शुक्रवार, 17 जून 2011

गामांचल के उपन्यास

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IMG_0877मनोज कुमार

ग्रामांचल उपन्यासों को आंचलिक उपन्यास भी कहा जाता है। जिन उपन्यासों को ग्रामांचल के उपन्यास कहा जाता है, उनमें गांव की धरती, खेत-खलिहान, नदी-नाले, डबरे, पशु-पक्षी, हल-बैल, भाषा, गीत, त्योहार आदि वहां रहने वाले लोग के साथ समवेत स्वर में वाणी पाते हैं। मतलब कि न सिर्फ़ इन उपन्यासों के पात्र बोलते हैं, बल्कि पूरा परिवेश भी बोलता है।

1954 में प्रकाशित फणिश्‍वरनाथ ‘रेणु’ का “मैला आंचल” हिन्दी साहित्य में आंचलिक उपन्यास की परंपरा को स्थापित करने का पहला सफल प्रयास है। हालाकि नागार्जुन ने रेणु से पहले लिखना शुरु किया। उनके ‘रतिनाथ की चाची’ (1949), ‘बलचनमा’, (1952), ‘नई पौध’ (1953) और ‘बाबा बटेसरनाथ’ (1954) में भी आंचलिक परिवेश का चित्रण हुआ है। इनके उपन्यासों में बिहार के दरभंगा और पुर्णिया ज़िले का राजनीतिक व सांस्कृतिक चित्रण हुआ है। उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टिकोण से गांव की समस्याओं को चित्रित किया है।

‘मैला आंचल’ और ‘परती परिकथा’ जैसे आंचलिक उपन्यासों की रचना करने वाले फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने प्रेमचंद के बाद, गांव को नये सौन्दर्यबोध और रागात्मकता के साथ चित्रित किया है। प्रेमचंद ने भी अपने उपन्यासों में गांव के निवासियों की कथाएं लिखी है। लेकिन इन्हें आंचलिक उपन्यास नहीं कहा गया।

‘रेणु’ जी का ‘मैला आंचल’ वस्तु और शिल्प दोनों स्तरों पर सबसे अलग है। इसमें एक नए शिल्प में ग्रामीण-जीवन को दिखलाया गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि इसका नायक कोई व्यक्ति (पुरुष या महिला) नहीं है, पूरा का पूरा अंचल ही इसका नायक है। दूसरी प्रमुख बात यह है कि मिथिलांचल की पृष्ठभूमि पर रचे इस उपन्यास में उस अंचल की भाषा विशेष का अधिक से अधिक प्रयोग किया गया है। खूबी यह है कि यह प्रयोग इतना सार्थक है कि वह वहां के लोगों की इच्छा-आकांक्षा, रीति-रिवाज़, पर्व-त्यौहार, सोच-विचार, को पूरी प्रामाणिकता के साथ पाठक के सामने उपस्थित करता है।

ग्रामांचल उपन्यासों की परंपरा

वैसे देखा जाए तो 1925 में प्रकाशित शिवपूजन सहाय के ‘देहाती दुनिया’ में भोजपुरी जनपद का चित्रण बहुत ही मनभावन तरीक़े से हुआ है। हम मान सकते हैं कि आंचलिक उपन्यास परंपरा का यह पहला उपन्यास है।

1952 में प्रकाशित शिवप्रसाद रुद्र का ‘बहती गंगा’ भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है।

प्रसंगवश यह भी याद करते चलें कि अंग्रेज़ी लेखिका मारिया एडवर्थ (1768-1849) का आंचलिक उपन्यासकारों की श्रेणी में सबसे पहले नाम लिया जाना चाहिए, जिनकी कृति ‘कासल रैकर्न्ट’ 1800 में आई थी।

अन्य आंचलिक उपन्यास

अन्य आंचलिक उपन्यासों में उदयशंकर भट्ट का ‘सागर, लहरें और मनुष्य’ (1955) इस धारा की प्रसिद्ध कृति है। इसमें बम्बई के पश्चिमी तट पर बसे हुए बरसोवा गांव के मछुआरों की जीवनकथा का वर्णन किया गया है। शहर के सम्पर्क में जब यह गांव आता है तो गांव की एकांगिता में दरारें पड़ने लगती है। नई परिस्थितियों के कारण बदलाव आता है। गांव की नायिका पूंजीवादी यातना में जा फंसती है।

