मंगलवार, 10 जुलाई 2012

हिंदी के अमर कथाकार,उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी



मुंशी प्रेमचंद 
हिंदी के अमर कथाकार, उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई सन्1880 में बनारस के पास लमही नामक गांव में हुआ था। उनके पिता मुंशी अजायबलाल निम्न-मध्यवर्ग के कुलीन कायस्थ थे। वे डाकखाने में मुंशी के पद पर कार्य किया करते थे। अपनी नई आशा में उन्होंने अपने पुत्र का नाम धनपतराय और प्यार का नाम नवाबराय रखा। सन् 1883 में अजायबलाल का स्थानांतरण बांदा हो गया। प्रेमचंद के जन्म के समय से ही इनकी माता बीमार रहने लगी और निर्धनता के कारण उचित चिकित्सा के अभाव में वह पुत्र को सात वर्ष का छोड़ कर स्वर्ग सिधार गई।

इस महीने की 31 तारीख को प्रेमचन्द जी का जन्मदिन है और यह पूरा मास हम “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग टीम की तरफ़ से प्रेमचन्द जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊपर कुछ पोस्ट ला रहे हैं। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है मनोज भारती की रचना।
पांच वर्ष की अवस्था में ही प्रेमचंद को अपनी कुल-परंपरा के अनुसार उर्दू-फारसी पढ़ाना शुरु किया गया। पर वे मदरसे की गणित जैसे रूखे विषयों की पुस्तकों के स्थान पर उपन्यासों को बड़े चाव से पढ़ा करते थे। बचपन में उपन्यास पढ़ने की इस लत ने ही उन में उपन्यास लिखने की प्रवृत्ति भी आगे चल कर जागृत कर दी और धीरे-धीरे वे हिंदी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यास लेखक के पद पर आसीन हो गए। किंतु इस प्रवृत्ति के कारण वे स्कूल की पढ़ाई में और विशेष रूप से गणित में बहुत कमजोर रह गए। पन्द्रहवें वर्ष में पदार्पण करते-करते,जबकि वे अभी नवीं कक्षा में ही पढ़ रहे थे,उनका विवाह भी हो गया। इसी समय उनके पिता का देहांत हो गया। इन दोनों घटनाओं ने प्रेमचंद जी के जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव डाला। छोटे भाई,विमाता तथा पत्नी इन तीनों प्राणियों का पालन-पोषण व अपनी पढ़ाई के खर्च के भार ने पन्द्रह वर्ष की छोटी-सी अवस्था में ही प्रेमचंद जी की कमर तोड़ डाली। विवश होकर स्कूल छोड़ देना पड़ा।

पांच रुपए मासिक की ट्यूशन कर किसी प्रकार से मैट्रिक परीक्षा पास की। गांव से पांच मील चल कर प्रतिदिन कॉलेज पढ़ने जाना,ट्यूशन पढ़ाना,परिवार का पालन-पोषण करना,इन सब शारीरिक और मानसिक कष्टों के कारण प्रेमचंद की दशा अत्यंत दयनीय हो उठी। फिर भी उन्होंने हिम्मत न हारी और दो बार इंटर परीक्षा में प्रविष्ट हुए,पर गणित के कारण दोनों बार ही असफल हुए। ऐसे ही समय में उन्हें स्कूल मास्टर की अठारह रुपए मासिक की नौकरी मिल गई। सन् 1902 में इलाहाबाद ट्रेनिंग कॉलेज से जे.टी.सी. की परीक्षा पास की और वहीं मॉडल स्कूल में हैडमास्टर बन गए। सन् 1908 में वे स्कूलों के सब-डिप्टी इन्सपेक्टर बन कर हमीरपुर पहुंचे, तो वहां आप को बुंदेलखंडी देहातों के दौरों में भारतीय कृषक-जीवन को निकट से देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। 'रानी सारंधा', 'राजा हरदौल' आदि ऐतिहासिक कहानियां यहीं लिखी गई। इसी समय 'सोजे-वतन' नामक देशभक्तिपूर्ण पांच उर्दू कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ। जिसके कारण अंग्रेज सरकार बौखला उठी और पुस्तक की पांच सौ प्रतियां जब्त करके जला दी गई। साथ ही प्रेमचंद जी को भविष्य में ऐसी कोई रचना न लिखने के लिए सावधान भी किया गया।

