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गुरुवार, 2 अगस्त 2012

आधुनिक काल - भारतेन्दु हरिशचन्द्र

Anamika 7577 की प्रोफाइल फोटोआदरणीय गुणी जन  को   अनामिका का सादर नमन   ! लीजिये जी आज से करते हैं एक नयी शुरुआत.  आप सभी ज्ञानी गुरु साहित्यिक  अध्ययन करते हैं और जानते हैं कि  हिंदी के प्रथम कवि पुष्य माने गए हैं जिनका समय वि. सं. 770 के लगभग बताया गया है.  तब से अब तक हिंदी काव्य साहित्य का विभाजन कई कालों के रूप में जाना जाता है  जैसे अपभ्रंश या सिद्धकाल, वीरगाथा काल अर्थात आदि काल, भक्ति काल, रीति काल और अंत में आधुनिक काल जिसका आगाज़ हुआ 1900 में . तो हम बहुत पीछे न जा कर शुरू करते हैं वि. सं. 1900 के आधुनिक काल से. यह काल शुरू होता है इस सदी के महान नायक भारतेन्दु हरिशचंद्र जी  से. आइये चर्चा करते हैं आज भारतेन्दु उपाधि से भूषित भारतेन्दु हरिशचंद्र जी  की .



आधुनिक काल:भारतेन्दु  हरिशचन्द्र  
[ (जन्म स. 1907 (सन 1850 ई.) मृत्यु सं. 1941 (सन 1884 ई.)]


भारतेन्दु युग - भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना हो जाने से हिंदी कविता ने नयी मोड़ ली. रीतिकालीन परम्पराएँ विलीन होने लगीं. सन 1857 के विद्रोह ने राष्ट्रीयता की तीव्र लहर फैला दी. नये विचार, नयी शैली और नयी भाषा का आन्दोलन चल पड़ा. भारतेन्दु हरिशचन्द्र  नयी कविता के प्रवर्तक थे. उन्ही से हिंदी कविता का वर्तमान युग प्रारम्भ होता है.

जीवन वृत्त -
भारतेंदु हरिशचन्द्र इतिहास प्रसिद्द  सेठ अमीचंद के वंशजों में से हैं. इनका जन्म भाद्रपद शुक्ल 5 सं. 1907 को अर्थात 9 सितम्बर 1850 ई. सोमवार को हुआ. भारतेंदु हरिशचन्द्र के पिता गोपालचंद्र उपनाम गिरधर दास जी ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे और पांच वर्ष की अवस्था में ही भारतेंदु ने निम्नांकित दोहा बनाकर अपने पिता को सुनाया जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने आशीर्वाद दिया कि तू मेरे नाम को बढ़ाएगा -
लै ब्यौड़ा ठाढ़े भये, श्री अनिरुद्ध सुजान !
बानासुर की सैन को, हनन लगे बलवान !!


पांच वर्ष की अवस्था में भारतेंदु की माता का और दस  वर्ष की आयु में पिता का देहांत हो गया. अतः घर पर ही इनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई. इन्होने घर पर ही हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त की थी. पिता की मृत्यु के पश्चात इन्होने क्वींस कालेज में प्रवेश लिया, पर वहां इनका जी न लगा और कविता करने की ओर दिन-प्रतिदिन इनकी रूचि बढ़ने लगी, अतः अधिक दिनों तक अध्ययन न चल सका. 13   वर्ष की अवस्था में इनका विवाह लाला गुलाबराय की बेटी मंनोदेवी से हो गया और पन्द्रह वर्ष की अवस्था में इन्होने सपरिवार जगन्नाथ की यात्राएँ की.यह देशाटन के  अत्यंत प्रेमी थे और विभिन्न स्थानों की यात्राएं की थी.  इसका परिणाम यह हुआ कि यह मराठी, गुजराती, बंगला, और संस्कृत भाषाओं के ज्ञाता भी हो गए.


