बुधवार, 1 जून 2011

उड़ते चेहरे फिसलते पाँव

उड़ते चेहरे फिसलते पाँव



डॉ. दलसिंगार यादव


वैसे तो हर साल गाँव जाता रहता था और खदेरू आदि जैसे पर पीड़ा में संतुष्टि महसूस करने वाले लोग तो मिलते ही रहते थे और अपनी व्यंग्यात्मक शैली में कुछ सुनाने और कुरेदने की कोशिश करते ही रहते थे लेकिन इस बार जब गाँव गया तो खदेरू को न देख कर भइया से पूछा कि खदेरू ना देखात हउऐं कतों गयल हउएं का? भइया ने बड़ी सहजता से बताया कि उ त मर गइलैं। भइया की इतनी आसानी से और बिना किसी दुःख की शैली में कही गई बात से मैं अवाक् रह गया और मुझे पिछली बार जब गाँव गया था तो उनसे हुई मुलाकात और उनकी बदली हुई चाल ढाल याद आ गई। जब मैं पिछली बार गाँव गया था और वे मिले थे तो कुछ दुःखी दिखे। बाज़ार से अकेले ही घर की ओर जा रहे थे। न चाल में वह तेज़ी थी और न ही वह आत्म विश्वास जिससे कि वे अपने तरकश में छुपे व्यंग्य बाणों से लोगों के दिल को छलनी कर देते थे और उसका मलाल भी उनके मन में नहीं आता था। 

मुझे लगा कि उनकी तबीयत कुछ खराब है, शायद डॉक्टर के पास दवाई लेने आए होंगे और अब घर लौट रहे होंगे। उनके पास आकर गाड़ी रोकी और सांत्वना के लहज़े में पूछा "का खदेरू भाई तबियत ठीक ना ह का।" मेरी बात सुनकर ठिठके और फिर पहचान कर बोले "अरे मास्टर भइया! कइसे हउआ? कब अइला है?" उनकी बात का जवाब दिया कि "हम त ठीक हई और अबहिनै चलल आवत हई। देखात ह कि तबियत कुछ ढिल्ल बाय! आवा बैठा गड़िया में हमहूं घरै जात हई।" यह कहकर गाड़ी का दरवाज़ा खोल दिया और खदेरू जी गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी में बैठते ही अपने तरकश में से एक बाण निकाला और बहुत ही सहजता से चलाया कि "गाड़ी नई लेहला है का। ई तो बड़ी महंग होई। अच्छी आमदनी होत बाय का?" उनकी यह बात मुझे अच्छी नहीं लगी। लेकिन कुछ कहने के बजाय उन्हें समझाने की कोशिश की कि यह गाड़ी अपनी आमदनी से नहीं बल्कि बैंक से कर्ज़ लेकर कर खरीदी है। और लोगों के पास गाड़ी है और मेरे पास नहीं है तो लोग बाग मुझे बड़ा अफ़सर ही नहीं समझते। अतः लोगों से बराबरी दिखाने लिए यह गाड़ी खरीदी है और अब इसकी किस्त भी भारी पड़ रही है। आज की महंगाई में घर खर्च तथा बच्चों की पढ़ाई का खर्च ही बड़ी मुश्किल से पूरा होता था और ऊपर से इसकी किस्त। इसके लिए ओवर टाइम करना पड़ता है जिससे सेहत भी जवाब देने लगी है। लेकिन मेरा कोई भी स्पष्टीकरण उनको संतुष्ट नहीं कर सकता था क्योंकि उन्होंने तो किसी पर विश्वास करना सीखा ही नहीं था। 

मैंने प्रसंग बदलने की कोशिश की और पूछा कि "डॉक्टर के पास गयल रहला का।" "अरे डॉक्टर के पास का जाईं घर में दूध दही न हउऐ यह मारे थोड़ी कमज़ोरी हवै। भंइस बियावै वाली हौ तब सब ठीक होय जाई।" उनसे बातें करते-करते घर आ गया और उन्हें उतार कर घर आ गया। उस बार एक मुकदमे के सिलसिले में एक दिन के लिए ही गाँव गया था इसलिए दूसरे दिन काम खत्म होते ही वापस आ गया था।

