मंगलवार, 17 जुलाई 2012

मानसिक पराधीनता

मानसिक पराधीनता
--मुंशी प्रेमचंद 


प्रस्तुति:मनोज भारती
(मुंशी प्रेमचंद उपन्यास सम्राट और सिद्ध कथाकार तो थे ही,पर वे एक अच्छे निबंधकार भी रहे। उन्होंने अपने बहुत से विचारों को निबंध के रूप में लेखनीबद्ध किया। जिनमें तत्कालीन समाज की ज्वलंत समस्याओं पर उनके विचार संकलित हैं। उनके निबंध की भाषा उनकी कहानियों की ही तरह सरल और सहज तथा आम जनता की भाषा है। जिस भाषा में देश की जनता सोचती-विचारती है,वही प्रेमचंद की भाषा रही। शैली धाराप्रवाह और संकल्पनाओं को स्पष्ट करते जाने की रही है। प्रस्तुत निबंध जनवरी,1931 में लिखा गया था,जिसमें प्रेमचंद जी के सभ्यता,संस्कृति के प्रति उद्-गार व्यक्त हुए हैं। वे भारतीय संस्कृति और सभ्यता को अक्षुण्ण रखना चाहते थे। इस संदर्भ में उनके विचार आज भी समकालीन प्रतीत होते हैं)

मुंशी प्रेमचंद 
हम दैहिक पराधीनता से मुक्त होना तो चाहते हैं; पर मानसिक पराधीनता में अपने-आपको स्वेच्छा से जकड़ते जा रहे हैं। किसी राष्ट्र या जाति का सबसे बहुमूल्य अंग क्या है? उसकी भाषा,उसकी सभ्यता,उसके विचार,उसका कलचर। यही कलचर हिंदू को हिंदू,मुसलमान को मुसलमान और ईसाई को ईसाई बनाए हुए है। मुसलमान इसी कलचर की रक्षा के लिए हिंदुओं से अलग रहना चाहता है,उसे भय है,कि सम्मिश्रण से कहीं कलचर का रूप ही विकृत न हो जाए। इसी तरह हिंदू भी अपने कलचर की रक्षा करना चाहता है; लेकिन क्या हिंदू और क्या मुसलमान,दोनों अपने कलचर की रक्षा की दुहाई देते हुए भी उसी कलचर का गला घोंटने पर तुले हुए हैं।

कलचर(सभ्यता या परिष्कृति) एक व्यापक शब्द है। हमारे धार्मिक विचार,हमारी सामाजिक रुढ़ियां,हमारे राजनैतिक सिद्धांत,हमारी भाषा और साहित्य,हमारा रहन-सहन,हमारे आचार-व्यवहार,सब हमारे कलचर के अंग हैं; पर आज हम कितनी बेदर्दी से इसी कलचर की जड़ काट रहे हैं। पश्चिमवालों को शक्तिशाली देखकर हम इस भ्रम में पड़ गए हैं कि हममें सिर से पांव तक दोष ही दोष हैं,और उनमें सिर से पांव तक गुण ही गुण हैं। इस अंधभक्ति में हमें उनके दोष भी गुण मालूम होते हैं और अपने गुण भी दोष। 