भारतेंदु जी एक यशस्वी साहित्यकार के साथ साथ समाज सेवक भी थे और इन्होने कई स्कूल, क्लब, सभा, पुस्तकालयों आदि की स्थापना की तथा कुछ परीक्षाएं भी नीयत की, जिनमे उत्तीर्ण होने पर यह स्वयं बालकों को पुरूस्कार दिया करते थे. काशी का हरिशचन्द्र कालेज भी इन्होने ही स्थापित किया था. यह विद्वानों और कवियों के आश्रयदाता तो थे ही पर अनाथों का भी बड़ा उपकार करते थे. इन्होने अपनी सारी संपत्ति अपनी उदारता के फलस्वरूप कुछ ही दिनों में पानी के सदृश बहा दी थी जिसके कारण अंत में इनका जीवन कष्टपूर्ण व्यतीत हुआ और इन्हें क्षय रोग हो गया.


यह हिंदी के प्रति बचपन से ही प्रेम रखते थे और इन्होने सर्वप्रथम 'कवि वचन सुधा' नामक मासिक पत्र प्रकाशित किया जो  की इनके अंत समय तक प्रकाशित होता रहा. साथ ही 'कविता वार्धिनी सभा' की भी स्थापना की जिसमे लेख आदि पढ़े जाते थे. इन्हें लिखने का  बड़ा व्यसन था और इनके मित्र इन्हें राईटिंग मशीन कहा करते थे. इनका स्वभाव अत्यंत सुन्दर था और यह हमेशा हंसमुख रहते थे. इनके सहयोग से कई नवीन विभूतियाँ हिंदी साहित्य जगत में आई और समकालीन साहित्य लेखकों में ये सर्वोपरि थे. संवत 1936 में इन्हें भारतेंदु की उपाधि दी गयी और मात्र कृष्ण 6, सं. 1941 में केवल 35 वर्ष की अवस्था में इनकी मृत्यु हो गयी.


काव्य सृजन
वस्तुतः प्राचीन और वर्तमान काल की युग संधि पर खड़े हुए भारतेंदु का काव्य अपना एक विशिष्ट महत्त्व रखता है. गोस्वामी तुलसीदास के उपरांत हिंदी साहित्य में वही एकमात्र कवि हैं जिन्होंने  प्रचलित समस्त शैलियों और विभिन्न  काव्य-भाषाओं का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है. इसीलिए प्रसाद जी ने उन्हें ही हिंदी साहित्य का प्रथम यथार्थवादी कवि माना है.


भारतेन्दु जी के काव्य को अध्ययन की सुविधा के लिए चार भागों में विभाजित किया जा सकता है -


1. भक्ति प्रधान रचनाएं -
भारतेन्दु जी ने अपनी अधिकाँश रचनाओं में राधा-कृष्ण के प्रगाढ़ प्रेम, प्रेम क्रीडाओं व रासलीला आदि का अत्यंत सुन्दर श्रृंगारिक चित्रण किया है. सूर और नंददास भक्त कवियों की भांति भारतेन्दु की भी यही अभिलाषा थी -
ब्रज के लता मोहि कीजै
गोपी पद पंकज पावन की राज जामें सिर भीजै


2. श्रृंगार विषयक रचनाये -
भारतेन्दु जी की काव्यगत विशेषता यह है कि उन्होंने रीतिकालीन वासनामूलक नग्न श्रृंगार का अश्लील पट सर्वदा के लिए बंद कर दिया और हृदय की गूढ़ अंतर्दशाओं का उदघाटन किया. प्रेम के संयोग, वियोग दोनों पक्षों का सफल व सरस चित्रण किया है.


3. देश भक्ति और राष्ट्रीयता सम्बन्धी रचनाएं -
यद्यपि भारतेन्दु जी ने कुछ ऐसी कवितायेँ लिखी जो उन्हें राज-भक्त के रूप में सिद्ध करती हैं. किन्तु सूक्षम दृष्टि से देखने पर उनकी कविताओं में उत्कृष्ट देश भक्ति और राष्ट्रीयता की झलक मिलती है. वास्तव में वह राष्ट्रीयता के मूल प्रवर्तक हैं क्यूंकि यह प्रथम कवि  हैं जिन्होंने भारत के प्राचीन इतिहास को कवि के रूप में निहारा और अतीत की गौरव गाथाओं को विस्मरण नहीं किया. 'प्रबोधिनी' में भारत दुर्दशा का हृदयस्पर्शी वर्णन करते हुए इन्होने कहा भी है -
रोबहू सब मिली के आबहु भारत भाई !
हा ! हा ! भारत दुर्दशा न देखि जाई !!


