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मंगलवार, 17 जुलाई 2012

मानसिक पराधीनता

मानसिक पराधीनता
--मुंशी प्रेमचंद 


प्रस्तुति:मनोज भारती
(मुंशी प्रेमचंद उपन्यास सम्राट और सिद्ध कथाकार तो थे ही,पर वे एक अच्छे निबंधकार भी रहे। उन्होंने अपने बहुत से विचारों को निबंध के रूप में लेखनीबद्ध किया। जिनमें तत्कालीन समाज की ज्वलंत समस्याओं पर उनके विचार संकलित हैं। उनके निबंध की भाषा उनकी कहानियों की ही तरह सरल और सहज तथा आम जनता की भाषा है। जिस भाषा में देश की जनता सोचती-विचारती है,वही प्रेमचंद की भाषा रही। शैली धाराप्रवाह और संकल्पनाओं को स्पष्ट करते जाने की रही है। प्रस्तुत निबंध जनवरी,1931 में लिखा गया था,जिसमें प्रेमचंद जी के सभ्यता,संस्कृति के प्रति उद्-गार व्यक्त हुए हैं। वे भारतीय संस्कृति और सभ्यता को अक्षुण्ण रखना चाहते थे। इस संदर्भ में उनके विचार आज भी समकालीन प्रतीत होते हैं)

मुंशी प्रेमचंद 
हम दैहिक पराधीनता से मुक्त होना तो चाहते हैं; पर मानसिक पराधीनता में अपने-आपको स्वेच्छा से जकड़ते जा रहे हैं। किसी राष्ट्र या जाति का सबसे बहुमूल्य अंग क्या है? उसकी भाषा,उसकी सभ्यता,उसके विचार,उसका कलचर। यही कलचर हिंदू को हिंदू,मुसलमान को मुसलमान और ईसाई को ईसाई बनाए हुए है। मुसलमान इसी कलचर की रक्षा के लिए हिंदुओं से अलग रहना चाहता है,उसे भय है,कि सम्मिश्रण से कहीं कलचर का रूप ही विकृत न हो जाए। इसी तरह हिंदू भी अपने कलचर की रक्षा करना चाहता है; लेकिन क्या हिंदू और क्या मुसलमान,दोनों अपने कलचर की रक्षा की दुहाई देते हुए भी उसी कलचर का गला घोंटने पर तुले हुए हैं।

कलचर(सभ्यता या परिष्कृति) एक व्यापक शब्द है। हमारे धार्मिक विचार,हमारी सामाजिक रुढ़ियां,हमारे राजनैतिक सिद्धांत,हमारी भाषा और साहित्य,हमारा रहन-सहन,हमारे आचार-व्यवहार,सब हमारे कलचर के अंग हैं; पर आज हम कितनी बेदर्दी से इसी कलचर की जड़ काट रहे हैं। पश्चिमवालों को शक्तिशाली देखकर हम इस भ्रम में पड़ गए हैं कि हममें सिर से पांव तक दोष ही दोष हैं,और उनमें सिर से पांव तक गुण ही गुण हैं। इस अंधभक्ति में हमें उनके दोष भी गुण मालूम होते हैं और अपने गुण भी दोष। 