भाषा को ही लीजिए। आज अंग्रेजी हमारे सभ्य-समाज की व्यवाहारिक भाषा बनी हुई है। सरकारी भाषा तो वह है ही,दफ़्तरों में तो हमें अंग्रेजी में काम करना ही पड़ता है; पर उस भाषा की सत्ता के हम ऐसे भक्त हो गए हैं कि निजी चिट्ठियों में,घर की बातचीत में भी उसी भाषा का आश्रय लेते हैं। स्त्री पुरुष को अंग्रेजी में पत्र लिखती है,पिता पुत्र को अंग्रेजी में पत्र लिखता है। दो मित्र मिलते हैं,तो अंग्रेजी में वार्तालाप करते हैं,कोई सभा होती है ,तो अंग्रेजी में। डायरी अंग्रेजी में लिखी जाती है। वाह!क्या भाषा है!क्या लोच है!कितनी मार्मिकता है,विचारों को व्यंजित करने की कितनी शक्ति,शब्द-भंडार कितना विशाल,साहित्य कितना बहुमूल्य,कितना परिष्कृत,कविता कितनी मर्मस्पर्शिणी,गद्य कितना अर्थबोधक!जिसे देखो अंग्रेजी ज़बान पर लट्टू,उसके नाम पर कुर्बान है। यहां तक कि हमारी योग्यता और विद्वता की यही एक परख हो गई है कि हम अंग्रेजी बोलने या लिखने में कितने कुशल हैं। आठवें क्लास से अंग्रेजी के मुहावरे की रटन शुरू हो जाती है,पर्यायों के सूक्ष्म अर्थभेद पर विचार होने लगता है,अपनी अंग्रेजी वक्तृता में अंग्रेजों का एक्सेंट और उच्चारण कैसे लाएं,इस प्रयत्न में जान खपा दी जाती है। अगर किसी स्वर का उच्चारण अंग्रेजों से उनके मौखिक गठन के दोषों के कारण नहीं होता,तो भी अपने में वही बात पैदा करेंगे। आज तक 'The'जैसे साधारण शब्द का भी ठीक उच्चारण-जो अंग्रेजों को भी जंचे-बहुत कम लोग कर सकते हैं और हमारी यह मनोवृत्ति राष्ट्रीय भावों के साथ ही साथ बढ़ती जाती है। यहां तक कि अंग्रेजी ही पठित-समाज की भाषा बन गई है। अपनी भाषा में बात-चीत करते समय कभी-कभी एकाध अंग्रेजी शब्द आ जाने को तो हम मुआफ़ी के क़ाबिल समझते हैं;लेकिन दु:ख तो यह है,कि ऐसे सज्जनों की भी कमी नहीं है,जो बहुत थोड़ी-सी अंग्रेजी जानकर भी अंग्रेजी में ही अपनी योग्यता का प्रदर्शन करते हैं। अंग्रेज स्वप्न में भी किसी अंग्रेज से ग़ैर अंग्रेजी भाषा में न बोलेगा;मगर यहां हम आपस में ही अंग्रेजी बोलकर अपनी मानसिक दासता का ढिंढ़ोरा पीटते हैं। मैं उस मनोवृत्ति की कल्पना भी नहीं कर सकता,जो एक ही भाषा-भाषियों को अंग्रेजी में बातें करने की प्रेरणा करती है। किसी मदरासी,बंगाली या चीनी से तो अंग्रेजी में बातें करने का कोई अर्थ हो सकता है।उनसे बातें करनी जरूरी हैं और इस वक्त और कोई ऐसी भारतीय भाषा नहीं,जिसका सभी प्रांतवालों का एक-सा ज्ञान हो; मगर एक ही प्रांत के रहने वाले,एक ही भाषा के बोलने वाले,क्यों आपस में अंग्रेजी बोलें,क्यों अंग्रेजी में पत्र लिखें,क्यों प्रणाम या नमस्कार या वंदे या नमस्ते या तस्लीम करने के बदले मार्निंग-मार्निंग कहें,यह मेरी समझ में नहीं आता। क्यों हल्लो ही मुंह से निकले,मैं इसकी कल्पना नहीं कर सकता। संसार में ऐसे प्राणियों की कमी नहीं है,जो मंगनी की चीज़ों का व्यवहार करके भी सिर उठाकर चलते हैं। उन्हें यही खुशी है,कि लोग मुझे इन चीज़ों का स्वामी समझते होंगे। अंग्रेजी का व्यवहार करने वालों की मनोवृत्ति भी कुछ इसी तरह की होती है। या तो उनका अभिप्राय: यह होता है,कि देखें हम दोनों में कौन अच्छी अंग्रेजी बोलता है,या यह कि देखो,हम जितनी स़फाई से अंग्रेजी बोलते हैं,तुममें वह स़फाई नहीं है। और इसका परिणाम यह होता है कि अच्छी अंग्रेजी लिखनी और बोलनी तो आ जाती है;पर अपनी भाषा भूल जाती है,या हेय और तुच्छ समझकर भुला दी जाती है। यह हमारे शिक्षित-समुदाय की लज्जाजनक ही नहीं,शोकजनक मानसिक दासता है। 