4. समाज सुधार सम्बन्धी समस्या प्रधान रचनाये -
भारतेन्दु जी समाज सुधारक थे. विविध सामजिक समस्याओं को अपने दृष्टिकोण से सुलझाने का प्रयास भी किया और सामजिक आन्दोलन भी चलाये. बाल-विवाह से हानि, जन्म-पत्री मिलने की अशास्त्र्ता, बालकों की शिक्षा, भ्रूण हत्या, फूट और बैर, स्वदेश प्रेम, हिन्दुस्तान की वस्तु हिन्दुस्तानियों के व्यवहार में लाना, धार्मिक पाखण्ड, अंधविश्वास आदि विषयों पर भारतेन्दु जी ने बहुत सी कवितायें लिखी.


कृतियाँ -
नाटक - साहित्य, धर्म, इतिहास आदि विषयों पर  लिखे इनके ग्रंथों की संख्या 238 है. सत्य हरिश्चंद्र, चन्द्रावली, भारत दुर्दशा, नीलदेवी, अंधेर नगरी, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, सती प्रताप और प्रेम-योगिनी  इनके उल्लेखनीय नाटक हैं.


निबन्ध - वैष्णवता और भारतवर्ष, ईश खृष्ट और ईश कृष्ण, अकबर, औरंगजेब मणिकणिका, लखनऊ, हिंदी भाषा, स्त्री सेवा पद्धति, जाति विवेकिनी सभा, स्वर्ग में विचार सभा, ग्रीष्म ऋतु, दिल्ली दरबार दर्पण, अंग्रेज-स्त्रोत आदि प्रसिद्द निबन्ध हैं.


काव्य ग्रन्थ - भक्ति-सर्वस्व, प्रेम मालिका, कार्तिकस्नान, वैशाख महात्म्य, प्रेम सरोवर, प्रेमाश्रु वर्षण, जन कुतूहल, प्रेम माधुरी, प्रेम तरंग उत्तरार्द्ध, भक्तमाल, प्रेमप्रलाप, गीत गोविंदानंद, सतसई श्रृंगार, होली, मधुमुकुल, राग संग्रह, वर्षाविनोद, विनय-प्रेम-पचीसी, फूलों का गुच्छा, प्रेम फुलवारी और कृष्ण चरित्र. इसके अलावा 70 छोटे छोटे प्रबंध काव्य व्  मुक्तक कविताओं का भी सृजन किया.


भारतेन्दु जी युग जागरण के दूत थे. उनमे जहाँ प्राचीन के प्रति मोह था, वहीँ नवीन के प्रति आकर्षण. अपनी कवित्व की प्रतिभा का उन्होंने सदुपयोग किया. उनकी इन सेवाओं के कारण ही देश ने उन्हें 'भारतेन्दु' की उपाधि से भूषित किया. वे थे भी भारत के चाँद . अनेक व्यसन रूप कलंक लिए हुए भी इस चन्द्र ने जिस दिव्य प्रकाश को प्रकीर्ण किया, वह अभी तक सम्पूर्ण हिंदी-साहित्य क्षितिज में छाया हुआ है. पर खेद है कि भारत का यह इंदु थोड़े ही समय तक अपना आलोक फैला सका और शीघ्र ही अस्त हो गया.

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

भारतेन्दु युग – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनके नाटक

नाटक साहित्य 4

भारतेन्दु युग

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनके नाटक

मनोज कुमार

हिंदी साहित्य का इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं, “जब भारतेंदु अपनी मंजी हुई परिष्कृत भाषा सामने लाए तब हिंदी बोलने वाली जनता को गद्य के लिए खड़ी बोली का प्रकृत साहित्यिक रूप मिल गया।” आ. शुक्ल की मान्यता है कि “साहित्य, शिक्षित जनता की प्रवृत्तियों का प्रतिफलन है।” यहां पर शिक्षित जनता से उनका मतलब उन पढ़े-लिखे चिंतक विद्वानों से है, जो अपने समाज की सांस्कृतिक, सामाजिक, वैयक्तिक और राजनीतिक-आर्थिक दशाओं के बारे में सोचने-विचारने की क्षमता रखते हैं। ऐसे लोग ही नये-नये जीवन मूल्यों को सुझा सकते हैं।