भाषा को ही लीजिए। आज अंग्रेजी हमारे सभ्य-समाज की व्यवाहारिक भाषा बनी हुई है। सरकारी भाषा तो वह है ही,दफ़्तरों में तो हमें अंग्रेजी में काम करना ही पड़ता है; पर उस भाषा की सत्ता के हम ऐसे भक्त हो गए हैं कि निजी चिट्ठियों में,घर की बातचीत में भी उसी भाषा का आश्रय लेते हैं। स्त्री पुरुष को अंग्रेजी में पत्र लिखती है,पिता पुत्र को अंग्रेजी में पत्र लिखता है। दो मित्र मिलते हैं,तो अंग्रेजी में वार्तालाप करते हैं,कोई सभा होती है ,तो अंग्रेजी में। डायरी अंग्रेजी में लिखी जाती है। वाह!क्या भाषा है!क्या लोच है!कितनी मार्मिकता है,विचारों को व्यंजित करने की कितनी शक्ति,शब्द-भंडार कितना विशाल,साहित्य कितना बहुमूल्य,कितना परिष्कृत,कविता कितनी मर्मस्पर्शिणी,गद्य कितना अर्थबोधक!जिसे देखो अंग्रेजी ज़बान पर लट्टू,उसके नाम पर कुर्बान है। यहां तक कि हमारी योग्यता और विद्वता की यही एक परख हो गई है कि हम अंग्रेजी बोलने या लिखने में कितने कुशल हैं। आठवें क्लास से अंग्रेजी के मुहावरे की रटन शुरू हो जाती है,पर्यायों के सूक्ष्म अर्थभेद पर विचार होने लगता है,अपनी अंग्रेजी वक्तृता में अंग्रेजों का एक्सेंट और उच्चारण कैसे लाएं,इस प्रयत्न में जान खपा दी जाती है। अगर किसी स्वर का उच्चारण अंग्रेजों से उनके मौखिक गठन के दोषों के कारण नहीं होता,तो भी अपने में वही बात पैदा करेंगे। आज तक 'The'जैसे साधारण शब्द का भी ठीक उच्चारण-जो अंग्रेजों को भी जंचे-बहुत कम लोग कर सकते हैं और हमारी यह मनोवृत्ति राष्ट्रीय भावों के साथ ही साथ बढ़ती जाती है। यहां तक कि अंग्रेजी ही पठित-समाज की भाषा बन गई है। अपनी भाषा में बात-चीत करते समय कभी-कभी एकाध अंग्रेजी शब्द आ जाने को तो हम मुआफ़ी के क़ाबिल समझते हैं;लेकिन दु:ख तो यह है,कि ऐसे सज्जनों की भी कमी नहीं है,जो बहुत थोड़ी-सी अंग्रेजी जानकर भी अंग्रेजी में ही अपनी योग्यता का प्रदर्शन करते हैं। अंग्रेज स्वप्न में भी किसी अंग्रेज से ग़ैर अंग्रेजी भाषा में न बोलेगा;मगर यहां हम आपस में ही अंग्रेजी बोलकर अपनी मानसिक दासता का ढिंढ़ोरा पीटते हैं। मैं उस मनोवृत्ति की कल्पना भी नहीं कर सकता,जो एक ही भाषा-भाषियों को अंग्रेजी में बातें करने की प्रेरणा करती है। किसी मदरासी,बंगाली या चीनी से तो अंग्रेजी में बातें करने का कोई अर्थ हो सकता है।उनसे बातें करनी जरूरी हैं और इस वक्त और कोई ऐसी भारतीय भाषा नहीं,जिसका सभी प्रांतवालों का एक-सा ज्ञान हो; मगर एक ही प्रांत के रहने वाले,एक ही भाषा के बोलने वाले,क्यों आपस में अंग्रेजी बोलें,क्यों अंग्रेजी में पत्र लिखें,क्यों प्रणाम या नमस्कार या वंदे या नमस्ते या तस्लीम करने के बदले मार्निंग-मार्निंग कहें,यह मेरी समझ में नहीं आता। क्यों हल्लो ही मुंह से निकले,मैं इसकी कल्पना नहीं कर सकता। संसार में ऐसे प्राणियों की कमी नहीं है,जो मंगनी की चीज़ों का व्यवहार करके भी सिर उठाकर चलते हैं। उन्हें यही खुशी है,कि लोग मुझे इन चीज़ों का स्वामी समझते होंगे। अंग्रेजी का व्यवहार करने वालों की मनोवृत्ति भी कुछ इसी तरह की होती है। या तो उनका अभिप्राय: यह होता है,कि देखें हम दोनों में कौन अच्छी अंग्रेजी बोलता है,या यह कि देखो,हम जितनी स़फाई से अंग्रेजी बोलते हैं,तुममें वह स़फाई नहीं है। और इसका परिणाम यह होता है कि अच्छी अंग्रेजी लिखनी और बोलनी तो आ जाती है;पर अपनी भाषा भूल जाती है,या हेय और तुच्छ समझकर भुला दी जाती है। यह हमारे शिक्षित-समुदाय की लज्जाजनक ही नहीं,शोकजनक मानसिक दासता है। 

फ्रांसीसी कवि फ्रेंच में कविता करता है,जर्मन,जर्मन में,रूसी रशियन में,कम से कम जिन रचनाओं पर उसे गर्व होता है,वह अपनी ही भाषा में करता है; लेकिन हमारे यहां के सारे कवि और सारे लेखक अंग्रेजी में लिखने लगें ,अगर केवल कोई प्रकाशक उनकी रचनाओं को छापने पर तैयार हो जाए!जिन्हें प्रकाशक मिल जाते हैं,वह चूकते भी नहीं,चाहे अंग्रेज आलोचक उनका मजाक ही क्यों न उड़ाएं; मगर वह खुश हैं। 

हम मानते हैं कि अंग्रेजी प्रौढ़ है,हरेक प्रकार के भावों को आसानी से ज़ाहिर कर सकती है और भारतीय भाषाओं में अभी वह बात नहीं आई; लेकिन जब वही लोग,जिन पर भाषा के निर्माण और विकास का दायित्व है,दूसरी भाषा के उपासक हो जावें,तो उनकी अपनी भाषा का भविष्य भी तो शून्य हो जाता है। फिर क्या विदेशी साहित्य की नींव पर आप भारतीय राष्ट्रीयता की दीवार खड़ी करेंगे? यह हिमाकत है। आज हमारा पठित-समाज साधारण जनता से पृथक हो गया है। उसका रहन-सहन,उसकी बोल-चाल,उसकी वेष-भूषा,सभी उसे साधारण समाज से अलग कर रहे हैं। शायद वह अपने दिल में फूला नहीं समाता,कि हम कितने विशिष्ट हैं। शायद वह जनता को नीच और गंवार समझता है; लेकिन वह खुद जनता की नजरों से गिर गया है। जनता उससे प्रभावित नहीं होती,उसे किरंटा या बिगड़ैल या साहब-बहादुर कहकर उसका बहिष्कार करती है और आज खुदा न खासता वह किसी अंग्रेज के हाथों पिट रहा हो,तो लोग उसकी दुर्गति का मजा उठावेंगे,कोई उसके पास न फटकेगा। जरा इस गुलामी को देखिए,कि हमारे विद्यालयों में हिंदी या उर्दू भी अंग्रेजी द्वारा पढ़ायी जाती है। अगर बेचारा हिंदी प्रोफ़ेसर अंग्रेजी में लेक्चर न दे,तो छात्र उसे नालायक समझते हैं। आदमी के मुख में कलंक लग जाए तो वह शर्माता है,उस कलंक को छिपाता है,कम से कम उस पर गर्व नहीं करता; पर हम अपनी दासता के कलंक को दिखाते फिरते हैं,उसकी नुमाइश करते हैं,उस पर अभिमान करते हैं,मानो वह नेकनामी का तमगा हो, या हमारी कीर्ति की ध्वजा। वाह री भारतीय दासता,तेरी बलिहारी। 