रांगेय राघव के ‘कब तक पुकारूं’ (1858) और ‘मुर्दों का टीला’, में भी ग्रामांचल का वर्णन हुआ है।

रामदरश मिश्र के ‘पानी की प्राचीर’, ‘जल टूटता हुआ’ तथा ‘सूखता हुआ तालाब’ काफ़ी प्रभावशाली उपन्यास हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के कछार अंचल की दमघोंट समस्याओं, विसंगतियों, अभावों, आंतरिक संदर्भों को तीव्रता से अभिव्यक्त किया है। अधुनिकीकरण का गांव पर प्रभाव पड़ता है और इसके परिणामस्वरूप काफ़ी बदलाव आता है। गांव को वे लगातार उसके परिवर्तनशील रूप में पकड़ने की कोशिश करते रहे हैं।

शिवप्रसाद सिंह के ‘अलग अलग वैतरणी’, में आंचलिक परिवेश का चित्रण है। नये-पुराने मूल्यों, पीढ़ियों, वर्गों और जातियों का टकराहट है। हर इंसान अपनी-अपनी वैतरणी में घिर जाता है। वैतरणी को पार करने का मतलब है नरक। गांव नरक हो गए हैं, जहां अलगाव और टूटन है।

हिमांशु श्रीवास्तव के ‘लोहे के पंख’, और ‘रथ के पहिए’ भी अपने ढ़ंग के प्रभावशाली ग्रामांचलीय उपन्यास हैं।

राही मासूम रज़ा के ‘आधा गांव’, में शिया मुसलमानों की ज़िन्दगी पर प्रकाश डाला गया है। इसमें भारत विभाजन से पहले और बाद की ज़िन्दगी को उभारा गया है। ज़िन्दगी का एकाकीपन और बिखराव को ऐतिहासिक सन्दर्भ में चित्रित किया गया है।

भैरव प्रसाद गुप्त के ‘गंगा मैया’, ‘सती मैया का चौरा’ मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखे गए हैं। इनमें गांवों के प्रति आशावादी दृष्टिकोण तथा स्थानीय रंग दर्शाया गया है।

ग्रामांचल को महत्व देने वाले अन्य उपन्यासकारों में विवेकी राय के बबूल, पुरुष पुराण, लोकऋण, सोना माटी, समर शेष है हिमांशु जोशी के ‘कमार की आग’, कृष्णा सोबती के ‘ज़िंदगीनामा’, ‘मितरो मरजानी’, जगदीश चंद्र के ‘कभी न छोड़े खेत’, बलवंत सिंह के ‘शत चोर और चांद’, देवेन्द्र सत्यार्थी के ‘ब्रह्मपुत्र’ (1956) और ‘दूध छाछ’, राजेन्द्र अवस्थी के ‘जंगल के फूल’, ‘जाने कितनी आंखें’, शैलेश मटियानी के ‘हौलदार’ (1960), मनहर चौहान के ‘हिरना सांवरी’, केशव प्रसाद मिर के ‘कोहवर की शर्त’, उदय राज सिंह के ‘अंधेरे के विरुद्ध’, श्रीलाल शुक्ल (रागदरबारी), हिमांशु जोशी (अरण्य), शैलेश मटियानी (कबूतरखाना, दो बूंद जल), शानी (काला जल) ), अमृतलाल नागर के ‘बूंद और समुद्र’ (1956), बलभद्र ठाकुर के ‘मुक्तावली’, और सच्चिदानंद धूमकेतु के ‘माटी की महक’ आदि में और रेणु के भी अन्य उपन्यास जैसे ‘परती परिकथा’ (1958), ’जुलूस’, ‘दीर्घतपा’, ‘कलंक मुक्ति’, व ‘पलटू बाबू रोड’ में अंचल विशेष के सजीव चित्र प्रस्तुत हुए हैं। इन उपन्यासों की रचना करके उपन्यासकारों ने भारत के विभिन्न अंचलों के जीवन-यथार्थ, आशा-आकांक्षा. संघर्ष-टूटन, राजनीतिक-सामाजिक पिछड़ेपन-जागृति आदि का चित्रण किया।

13 टिप्‍पणियां:

  1. वाह आज तो बहुत जानकारी मिली .आभार.