भारतेन्दु जी सही अर्थों में पूर्ण नाटककार थे। उन्होंने जब नाटक लिखना शुरु किया तब हिंदी नाट्य विधा संबंधी किसी तरह की सोच उपलब्ध नहीं थी। न ही हिंदी का अपना रंगमंच था। पारसी थियेटर की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन उन्हें हिंदी रंगमंच नहीं कहा जा सकता। डॉ. नगेन्द्र लिखते हैं,

“पारसी रंगमंच पर अभिनीत हिंदी के सस्ते नाटक सिनेमा आगमन के पूर्व हमारी अभिनय-दर्शन की भूख मिटाते रहे थे। ये नाटक सस्ती नीति (Cheap ethics) के बल पर समाज-सुधार, धर्म, राष्ट्रीयता आदि का उपदेश देते थे, परंतु इनका उद्देश्य व्यवसाय ही था। अतः अधिक से अधिक ये जनता की रुचि का प्रसादन कर सकते थे, उसका परिष्कार नहीं। ... फिर भी श्री नारायणप्रसाद बेताब और पं. राधेश्याम कथावाचक के नाटकों को हिंदी भूल नहीं सकती।

शुद्ध साहित्य के रूप में हिन्दी नाटक साहित्य का विकास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ही किया। डॉ. दशरथ ओझा बताते हैं,

“पारसी थियेट्रिकल कम्पनी की अर्थ लिप्सा ने नाट्य-कला को अपनी दासी बनाया और अर्थपिशाच के हाथों इस ललित कला की हत्या होने लगी। भारतेन्दु जी का सुसंस्कृत हृदय इस अत्याचार को सहन न कर सका। कालिदास की शकुन्तला को पारसी रंगमंच पर निकृष्ट वेश्या की तरह नृत्य करते देखकर उनको अत्यन्त क्लेश हुआ और अभिनय के योग्य उत्तम नाटक लिखने की प्रेरणा उनके हृदय का मन्थन करने लगी।

भारतेन्दु और भारतेन्दु मंडल के नाटककारों का लक्ष्य समाज-सुधार और सांस्कृतिक पुनरुत्थान था। इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने समाज के यथार्थ का चित्रण नाटकों में किया। उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त बुराइयों, कुरीतियों, विकृतियों, अंधविश्वासों को देखा और उसे उसी रूप में प्रस्तुत भी किया। ‘कविवचन सुधा’ में समय-समय पर लिखे उनके लेख इसी का लेखा-जोखा है। लेकिन वे सिर्फ़ सैद्धांतिक यथार्थवादी नहीं थे। वे व्यावहारिक थे। उन्होंने बुराइयों की पहचान कर उसका यथार्थ चित्रण किया और उसके द्वारा भारतीय चिंतन के सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों को अपनाकर सुधार करने के लिए प्रेरित करना अपना लक्ष्य बनाया।

भारतेन्दु ने जो राजनीतिक चेतना और सामाजिक पुनरुत्थान का जो अलख जगाया उससे लोग अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुए। भारतेन्दु युग में भारत गुलाम था। समाज तरह-तरह की रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था। लोगों की आस्था और विश्वास खोखली होती जा रही थी। जातिप्रथा, धार्मिक अंधविश्वास ने समाज को पतनशील बना दिया था। एक रचनाकार का हृदय यह सब देख व्याकुल हो उठा। यथार्थबोध के इस नाटककार ने तत्कालीन परिस्थितियों के चित्रण के माध्यम से सुधार का बीड़ा उठाया। “अंधेर नगरी” हो या “भारत दुर्दशा” या फिर “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति”, इनके माध्यम से उनके सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना प्रकट हुई है। उन्होंने लोगों में देशभाक्ति की चेतना को जगाया। यह चेतना सामाजिक नव जागरण की चेतना में रूपांतरित हुई। 1857 की क्रांति असफल हो चुकी थी। जनमानस में निराशा व्याप्त थी। एक प्रकार की शिथिलता व्याप्त थी। भारतेन्दु के नाटकों ने और उसके अभिनय ने वातावरण में नया उत्साह भरा, नया जोश पैदा किया। नाटकों में अतीत के गौरवपूर्ण अध्यायों को देख कर और आज़ादी के महत्व को समझ कर लोगों में आत्मविश्वास और स्वाभिमान का भाव जगा।

