शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

भारतेन्दु युग – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनके नाटक

नाटक साहित्य 4

भारतेन्दु युग

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनके नाटक

मनोज कुमार

हिंदी साहित्य का इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं, “जब भारतेंदु अपनी मंजी हुई परिष्कृत भाषा सामने लाए तब हिंदी बोलने वाली जनता को गद्य के लिए खड़ी बोली का प्रकृत साहित्यिक रूप मिल गया।” आ. शुक्ल की मान्यता है कि “साहित्य, शिक्षित जनता की प्रवृत्तियों का प्रतिफलन है।” यहां पर शिक्षित जनता से उनका मतलब उन पढ़े-लिखे चिंतक विद्वानों से है, जो अपने समाज की सांस्कृतिक, सामाजिक, वैयक्तिक और राजनीतिक-आर्थिक दशाओं के बारे में सोचने-विचारने की क्षमता रखते हैं। ऐसे लोग ही नये-नये जीवन मूल्यों को सुझा सकते हैं।

भारतेन्दु जी सही अर्थों में पूर्ण नाटककार थे। उन्होंने जब नाटक लिखना शुरु किया तब हिंदी नाट्य विधा संबंधी किसी तरह की सोच उपलब्ध नहीं थी। न ही हिंदी का अपना रंगमंच था। पारसी थियेटर की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन उन्हें हिंदी रंगमंच नहीं कहा जा सकता। डॉ. नगेन्द्र लिखते हैं,

“पारसी रंगमंच पर अभिनीत हिंदी के सस्ते नाटक सिनेमा आगमन के पूर्व हमारी अभिनय-दर्शन की भूख मिटाते रहे थे। ये नाटक सस्ती नीति (Cheap ethics) के बल पर समाज-सुधार, धर्म, राष्ट्रीयता आदि का उपदेश देते थे, परंतु इनका उद्देश्य व्यवसाय ही था। अतः अधिक से अधिक ये जनता की रुचि का प्रसादन कर सकते थे, उसका परिष्कार नहीं। ... फिर भी श्री नारायणप्रसाद बेताब और पं. राधेश्याम कथावाचक के नाटकों को हिंदी भूल नहीं सकती।

शुद्ध साहित्य के रूप में हिन्दी नाटक साहित्य का विकास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ही किया। डॉ. दशरथ ओझा बताते हैं,

“पारसी थियेट्रिकल कम्पनी की अर्थ लिप्सा ने नाट्य-कला को अपनी दासी बनाया और अर्थपिशाच के हाथों इस ललित कला की हत्या होने लगी। भारतेन्दु जी का सुसंस्कृत हृदय इस अत्याचार को सहन न कर सका। कालिदास की शकुन्तला को पारसी रंगमंच पर निकृष्ट वेश्या की तरह नृत्य करते देखकर उनको अत्यन्त क्लेश हुआ और अभिनय के योग्य उत्तम नाटक लिखने की प्रेरणा उनके हृदय का मन्थन करने लगी।

भारतेन्दु और भारतेन्दु मंडल के नाटककारों का लक्ष्य समाज-सुधार और सांस्कृतिक पुनरुत्थान था। इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने समाज के यथार्थ का चित्रण नाटकों में किया। उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त बुराइयों, कुरीतियों, विकृतियों, अंधविश्वासों को देखा और उसे उसी रूप में प्रस्तुत भी किया। ‘कविवचन सुधा’ में समय-समय पर लिखे उनके लेख इसी का लेखा-जोखा है। लेकिन वे सिर्फ़ सैद्धांतिक यथार्थवादी नहीं थे। वे व्यावहारिक थे। उन्होंने बुराइयों की पहचान कर उसका यथार्थ चित्रण किया और उसके द्वारा भारतीय चिंतन के सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों को अपनाकर सुधार करने के लिए प्रेरित करना अपना लक्ष्य बनाया।