इस घटना से प्रेमचंद को बड़ा दु:ख हुआ। उन्होंने अपना नाम धनपतराय व नवाबराय से बदलकर 'प्रेमचंद' नाम से साहित्य-निर्माण आरम्भ कर दिया। आगे चलकर इस प्रेमचंद उपनाम से ही वे हिंदी जगत में विख्यात हुए। इन्हीं दिनों उनकी पत्नी उनसे लड़-झगड़ कर मायके चली गई। पत्नी के चले जाने से प्रेमचंद का हृदय संवेदना और सहानुभूति पाने के लिए तड़प उठा। ऐसे ही समय में शिव रानी देवी ने उनके संपर्क में आकर इस महान कलाकार के जीवन-निर्माण में महत्त्वपूर्ण योग दिया।

शिवरानी स्वयं बाल-विधवा थी। जिन रुढ़ियों से प्रेमचंद का हृदय उत्पीड़ित था,वे भी उन्ही की शिकार हो चुकी थी। अत: उन्होंने बड़े साहस के साथ समाज की परवाह न कर विधवा शिवरानी के साथ विवाह कर लिया। शिवरानी में प्रेमचंद जी को मनचाहे गुण प्राप्त हो गए। उनका जीवन सरस,सुंदर और सप्राण हो उठा,जिसका  प्रभाव उनकी आगामी रचनाओं पर भी स्पष्ट लक्षित होता है। पीछे उन्हें अपनी पहली पत्नी के विच्छेद पर पश्चाताप भी हुआ और वे जीवन-भर उसका भरण-पोषण करते रहे,पर शिवरानी देवी के बार-बार आग्रह करने पर भी वे उसे स्वयं बुलाने नहीं गए। उनकी इस मानसिक स्थिति का चित्रण एक आलोचक ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में इस प्रकार किया है- "शायद यह..... प्रेमचंद के भीतरी पुरुष को यह समझौता या प्रत्यावर्तन गवारा न हुआ,यह दूसरी बात है; पर उन्हें इसका ज्ञान जरूर हो गया कि भारतीय नारी के ओज का उन्होंने उचित आदर नहीं किया और अपनी इस गलती का परिमार्जन उन्होंने अपने नारी-पात्रों के उन्नयन में किया! किया तो बंगाल के शरच्चंद्र ने भी है, पर प्रेमचंद की नारी अपनी निष्ठा को नीति से जोड़कर रखती है,जबकि शरत् की नारी नीति के बंधन को तोड़कर निष्ठा का पालन करती है।" शिव रानी के त्याग और धैर्य से प्रेमचंद का साहित्य पनप उठा है। शिवरानी में उन्हें प्रथम प्रीति का उन्माद तो न मिला होगा,पर नारीत्व की पूर्णता मिली,सबसे अधिक उन्हें उनमें मातृत्व की छाया मिली। इसी कारण बाद में उन्होंने अपने आपको शिवरानी की स्नेहमयी रक्षा में बच्चे की भांति सौंप डाला। सन् 1910 में वे इंटर परीक्षा में पास हो गए और बाद में उन्होंने बी.ए. भी कर लिया। 

सन् 1914 में वे स्थानांतरित होकर बस्ती आ पहुंचे जहां उन्हें पंडित मन्नन द्विवेदी गजपुरी के संपर्क से हिंदी में लिखने की प्रबल प्रेरणा प्राप्त हुई। इसी समय 'सेवासदन' समाप्त हुआ। इससे पूर्व 'सप्त सरोज' नामक हिंदी कहानियों का संग्रह पर्याप्त लोकप्रिय हो चुका था। यहां इनकी पेचिश की बीमारी ने उग्र रूप धारण कर लिया,इन्ही दिनों उन्हें गोरखपुर गवर्नमेन्ट नार्मल स्कूल का हैडमास्टर बनाकर भेज दिया गया। वहीं पर इनके प्रथम पुत्र श्रीपतराय का जन्म हुआ। 