हालकि नाटक के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का उदय करना और सांस्कृतिक जागरण उनके नाटक साहित्य रचने का उद्देश्य था, लेकिन वे मनोरंजन के विरोधी नहीं थे। न ही हास्य को हल्की-फुल्की नगण्य चीज़ मानते थे। मनोरंजन तो हो ही, साथ ही साथ नाटक के दर्शक को शिक्षा देना भी उनका लक्ष्य था। बड़ी से बड़ी समस्या को हास्य और तीखे व्यंग्य से कहकर वे नाटक की मंचीय प्रकृति को उजागर करते हैं। उन्होंने नाटक-लेखन को नवजागरण से जोड़ा। उनका मानना था कि नाटकों के प्रदर्शन के माध्यम से समाज सुधार का आंदोलन अधिक प्रभावी हो सकता है। समाज को उसके यथार्थ को दिखा कर अधिक झकझोरा जा सकता है। उनकी जो दशा है उसे सुधारने के लिए उनको प्रेरित किया जा सकता है। इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखकर उन्होंने धार्मिक,सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि प्रश्नों को अपने प्रहसन नाटकों के द्वारा न सिर्फ़ सामने लाने का प्रयास किया बल्कि समाज के पुनरुत्थान का समाधान भी प्रस्तुत किया।

भारतेन्दु जी ने आंदोलन की तरह नाट्यविद्या को लिया। उन्होंने नाटक लिखे, अनूदित किए, लिखवाए, उनकी समीक्षाएं प्रकाशित कीं, नाट्य मंडलियां बनाईं, जगह-जगह नाट्य-प्रदर्शन किये। कवितावर्धिनी सभा का निर्माण किया। पेनी रीडिंग क्लब की योजना बनाई। अपने संरक्षण में काशी में “नेशनल थियेटर” की स्थापना की। उनके मंडल के लेखकों ने काशी, प्रयाग, बिहार आदि अनेक नाट्य मंडलियां स्थापित कीं। नाटक संबंधी विस्तृत लेख लिखकर उन्होंने नाटक के बारे में अपने विचार प्रस्तुत किए। इसमें उन्होंने नाट्यशास्त्र, साहित्य दर्पण, काव्य प्रकाश आदि प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के आधार पर नाटक के विभिन्न पहलुओं पर विवेचना की।

उन्होंने हिंदी की अपनी नाट्य परंपरा, नाट्य शिल्प और रंगमंच के विकास के लिए संघर्ष किया। उन्होंने अपनी मौलिकता और चिन्तन को “नाटक” निबन्ध और नाट्य लेखन में प्रस्तुत किया। वे हिंदी की अपनी रंग-दृष्टि और नाट्य परंपरा का विकास करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने जहां एक ओर प्राचीन संस्कृत नाट्य परंपरा से सीखा, तो दूसरी ओर लोक नाटकों की परंपरा को भी अंगीकार किया। साथ ही उनका नाट्य चिंतन पश्चिम की नाट्य परंपरा से भी प्रेरित था। इसलिए हम कह सकते हैं कि भारतेन्दु जी की नाट्य-दृष्टि भारतीय और आधुनिक है, रूढ़िबद्ध नहीं।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र रचित नाटक

मौलिक अनुदित नाट्य रचनाएं

१. रत्नावली (1868), संस्कृत से अनुवाद

२. विद्या सुन्दर (1868), बंगला से छायानुवाद

३. पाखंड विडम्बन (1872) कृष्ण मिश्र रचित प्रबोध चन्द्रोदय के तृतीय अंक का अनुवाद

४. धनंजय विजय (1873), कांचन कवि के संस्कृत नाटक का अनुवाद।

५. वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (1873),

६. प्रेमयोगिनी (1875),

७. सत्यहरिश्चन्द्र (1875),

८. कर्पूर मंजरी (1875), प्राकृत में राजशेखर रचित  सट्टक का अनुवाद

९. विषस्य विषमौषधम्‌ (1876),

१०. चन्द्रावली (1876),

११. मुद्रा राक्षस (1878), संस्कृत के विख्यात नाटककार विशाखदत्त के मुद्राराक्षस का अनुवाद