भाषा को छोड़िए,वेश-भूषा पर आइए। आप उन साहब-बहादुर को देख रहें हैं,जो हैट-कैट लगाये,ग़रूर से इधर-उधर देखते चले जा रहे हैं। यह हमारे हिंदुस्तानी योरोपियन हैं। रास्ते से हट जाओ,साहब बहादुर आते हैं!साहब को सलाम करो,आप पूरे साहब-बहादुर हैं! मुझे तो आप सिर से पांव तक गुलाम नज़र आते हैं,जो अपनी गुलामी का उसी बेशर्मी से प्रदर्शन कर रहे हैं,जैसे कोई वेश्या अपने हाव-भाव का। आपमें आत्मबल अवश्य है,बड़े ऊंचे दरजे का आत्मगौरव,आप लोकमत को ठुकरा देते हैं,किसी के नाक-भौं सिकोड़ने की परवा नहीं करते,जो अपने स्वार्थ के लिए उपयोगी या अपनी मनोतुष्टि के लिए वांछनीय समझते हैं,वह अबाध्य रूप से करते हैं। क्यों लोकमत का आदर करें! लोकमत के गुलाम नहीं; लेकिन उसी आत्मगौरव के पुतले से कहिए,कि ज़रा शाम को बिना फेल्टकैप लगाये किसी अंग्रेज-क्लब में चला जाए,तो उसके हाथ-पांव फूल जाएंगे।खून ठंडा हो जाएगा;चेहरा फक़ हो जाएगा। क्यों? इसलिए कि उसका आत्मगौरव केवल अपने भाइयों पर रोब जमाने के लिए है,उसमें सार का नाम नहीं। वह जिस समाज में मिलना चाहता है,उसकी छोटी से छोटी रूढ़ियों की भी अवहेलना नहीं कर सकता। जनता को वह समझता है,हमारा कर ही क्या लेगी,यह खुश रहे तो क्या,और नाराज रहे तो क्या,यह हमारा कुछ बना-बिगाड़ नहीं सकती। जिनसे कुछ बनने-बिगड़ने का भय है,उसके सामने वह भीगी बिल्ली बन जाता है। अपने एक मित्र साहब बहादुर से मैंने पूछा--तुम इस ठाठ से क्यों रहते हो,तो बड़े दार्शनिक भाव से बोले--इसलिए कि अंग्रेजों से मिलने जाता हूं,तो जूते बाहर नहीं उतारने पड़ते। जो लोग अचकन और टोपी पहनकर जाते हैं,उन्हें जूते उतार देने पड़ते हैं। मैं कहता हूं,जो स्वार्थ लेकर अंग्रेजों से मिलने नहीं जाते,वह अचकन नहीं,मिर्जई भी पहने हों,तो उन्हें जूते उतारने की जरूरत नहीं और जो स्वार्थ लेकर जाते हैं,वह किसी वेष में हों,उनकी आत्मा दबी रहती है। ऐसे प्राणियों की दशा उस आदमी की सी है,जो अपने कपड़े पर एक दाग को छिपाने के लिए सारा कपड़ा ही काला रंग ले। अगर स्वार्थ मजबूर कर रहा हो,तो मेरे विचार में तो जूते उतार देना इससे कहीं अच्छा है, कि हम उस अपमान से बचने के लिए बेहयाई का एक अपराध और अपने सिर पर लें। 

