मंगलवार, 7 जून 2011

अपहृत लोकतंत्र

अपहृत लोकतंत्र

अरुण चन्द्र रॉय

शनिवार यानी ४ जून को बाबा रामदेव और मैं दोनों बहुत व्यस्त थे. एक ओर जहाँ बाबा रामदेव रामलीला मैदान में देश में काले धन के मुद्दे पर अनशन पर बैठे थे, वहीं दूसरी ओर  मैं एक बड़े रियल एस्टेट कंपनी के नए प्रोजेक्ट लांच की तैयारियो के सिलसिले में उनकी कारपोरेट फिल्म बनाने के लिए भिवाड़ी के औद्योगिक क्षेत्रों और कंपनी के प्रोजेक्टों की शूटिंग कर रहा था.

मेरे साथ दिल्ली के एक बड़े विज्ञापन एजेंसी के मालिक जिनका उठाना बैठना देश के बड़े उद्योगपतियों, मीडिया के लोगों, बालीवुड की हस्तियों और तारिकाओं के साथ होता है, वे भी थे. दिन भर उनका मोबाइल फोन बजता रहा और सबका एक ही सवाल था बाबा रामदेव का अनशन यदि अधिक दिनों तक चला तो क्या होगा. मेरे मित्र के चेहरे पर बैचैनी आसानी से पढ़ी जा सकती थी.

मेरे सामने भिवाड़ी में बड़े बड़े प्रोजेक्ट थे. भिवाड़ी में होंडा सील एशिया का सबसे बड़ा संयत्र और वेयरहाउस लगा रहा है. साथ में कई और भी बड़ी परियोजनाएं आ रही हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जमवाडा होने वाला है यहाँ. यही कारण है कि रियल एस्टेट भी बड़ी तैयारियों में है यहाँ. हाइवे चौड़ा हो रहा है, बिजली आ रही है. यानी पूरा कायाकल्प हो रहा है.

इस सुनहरे दौर के बाद संयोग से मुझे भिवाड़ी के पुराने औद्योगिक क्षेत्र जाने का मौका भी मिला. वहां भारतीय कंपनिया थी, छोटे उद्यमी थे, पारंपरिक उद्योग थे.. जो रुग्ण अवस्था में मिले. दयनीय स्थिति थी वहां. सड़के खराब, बिजली नहीं थी. और यह स्थिति कमोबेश सभी औद्योगिक परिसरों में है. अभी अभी आकडे आये हैं कि अपने देश में विनिर्माण (मैनुफेक्चरिंग) क्षेत्र में ५% की कमी आई है. जबकि अन्य विकासशील देशों जिसमे चीन शामिल है इस क्षेत्र में १०% तक की बढ़ोतरी हुई है. यह इस बात का द्योतक है कि अपने देश में उद्योग का फोकस बदल गया है और दीर्घावधि में यह रुझान देश के लिए ठीक नहीं. लेकिन जब नेतृत्व ही देश के बारे में नहीं सोच रहा तो उद्योग, व्यापार को क्या फ़िक्र पड़ी है.

एक और बात जो सामने आ रही है इन दिनों वह यह  कि नई पीढी का उद्यमी चीन और अन्य देशों से आयात करना बेहतर समझता है, बनिस्बत अपने यहाँ निर्माण करने के. इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं जिसमे भ्रष्ट्राचार और लालफीताशाही शामिल हैं. साथ में नई उद्योग नीति भी ऐसी बन रही है जिसमे भारत बाज़ार तो बन रहा है लेकिन निर्माण हब नहीं बन रहा. इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने होंगे, यह तय है.