फ्रांसीसी कवि फ्रेंच में कविता करता है,जर्मन,जर्मन में,रूसी रशियन में,कम से कम जिन रचनाओं पर उसे गर्व होता है,वह अपनी ही भाषा में करता है; लेकिन हमारे यहां के सारे कवि और सारे लेखक अंग्रेजी में लिखने लगें ,अगर केवल कोई प्रकाशक उनकी रचनाओं को छापने पर तैयार हो जाए!जिन्हें प्रकाशक मिल जाते हैं,वह चूकते भी नहीं,चाहे अंग्रेज आलोचक उनका मजाक ही क्यों न उड़ाएं; मगर वह खुश हैं। 

हम मानते हैं कि अंग्रेजी प्रौढ़ है,हरेक प्रकार के भावों को आसानी से ज़ाहिर कर सकती है और भारतीय भाषाओं में अभी वह बात नहीं आई; लेकिन जब वही लोग,जिन पर भाषा के निर्माण और विकास का दायित्व है,दूसरी भाषा के उपासक हो जावें,तो उनकी अपनी भाषा का भविष्य भी तो शून्य हो जाता है। फिर क्या विदेशी साहित्य की नींव पर आप भारतीय राष्ट्रीयता की दीवार खड़ी करेंगे? यह हिमाकत है। आज हमारा पठित-समाज साधारण जनता से पृथक हो गया है। उसका रहन-सहन,उसकी बोल-चाल,उसकी वेष-भूषा,सभी उसे साधारण समाज से अलग कर रहे हैं। शायद वह अपने दिल में फूला नहीं समाता,कि हम कितने विशिष्ट हैं। शायद वह जनता को नीच और गंवार समझता है; लेकिन वह खुद जनता की नजरों से गिर गया है। जनता उससे प्रभावित नहीं होती,उसे किरंटा या बिगड़ैल या साहब-बहादुर कहकर उसका बहिष्कार करती है और आज खुदा न खासता वह किसी अंग्रेज के हाथों पिट रहा हो,तो लोग उसकी दुर्गति का मजा उठावेंगे,कोई उसके पास न फटकेगा। जरा इस गुलामी को देखिए,कि हमारे विद्यालयों में हिंदी या उर्दू भी अंग्रेजी द्वारा पढ़ायी जाती है। अगर बेचारा हिंदी प्रोफ़ेसर अंग्रेजी में लेक्चर न दे,तो छात्र उसे नालायक समझते हैं। आदमी के मुख में कलंक लग जाए तो वह शर्माता है,उस कलंक को छिपाता है,कम से कम उस पर गर्व नहीं करता; पर हम अपनी दासता के कलंक को दिखाते फिरते हैं,उसकी नुमाइश करते हैं,उस पर अभिमान करते हैं,मानो वह नेकनामी का तमगा हो, या हमारी कीर्ति की ध्वजा। वाह री भारतीय दासता,तेरी बलिहारी। 