यह मत समझो,कि अंग्रेज तुम्हारा कोट-पैंट देखकर तुम्हारा ज्यादा आदर करता है। और अगर ऐसा हो भी,तो अपना वेश छोड़कर उस आदर को लेना,एक प्याले शोरबे के लिए अपने जन्म-सिद्ध गौरव को बेचना है। एक दूसरे मित्र से यही प्रश्न किया,तो बोले--इससे सफर करने में बड़ा सुभीता होता है,जनता समझती है यह कोई साहब हैं,मेरे डब्बे में नहीं आती। एक और साहब ने कहा--अंग्रेजी कपड़े पहनने से देह में बड़ी चुस्ती और फुरती आ जाती है। गरज,लोग तरह-तरह की दलीलों से आपका समाधान कर देंगे। मैं पूछता हूं--क्यों साहब,क्या सारी चुस्ती और फुरती अंग्रेजी कपड़ों में ही है? क्या यह कोई तिलिस्माती चीज़ है,कि बदन पर आई और आपकी देह में स्फुर्ति दौड़ी! यह दलीलें लग़ो और लचर है।हां,इस तर्क में अवश्य सार है,कि जब सारा संसार योरोपीय वेश के पीछे जा रहा है,तो आप उससे अलग कैसे जा सकते हैं। दूसरी दलील यह हो सकती है,कि हमारा हमारा कोई जातीय परिधान भी तो नहीं है। भिन्न-भिन्न प्रांतीय परिधानों की अपेक्षा तो एक सार्वदैशिक योरोपीय परिधान का होना कहीं अच्छा है। बेशक यह टेढ़ा प्रश्न है। यह बात भी विचारणीय है,कि अन्य देशों में अमीर-गरीब सबका पहनावा एक ही है,चाहे उनके कपड़े में कितना ही अंतर हो। आपके यहां किसान मिर्ज़ई या नीमआस्तीन या कुर्ता-धोती पहनता है,कहीं शलवार है,कहीं पगड़ी,कहीं जांघिया। पहले एक जातीय ठाठ की सृष्टि तो कर लीजिए,फिर विलायती पहनावे पर आक्षेप कीजिएगा। भाषा ही की भांति एक जातीय पहनावा भी बरसों के बाद कहीं जाकर आविर्भूत होता है।किसी संस्था या नीति-द्वारा उसकी सृष्टि नहीं की जा सकती। अभी भारत को एक सार्वदैशिक परिधान के लिए बहुत दिनों तक इंतजार करना पड़ेगा;मगर जब तक वह समय नहीं आता,तब तक के लिए हमारे विचार में इस नीति को सामने रखना चाहिए,कि यथासध्य जनरुचि का सम्मान किया जाए। अगर किसी प्रांत में जनता कोट पहनती है,तो वहां के लिए कोट-पतलून ही उपयुक्त है। इसी भांति जिन प्रांतों में साधारण जनता कुरता और धोती पहनती है,वहां कुरता और धोती को ही जातीय परिधान के पद पर सम्मानित करना चाहिए। अभिप्राय केवल यह है,कि शिक्षित-समाज केवल अपनी विशिष्टता या प्रभुत्व जताने के लिए ऐसी वेष-भूषा का व्यवहार न करे जिसमें विदेशीपन की झलक आती हो। हो सकता है,कि कुछ लोगों को अंग्रेजी वेष में रहने पर भी जरा अभिमान या स्वार्थ-सिद्धि की भावना न हो; पर दुर्भाग्यवश यह विदेशी वेष जनता की आंखों में खटकता है और इसे धारण करने वाले चाहे देवता ही क्यों न हों,वे स्वजाति के द्रोही और शासक जाति के अनन्य भक्त के रूप में नजर आते हैं। संभव है,स्वाधीन हो जाने पर यही हमारा स्वजातीय वेष हो जाए; लेकिन तब इसमें कुसंस्कार न रहेंगे,जिन्होंने इस वक्त इसे इतना अवहेलनीय बना रक्खा है। जरा सोचिए,क्या यह एक पढ़े-लिखे व्यक्ति को शोभा देता है,कि वह अपना रहन-सहन ऐसा बना ले कि जनता उसे श्रद्धा की दृष्टि से देखने के बदले घृणा या भय की दृष्टि से देखे।किसी समय जनरुचि को पद-दलित करने का नतीजा बुरा भी हो सकता है और यह तो स्पष्ट ही है कि अगर जनता के हाथों में प्रभुत्व होता,तो बहुत से अंग्रेजी वेष के प्रेमी यह वेष धारण करने के पहले ज्यादा विचार से काम लेना आवश्यक समझते; मगर हमारी यह मनोवृत्ति भाषा और वेष तक ही रहती तो अधिक चिंता की बात न थी। इसने हमारे कितने और सामाजिक विचारों पर भी अपना प्रभुत्व जमा लिया है और अभी से रोक-थाम न की गई,तो एक दिन हमारी जातीय संस्कृति ही का लोप हो जाएगा। यह एक साधारण सी बात है,कि पराधीन जाति को अपने में सारी बुराइयां और राज्य करने वाली जाति में भलाइयां ही भलाइयां नजर आती हैं। हमारी सभ्यता कहती है--अपनी जरूरतों को मत बढ़ाओ,ताकि तुम्हारी जात से कुटुम्ब और परिवार का भी कुछ उपकार हो। पश्चिमी सभ्यता का आदर्श है--अपनी जरूरतों को खूब बढ़ाओ,चाहे उसके लिए दूसरों की जेब ही क्यों न काटनी पड़े। अपने ही लिए जियो और अपने ही लिए मरो। हमारी सभ्यता कृषि-प्रधान थी,हम गांवों में रहते थे,जहां अपने आत्मीयजनों का संसर्ग बहुत-सी बुराइयों से हमारी रक्षा करता था। पश्चिमी सभ्यता व्यवसाय-प्रधान है और बड़े-बड़े नगरों का निर्माण करती है,जहां हम सारे बंधनों से मुक्त होकर दुराचरण में पड़ जाते हैं। हमारी सभ्यता में सम्मिलित-कु़टुम्ब एक प्रधान अंग था। पश्चिमी सभ्यता में परिवार का अर्थ है--केवल स्त्री और पुरुष। दोनों में बुराइयां और भलाइयां दोनों ही हैं;पर जहां एक में सेवा और त्याग प्रधान है,वहां दूसरे में स्वार्थ और संकीर्णता। हमारी सभ्यता में नम्रता का बड़ा महत्व था,पश्चिमी सभ्यता में आत्मप्रशंसा को वही स्थान प्राप्त है। अपने को खूब सराहो,अपने मुंह खूब मियां-मिट्ठू बनो। हमारी सभ्यता में धन का स्थान गौण था,विद्या और आचरण से आदर मिलता था। पश्चिमी सभ्यता में धन ही मुख्य वस्तु है। हम भी धन कमाते थे;पर दया के साथ। पश्चिम भी धन कमाता है;पर दया का नाम नहीं। हमारी सभ्यता का आधार धर्म था,पश्चिमी सभ्यता का आधार संघर्ष है।

