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मंगलवार, 10 जुलाई 2012

हिंदी के अमर कथाकार,उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी



मुंशी प्रेमचंद 
हिंदी के अमर कथाकार, उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई सन्1880 में बनारस के पास लमही नामक गांव में हुआ था। उनके पिता मुंशी अजायबलाल निम्न-मध्यवर्ग के कुलीन कायस्थ थे। वे डाकखाने में मुंशी के पद पर कार्य किया करते थे। अपनी नई आशा में उन्होंने अपने पुत्र का नाम धनपतराय और प्यार का नाम नवाबराय रखा। सन् 1883 में अजायबलाल का स्थानांतरण बांदा हो गया। प्रेमचंद के जन्म के समय से ही इनकी माता बीमार रहने लगी और निर्धनता के कारण उचित चिकित्सा के अभाव में वह पुत्र को सात वर्ष का छोड़ कर स्वर्ग सिधार गई।

इस महीने की 31 तारीख को प्रेमचन्द जी का जन्मदिन है और यह पूरा मास हम “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग टीम की तरफ़ से प्रेमचन्द जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊपर कुछ पोस्ट ला रहे हैं। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है मनोज भारती की रचना।
पांच वर्ष की अवस्था में ही प्रेमचंद को अपनी कुल-परंपरा के अनुसार उर्दू-फारसी पढ़ाना शुरु किया गया। पर वे मदरसे की गणित जैसे रूखे विषयों की पुस्तकों के स्थान पर उपन्यासों को बड़े चाव से पढ़ा करते थे। बचपन में उपन्यास पढ़ने की इस लत ने ही उन में उपन्यास लिखने की प्रवृत्ति भी आगे चल कर जागृत कर दी और धीरे-धीरे वे हिंदी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यास लेखक के पद पर आसीन हो गए। किंतु इस प्रवृत्ति के कारण वे स्कूल की पढ़ाई में और विशेष रूप से गणित में बहुत कमजोर रह गए। पन्द्रहवें वर्ष में पदार्पण करते-करते,जबकि वे अभी नवीं कक्षा में ही पढ़ रहे थे,उनका विवाह भी हो गया। इसी समय उनके पिता का देहांत हो गया। इन दोनों घटनाओं ने प्रेमचंद जी के जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव डाला। छोटे भाई,विमाता तथा पत्नी इन तीनों प्राणियों का पालन-पोषण व अपनी पढ़ाई के खर्च के भार ने पन्द्रह वर्ष की छोटी-सी अवस्था में ही प्रेमचंद जी की कमर तोड़ डाली। विवश होकर स्कूल छोड़ देना पड़ा।

पांच रुपए मासिक की ट्यूशन कर किसी प्रकार से मैट्रिक परीक्षा पास की। गांव से पांच मील चल कर प्रतिदिन कॉलेज पढ़ने जाना,ट्यूशन पढ़ाना,परिवार का पालन-पोषण करना,इन सब शारीरिक और मानसिक कष्टों के कारण प्रेमचंद की दशा अत्यंत दयनीय हो उठी। फिर भी उन्होंने हिम्मत न हारी और दो बार इंटर परीक्षा में प्रविष्ट हुए,पर गणित के कारण दोनों बार ही असफल हुए। ऐसे ही समय में उन्हें स्कूल मास्टर की अठारह रुपए मासिक की नौकरी मिल गई। सन् 1902 में इलाहाबाद ट्रेनिंग कॉलेज से जे.टी.सी. की परीक्षा पास की और वहीं मॉडल स्कूल में हैडमास्टर बन गए। सन् 1908 में वे स्कूलों के सब-डिप्टी इन्सपेक्टर बन कर हमीरपुर पहुंचे, तो वहां आप को बुंदेलखंडी देहातों के दौरों में भारतीय कृषक-जीवन को निकट से देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। 'रानी सारंधा', 'राजा हरदौल' आदि ऐतिहासिक कहानियां यहीं लिखी गई। इसी समय 'सोजे-वतन' नामक देशभक्तिपूर्ण पांच उर्दू कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ। जिसके कारण अंग्रेज सरकार बौखला उठी और पुस्तक की पांच सौ प्रतियां जब्त करके जला दी गई। साथ ही प्रेमचंद जी को भविष्य में ऐसी कोई रचना न लिखने के लिए सावधान भी किया गया।