सन् 1916 के आसपास इनकी अनुभूति बड़ी तीव्र हो गई और 'प्रेमाश्रम' का प्रारंभ हुआ। महात्मा गांधी के राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रभावित होकर सन् 1921 में आप ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। कानपुर से आप काशी आए,जहां डेढ़ वर्ष तक मर्यादा का संपादन कर काशी विद्यापीठ में अध्यापक बन गए। सन् 1923 में 'सरस्वती प्रेस' की स्थापना की। सन् 1928 में उन्होंने 'माधुरी' का संपादन-भार संभाला और सन् 1930 में 'हँस' नामक एक साहित्यिक पत्र का श्रीगणेश किया। इस मासिक पत्र के साथ-साथ 'जागरण' नामक एक साप्ताहिक पत्र भी प्रारंभ किया। अत्यधिक घाटा उठा कर भी प्रेमचंद जी  इन दोनों पत्रों को सन् 1931 से 1935 तक निरंतर चलाते रहे। 'रंगभूमि','गबन' और 'कर्मभूमि' नामक बड़े-बड़े उपन्यास भी इसी अवधि में प्रकाशित हुए।

अलवर के महाराजा ने उन्हें स्थायी रूप से अपने यहां बुलाना चाहा पर उनकी स्वाभिमानी प्रवृत्ति ने किसी राजा के यहां रहना स्वीकार नहीं किया।

सन् 1934 में वे बम्बई में फिल्म-कंपनी में कहानी लिखने चले गए,पर एक वर्ष में ही वहां के वातावरण से ऊब कर बम्बई छोड़कर बनारस लौट आए। इस समय प्रेमचंद जी का सबसे गौरवमय ग्रंथ 'गोदान' लिखा जाने लगा। सन् 1936 में गोदान प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशित होने के कुछ मास अनन्तर अपने अंतिम उपन्यास 'मंगलसूत्र' को अधुरा ही छोड़कर यह हिंदी का महान कथाकार हम से सदा के लिए विदा हो गया। वास्तव में प्रेमचंद जी ने जीवन-भर आर्थिक संकटों की चक्की में पिसते हुए भी जिस गौरवमय कथा-साहित्य का सृजन किया है उसके कारण वे सदा अमर रहेंगे। 

प्रेमचंद जी वास्तव में हिंदी के एक महान कलाकार थे। नानाविध अभावों से ग्रस्त निम्नमध्यवर्ग का जैसा सजीव सहानुभूतिपूर्ण चित्र प्रेमचंद जी के कथा-साहित्य(कहानी और उपन्यास) में उपलब्ध होता है,वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। पीड़ित मानवता की पुकार को उन्होंने बड़े ध्यान से सुना और उसे बड़े ही मर्मस्पर्शी कलात्मक रूप में विश्व को सुनाया। वे जनता के सच्चे प्रतिनिधि कलाकार थे। यही कारण है कि आज भी उनकी रचनाएं बड़े चाव के साथ पढ़ी जाती हैं। इतना ही नहीं उनकी अनेक रचनाओं का अनुवाद चीनी,रुसी आदि अनेक भाषाओं में अनूदित होकर वहां की जनता के द्वारा सोत्साह पढ़ी जा रही हैं। प्रेमचंद वास्तव में किसी देश या जाति के नहीं प्रत्युत अखंड मानवता के प्रचारक एवं विश्व के महान कलाकार थे।

रचनाएं: प्रेमचंद जी ने कुल मिलाकर तीन सौ से अधिक कहानियां, ग्यारह उपन्यास,तीन जीवनियां,आठ विभिन्न भाषाओं से अनूदित ग्रंथ,अनेक आलोचनात्मक तथा विविध विषयों के निबंध,तीन नाटक और बहुत सा बाल-साहित्य देकर हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि में महत्त्वपूर्ण योग दिया। 

कहानियां: 'मासरोवर' के आठ भागों में उनकी बहुत सी कहानियां संकलित हैं। 'ईदगाह','कफन','अलग्योझा','शतरंज के खिलाड़ी', 'आत्माराम', 'मुक्ति का मार्ग','बेटी का धन', 'बड़े घर की बेटी','डिग्री के रुपए','पंचपरमेश्वर','शंखनाद','दुर्गा का मंदिर','रानी सारंधा','राजा हरदौल','मंदिर और मस्जिद', 'नमक का दारोगा','मंत्र','कामना-तरु','सुजानभगत', 'ईश्वरीय न्याय' ये उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियां गिनी जाती हैं।