लेकिन यहां हम अपने सद्-गुणों की प्रशंसा नहीं करने बैठें हैं। हमारे कहने का तात्पर्य केवल यह है कि हमें हरेक पश्चिमी चीज के पीछे आंखें बंद करके चलने की जो प्रवृत्ति हो रही है,वह हमारी मानसिक पराजय के कारण । हमारी सभ्यता में भी रोग थे;मगर उसकी दवा योरोपीय सभ्यता की अंधभक्ति नहीं है। उसकी दवा हमें अपनी ही संस्कृति में खोजनी थी। योरोपीय सभ्यता की नकल करके हमें अपने यहां भी उन्हीं दवाओं का व्यवहार करना पड़ेगा,जो योरोप कर रहा है। योरोप पथ-भ्रष्ट है,उसे अपने लक्ष्य का ज्ञान नहीं और आज योरोप के विचारवान् लोग कह रहे हैं,कि यह संस्कृति अब विध्वंस के गर्त में जानेवाली है। क्या हम भी उन्हीं बुराइयों की नक़ल करके अपनी संस्कृति को भी विध्वंस के गर्त में ढकलेने की तैयारी करें? यह समझ लीजिए कि यह राजनीतिक परिस्थिति नहीं रहेगी; पर इस परिस्थिति में हमने अपने अस्तित्व को खो दिया,अपने धर्म की सत्ता खो दी,अपनी संस्कृति को खो बैठे,तो हमारा अंत हो जाएगा।
(जनवरी,1931) 
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मंगलवार, 10 जुलाई 2012

हिंदी के अमर कथाकार,उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी



मुंशी प्रेमचंद 
हिंदी के अमर कथाकार, उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई सन्1880 में बनारस के पास लमही नामक गांव में हुआ था। उनके पिता मुंशी अजायबलाल निम्न-मध्यवर्ग के कुलीन कायस्थ थे। वे डाकखाने में मुंशी के पद पर कार्य किया करते थे। अपनी नई आशा में उन्होंने अपने पुत्र का नाम धनपतराय और प्यार का नाम नवाबराय रखा। सन् 1883 में अजायबलाल का स्थानांतरण बांदा हो गया। प्रेमचंद के जन्म के समय से ही इनकी माता बीमार रहने लगी और निर्धनता के कारण उचित चिकित्सा के अभाव में वह पुत्र को सात वर्ष का छोड़ कर स्वर्ग सिधार गई।

इस महीने की 31 तारीख को प्रेमचन्द जी का जन्मदिन है और यह पूरा मास हम “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग टीम की तरफ़ से प्रेमचन्द जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊपर कुछ पोस्ट ला रहे हैं। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है मनोज भारती की रचना।
पांच वर्ष की अवस्था में ही प्रेमचंद को अपनी कुल-परंपरा के अनुसार उर्दू-फारसी पढ़ाना शुरु किया गया। पर वे मदरसे की गणित जैसे रूखे विषयों की पुस्तकों के स्थान पर उपन्यासों को बड़े चाव से पढ़ा करते थे। बचपन में उपन्यास पढ़ने की इस लत ने ही उन में उपन्यास लिखने की प्रवृत्ति भी आगे चल कर जागृत कर दी और धीरे-धीरे वे हिंदी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यास लेखक के पद पर आसीन हो गए। किंतु इस प्रवृत्ति के कारण वे स्कूल की पढ़ाई में और विशेष रूप से गणित में बहुत कमजोर रह गए। पन्द्रहवें वर्ष में पदार्पण करते-करते,जबकि वे अभी नवीं कक्षा में ही पढ़ रहे थे,उनका विवाह भी हो गया। इसी समय उनके पिता का देहांत हो गया। इन दोनों घटनाओं ने प्रेमचंद जी के जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव डाला। छोटे भाई,विमाता तथा पत्नी इन तीनों प्राणियों का पालन-पोषण व अपनी पढ़ाई के खर्च के भार ने पन्द्रह वर्ष की छोटी-सी अवस्था में ही प्रेमचंद जी की कमर तोड़ डाली। विवश होकर स्कूल छोड़ देना पड़ा।

