रखकर महत्वपूर्ण उपन्यासों की रचना हुई।

यशपाल का ‘झूठा सच’ स्वतंत्रता पूर्व और प्राप्ति के बाद के यथार्थ को चित्रित करने वाला उपन्यास है। इसका पहला खण्ड ‘वतन और देश’ और दूसरा खण्ड ‘देश का भविष्य’ आज़ादी के पूर्व और अज़ादी के बाद के भारत की संघर्ष कथा को बड़ी सजीवता से रूपायित करते हैं। उन्हें उपन्यास और कहानी दोनों में ही सफलता प्राप्त हुई। ‘मनुष्य के रूप’ और ‘दिव्या’ उनकी अमर कृति है।

अन्य उपन्यासकारों में चतुरसेन शास्त्री (धर्मपुत्र), विष्णु प्रभाकर (निशिकांत), मन्मथनाथ गुप्त (गृहयुद्ध, तूफ़ान के बादल), भीष्म साहनी (तमस), कमलेश्वर (लौटे हुए मुसाफ़िर), जगदीश चन्द्र (मुट्ठी भर कांकर), राही मासूम रज़ा (आधा गांव), बलवन्त सिंह (काले कोस), बदीउज़्ज़मा (छाको की वापसी), भगवती चरण वर्मा (सीधी सच्ची बातें, प्रश्न और मरीचिका, वह फिर नहीं आई), और कृष्णबलदेव वैद (गुज़रा हुआ ज़माना) के नाम उल्लेखनीय हैं।

देश का विभाजन और उसकी त्रासदी इन उपन्यासों के केन्द्र में है। इन्हें पढ़ने के बाद इस शताब्दी की सबसे बड़ी त्रासदी के अनेक पहलुओं को जानने-समझने में सुविधा होती है। यह मनुष्यता के अंधकारकाल की लोमहर्षक घटनाओं का जीता-जागता चित्र है।

२. स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद वाले दशक के रचनाकार :

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पिछली पीढी के व्यक्तिवादी, समाजवादी, मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना करने वाले उपन्यासकार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी सक्रिय रहे। अमृतलाल नागर ने कई महत्वपूर्ण उपन्यास स्वतंत्रता के बाद वाले दौर में लिखे। उन्होंने अपने उपन्यासों में व्यक्ति और समाज के सापेक्षिक संबंध को चित्रित किया है। ‘नवाबी मसनद’, ‘सेठ बांके मल’, ‘महाकाल’, ‘बूंद और समुद्र’, ‘सुहाग के नूपुर’, ‘शंतरंज के मोहरे’, अमृत और विष’, ‘एकदा नैमिषारण्ये’, ‘बिखरे तिनके’, ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’, ‘मानस के हंस’, ‘खंजन नयन’, और ‘करवट’ जैसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास इसी काल में प्रकाशित हुए।

अपने विस्तार और गहराई के कारण ‘बूद और समुंद्र’ काफ़ी महत्वपूर्ण उपन्यास है। इसमें बूंद व्यक्ति और समुद्र समाज का प्रतीक है। इसमें भारतीय समाज के विभिन्न रूपों, रीतियों, आचार-विचार, मर्यादाओं, व्यवस्थाओं का चित्रण बड़ी खूबी से किया गया है।

भगवती चरण वर्मा के ‘भूले बिसरे चित्र’, ‘सामर्थ्य और सीमा’, ‘सबहिं नचावत राम गोसाईं’, ‘सीधी सच्ची बातें’, उपेन्द्र नाथ ‘अश्क’ के ‘गिरती दीवारें’, ‘गर्म राख’, ‘शहर में घूमता आईना’, ‘बांधो न नाव इस ठांव बन्धु’, जैसे सामाजिक उपन्यास स्वतंत्रता मिलने के २०-२५ वर्षों की अवधि में लिखे गए।

मनोविश्लेषणवादी उपन्यासकारों में इलाचन्द्र जोशी के ‘मुक्ति पथ’, ‘जिप्सी’, ‘जहाज का पंछी’, ‘भूत का भविष्य’ अज्ञेय के ‘नदी के द्वीप’ (1951), ‘अपने-अपने अजनबी’ इस दशक की प्रमुख कृतियां हैं। ‘नदी के द्वीप’ को रोमैंटिक क़िस्म के व्यक्तिवादी उपन्यासों का चरम समझना चाहिए।

देवराज का ‘पथ की खोज’, नागार्जुन का ‘बलचनमा’, धर्मवीर भारती का ‘सूरज का सातवां घोड़ा’, रुद्र का ‘बहती गंगा’, और रेणु का ‘मैला आंचल’ (1954) इसी दशक के उपन्यास हैं। इन सभी उपन्यासों में जूझते हुए आदमी और समाज की अवस्थाओं को देखा जा सकता है।

3. आंचलिक उपन्यास

‘मैला आंचल’ और ‘परती परिकथा’ जैसे आंचलिक उपन्यासों की रचना का श्रेय फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ को जाता है। प्रेमचंद के बाद रेणु ने गांव को नये सौन्दर्यबोध और रागात्मकता के साथ चित्रित किया है।

उदयशंकर भट्ट (कब तक पुकारूं), रामदरश मिश्र (पानी के प्राचीर, जल टूटता हुआ), राही मासूम रज़ा (आधा गांव), शिवप्रसाद सिंह (अलग-अलग वैतरणी), श्रीलाल शुक्ल (रागदरबारी), हिमांशु जोशी (अरण्य), शैलेश मटियानी (कबूतरखाना, दो बूंद जल), शानी (काला जल) विवेकी राय (बबूल, पुरुष पुराण, लोकऋण, सोना माटी, समर शेष है), आदि उपन्यासों की रचना करके भारत के विभिन्न अंचलों के जीवन-यथार्थ, आशा-आकांक्षा. संघर्ष-टूटन, राजनीतिक-सामाजिक पिछड़ेपन-जागृति आदि का चित्रण किया।

10 टिप्‍पणियां:

  1. महान साहित्यकारों के परिचय के लिए आभार मनोज जी ।

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  2. जाने माने साहित्य्कारोंसे और उनकी कृतियों से परिचय मिला ..इनमें से कुछ ही उपन्यास पढ़े हुए हैं ..

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  3. वाह ये तो सभी मेरा पसंदीदा हैं.
    आभार इनकी जानकारी का.

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  4. Manoj ji -yah post to har hindi sahity premi ke liye ek saugat hai .bahut achchha parichay prastut kiya hai aapne mahan sahitykaron ka .aabhar .

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  5. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (11.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  6. आपने जो प्रयास किया है उसके लिए मेरे पास कोई विशेषण नही है। स्वातंत्र्योतर हिंदी उपन्यास के बारे में आपके द्वारी दी गयी जानकारी पुनरावृति का कार्य कर गयी। आपके द्वारा जिन उपन्यासों के बारे में जिक्र किया गया है,उसे आगे की ओर ले जाते हुए सुझाव दूंगा कि "मृगनयनी',"चित्रलेखा","प्रेम न बाडी उपजै' "एक थी जमुनी","वैशाली की नगर बधु" को भी उचित स्थान दें।
    पोस्ट अच्छा लगा।
    धन्यवाद।

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  7. स्वतंत्र्योत्तर काल के प्रथम दशक के सभी सर्वश्रेष्ठ उपन्यास गिना दिए हैं आपने...इस जानकारी के लिए आभार ...

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