कंजूसी में तो जैसे उन्हें डॉक्टोरेट हासिल था। शरीर को चाहे कितन ही कष्ट क्यों न हो और कैसी ही व्याधि क्यों न हो पैसा एक नहीं खर्च करेंगे। उनकी इसी कंजूसी की प्रवृत्ति के चलते उनकी पुत्रवधू प्रसव के समय ही चल बसी थी। लोगों के लाख समझाने के बावज़ूद उसे अस्पताल नहीं ले गए। उनका मानना था कि "यश अपयश जीवन मरन सब विधि के हाथ।" गाँव के लोग हर संदर्भ में दार्शनिक हो जाते हैं और अपने समर्थन में ऐसे अकाट्य तर्क देंगे कि पढ़ा लिखा मूर्ख साबित हो जाए। जब अमरीकी अपोलो यान चाँद पर उतरा था और उनको जब बताया गया कि आदमी चाँद पर पहुंच गया तो उन्होंने झट से तर्क दिया कि "अदमी का अंजोरिया तक पहुंच पाई? रावणवा सीढ़ी लगावत लगावत थक गयल उहाँ तक पहुंची न पउलै औ अब अदमी उहाँ तक पहुंच पाई।" जब पौराणिक कथा बीच में आ जाती है तो विज्ञान भी फ़ेल हो जाता है। 

गाँव वाले अपने ऐसे ही तर्कों से किसी भी नई तकनीक को अपने तक पहुंचने ही नहीं देते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की तो ऐसी धज्जी उड़ा देते हैं कि डॉक्टर तो उनके सामने टिक ही नहीं पाते हैं। डॉक्टर की परीक्षा तक लेने से नहीं बाज़ आते हैं। एक बार एक डॉक्टर गाँव में आया और खदेरू और उनके साथ मिलकर कुछ लोग डिस्पेंसरी गए और बीमारी के ऐसे ऐसे लक्षण बताए कि डॉक्टर को लगा कि मेरी सारी पढ़ाई ही फ़ेल हो गई है। इसी प्रकार गाँव में कोई बच्चा पढ़ने में मन लगाता है और अच्छा निकलने लगता है तो उसका टेस्ट ये लोग कैसे लेते हैं एक उदाहरण देखिए – एक पेड़ पर अस्सी मकड़ा, वे खाएं लकड़ा, एक मकड़ा खाए एक छटाँक लकड़ा तो कुल खाएं कितना लकड़ा। अब इसका जवाब देने के लिए टो रामानुजम जैसा गणितज्ञ ही चाहिए। एक व्यंग्यकार ने सही ही लिखा है – गाँव वाले भोले नहीं "भाले" होते हैं। ऐसा ही विचार उस दिन सुनने को मिला जब एक दवाई कंपनी ने गाँव में मुफ़्त में कुछ पेटेंटेड दवाइयों को वितरित करने के गाँव के किसी व्यक्ति से संपर्क किया। संपर्क सूत्र ने गाँव के लोंगों को बताया और सुबह 8 बजे चौपाल में एकत्र होने के लिए कहा। उस गोष्ठी में गाँव वालों ने जो प्रश्न पूछे उनमें से एक यह भी था। इससे कंपनी को क्या फ़ायदा होगा जो हमें मुफ़्त में दवाइयाँ बाँट रही है? ये लोग कहीं सरकारी एजेंट तो नहीं हैं जो आबादी घटाने के लिए लोगों को बाँझ बना देंगे। 

शायद ऐसी ही सोच के कारण गाँव में कॉस्मेटिक, पाउडर क्रीम तो लोकप्रिय हो रहे हैं परंतु स्वास्थ्य की बातों के प्रति लोग सशंकित हैं जिसके कारण खदेरू जैसे लोग हृदय रोग को भी कमज़ोरी मानकर जीवन जैसी अनमोल नेमत के प्रति गंभीर नहीं होते हैं। जब उनके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं तो पीछे छूटे परिवार के लोगों के उड़ते चेहरे फिसलते पाँव ही नज़र आते हैं।
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20 टिप्‍पणियां:

  1. खदैरु का दर्द, गरीबी, व दूसरों का रुखापन, ऐसा लेख कभी-कभार ही मिलता है,

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  2. ग्रामीण जीवन के एक अंश का सशक्त चित्रण

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  3. गाँव के लोंग भोले नहीं भाले होते हैं ... अच्छी प्रस्तुति

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  4. आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  5. Tetala ke madhyam se aapke blog par pahli bar aai hoon.aapka lekh padha gaon ka bahut yataarth sajeev chitran kiya hai aapne.padhkar achcha laga.apne blog par aamantrit kar rahi hoon.shubhkamnaayen.