पांच रुपए मासिक की ट्यूशन कर किसी प्रकार से मैट्रिक परीक्षा पास की। गांव से पांच मील चल कर प्रतिदिन कॉलेज पढ़ने जाना,ट्यूशन पढ़ाना,परिवार का पालन-पोषण करना,इन सब शारीरिक और मानसिक कष्टों के कारण प्रेमचंद की दशा अत्यंत दयनीय हो उठी। फिर भी उन्होंने हिम्मत न हारी और दो बार इंटर परीक्षा में प्रविष्ट हुए,पर गणित के कारण दोनों बार ही असफल हुए। ऐसे ही समय में उन्हें स्कूल मास्टर की अठारह रुपए मासिक की नौकरी मिल गई। सन् 1902 में इलाहाबाद ट्रेनिंग कॉलेज से जे.टी.सी. की परीक्षा पास की और वहीं मॉडल स्कूल में हैडमास्टर बन गए। सन् 1908 में वे स्कूलों के सब-डिप्टी इन्सपेक्टर बन कर हमीरपुर पहुंचे, तो वहां आप को बुंदेलखंडी देहातों के दौरों में भारतीय कृषक-जीवन को निकट से देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। 'रानी सारंधा', 'राजा हरदौल' आदि ऐतिहासिक कहानियां यहीं लिखी गई। इसी समय 'सोजे-वतन' नामक देशभक्तिपूर्ण पांच उर्दू कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ। जिसके कारण अंग्रेज सरकार बौखला उठी और पुस्तक की पांच सौ प्रतियां जब्त करके जला दी गई। साथ ही प्रेमचंद जी को भविष्य में ऐसी कोई रचना न लिखने के लिए सावधान भी किया गया।

इस घटना से प्रेमचंद को बड़ा दु:ख हुआ। उन्होंने अपना नाम धनपतराय व नवाबराय से बदलकर 'प्रेमचंद' नाम से साहित्य-निर्माण आरम्भ कर दिया। आगे चलकर इस प्रेमचंद उपनाम से ही वे हिंदी जगत में विख्यात हुए। इन्हीं दिनों उनकी पत्नी उनसे लड़-झगड़ कर मायके चली गई। पत्नी के चले जाने से प्रेमचंद का हृदय संवेदना और सहानुभूति पाने के लिए तड़प उठा। ऐसे ही समय में शिव रानी देवी ने उनके संपर्क में आकर इस महान कलाकार के जीवन-निर्माण में महत्त्वपूर्ण योग दिया।

शिवरानी स्वयं बाल-विधवा थी। जिन रुढ़ियों से प्रेमचंद का हृदय उत्पीड़ित था,वे भी उन्ही की शिकार हो चुकी थी। अत: उन्होंने बड़े साहस के साथ समाज की परवाह न कर विधवा शिवरानी के साथ विवाह कर लिया। शिवरानी में प्रेमचंद जी को मनचाहे गुण प्राप्त हो गए। उनका जीवन सरस,सुंदर और सप्राण हो उठा,जिसका  प्रभाव उनकी आगामी रचनाओं पर भी स्पष्ट लक्षित होता है। पीछे उन्हें अपनी पहली पत्नी के विच्छेद पर पश्चाताप भी हुआ और वे जीवन-भर उसका भरण-पोषण करते रहे,पर शिवरानी देवी के बार-बार आग्रह करने पर भी वे उसे स्वयं बुलाने नहीं गए। उनकी इस मानसिक स्थिति का चित्रण एक आलोचक ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में इस प्रकार किया है- "शायद यह..... प्रेमचंद के भीतरी पुरुष को यह समझौता या प्रत्यावर्तन गवारा न हुआ,यह दूसरी बात है; पर उन्हें इसका ज्ञान जरूर हो गया कि भारतीय नारी के ओज का उन्होंने उचित आदर नहीं किया और अपनी इस गलती का परिमार्जन उन्होंने अपने नारी-पात्रों के उन्नयन में किया! किया तो बंगाल के शरच्चंद्र ने भी है, पर प्रेमचंद की नारी अपनी निष्ठा को नीति से जोड़कर रखती है,जबकि शरत् की नारी नीति के बंधन को तोड़कर निष्ठा का पालन करती है।" शिव रानी के त्याग और धैर्य से प्रेमचंद का साहित्य पनप उठा है। शिवरानी में उन्हें प्रथम प्रीति का उन्माद तो न मिला होगा,पर नारीत्व की पूर्णता मिली,सबसे अधिक उन्हें उनमें मातृत्व की छाया मिली। इसी कारण बाद में उन्होंने अपने आपको शिवरानी की स्नेहमयी रक्षा में बच्चे की भांति सौंप डाला। सन् 1910 में वे इंटर परीक्षा में पास हो गए और बाद में उन्होंने बी.ए. भी कर लिया। 