मैं कहाँ से कहाँ चला गया. वापिस आता हूँ अपने बेचैन मित्र पर. वास्तव में वह बैचैनी मेरे मित्र की ही नहीं थी बल्कि यह बैचैनी समूचे उद्योग और व्यापार तबका का था जो इस काले धन और भ्रष्ट्राचार के मुद्दे का शमन यही करना चाहता है. राजनेताओं के साथ साथ छोटे बड़े उद्यमी, व्यापारी, रियल एस्टेट, निवेशक सब काले धन के वाहक हैं और सबसे आसानी से काला धन रियल इस्टेट में निवेश हो जाता है और हो रहा है. ऐसे में बाबा रामदेव के धरने, अनशन से  सबसे ज़्यादा डरा हुआ भी यही तबका था. लेकिन दोपहर के बाद मैंने अपने बेचैन मित्र को उतना बैचैन नहीं देखा. अब जो भी फ़ोन आ रहे थे उसमे बस यही कहा जा रहा था कि बाबा को वापिस उतराखंड भेज दिया जायेगा. मुझे पहले तो यह स्ट्रेस ब्रस्टर  टिप्स लगा लेकिन रविवार की सुबह की घटनाक्रम के बाद मेरा विश्वास पक्का था कि बाबा रामदेव का इंतजाम जितना राजनीतिक भय था उससे कहीं अधिक उद्योग और व्यापार के लोगों की शह पर हुआ है.

जिस तरह उद्योग जगत इन दिनों चुनावों में राजनीतिक दलों को वित्त मुहैया करता है उस से लग रहा है कि मानों लोकतंत्र अपहृत हो गया हो. बाबा रामदेव प्रकरण से यह बात अधिक स्पष्ट हो गई है. इस बीच मेरी कारपोरेट फिल्म तैयार हो गई है और मेरे क्लाइंट का नया रियल एस्टेट प्रोजेक्ट बुधवार को राजधानी के एक पांचतारा होटल में विधिवत लांच हो रहा है.

19 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई लगता है कि लोकतंत्र अपहृत हो गया है.

    आपकी फिल्म लॉचिंग के लिए बधाई एवं शुभकामनाएँ.

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  2. आपकी बात अक्षरश: सत्‍य है तभी तो इतनी बर्बरता के बाद भी लोग मुद्दे से ध्‍यान हटाकर चरित्रहनन कर रहे हैं। आज देश में भ्रष्‍टाचारियों की बहुत बड़ी लॉबी बन चुकी है और वे कभी नहीं चाहेंगे कि ऐसा कोई कानून बने। इसलिए आज एक तरफ भ्रष्‍टाचारी खड़े हैं तो दूसरी तरफ देशहित में सोचने वाले लोग हैं।

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  3. बहुत स्पष्ट तरीके से आपने बता दिया कि लोकतंत्र कैसे और क्यों अपहृत हो रहा है ..भ्रष्टाचार जैसे जवलंत मुद्दे से ध्यान हटाने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है ?

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  4. बहुत ही सही बात है आपकी तभी कोई भी पीछे नहीं हो रहा !अपना महत्वपूर्ण टाइम निकाल कर मेरे ब्लॉग पर जरुर आए !
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  5. वाकई ... लोकतंत्र अपहृत हो गया है....

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  6. उफ़्……………क्या कहें आज की एक और कटु सच्चाई आपने उजागर कर दी जिससे यही लगता है कि अब लोकतंत्र बचा ही कहाँ ?

    आपकी फिल्म लॉचिंग के लिए बधाई एवं शुभकामनाएँ.

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  7. वाकई लोकतंत्र अपहृत सा लगता है... पूंजीपतियों के चंगुल में है देश और देश की नीतियाँ...

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  8. लोकतंत्र मात्र अपहृत ही नहीं, बल्कि हत्या कर दी गयी

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  9. आज के सच को सबके सामने लाने के लिया शुक्रिया अरुण जी

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  10. बोलने को तो इतना कुछ है कि क्या कहूँ...लेकिन क्या क्या बोलूं...

    आभार आपका इस सत्य और तथ्य को रेखांकित करने का...बहुत बहुत आभार.