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  2. कोइ भी उपन्यासकार/कथाकार आपने नहीं छोड़ा, जिनकी कहानियों में आंचलिकता की सोंधी गंध बसी रहती है.. मैं तो धन्य हो गया रेणु और राही मासूम का ज़िक्र सुनकर!! आज भी फेनुगिलास और गम्कौवा जैसे शब्द कहीं नहीं मिलते..
    हाँ.. अगर कभी शायरी का ज़िक्र हो तो गुलज़ार साहब का ज़िक्र ज़रूर करेंगे जिन्होंने कई लफ़्ज़ों को एक नया मुकाम बख्शा!!

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  3. उपन्यास साहित्य को जानने का सम्पूर्ण माध्यम बन रहा है आपका ब्लॉग

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  4. इनमें से ज्यादातर उपन्यासों को पढ़ चुका हूँ. अच्छी जानकारी दी है।

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  5. प्रायः,आंचलिक रचनाकारों की चर्चा में रेणु के बाद कोई नाम बमुश्किल याद आता है। आपने इतने विस्तार से बताया।

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  6. मेरा बिना पानी पिए आज का उपवास है आप भी जाने क्यों मैंने यह व्रत किया है.

    दिल्ली पुलिस का कोई खाकी वर्दी वाला मेरे मृतक शरीर को न छूने की कोशिश भी न करें. मैं नहीं मानता कि-तुम मेरे मृतक शरीर को छूने के भी लायक हो.आप भी उपरोक्त पत्र पढ़कर जाने की क्यों नहीं हैं पुलिस के अधिकारी मेरे मृतक शरीर को छूने के लायक?

    मैं आपसे पत्र के माध्यम से वादा करता हूँ की अगर न्याय प्रक्रिया मेरा साथ देती है तब कम से कम 551लाख रूपये का राजस्व का सरकार को फायदा करवा सकता हूँ. मुझे किसी प्रकार का कोई ईनाम भी नहीं चाहिए.ऐसा ही एक पत्र दिल्ली के उच्च न्यायालय में लिखकर भेजा है. ज्यादा पढ़ने के लिए किल्क करके पढ़ें. मैं खाली हाथ आया और खाली हाथ लौट जाऊँगा.

    मैंने अपनी पत्नी व उसके परिजनों के साथ ही दिल्ली पुलिस और न्याय व्यवस्था के अत्याचारों के विरोध में 20 मई 2011 से अन्न का त्याग किया हुआ है और 20 जून 2011 से केवल जल पीकर 28 जुलाई तक जैन धर्म की तपस्या करूँगा.जिसके कारण मोबाईल और लैंडलाइन फोन भी बंद रहेंगे. 23 जून से मौन व्रत भी शुरू होगा. आप दुआ करें कि-मेरी तपस्या पूरी हो

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  7. आंचलिक उपन्यासों के बारे में संक्षिप्त एवं सटीक प्रस्तुति के लिए धन्यवाद। इस बार के पोस्ट में आपने किसी भी आंचलिक उपन्यासकारों की कृतियों को नही छोड़ा है। यह पोस्ट अपनी पूर्ण समग्रता में मुझे अच्छा लगा। "चलत मुशाफिर मोह लिया रे पिंजड़े वाली मुनिया" की बात ही निराली है। धन्यवाद।

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  8. अच्छा लगा जानकर आंचलिक उपन्यास साहित्य को
    आभार.

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  9. रेणु जी ने "फेनुगिलास" का प्रयोग किया है 'मारे गए गुलफ़ाम' में, बता सकेंगे ये क्या है?

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  10. रेणु जी ने "फेनुगिलास" का प्रयोग किया है 'मारे गए गुलफ़ाम' में, बता सकेंगे ये क्या है?

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