भाषा को छोड़िए,वेश-भूषा पर आइए। आप उन साहब-बहादुर को देख रहें हैं,जो हैट-कैट लगाये,ग़रूर से इधर-उधर देखते चले जा रहे हैं। यह हमारे हिंदुस्तानी योरोपियन हैं। रास्ते से हट जाओ,साहब बहादुर आते हैं!साहब को सलाम करो,आप पूरे साहब-बहादुर हैं! मुझे तो आप सिर से पांव तक गुलाम नज़र आते हैं,जो अपनी गुलामी का उसी बेशर्मी से प्रदर्शन कर रहे हैं,जैसे कोई वेश्या अपने हाव-भाव का। आपमें आत्मबल अवश्य है,बड़े ऊंचे दरजे का आत्मगौरव,आप लोकमत को ठुकरा देते हैं,किसी के नाक-भौं सिकोड़ने की परवा नहीं करते,जो अपने स्वार्थ के लिए उपयोगी या अपनी मनोतुष्टि के लिए वांछनीय समझते हैं,वह अबाध्य रूप से करते हैं। क्यों लोकमत का आदर करें! लोकमत के गुलाम नहीं; लेकिन उसी आत्मगौरव के पुतले से कहिए,कि ज़रा शाम को बिना फेल्टकैप लगाये किसी अंग्रेज-क्लब में चला जाए,तो उसके हाथ-पांव फूल जाएंगे।खून ठंडा हो जाएगा;चेहरा फक़ हो जाएगा। क्यों? इसलिए कि उसका आत्मगौरव केवल अपने भाइयों पर रोब जमाने के लिए है,उसमें सार का नाम नहीं। वह जिस समाज में मिलना चाहता है,उसकी छोटी से छोटी रूढ़ियों की भी अवहेलना नहीं कर सकता। जनता को वह समझता है,हमारा कर ही क्या लेगी,यह खुश रहे तो क्या,और नाराज रहे तो क्या,यह हमारा कुछ बना-बिगाड़ नहीं सकती। जिनसे कुछ बनने-बिगड़ने का भय है,उसके सामने वह भीगी बिल्ली बन जाता है। अपने एक मित्र साहब बहादुर से मैंने पूछा--तुम इस ठाठ से क्यों रहते हो,तो बड़े दार्शनिक भाव से बोले--इसलिए कि अंग्रेजों से मिलने जाता हूं,तो जूते बाहर नहीं उतारने पड़ते। जो लोग अचकन और टोपी पहनकर जाते हैं,उन्हें जूते उतार देने पड़ते हैं। मैं कहता हूं,जो स्वार्थ लेकर अंग्रेजों से मिलने नहीं जाते,वह अचकन नहीं,मिर्जई भी पहने हों,तो उन्हें जूते उतारने की जरूरत नहीं और जो स्वार्थ लेकर जाते हैं,वह किसी वेष में हों,उनकी आत्मा दबी रहती है। ऐसे प्राणियों की दशा उस आदमी की सी है,जो अपने कपड़े पर एक दाग को छिपाने के लिए सारा कपड़ा ही काला रंग ले। अगर स्वार्थ मजबूर कर रहा हो,तो मेरे विचार में तो जूते उतार देना इससे कहीं अच्छा है, कि हम उस अपमान से बचने के लिए बेहयाई का एक अपराध और अपने सिर पर लें। 