सन् 1914 में वे स्थानांतरित होकर बस्ती आ पहुंचे जहां उन्हें पंडित मन्नन द्विवेदी गजपुरी के संपर्क से हिंदी में लिखने की प्रबल प्रेरणा प्राप्त हुई। इसी समय 'सेवासदन' समाप्त हुआ। इससे पूर्व 'सप्त सरोज' नामक हिंदी कहानियों का संग्रह पर्याप्त लोकप्रिय हो चुका था। यहां इनकी पेचिश की बीमारी ने उग्र रूप धारण कर लिया,इन्ही दिनों उन्हें गोरखपुर गवर्नमेन्ट नार्मल स्कूल का हैडमास्टर बनाकर भेज दिया गया। वहीं पर इनके प्रथम पुत्र श्रीपतराय का जन्म हुआ। 

सन् 1916 के आसपास इनकी अनुभूति बड़ी तीव्र हो गई और 'प्रेमाश्रम' का प्रारंभ हुआ। महात्मा गांधी के राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रभावित होकर सन् 1921 में आप ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। कानपुर से आप काशी आए,जहां डेढ़ वर्ष तक मर्यादा का संपादन कर काशी विद्यापीठ में अध्यापक बन गए। सन् 1923 में 'सरस्वती प्रेस' की स्थापना की। सन् 1928 में उन्होंने 'माधुरी' का संपादन-भार संभाला और सन् 1930 में 'हँस' नामक एक साहित्यिक पत्र का श्रीगणेश किया। इस मासिक पत्र के साथ-साथ 'जागरण' नामक एक साप्ताहिक पत्र भी प्रारंभ किया। अत्यधिक घाटा उठा कर भी प्रेमचंद जी  इन दोनों पत्रों को सन् 1931 से 1935 तक निरंतर चलाते रहे। 'रंगभूमि','गबन' और 'कर्मभूमि' नामक बड़े-बड़े उपन्यास भी इसी अवधि में प्रकाशित हुए।

अलवर के महाराजा ने उन्हें स्थायी रूप से अपने यहां बुलाना चाहा पर उनकी स्वाभिमानी प्रवृत्ति ने किसी राजा के यहां रहना स्वीकार नहीं किया।

सन् 1934 में वे बम्बई में फिल्म-कंपनी में कहानी लिखने चले गए,पर एक वर्ष में ही वहां के वातावरण से ऊब कर बम्बई छोड़कर बनारस लौट आए। इस समय प्रेमचंद जी का सबसे गौरवमय ग्रंथ 'गोदान' लिखा जाने लगा। सन् 1936 में गोदान प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशित होने के कुछ मास अनन्तर अपने अंतिम उपन्यास 'मंगलसूत्र' को अधुरा ही छोड़कर यह हिंदी का महान कथाकार हम से सदा के लिए विदा हो गया। वास्तव में प्रेमचंद जी ने जीवन-भर आर्थिक संकटों की चक्की में पिसते हुए भी जिस गौरवमय कथा-साहित्य का सृजन किया है उसके कारण वे सदा अमर रहेंगे। 

प्रेमचंद जी वास्तव में हिंदी के एक महान कलाकार थे। नानाविध अभावों से ग्रस्त निम्नमध्यवर्ग का जैसा सजीव सहानुभूतिपूर्ण चित्र प्रेमचंद जी के कथा-साहित्य(कहानी और उपन्यास) में उपलब्ध होता है,वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। पीड़ित मानवता की पुकार को उन्होंने बड़े ध्यान से सुना और उसे बड़े ही मर्मस्पर्शी कलात्मक रूप में विश्व को सुनाया। वे जनता के सच्चे प्रतिनिधि कलाकार थे। यही कारण है कि आज भी उनकी रचनाएं बड़े चाव के साथ पढ़ी जाती हैं। इतना ही नहीं उनकी अनेक रचनाओं का अनुवाद चीनी,रुसी आदि अनेक भाषाओं में अनूदित होकर वहां की जनता के द्वारा सोत्साह पढ़ी जा रही हैं। प्रेमचंद वास्तव में किसी देश या जाति के नहीं प्रत्युत अखंड मानवता के प्रचारक एवं विश्व के महान कलाकार थे।

रचनाएं: प्रेमचंद जी ने कुल मिलाकर तीन सौ से अधिक कहानियां, ग्यारह उपन्यास,तीन जीवनियां,आठ विभिन्न भाषाओं से अनूदित ग्रंथ,अनेक आलोचनात्मक तथा विविध विषयों के निबंध,तीन नाटक और बहुत सा बाल-साहित्य देकर हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि में महत्त्वपूर्ण योग दिया। 

कहानियां: 'मासरोवर' के आठ भागों में उनकी बहुत सी कहानियां संकलित हैं। 'ईदगाह','कफन','अलग्योझा','शतरंज के खिलाड़ी', 'आत्माराम', 'मुक्ति का मार्ग','बेटी का धन', 'बड़े घर की बेटी','डिग्री के रुपए','पंचपरमेश्वर','शंखनाद','दुर्गा का मंदिर','रानी सारंधा','राजा हरदौल','मंदिर और मस्जिद', 'नमक का दारोगा','मंत्र','कामना-तरु','सुजानभगत', 'ईश्वरीय न्याय' ये उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियां गिनी जाती हैं।