इस घटना से प्रेमचंद को बड़ा दु:ख हुआ। उन्होंने अपना नाम धनपतराय व नवाबराय से बदलकर 'प्रेमचंद' नाम से साहित्य-निर्माण आरम्भ कर दिया। आगे चलकर इस प्रेमचंद उपनाम से ही वे हिंदी जगत में विख्यात हुए। इन्हीं दिनों उनकी पत्नी उनसे लड़-झगड़ कर मायके चली गई। पत्नी के चले जाने से प्रेमचंद का हृदय संवेदना और सहानुभूति पाने के लिए तड़प उठा। ऐसे ही समय में शिव रानी देवी ने उनके संपर्क में आकर इस महान कलाकार के जीवन-निर्माण में महत्त्वपूर्ण योग दिया।

शिवरानी स्वयं बाल-विधवा थी। जिन रुढ़ियों से प्रेमचंद का हृदय उत्पीड़ित था,वे भी उन्ही की शिकार हो चुकी थी। अत: उन्होंने बड़े साहस के साथ समाज की परवाह न कर विधवा शिवरानी के साथ विवाह कर लिया। शिवरानी में प्रेमचंद जी को मनचाहे गुण प्राप्त हो गए। उनका जीवन सरस,सुंदर और सप्राण हो उठा,जिसका  प्रभाव उनकी आगामी रचनाओं पर भी स्पष्ट लक्षित होता है। पीछे उन्हें अपनी पहली पत्नी के विच्छेद पर पश्चाताप भी हुआ और वे जीवन-भर उसका भरण-पोषण करते रहे,पर शिवरानी देवी के बार-बार आग्रह करने पर भी वे उसे स्वयं बुलाने नहीं गए। उनकी इस मानसिक स्थिति का चित्रण एक आलोचक ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में इस प्रकार किया है- "शायद यह..... प्रेमचंद के भीतरी पुरुष को यह समझौता या प्रत्यावर्तन गवारा न हुआ,यह दूसरी बात है; पर उन्हें इसका ज्ञान जरूर हो गया कि भारतीय नारी के ओज का उन्होंने उचित आदर नहीं किया और अपनी इस गलती का परिमार्जन उन्होंने अपने नारी-पात्रों के उन्नयन में किया! किया तो बंगाल के शरच्चंद्र ने भी है, पर प्रेमचंद की नारी अपनी निष्ठा को नीति से जोड़कर रखती है,जबकि शरत् की नारी नीति के बंधन को तोड़कर निष्ठा का पालन करती है।" शिव रानी के त्याग और धैर्य से प्रेमचंद का साहित्य पनप उठा है। शिवरानी में उन्हें प्रथम प्रीति का उन्माद तो न मिला होगा,पर नारीत्व की पूर्णता मिली,सबसे अधिक उन्हें उनमें मातृत्व की छाया मिली। इसी कारण बाद में उन्होंने अपने आपको शिवरानी की स्नेहमयी रक्षा में बच्चे की भांति सौंप डाला। सन् 1910 में वे इंटर परीक्षा में पास हो गए और बाद में उन्होंने बी.ए. भी कर लिया। 

सन् 1914 में वे स्थानांतरित होकर बस्ती आ पहुंचे जहां उन्हें पंडित मन्नन द्विवेदी गजपुरी के संपर्क से हिंदी में लिखने की प्रबल प्रेरणा प्राप्त हुई। इसी समय 'सेवासदन' समाप्त हुआ। इससे पूर्व 'सप्त सरोज' नामक हिंदी कहानियों का संग्रह पर्याप्त लोकप्रिय हो चुका था। यहां इनकी पेचिश की बीमारी ने उग्र रूप धारण कर लिया,इन्ही दिनों उन्हें गोरखपुर गवर्नमेन्ट नार्मल स्कूल का हैडमास्टर बनाकर भेज दिया गया। वहीं पर इनके प्रथम पुत्र श्रीपतराय का जन्म हुआ। 

सन् 1916 के आसपास इनकी अनुभूति बड़ी तीव्र हो गई और 'प्रेमाश्रम' का प्रारंभ हुआ। महात्मा गांधी के राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रभावित होकर सन् 1921 में आप ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। कानपुर से आप काशी आए,जहां डेढ़ वर्ष तक मर्यादा का संपादन कर काशी विद्यापीठ में अध्यापक बन गए। सन् 1923 में 'सरस्वती प्रेस' की स्थापना की। सन् 1928 में उन्होंने 'माधुरी' का संपादन-भार संभाला और सन् 1930 में 'हँस' नामक एक साहित्यिक पत्र का श्रीगणेश किया। इस मासिक पत्र के साथ-साथ 'जागरण' नामक एक साप्ताहिक पत्र भी प्रारंभ किया। अत्यधिक घाटा उठा कर भी प्रेमचंद जी  इन दोनों पत्रों को सन् 1931 से 1935 तक निरंतर चलाते रहे। 'रंगभूमि','गबन' और 'कर्मभूमि' नामक बड़े-बड़े उपन्यास भी इसी अवधि में प्रकाशित हुए।