भारतेन्दु ने जो राजनीतिक चेतना और सामाजिक पुनरुत्थान का जो अलख जगाया उससे लोग अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुए। भारतेन्दु युग में भारत गुलाम था। समाज तरह-तरह की रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था। लोगों की आस्था और विश्वास खोखली होती जा रही थी। जातिप्रथा, धार्मिक अंधविश्वास ने समाज को पतनशील बना दिया था। एक रचनाकार का हृदय यह सब देख व्याकुल हो उठा। यथार्थबोध के इस नाटककार ने तत्कालीन परिस्थितियों के चित्रण के माध्यम से सुधार का बीड़ा उठाया। “अंधेर नगरी” हो या “भारत दुर्दशा” या फिर “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति”, इनके माध्यम से उनके सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना प्रकट हुई है। उन्होंने लोगों में देशभाक्ति की चेतना को जगाया। यह चेतना सामाजिक नव जागरण की चेतना में रूपांतरित हुई। 1857 की क्रांति असफल हो चुकी थी। जनमानस में निराशा व्याप्त थी। एक प्रकार की शिथिलता व्याप्त थी। भारतेन्दु के नाटकों ने और उसके अभिनय ने वातावरण में नया उत्साह भरा, नया जोश पैदा किया। नाटकों में अतीत के गौरवपूर्ण अध्यायों को देख कर और आज़ादी के महत्व को समझ कर लोगों में आत्मविश्वास और स्वाभिमान का भाव जगा।

हालकि नाटक के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का उदय करना और सांस्कृतिक जागरण उनके नाटक साहित्य रचने का उद्देश्य था, लेकिन वे मनोरंजन के विरोधी नहीं थे। न ही हास्य को हल्की-फुल्की नगण्य चीज़ मानते थे। मनोरंजन तो हो ही, साथ ही साथ नाटक के दर्शक को शिक्षा देना भी उनका लक्ष्य था। बड़ी से बड़ी समस्या को हास्य और तीखे व्यंग्य से कहकर वे नाटक की मंचीय प्रकृति को उजागर करते हैं। उन्होंने नाटक-लेखन को नवजागरण से जोड़ा। उनका मानना था कि नाटकों के प्रदर्शन के माध्यम से समाज सुधार का आंदोलन अधिक प्रभावी हो सकता है। समाज को उसके यथार्थ को दिखा कर अधिक झकझोरा जा सकता है। उनकी जो दशा है उसे सुधारने के लिए उनको प्रेरित किया जा सकता है। इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखकर उन्होंने धार्मिक,सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि प्रश्नों को अपने प्रहसन नाटकों के द्वारा न सिर्फ़ सामने लाने का प्रयास किया बल्कि समाज के पुनरुत्थान का समाधान भी प्रस्तुत किया।

भारतेन्दु जी ने आंदोलन की तरह नाट्यविद्या को लिया। उन्होंने नाटक लिखे, अनूदित किए, लिखवाए, उनकी समीक्षाएं प्रकाशित कीं, नाट्य मंडलियां बनाईं, जगह-जगह नाट्य-प्रदर्शन किये। कवितावर्धिनी सभा का निर्माण किया। पेनी रीडिंग क्लब की योजना बनाई। अपने संरक्षण में काशी में “नेशनल थियेटर” की स्थापना की। उनके मंडल के लेखकों ने काशी, प्रयाग, बिहार आदि अनेक नाट्य मंडलियां स्थापित कीं। नाटक संबंधी विस्तृत लेख लिखकर उन्होंने नाटक के बारे में अपने विचार प्रस्तुत किए। इसमें उन्होंने नाट्यशास्त्र, साहित्य दर्पण, काव्य प्रकाश आदि प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के आधार पर नाटक के विभिन्न पहलुओं पर विवेचना की।

उन्होंने हिंदी की अपनी नाट्य परंपरा, नाट्य शिल्प और रंगमंच के विकास के लिए संघर्ष किया। उन्होंने अपनी मौलिकता और चिन्तन को “नाटक” निबन्ध और नाट्य लेखन में प्रस्तुत किया। वे हिंदी की अपनी रंग-दृष्टि और नाट्य परंपरा का विकास करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने जहां एक ओर प्राचीन संस्कृत नाट्य परंपरा से सीखा, तो दूसरी ओर लोक नाटकों की परंपरा को भी अंगीकार किया। साथ ही उनका नाट्य चिंतन पश्चिम की नाट्य परंपरा से भी प्रेरित था। इसलिए हम कह सकते हैं कि भारतेन्दु जी की नाट्य-दृष्टि भारतीय और आधुनिक है, रूढ़िबद्ध नहीं।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र रचित नाटक