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  11. आपकी बातें कतई हवाई नहीं लगीं.
    भ्रष्टाचार जहाँ-जहाँ है वहाँ-वहाँ इस हलचल से बेचैनी होनी ही थी. फिर रीअल इस्टेट और सरकार मिलकर गुंडाराज ही तो चलाते हैं; उसी का प्रमाण ऑपरेशन-रामदेव में मिला.

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  12. आपने भी सच्चाई स्वीकार कर ली वर्ना पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंघा रो साहब तो अपने उपन्यास 'दी इनसाइडर'में पहले ही लिख गए है -"हम स्वतंत्रता के भ्रम जाल में जी रहे हैं",जब हम स्वतन्त्र ही नहीं हैं तो लोकतंत्र कैसा?और उसका अपहरण कैसा ?

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  13. आपकी फिल्म लॉचिंग के लिए बधाई एवं शुभकामनाएँ.
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  14. बहुत ही सटीक शीर्षक दिया है...आजकल तो ऐसा ही लग रहा है, लोकतंत्र कितना बेबस हो गया है...

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  15. एक विचारोत्तेजक आलेख। समसायिक विषय पर आपने एक अलग दृष्टिकोण सामने लाया है।

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  16. आपका स्वागत है "नयी पुरानी हलचल" पर...यहाँ आपके पोस्ट की है हलचल...जानिये आपका कौन सा पुराना या नया पोस्ट है यहाँ...........

    "नयी पुरानी हलचल"

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  17. अरुण जी! हम ब्लॉग में चाहे जितना भी फ्रस्ट्रेशन निकाल लें.. वास्तव में मेरी नौकरी तो तो इसी बात की तनख्वाह देती है मुझे.. बस पेट और परिवार ने बाँध रखा है!!आपका बयान हर रोज हमारे मन मस्तिष्क में पनपता है और दम तोड़ देता है!! बस याद आता है "अर्ध सत्य!"

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  18. आपका पोस्ट पढ़ने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूं कि बाबा रामदेव जी का भ्रष्टाचार के प्रति किय़ा गया अनशन शांतिपूर्ण अनशन था। 2G Spectrum केश की सुनवाई के दौरान Telecom Secretary ने CBI Court में स्वीकार किया है कि इस केश में जो कुछ भी हुआ है उसके लिए Council of Ministers भी जिम्मेवार है। सरकार की और से इस पर कोई कार्रवाई नही की गयी। इसका क्या कारण है!
    लोकतांत्रिक ढांचे के अंतर्गत शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार सबको है।सरकार ने किसके कहने पर या ऐसा क्यों किया यह एक प्रश्न चिह्न है। इसे देखते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस घटना का Suo motto Cognisance लिया है एवं केंद्रीय सरकार.दिल्ली सरकार आदि को नोटिस भी जारी किया है। मानवाधिकार आयोग भी हरकत में आ गया है। यदि कोई भ्रष्टाचार या विदेशों से काले धन की वापसी के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करता है तो इस मुद्दे पर गंभीरता से चिंतन-मनन करना चाहिए न कि उसका दमन। यह तो चिंतनीय विषय है। मेरा व्यक्तिगत अपील है कि देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन लोग आत्म-मंथन करें एवं इस समस्या के निराकरण हेतु आपना योगदान दें और 'राष्द्रपिता गांधी' जी के सपनों के भारत को उनकी मानसिक संकल्पना के आधार पर इसका फिर से निर्माण करें ताकि 'रामराज्य' की कल्पना साकार हो सके। इस घटना चक्र को देखते हुए वास्तव में ऐसा लगता है कि भारतीय लोकतंत्र अपहृत हो गया है या अपहृत होने के कगार पर है। पोस्ट अच्छा लगा।धन्यवाद।

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  19. इसी लिए तो सौ चोर मिलकर ...एक निहत्थे इंसान को चोर बना कर ..इस बाजार में बेईज्जत कर रहे है !

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