१२. दुर्लभ बन्धु (1880) शेक्सपियर के नाटक ‘मर्चेण्ट आफ वेनिस’ का अनुवाद।

१३. भारत दुर्दशा (1880),

१४. अंधेर नगरी (1881)

१५. नील देवी (1881), गीति रूपक

१६. भारत जननी (1877), बंगला नाटक ‘भारतमाता’ का भारतेन्दु जी के मित्र ने अनुवाद किया था जिसे उन्होंने संशोधित किया। चूंकि संशिधित नाटक का सम्पूर्ण रूप ही बदल गया था, इसलिए उसने अपना नाम इसके मुख्य पृष्ठ पर देना उचित नहीं समझा। कुछ विद्वान इसे भारतेन्दु जी की मौलिक रचना मानते हैं।

१७. सती प्रताप (1884)

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रविवार, 17 जुलाई 2011

हिन्दी नाटक का प्रारंभ-2

नाटक साहित्य

हिन्दी नाटक का प्रारंभ-2

vcm_s_kf_repr_640x480मनोज कुमार

लिंक : हिन्दी नाटक का प्रारंभ-1

हमारे यहां भारतीय नाट्यकला की बहुत लम्बी और समृद्ध परंपरा मिलती है लेकिन हिंदी में आधुनिक युग के पहले नाटक की परंपरा लगभग अनुपस्थित थी। हिन्दी साहित्य में नाटक साहित्य 19 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक उपलब्ध नहीं होते। नेमिचन्द्र जैन कहते हैं,

“संस्कृत नाटक के स्वर्णयुग के बाद हमारी रंग-परंपरा विच्छिन्न हो गयी। उसके बाद प्रायः एक हज़ार वर्ष तक आधुनिक भाषाओं में नाटक बहुत ही कम लिखे गए और जो इक्का-दुक्का प्रयत्न हुए भी वे संस्कृत नाटकों की अनुकृति मात्र थे और उनका किसी रंग-प्रयोग से कोई सम्बन्ध नहीं था।”

नेमिचन्द्र जैन जी का यह भी कहना है,

“अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में, देश की बहुत-सी भाषाओं में कुछ-कुछ नाटक लिखे जाने लगे। पर अपने देश की नाट्य-परंपरा से जीवन्त और गहरे सम्पर्क के अभाव में नाटक को या तो सृजनात्मक साहित्य से अलग मनोरंजन का कार्य समझा गया, या फिर शैक्षिक क्षेत्रों में वह बहुत-कुछ एक निरा साहित्य-रूप गिना जाने लगा।”

हालाकि हिन्दी नाटक का उदय भारतेन्दु युग से पहले हो चुका था और कुछ छिटपुट नाटक लिखे भी गए थे, कुछ ब्रजभाषा में कुछ खड़ी बोली में। कम से कम दर्जनभर ऐसी कृतियां हैं जिन्हें हिन्दी भाषा का नाटक कहा गया है। जोधपुर नरेश जसवन्त सिंह द्वारा लगभग 1643 में लिखा गया “प्रबोध चन्द्रोदय”, “हनुमन्नाटक” और अभिज्ञान शाकुन्तलम्‌” आदि संस्कृत नाटकों के अनुवाद हैं। प्राणचन्द चौहान कृत “रामायण महानाटक” (1610), कृष्णजीवन लछीराम कृत “करुणाभरण” (1657), नेवाज कृत “शकुंतला” (1680), महाराज विश्वनाथ सिंह कृत “आनन्द रघुनन्दन” (1700), रघुराय नागर कृत “सभासार” (1700), उदय कृत “रामकरुणाकर” और “हनुमान नाटक” (1840), अमानत कृत “इंदरसभा” (1853), गणेश कवि कृत “प्रद्युम्न विजय” (1863), आदि का उल्लेख मिलता है, लेकिन वे नाटक हैं ही नहीं। ये पद्यात्मक प्रबंध हैं।