मौलिक अनुदित नाट्य रचनाएं

१. रत्नावली (1868), संस्कृत से अनुवाद

२. विद्या सुन्दर (1868), बंगला से छायानुवाद

३. पाखंड विडम्बन (1872) कृष्ण मिश्र रचित प्रबोध चन्द्रोदय के तृतीय अंक का अनुवाद

४. धनंजय विजय (1873), कांचन कवि के संस्कृत नाटक का अनुवाद।

५. वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (1873),

६. प्रेमयोगिनी (1875),

७. सत्यहरिश्चन्द्र (1875),

८. कर्पूर मंजरी (1875), प्राकृत में राजशेखर रचित  सट्टक का अनुवाद

९. विषस्य विषमौषधम्‌ (1876),

१०. चन्द्रावली (1876),

११. मुद्रा राक्षस (1878), संस्कृत के विख्यात नाटककार विशाखदत्त के मुद्राराक्षस का अनुवाद

१२. दुर्लभ बन्धु (1880) शेक्सपियर के नाटक ‘मर्चेण्ट आफ वेनिस’ का अनुवाद।

१३. भारत दुर्दशा (1880),

१४. अंधेर नगरी (1881)

१५. नील देवी (1881), गीति रूपक

१६. भारत जननी (1877), बंगला नाटक ‘भारतमाता’ का भारतेन्दु जी के मित्र ने अनुवाद किया था जिसे उन्होंने संशोधित किया। चूंकि संशिधित नाटक का सम्पूर्ण रूप ही बदल गया था, इसलिए उसने अपना नाम इसके मुख्य पृष्ठ पर देना उचित नहीं समझा। कुछ विद्वान इसे भारतेन्दु जी की मौलिक रचना मानते हैं।

१७. सती प्रताप (1884)

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12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी जानकारी। धन्यवाद।

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  2. भारतेंदु जी की सोच से परिचित कराने के लिए आभार .

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  3. अंधेर नगरी और भारत दुर्दशा को यदि इन दिनों मंचित किया जाए,तो पहले से अधिक भीड़ जुटेगी।

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  4. दिनांक गलत होने के कारण फिर से सूचित कर रही हूँ ---


    आज 22- 07- 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


    ...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
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  5. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला सुन्दर पोस्ट |
    बहुत - बहुत शुक्रिया |

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  6. भारतेंदु जी का यह मत बहुत गहरे जाकर मेरे अंतस में बैठा है कि साहित्य का उद्देश्य केवल रंजन नहीं नवनिर्माण / लोकमंगल अवश्य ही होना चाहिए..

    इस कसौटी पर कसा साहित्य ही कालजयी हो सकता है...

    आभार आपका इस सुन्दर पोस्ट के लिए...

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  7. भारतेंदु और उनके नाटकों के बारे में प्रस्तुत जानकारी संग्रहणीय है। नाट्य-विधा की शुरूआत एवं खड़ी बोली के वास्तविक विकास का श्रेय भारतेंदु जी को ही जाता है। भारतेंदु जी के संबंध में आचार्य रामचंद्र शुक्ल एवं डॉ नगेंद्र जी के विचारों का उल्लेख इस पोस्ट को हर मानकों पर समीचीन बनाने में सार्थक सिद्ध हुआ है। मेरा विश्वास है कि अन्य संकायों के प्रबुद्द लोगों के साथ-साथ हिंदी साहित्य के स्नातकोत्तर स्तर के छात्र भी इस पोस्ट से अत्यधिक रूप से लाभान्वित होंगे।
    धन्यवाद।

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  8. शोधपरक सुन्दर अभिव्यक्ति...धन्यवाद

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