प्रेमचंद जी जितने बड़े उपन्यासकार थे उतने ही बड़े कहानीकार भी थे। उनकी कहानियों में जीवन के अनेक रूप,समाज के अनेक चित्र और मनोविज्ञान के अनेक पहलू अंकित हुए हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिस पर प्रेमचंद जी की प्रतिभा ने अपना चमत्कार न दिखाया हो। अनेक छोटी-मोटी समस्याओं का इन कहानियों में समाधान करने का प्रयत्न किया गया है।'रामलीला' कहानी में पाखंड पर चोट की गई है। 'सभ्यता की पोल', में बताया गया है कि जिस काम को करने पर कोई छोटा आदमी दुष्ट समझ लिया जाता है,उसी को कोई बड़ा कर बैठे तो कोई कुछ नहीं कहता। 'उद्धार' में दहेज-प्रथा की भयंकरता दिखाई गई है। 'मोटर के छिंटे', 'सत्याग्रह' आदि में हास्य-व्यंग्य की पुट है। 'आत्माराम' कहानी को जिसमें कंजूस महादेव सुनार को डाकुओं का धन पाकर उदार बनने की कथा के साथ-साथ उसका 'आत्माराम' नामक तोते पर प्रगाढ़ प्रेम दिखाया गया है-इसे प्रेमचंद जी ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कहानियों में गिना है।'दंड' नामक कहानी में अफसरों की रिश्वतखोरी और मुकदमेंबाजी का चित्र खिंचा गया है। 'पंचपरमेश्वर' में पंचायत-प्रथा की महत्ता बताई गई है। 'बड़े घर की बेटी' में संयुक्त परिवार का वर्णन किया गया है। 'शतरंज के खिलाड़ी' में लखनवी नवाबों के ठाठ-बाठ और शतरंज के भयंकर परिणामों को दिखाया गया है। 'अमावस्या की रात्रि 'और 'मंत्र' में डाक्टरों और वैद्यों की स्वार्थमय प्रवृत्ति तथा गरीब जनता की सात्विकता का चित्र चित्र अंकित किया गया है। 'सत्याग्रह','विनोद','मोटेराम की डायरी' और 'बूढ़ी काकी' सुंदर हास्यरस की कहानियां हैं।

उपन्यास: (1) प्रतिज्ञा या प्रेमा(1904)- विधवा समस्या को लेकर लिखा गया है।
(2) वरदान(1906)- इसमें सामयिक राजनैतिक आन्दोलन प्रतिबिम्बित है।
(3) सेवासदन(1914)-नारी समस्या, विशेषत: वेश्या-सुधार और निम्नमध्यवर्ग की दुर्बलता को लेकर लिखा गया है।
(4) प्रेमाश्रम(1918)- इसमें जमींदारों के द्वारा किसानों के शोषण का चित्र मुख्य रूप से अंकित हुआ है।
(5) निर्मला(1923)- इसमें दहेजप्रथा और बेमेल विवाह के दुष्परिणाम दिखानेवाली एक करुण कथा है।
(6) रंगभूमि(1926)- औद्योगिक शोषण,राजनैतिक दासता तथा अंतर-जातीय विवाह की समस्याओं को लेकर चलने वाला एक बड़ा उपन्यास है।
(7) कायाकल्प(1928)- मध्यवर्ग के मिथ्या अभिमान से विद्रोह कर आत्मा के रहस्यों में खो जाने वाली रचना।
(8) गबन(1930)- निम्न-मध्यवर्ग की पारिवारिक समस्या की भयंकरता का सजीव चित्रण है।
(9) कर्मभूमि(1932)- किसान आन्दोलन और अछूतोद्धार को लेकर यह उपन्यास लिखा गया है।
(10)गोदान(1936)- भारतीय किसान के जीवन-संघर्ष को लेकर लिखा गया यह एक महत्त्वपूर्ण गौरवग्रंथ है।
(11) मंगलसूत्र(अपूर्ण 1936) - लेखक की साहित्य साधना में आने वाले कष्टों का इसमें हृदयस्पर्शी चित्र अंकित हुआ है।

निबंध--'कुछ विचार' के नाम से उनके निबंधों का संग्रह प्रकाशित हुआ है।

नाटक--'संग्राम','कर्बला', 'प्रेम की बेदी' -यह तीन प्रेमचंद जी के नाटक हैं।

जीवनियां--'महात्मा शेखसादी', 'दुर्गादास', 'कलम तलवार और त्याग'।

अनुवाद --'सृष्टि का आरंभ'(बर्नाड शॉ), 'टालस्टाय की कहानियां', 'सुखदास'(जार्ज इलियट का साइलस मेरिनर), 'अहंकार','छाया'(अनातोले फ्रांस), 'चांदी की डिबिया','न्याय','हड़ताल' तीनों गाल्सवर्दो के नाटकों का अनुवाद और 'आज़ाद-कथा'(रतननाथ सरशार)।

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