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  6. बहुत खूब कहा है.....सराहनीय आलेख। दिल में उतर जाने वाली प्रस्तुति...साधुवाद!
    ================
    व्यंग्य रणमूलक लेखन है। यह उस पर्दे को हटाता है जिसके पीछे भ्रष्टाचार आराम फरमा रहा होता है।
    =================
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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  7. लेकिन सच ये भी है कि गांव में न तो सभी खदेरू होते हैं और न ही भाले :)

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  8. gavn ke log aur gavn ke jeevan per saarthak lekh.garibi bhi aek bade dukh ka kaaran hoti hai,badhaai aapko.



    please visit my blog and leave a comment.thanks

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  9. बढिया संस्मरण है । गाँव के लोग कुछ लोग भोले भी होते हैं और कुछ भाले भी ,लेकिन अपने प्रति विश्वास
    गजब का होता है चाहे वह ठीक न भी हो । दूसरों पर भी वे विस्वास देर से करते हैं पर जो करते हैं तो फिर पक्का । यादव जी आपको मेरा मेल मिला ? उन्ही हिन्दी ध्वनियों (ड ,ढ )के विषयक । आशा है आप समाधान खोज रहे होंगे ।

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  10. गिरिजा जी!
    आपका मेल नहीं मिला। कृपया रीसेंड कर दें। मेर पास समाधान मौजूद है।

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  11. गिरिजा जी!
    आपका मेल नहीं मिला। कृपया रीसेंड कर दें। मेर पास समाधान मौजूद है।

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  12. खदेरू के संस्मरण और उसके माध्यम से आपने ग्रामीण इलाक़े में व्याप्त अशिक्षा, अंधविश्वास और स्वास्थ्य के प्रति बरती जा रही लापरवाही की ओर बड़े सशक्त तरीक़े से इशारा किया है।

    @ और लोगों के पास गाड़ी है और मेरे पास नहीं है तो लोग बाग मुझे बड़ा अफ़सर ही नहीं समझते। अतः लोगों से बराबरी दिखाने लिए यह गाड़ी खरीदी है और अब इसकी किस्त भी भारी पड़ रही है।
    *** दुखते रग पर हाथ रख दिया।

    @ जब पौराणिक कथा बीच में आ जाती है तो विज्ञान भी फ़ेल हो जाता है।
    *** सौ फ़ीसदी सहमत हूं आपसे।

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  13. ग्रामीण अंचल के जीवन का जीवंत चित्रण ... बहुत बढ़िया...

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  14. दलसिंगार जी! भोले और भाले का अच्छा शब्दचित्र है यह! यथार्थ के बिलकुल समीप!

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  15. मेरे अपने अनुभव के आधार पर इस लघु प्रस्तुति को आप लोगों ने पसंद की इसके लिए आप सभी के प्रति सविनय आभार।

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  16. बदलाव के इस दौर में गाँव के जीवन का सटीक और संतुलित विवेचन .......... यही परिस्थितियाँ बन रही हैं.....

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  17. दलसिंगार जी, आप का बात कहने का अन्दाज़ बहुत अच्छा लगा. जिसे आप कँजूसी कहते हैं, क्या वह जानकारी कम होने या अन्धविश्वास के साथ किसान की गरीबी का सूचक नहीं है? बाकी सब बातों में शायद आप ठीक कहते हैं लकिन, कम्पिनयों वालों द्वारा मुफ़्त दवाई बाँटें जाने पर शक करना मुझे ठीख बात लगी. मुनाफ़ा कमाने वाले, बिना अपना सोचे, यूँ ही कुछ नहीं देते. सचमुच कोई दानी दयालू बना हो तो भी, ठीक से जाँच करना बेहतर ही है!

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  18. दलसिंगार जी, आप ने इस तरह मेरी टिप्पणी का उत्तर दिया, मुझे बहुत अच्छा लगा. धन्यवाद. जैसे मेंने आप के आलेख पर पहले लिखा था, मुझे आप का बात कहने का अन्दाज़ बहुत अच्छा लगा था.
    सप्रेम
    सुनील

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