यह मत समझो,कि अंग्रेज तुम्हारा कोट-पैंट देखकर तुम्हारा ज्यादा आदर करता है। और अगर ऐसा हो भी,तो अपना वेश छोड़कर उस आदर को लेना,एक प्याले शोरबे के लिए अपने जन्म-सिद्ध गौरव को बेचना है। एक दूसरे मित्र से यही प्रश्न किया,तो बोले--इससे सफर करने में बड़ा सुभीता होता है,जनता समझती है यह कोई साहब हैं,मेरे डब्बे में नहीं आती। एक और साहब ने कहा--अंग्रेजी कपड़े पहनने से देह में बड़ी चुस्ती और फुरती आ जाती है। गरज,लोग तरह-तरह की दलीलों से आपका समाधान कर देंगे। मैं पूछता हूं--क्यों साहब,क्या सारी चुस्ती और फुरती अंग्रेजी कपड़ों में ही है? क्या यह कोई तिलिस्माती चीज़ है,कि बदन पर आई और आपकी देह में स्फुर्ति दौड़ी! यह दलीलें लग़ो और लचर है।हां,इस तर्क में अवश्य सार है,कि जब सारा संसार योरोपीय वेश के पीछे जा रहा है,तो आप उससे अलग कैसे जा सकते हैं। दूसरी दलील यह हो सकती है,कि हमारा हमारा कोई जातीय परिधान भी तो नहीं है। भिन्न-भिन्न प्रांतीय परिधानों की अपेक्षा तो एक सार्वदैशिक योरोपीय परिधान का होना कहीं अच्छा है। बेशक यह टेढ़ा प्रश्न है। यह बात भी विचारणीय है,कि अन्य देशों में अमीर-गरीब सबका पहनावा एक ही है,चाहे उनके कपड़े में कितना ही अंतर हो। आपके यहां किसान मिर्ज़ई या नीमआस्तीन या कुर्ता-धोती पहनता है,कहीं शलवार है,कहीं पगड़ी,कहीं जांघिया। पहले एक जातीय ठाठ की सृष्टि तो कर लीजिए,फिर विलायती पहनावे पर आक्षेप कीजिएगा। भाषा ही की भांति एक जातीय पहनावा भी बरसों के बाद कहीं जाकर आविर्भूत होता है।किसी संस्था या नीति-द्वारा उसकी सृष्टि नहीं की जा सकती। अभी भारत को एक सार्वदैशिक परिधान के लिए बहुत दिनों तक इंतजार करना पड़ेगा;मगर जब तक वह समय नहीं आता,तब तक के लिए हमारे विचार में इस नीति को सामने रखना चाहिए,कि यथासध्य जनरुचि का सम्मान किया जाए। अगर किसी प्रांत में जनता कोट पहनती है,तो वहां के लिए कोट-पतलून ही उपयुक्त है। इसी भांति जिन प्रांतों में साधारण जनता कुरता और धोती पहनती है,वहां कुरता और धोती को ही जातीय परिधान के पद पर सम्मानित करना चाहिए। अभिप्राय केवल यह है,कि शिक्षित-समाज केवल अपनी विशिष्टता या प्रभुत्व जताने के लिए ऐसी वेष-भूषा का व्यवहार न करे जिसमें विदेशीपन की झलक आती हो। हो सकता है,कि कुछ लोगों को अंग्रेजी वेष में रहने पर भी जरा अभिमान या स्वार्थ-सिद्धि की भावना न हो; पर दुर्भाग्यवश यह विदेशी वेष जनता की आंखों में खटकता है और इसे धारण करने वाले चाहे देवता ही क्यों न हों,वे स्वजाति के द्रोही और शासक जाति के अनन्य भक्त के रूप में नजर आते हैं। संभव है,स्वाधीन हो जाने पर यही हमारा स्वजातीय वेष हो जाए; लेकिन तब इसमें कुसंस्कार न रहेंगे,जिन्होंने इस वक्त इसे इतना अवहेलनीय बना रक्खा है। जरा सोचिए,क्या यह एक पढ़े-लिखे व्यक्ति को शोभा देता है,कि वह अपना रहन-सहन ऐसा बना ले कि जनता उसे श्रद्धा की दृष्टि से देखने के बदले घृणा या भय की दृष्टि से देखे।किसी समय जनरुचि को पद-दलित करने का नतीजा बुरा भी हो सकता है और यह तो स्पष्ट ही है कि अगर जनता के हाथों में प्रभुत्व होता,तो बहुत से अंग्रेजी वेष के प्रेमी यह वेष धारण करने के पहले ज्यादा विचार से काम लेना आवश्यक समझते; मगर हमारी यह मनोवृत्ति भाषा और वेष तक ही रहती तो अधिक चिंता की बात न थी। इसने हमारे कितने और सामाजिक विचारों पर भी अपना प्रभुत्व जमा लिया है और अभी से रोक-थाम न की गई,तो एक दिन हमारी जातीय संस्कृति ही का लोप हो जाएगा। यह एक साधारण सी बात है,कि पराधीन जाति को अपने में सारी बुराइयां और राज्य करने वाली जाति में भलाइयां ही भलाइयां नजर आती हैं। हमारी सभ्यता कहती है--अपनी जरूरतों को मत बढ़ाओ,ताकि तुम्हारी जात से कुटुम्ब और परिवार का भी कुछ उपकार हो। पश्चिमी सभ्यता का आदर्श है--अपनी जरूरतों को खूब बढ़ाओ,चाहे उसके लिए दूसरों की जेब ही क्यों न काटनी पड़े। अपने ही लिए जियो और अपने ही लिए मरो। हमारी सभ्यता कृषि-प्रधान थी,हम गांवों में रहते थे,जहां अपने आत्मीयजनों का संसर्ग बहुत-सी बुराइयों से हमारी रक्षा करता था। पश्चिमी सभ्यता व्यवसाय-प्रधान है और बड़े-बड़े नगरों का निर्माण करती है,जहां हम सारे बंधनों से मुक्त होकर दुराचरण में पड़ जाते हैं। हमारी सभ्यता में सम्मिलित-कु़टुम्ब एक प्रधान अंग था। पश्चिमी सभ्यता में परिवार का अर्थ है--केवल स्त्री और पुरुष। दोनों में बुराइयां और भलाइयां दोनों ही हैं;पर जहां एक में सेवा और त्याग प्रधान है,वहां दूसरे में स्वार्थ और संकीर्णता। हमारी सभ्यता में नम्रता का बड़ा महत्व था,पश्चिमी सभ्यता में आत्मप्रशंसा को वही स्थान प्राप्त है। अपने को खूब सराहो,अपने मुंह खूब मियां-मिट्ठू बनो। हमारी सभ्यता में धन का स्थान गौण था,विद्या और आचरण से आदर मिलता था। पश्चिमी सभ्यता में धन ही मुख्य वस्तु है। हम भी धन कमाते थे;पर दया के साथ। पश्चिम भी धन कमाता है;पर दया का नाम नहीं। हमारी सभ्यता का आधार धर्म था,पश्चिमी सभ्यता का आधार संघर्ष है।

