भारतेन्दु युग - भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना हो जाने से हिंदी कविता ने नयी मोड़ ली. रीतिकालीन परम्पराएँ विलीन होने लगीं. सन 1857 के विद्रोह ने राष्ट्रीयता की तीव्र लहर फैला दी. नये विचार, नयी शैली और नयी भाषा का आन्दोलन चल पड़ा. भारतेन्दु हरिशचन्द्र नयी कविता के प्रवर्तक थे. उन्ही से हिंदी कविता का वर्तमान युग प्रारम्भ होता है.
पांच वर्ष की अवस्था में भारतेंदु की माता का और दस वर्ष की आयु में पिता का देहांत हो गया. अतः घर पर ही इनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई. इन्होने घर पर ही हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त की थी. पिता की मृत्यु के पश्चात इन्होने क्वींस कालेज में प्रवेश लिया, पर वहां इनका जी न लगा और कविता करने की ओर दिन-प्रतिदिन इनकी रूचि बढ़ने लगी, अतः अधिक दिनों तक अध्ययन न चल सका. 13 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह लाला गुलाबराय की बेटी मंनोदेवी से हो गया और पन्द्रह वर्ष की अवस्था में इन्होने सपरिवार जगन्नाथ की यात्राएँ की.यह देशाटन के अत्यंत प्रेमी थे और विभिन्न स्थानों की यात्राएं की थी. इसका परिणाम यह हुआ कि यह मराठी, गुजराती, बंगला, और संस्कृत भाषाओं के ज्ञाता भी हो गए.
भारतेंदु जी एक यशस्वी साहित्यकार के साथ साथ समाज सेवक भी थे और इन्होने कई स्कूल, क्लब, सभा, पुस्तकालयों आदि की स्थापना की तथा कुछ परीक्षाएं भी नीयत की, जिनमे उत्तीर्ण होने पर यह स्वयं बालकों को पुरूस्कार दिया करते थे. काशी का हरिशचन्द्र कालेज भी इन्होने ही स्थापित किया था. यह विद्वानों और कवियों के आश्रयदाता तो थे ही पर अनाथों का भी बड़ा उपकार करते थे. इन्होने अपनी सारी संपत्ति अपनी उदारता के फलस्वरूप कुछ ही दिनों में पानी के सदृश बहा दी थी जिसके कारण अंत में इनका जीवन कष्टपूर्ण व्यतीत हुआ और इन्हें क्षय रोग हो गया.
यह हिंदी के प्रति बचपन से ही प्रेम रखते थे और इन्होने सर्वप्रथम 'कवि वचन सुधा' नामक मासिक पत्र प्रकाशित किया जो की इनके अंत समय तक प्रकाशित होता रहा. साथ ही 'कविता वार्धिनी सभा' की भी स्थापना की जिसमे लेख आदि पढ़े जाते थे. इन्हें लिखने का बड़ा व्यसन था और इनके मित्र इन्हें राईटिंग मशीन कहा करते थे. इनका स्वभाव अत्यंत सुन्दर था और यह हमेशा हंसमुख रहते थे. इनके सहयोग से कई नवीन विभूतियाँ हिंदी साहित्य जगत में आई और समकालीन साहित्य लेखकों में ये सर्वोपरि थे. संवत 1936 में इन्हें भारतेंदु की उपाधि दी गयी और मात्र कृष्ण 6, सं. 1941 में केवल 35 वर्ष की अवस्था में इनकी मृत्यु हो गयी.
काव्य सृजन
भारतेन्दु जी के काव्य को अध्ययन की सुविधा के लिए चार भागों में विभाजित किया जा सकता है -
1. भक्ति प्रधान रचनाएं -
2. श्रृंगार विषयक रचनाये -
3. देश भक्ति और राष्ट्रीयता सम्बन्धी रचनाएं -
4. समाज सुधार सम्बन्धी समस्या प्रधान रचनाये -
कृतियाँ -
निबन्ध - वैष्णवता और भारतवर्ष, ईश खृष्ट और ईश कृष्ण, अकबर, औरंगजेब मणिकणिका, लखनऊ, हिंदी भाषा, स्त्री सेवा पद्धति, जाति विवेकिनी सभा, स्वर्ग में विचार सभा, ग्रीष्म ऋतु, दिल्ली दरबार दर्पण, अंग्रेज-स्त्रोत आदि प्रसिद्द निबन्ध हैं.
काव्य ग्रन्थ - भक्ति-सर्वस्व, प्रेम मालिका, कार्तिकस्नान, वैशाख महात्म्य, प्रेम सरोवर, प्रेमाश्रु वर्षण, जन कुतूहल, प्रेम माधुरी, प्रेम तरंग उत्तरार्द्ध, भक्तमाल, प्रेमप्रलाप, गीत गोविंदानंद, सतसई श्रृंगार, होली, मधुमुकुल, राग संग्रह, वर्षाविनोद, विनय-प्रेम-पचीसी, फूलों का गुच्छा, प्रेम फुलवारी और कृष्ण चरित्र. इसके अलावा 70 छोटे छोटे प्रबंध काव्य व् मुक्तक कविताओं का भी सृजन किया.
भारतेन्दु जी युग जागरण के दूत थे. उनमे जहाँ प्राचीन के प्रति मोह था, वहीँ नवीन के प्रति आकर्षण. अपनी कवित्व की प्रतिभा का उन्होंने सदुपयोग किया. उनकी इन सेवाओं के कारण ही देश ने उन्हें 'भारतेन्दु' की उपाधि से भूषित किया. वे थे भी भारत के चाँद . अनेक व्यसन रूप कलंक लिए हुए भी इस चन्द्र ने जिस दिव्य प्रकाश को प्रकीर्ण किया, वह अभी तक सम्पूर्ण हिंदी-साहित्य क्षितिज में छाया हुआ है. पर खेद है कि भारत का यह इंदु थोड़े ही समय तक अपना आलोक फैला सका और शीघ्र ही अस्त हो गया.