इनके अलावा और भी ग्रन्थ हैं, जैसे केशवदास कृत “विज्ञान गीता”, बनारीदास कृत “समय सार”, गुरु गोविन्द सिंह कृत “चण्डी चरित्र”, आनंद कृत “नाटका नन्द”, लाल झा कृत “गोरी परिणय”, हरिराम कृत “जानकीराम चरित्र”, भानु झा कृत “प्राभावती हरण”, हर्षनाथ झा कृत “उषा हरण” जिनमे संवाद योजना देखने को मिलते हैं।

इस काल में पुरानी कहानी के (इतिवृत्त्मूलक) संवादात्मक काव्य को ही नाटक कहा जाने लगा। चूंकि इनमें नाटकीय संवाद योजना है इसलिए इन्हें नाटक मान लिया गया।

गद्य रचना के अंतर्गत भारतेंदु जी ने अपने “नाटक” नाम की पुस्तक में लिखा है कि हिन्दी में मौलिक नाटक उनके पहले दो ही लिखे गए थे -- रीवां नरेश महाराज विश्वनाथ सिंह (1661-1740) का लगभग 1700 में लिखा हुआ “आनन्द रघुनन्दन” और भारतेन्दु जी के पिता गोपालचन्द्र गिरिधरदास का 1857 में लिखा हुआ “नहुष नाटक”। ये दोनों ही ब्रजभाषा में थे। इनमें नाटक को मंच पर पेश किये जाने योग्य बनाने, उसके अनुरूप भाषा और शिल्प का निर्माण करने की कोशिश मिलती है।

भारतेन्दु जी ने अपने “नाटक” नामक ग्रन्थ में देवमाया प्रपंच, प्रभावती और आनन्द रघुनन्दन को सर्वप्रथम नाटक-रीति पर विरचित नाटक माना है। बाबू गुलाब राय ने “हिन्दी नाट्य-विमर्श” और बाबू ब्रजरत्नदास ने “हिन्दी नाट्य साहित्य” में चर्चा करते हुए कहा है कि “आनन्द रघुनन्दन” ही हिन्दी का सर्वप्रथम नाटक है। यह ऐसी रचना है जिसमें शास्त्रीय नियमों के अनुसार नान्दी, विष्कम्भक, भरतवाक्य आदि का प्रयोग किया गया है। यह संस्कृत की नाटक शैली से बहुत प्रभावित है। रंगमंच के संकेत भी इसमें संस्कृत में ही दिए गए हैं। हास्य के लिए विदूषक की योजना की गई है। इसका नायक राम हैं और खलनायक रावण। विश्वनाथ जी ने यह नाटक नये दृष्टिकोण से लिखा। एक और विशेषता इसकी यह है कि विश्वनाथ जी ने सबसे पहले मौलिक नाटकों में ब्रजभाषा की गद्य-शैली का प्रयोग मुख्य पात्रों से कराया है। गीत और छन्द की अधिकता के कारण इसकी गति बहुत धीमी है। हालाकि कला की कसौटी पर यह सफल नाटक की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता हो, फिर भी भारतेन्दु हरिश्चंद्र के अलावा अन्य कई विद्वानों ने इसे हिन्दी नाटकों का पहला नाटक कहलाने का श्रेय दिया है। डॉ. दशरथ ओझा का मानना है,

“विश्वनाथ जी के इस नाटक ने हिन्दी नाटकों में ऐसी क्रांति पैदा कर दी, जिसकी अत्यंत आवश्यकता थी।

“नहुष नाटक” (1857) लुप्तप्राय हो गया था। “कवि वचन सुधा” पत्रिका के पहले साल के पहले अंक में इस नाटक का पहला अंक छपा था। डॉ. दशरथ ओझा बताते हैं,

“कांकरौली में इसकी एक हस्तलिखित प्रति मिल गई है। इस प्रति में नाटक में प्रस्तावना तथा छः अंक हैं। इसकी कथावस्तु महाभारत के उद्योग तथा अनुशासन पर्वों के आधार पर निर्मित है।”