लेकिन यहां हम अपने सद्-गुणों की प्रशंसा नहीं करने बैठें हैं। हमारे कहने का तात्पर्य केवल यह है कि हमें हरेक पश्चिमी चीज के पीछे आंखें बंद करके चलने की जो प्रवृत्ति हो रही है,वह हमारी मानसिक पराजय के कारण । हमारी सभ्यता में भी रोग थे;मगर उसकी दवा योरोपीय सभ्यता की अंधभक्ति नहीं है। उसकी दवा हमें अपनी ही संस्कृति में खोजनी थी। योरोपीय सभ्यता की नकल करके हमें अपने यहां भी उन्हीं दवाओं का व्यवहार करना पड़ेगा,जो योरोप कर रहा है। योरोप पथ-भ्रष्ट है,उसे अपने लक्ष्य का ज्ञान नहीं और आज योरोप के विचारवान् लोग कह रहे हैं,कि यह संस्कृति अब विध्वंस के गर्त में जानेवाली है। क्या हम भी उन्हीं बुराइयों की नक़ल करके अपनी संस्कृति को भी विध्वंस के गर्त में ढकलेने की तैयारी करें? यह समझ लीजिए कि यह राजनीतिक परिस्थिति नहीं रहेगी; पर इस परिस्थिति में हमने अपने अस्तित्व को खो दिया,अपने धर्म की सत्ता खो दी,अपनी संस्कृति को खो बैठे,तो हमारा अंत हो जाएगा।
(जनवरी,1931) 
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22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया पोस्ट...
    हाँ...मानसिक रूप से पराधीन तो हम हैं.....
    अपनी संस्कृति को बचाना बहुत ज़रूरी है...
    आभार इस पोस्ट के लिए
    अनु

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    1. अनु जी आपने इस निबंध को पसंद किया,इसके लिए धन्यवाद!!!

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  2. पता नहीं कब पूरी तरह आज़ाद होंगे हम ...गुलामी में तो कुछ भी बचपना संभव नहीं फिर संस्कृति भी कैसे बचेगी.

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    1. प्रेमचंद जी के विचारों ने आपको सोचने पर विवश किया...यही इस लेख की प्रस्तुति का उद्देश्य रहा है।

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  3. इस श्रृंखला के तहत आपने प्रेमचंद जी के उस रूप पर प्रकाश डाला है जिसके बारे में ज़्यादा बात नहीं की जाती, मतलब उनके गद्य लेखन के। आभार आपका इस प्रस्तुति के लिए। उनकी पंक्तियां पुनः कोट करना चाहूंगा जो काफ़ी प्रेरक और अनुकरणीय है।
    “फ्रांसीसी कवि फ्रेंच में कविता करता है,जर्मन,जर्मन में,रूसी रशियन में,कम से कम जिन रचनाओं पर उसे गर्व होता है,वह अपनी ही भाषा में करता है; लेकिन हमारे यहां के सारे कवि और सारे लेखक अंग्रेजी में लिखने लगें ,अगर केवल कोई प्रकाशक उनकी रचनाओं को छापने पर तैयार हो जाए!जिन्हें प्रकाशक मिल जाते हैं,वह चूकते भी नहीं,चाहे अंग्रेज आलोचक उनका मजाक ही क्यों न उड़ाएं; मगर वह खुश हैं।”