प्रेमचंद जी जितने बड़े उपन्यासकार थे उतने ही बड़े कहानीकार भी थे। उनकी कहानियों में जीवन के अनेक रूप,समाज के अनेक चित्र और मनोविज्ञान के अनेक पहलू अंकित हुए हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिस पर प्रेमचंद जी की प्रतिभा ने अपना चमत्कार न दिखाया हो। अनेक छोटी-मोटी समस्याओं का इन कहानियों में समाधान करने का प्रयत्न किया गया है।'रामलीला' कहानी में पाखंड पर चोट की गई है। 'सभ्यता की पोल', में बताया गया है कि जिस काम को करने पर कोई छोटा आदमी दुष्ट समझ लिया जाता है,उसी को कोई बड़ा कर बैठे तो कोई कुछ नहीं कहता। 'उद्धार' में दहेज-प्रथा की भयंकरता दिखाई गई है। 'मोटर के छिंटे', 'सत्याग्रह' आदि में हास्य-व्यंग्य की पुट है। 'आत्माराम' कहानी को जिसमें कंजूस महादेव सुनार को डाकुओं का धन पाकर उदार बनने की कथा के साथ-साथ उसका 'आत्माराम' नामक तोते पर प्रगाढ़ प्रेम दिखाया गया है-इसे प्रेमचंद जी ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कहानियों में गिना है।'दंड' नामक कहानी में अफसरों की रिश्वतखोरी और मुकदमेंबाजी का चित्र खिंचा गया है। 'पंचपरमेश्वर' में पंचायत-प्रथा की महत्ता बताई गई है। 'बड़े घर की बेटी' में संयुक्त परिवार का वर्णन किया गया है। 'शतरंज के खिलाड़ी' में लखनवी नवाबों के ठाठ-बाठ और शतरंज के भयंकर परिणामों को दिखाया गया है। 'अमावस्या की रात्रि 'और 'मंत्र' में डाक्टरों और वैद्यों की स्वार्थमय प्रवृत्ति तथा गरीब जनता की सात्विकता का चित्र चित्र अंकित किया गया है। 'सत्याग्रह','विनोद','मोटेराम की डायरी' और 'बूढ़ी काकी' सुंदर हास्यरस की कहानियां हैं।

उपन्यास: (1) प्रतिज्ञा या प्रेमा(1904)- विधवा समस्या को लेकर लिखा गया है।
(2) वरदान(1906)- इसमें सामयिक राजनैतिक आन्दोलन प्रतिबिम्बित है।
(3) सेवासदन(1914)-नारी समस्या, विशेषत: वेश्या-सुधार और निम्नमध्यवर्ग की दुर्बलता को लेकर लिखा गया है।
(4) प्रेमाश्रम(1918)- इसमें जमींदारों के द्वारा किसानों के शोषण का चित्र मुख्य रूप से अंकित हुआ है।
(5) निर्मला(1923)- इसमें दहेजप्रथा और बेमेल विवाह के दुष्परिणाम दिखानेवाली एक करुण कथा है।
(6) रंगभूमि(1926)- औद्योगिक शोषण,राजनैतिक दासता तथा अंतर-जातीय विवाह की समस्याओं को लेकर चलने वाला एक बड़ा उपन्यास है।
(7) कायाकल्प(1928)- मध्यवर्ग के मिथ्या अभिमान से विद्रोह कर आत्मा के रहस्यों में खो जाने वाली रचना।
(8) गबन(1930)- निम्न-मध्यवर्ग की पारिवारिक समस्या की भयंकरता का सजीव चित्रण है।
(9) कर्मभूमि(1932)- किसान आन्दोलन और अछूतोद्धार को लेकर यह उपन्यास लिखा गया है।
(10)गोदान(1936)- भारतीय किसान के जीवन-संघर्ष को लेकर लिखा गया यह एक महत्त्वपूर्ण गौरवग्रंथ है।
(11) मंगलसूत्र(अपूर्ण 1936) - लेखक की साहित्य साधना में आने वाले कष्टों का इसमें हृदयस्पर्शी चित्र अंकित हुआ है।

निबंध--'कुछ विचार' के नाम से उनके निबंधों का संग्रह प्रकाशित हुआ है।

नाटक--'संग्राम','कर्बला', 'प्रेम की बेदी' -यह तीन प्रेमचंद जी के नाटक हैं।

जीवनियां--'महात्मा शेखसादी', 'दुर्गादास', 'कलम तलवार और त्याग'।

अनुवाद --'सृष्टि का आरंभ'(बर्नाड शॉ), 'टालस्टाय की कहानियां', 'सुखदास'(जार्ज इलियट का साइलस मेरिनर), 'अहंकार','छाया'(अनातोले फ्रांस), 'चांदी की डिबिया','न्याय','हड़ताल' तीनों गाल्सवर्दो के नाटकों का अनुवाद और 'आज़ाद-कथा'(रतननाथ सरशार)।

(मोबाइल: 09855422289)

17 टिप्‍पणियां:

  1. यह है बुधवार की खबर ।

    उत्कृष्ट प्रस्तुति चर्चा मंच पर ।।



    आइये-

    सादर ।।

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    1. धन्यवाद!!! इस लेख की चर्चा चर्चा मंच पर करने हेतु।

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  2. मुंशी प्रेमचंद के विषय में सार्थक जानकारी उपलब्ध कराता लेख ...