इस नाटक में यह विलक्षण पद्धति पाई जाती है कि पात्र के प्रवेश के साथ उसके परिचय के रूप में एक कविता दे दी गई है। नाट्क में नान्दी, सूत्रधार, प्रस्तावना का समावेश आनन्द-रघुनन्दन के समान ही मिलता है।

पं. शीतला प्रसाद त्रिपाठी कृत “जानकीमंगल” (1868) नाट्य गुणों से युक्त है। इसकी रचना अभिनय के लिए ही की गई होगी। इसमें परिमार्जित खड़ी बोली का भी उपयोग हुआ है। उन दिनों रामलीला और रास लीला भी काफ़ी लोकप्रिय थे। रामलीला की लोकप्रियता का बहुत अच्छा उदाहरण यह नाटक है। इसके अभिनय में भारतेन्दु ने भी भाग लिया था।

अमानत की “इन्दरसभा” का स्वरूप भी उस समय के इतिहास, नाटक और रंगमंच की देन था। उसके संगीत, नृत्य, भाव, रस, गतियों – प्रकारों और लचीले शिल्प ने एक मौलिक पहचान बनाई।

इन नाटकों में हालाकि नाटक-रचना की शास्त्रीय विधियों को अपनाया गया है, फिर भी आगे के हिंदी नाट्य-लेखन को इनसे कोई सार्थक दिशा नहीं मिलती है। नाट्य-वस्तु और शैली शिल्प की दृष्टि से हिंदी नाटक के आधुनिक मौलिक स्वरूप का विकास भारतेंदु जी के नाटक अभिनय में ही देखने को मिलता है। आधुनिक हिंदी नाटक और रंगमंच का यह एक सर्वमान्य और ऐतिहासिक सत्य है कि पारसी व्यावसायिक थियेटर की प्रतिक्रियास्वरूप हिंदी में सुरुचिपूर्ण एवं गम्भीर अव्यावसायिक रंगमंच की स्थापना और उसके विकास में भारतेंदु हरिश्चन्द्र के रचनात्मक प्रयासों का बुनियादी महत्व रहा है।

हिंदी के संबंध में एक विचित्र बात यह है कि इसके नवयुग का उत्थान नाटक से ही हुआ है। श्री हरिश्चंद्र ने जिस काल में अपनी प्रतिभा से और परिश्रम से हिंदी की उन्नति की उस काल के साहित्य से नाटकों को अलग कर देने बचता ही क्या है? आ. रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं,

“विलक्षण बात यह है कि आधुनिक गद्य साहित्य की परंपरा का प्रवर्तन नाटकों से हुआ।”

भारतेन्दु जी से ही हिन्दी के आधुनिक युग की शुरुआत होती है। आधुनिक हिन्दी गद्य के जन्मदाता वही हैं। हिन्दी नाटकों का जन्मदाता भी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को ही माना जाता है। भारतेन्दु जी ने जब नाटक लिखना शुरु किया था, तब हिन्दी में न तो नाटक लिखे जाते थे और न ही रंगमंच उपलब्ध था। लेकिन भारतीय, पाश्चात्य, लोक आदि परंपराओं का उन्हें ज्ञान था। वह हिन्दी के प्रथम समर्थ नाटककार हैं।

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संदर्भ ग्रंथ

१. हिन्दी साहित्य का इतिहास – सं. डॉ. नगेन्द्र, सह सं. डॉ. हरदयाल २. डॉ. नगेन्द्र ग्रंथावली – खंड ९ ३. हिन्दी साहित्य उद्भव और विकास – हजारीप्रसाद द्विवेदी ४. हिन्दी साहित्य का इतिहास – डॉ. श्यम चन्द्र कपूर ५. हिन्दी साहित्य का इतिहास – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ६. मोहन राकेश, रंग-शिल्प और प्रदर्शन – डॉ. जयदेव तनेजा ७. हिन्दी नाटक : उद्भव और विकास – डॉ. दशरथ ओझा ८. रंग दर्शन – नेमिचन्द्र जैन ९. कोणार्क – जगदीश चन्द्र माथुर जयशंकर प्रसाद : रंगदृष्टि नाटक के लिए रंगमंच – महेश आनंद