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    1. सचमुच भाषा के संबंध में मुंशी प्रेमचंद के विचार प्रेरक हैं।

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  4. आपका कहना बिल्‍कुल सही है ..
    निश्चित तौर पर हमारे देशवासी मानसिक गुलाम बने हुए हैं ..
    एक नजर समग्र गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर भी डालें

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    1. क्या हम कुछ कर सकते हैं,इस मानसिक गुलामी से उबरने के लिए,यह विचारणीय बिंदु है।

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  5. भारतीय सभ्यता और संस्कृति को अपनी लेखनी के माध्यम से अक्षुण्ण रखने वाले रचनाकार मुंशी प्रेमचंद की एक बड़ी विशेषता यह रही है कि वे अपनी साहित्य यात्रा में निरंतर विकासमान रहे। ‘सेवासदन’ और ‘प्रेमाश्रम’ जैसे सुधारवादी उपन्यासों से शुरू करके ‘गोदान’ जैसे यथार्थवादी, कालजयी उपन्यास तक पहुंचे। इसी तरह कहानियों में ‘नमक का दरोगा’ जैसी आदर्शवादी कहानियों से शुरू करके ‘नशा’,‘पूस की रात’,‘बड़े भाई साहब’ और ‘कफन’ तक का लंबा सफर तय किया। आज भले ही हम आधुनिक जीवन पर आधारित साहित्य को एक नए नजरिए से देखते हैं लेकिन जब प्रेमचंद जी की रचना की बात चलती है तो सुधी एवं सूज्ञ लोग भी चुप्पी साध लेते हैं। हिंदी साहित्य के महान कलाकार एवं उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी की यह प्रस्तुति(मानसिक पराधीनता) काफी अच्छी लगी। धन्यवाद।

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  6. premchand ji ke vicharon ko nibandh dwara prastut kar ke aapne hame unke vyaktitv ko janNe ke aur kareeb la diya hai. bahut kuchh samajhne janne ko mila. apki is tarah ki koshish aaj k samay me bahut aawashyak hai. koti koti aabhar.

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    1. आपने लेख को ज्ञानवर्धक पाया और इसने प्रेमचंद जी की जीवन-दृष्टि समझने में आपकी सहायता की. धन्यवाद की आपने इसे समय के अनुरूप पाया।

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  7. हम दैहिक पराधीनता से मुक्त होना तो चाहते हैं; पर मानसिक पराधीनता में अपने-आपको स्वेच्छा से जकड़ते जा रहे हैं। इतने में ही सब कुछ कह गये !!

    बहुत सुंदर आलेख !

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    1. निबंध की प्रशंसा के लिए धन्यवाद!!! किसी भी अच्छे लेखक की यह पहचान होती है कि उसकी रचना का प्रारंभ बहुत सटीक और रचना का आधार होता है। लेख को पसंद करने के लिए धन्यवाद!!!

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  8. हिन्दी-उर्दू से जुड़ा, प्रेमचन्द का नाम।
    धन्य किया साहित्य को, दिया नया आयाम।।

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  9. मानसिक गुलामी से बाहर आने में शायद एक और सदी लग जाए ... पर ये सच है इससे बाहर आए बिना देश की असल प्रगति और विकास जिसके लिए हम जाने जाते रहे हैं विश्व में ... संभव नहीं ..

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    1. सही कहा आपने दिगम्बर नासवा जी. धन्यवाद.

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  10. खरगोश का संगीत राग
    रागेश्री पर आधारित है जो कि खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है,
    स्वरों में कोमल निशाद और बाकी स्वर
    शुद्ध लगते हैं, पंचम इसमें वर्जित है, पर हमने इसमें अंत में पंचम
    का प्रयोग भी किया है,
    जिससे इसमें राग बागेश्री भी झलकता है.
    ..

    हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर ने दिया है.

    .. वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा जंगल में
    चिड़ियों कि चहचाहट से मिलती है.
    ..
    Feel free to visit my weblog - संगीत

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