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    1. संगीता जी!!! आपका आभार कि लेख आपको पसंद आया।

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  3. संक्षेप में सारी बुनियादी जानकारी समेटी आपने।

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    1. लेख आपको जानकारीप्रद लगा, धन्यवाद!!!

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  4. सम्पूर्ण परिचय ..अच्छा लगा ..

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    1. धन्यवाद!!!कि आपको मुंशी प्रेमचंद के संबंध में दी गई जानकारी परिपूर्ण लगी।

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  5. उत्तर
    1. धन्यवाद!!! जानकारी बढ़ाना और मुंशी प्रेमचंद के बारे में सर्वाधिक जानकारी देना ही इस आलेख का उद्देश्य रहा है।

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  6. पीछे उन्हें अपनी पहली पत्नी के विच्छेद पर पश्चाताप भी हुआ और वे जीवन-भर उसका भरण-पोषण करते रहे,पर शिवरानी देवी के बार-बार आग्रह करने पर भी वे उसे स्वयं बुलाने नहीं गए। उनकी इस मानसिक स्थिति का चित्रण एक आलोचक ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में इस प्रकार किया है- "शायद यह..... प्रेमचंद के भीतरी पुरुष को यह समझौता या प्रत्यावर्तन गवारा न हुआ,यह दूसरी बात है; पर उन्हें इसका ज्ञान जरूर हो गया कि भारतीय नारी के ओज का उन्होंने उचित आदर नहीं किया! किया तो बंगाल के शरच्चंद्र ने भी है, पर प्रेमचंद की नारी अपनी निष्ठा को नीति से जोड़कर रखती है,जबकि शरत् की नारी नीति के बंधन को तोड़कर निष्ठा का पालन करती है।"

    premchand ji ke jeewan ka yah prishth pahli baar padha. aabhar yah sarthak jankari pradaan karane ke liye.

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    1. अनामिका जी आपने जिन पंक्तियों को उद्धृत किया है उसमें कुछ आंशिक संशोधन किया गया है। कृपया पुन: देख लें। त्रुटि के लिए खेद है।

      जानकारी अच्छी लगी, इस हेतु आपका धन्यवाद!!!

      हटाएं
  7. मनोज भारती जी,

    सबसे पहले तो आभार आपका कि हमारे इस आयोजन को आपने आगे बढ़ाया और आशा है कि ३१ जुलाई तक कुछ और योगदान “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग को आप अवश्य देंगे।

    इस आलेख के द्वारा आपने प्रेमचंद साहित्य पर एक समग्र दृष्टि डाली है। उनके समस्त लेखन पर जब हम विहंगम नज़र देते हैं तो पाते हैं कि प्रेमचंद जी उन कथाकारों में से थे, जो यह विश्वास करते थे कि व्यक्ति एक सामाजिक इकाई है। वह समाज की सीमाओं के भीतर ही बनता बिगड़ता है। समाज की सत्ता सर्वोपरि होती है। इसलिए प्रेमचंद जी ने समाज की ज्वलंत समस्याओं की कभी उपेक्षा नहीं की।

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    1. मनोज जी!!! मेरी कोशिश रहेगी की उनके बारे में/उनकी कोई सार्थक रचना जरूर प्रेषित कर पाऊं।

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  8. उर्दू-हिन्दी को दिया, जिसने नव आयाम।
    अमर रहेगा जगत में, मुंशी जी का नाम।।

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    1. आमीन!!! मुंशी जी का नाम साहित्य में अमर रहेगा.

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  9. खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर
    आधारित है जो कि खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है,
    स्वरों में कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं, पंचम
    इसमें वर्जित है, पर हमने इसमें अंत में पंचम का प्रयोग भी
    किया है, जिससे इसमें राग बागेश्री भी झलकता है.

    ..

    हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर ने दिया है.
    .. वेद जी को अपने संगीत
    कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों
    कि चहचाहट से मिलती है.
    ..
    Also visit my blog - हिंदी

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