अलवर के महाराजा ने उन्हें स्थायी रूप से अपने यहां बुलाना चाहा पर उनकी स्वाभिमानी प्रवृत्ति ने किसी राजा के यहां रहना स्वीकार नहीं किया।

सन् 1934 में वे बम्बई में फिल्म-कंपनी में कहानी लिखने चले गए,पर एक वर्ष में ही वहां के वातावरण से ऊब कर बम्बई छोड़कर बनारस लौट आए। इस समय प्रेमचंद जी का सबसे गौरवमय ग्रंथ 'गोदान' लिखा जाने लगा। सन् 1936 में गोदान प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशित होने के कुछ मास अनन्तर अपने अंतिम उपन्यास 'मंगलसूत्र' को अधुरा ही छोड़कर यह हिंदी का महान कथाकार हम से सदा के लिए विदा हो गया। वास्तव में प्रेमचंद जी ने जीवन-भर आर्थिक संकटों की चक्की में पिसते हुए भी जिस गौरवमय कथा-साहित्य का सृजन किया है उसके कारण वे सदा अमर रहेंगे। 

प्रेमचंद जी वास्तव में हिंदी के एक महान कलाकार थे। नानाविध अभावों से ग्रस्त निम्नमध्यवर्ग का जैसा सजीव सहानुभूतिपूर्ण चित्र प्रेमचंद जी के कथा-साहित्य(कहानी और उपन्यास) में उपलब्ध होता है,वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। पीड़ित मानवता की पुकार को उन्होंने बड़े ध्यान से सुना और उसे बड़े ही मर्मस्पर्शी कलात्मक रूप में विश्व को सुनाया। वे जनता के सच्चे प्रतिनिधि कलाकार थे। यही कारण है कि आज भी उनकी रचनाएं बड़े चाव के साथ पढ़ी जाती हैं। इतना ही नहीं उनकी अनेक रचनाओं का अनुवाद चीनी,रुसी आदि अनेक भाषाओं में अनूदित होकर वहां की जनता के द्वारा सोत्साह पढ़ी जा रही हैं। प्रेमचंद वास्तव में किसी देश या जाति के नहीं प्रत्युत अखंड मानवता के प्रचारक एवं विश्व के महान कलाकार थे।

रचनाएं: प्रेमचंद जी ने कुल मिलाकर तीन सौ से अधिक कहानियां, ग्यारह उपन्यास,तीन जीवनियां,आठ विभिन्न भाषाओं से अनूदित ग्रंथ,अनेक आलोचनात्मक तथा विविध विषयों के निबंध,तीन नाटक और बहुत सा बाल-साहित्य देकर हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि में महत्त्वपूर्ण योग दिया। 

कहानियां: 'मासरोवर' के आठ भागों में उनकी बहुत सी कहानियां संकलित हैं। 'ईदगाह','कफन','अलग्योझा','शतरंज के खिलाड़ी', 'आत्माराम', 'मुक्ति का मार्ग','बेटी का धन', 'बड़े घर की बेटी','डिग्री के रुपए','पंचपरमेश्वर','शंखनाद','दुर्गा का मंदिर','रानी सारंधा','राजा हरदौल','मंदिर और मस्जिद', 'नमक का दारोगा','मंत्र','कामना-तरु','सुजानभगत', 'ईश्वरीय न्याय' ये उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियां गिनी जाती हैं।

प्रेमचंद जी जितने बड़े उपन्यासकार थे उतने ही बड़े कहानीकार भी थे। उनकी कहानियों में जीवन के अनेक रूप,समाज के अनेक चित्र और मनोविज्ञान के अनेक पहलू अंकित हुए हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिस पर प्रेमचंद जी की प्रतिभा ने अपना चमत्कार न दिखाया हो। अनेक छोटी-मोटी समस्याओं का इन कहानियों में समाधान करने का प्रयत्न किया गया है।'रामलीला' कहानी में पाखंड पर चोट की गई है। 'सभ्यता की पोल', में बताया गया है कि जिस काम को करने पर कोई छोटा आदमी दुष्ट समझ लिया जाता है,उसी को कोई बड़ा कर बैठे तो कोई कुछ नहीं कहता। 'उद्धार' में दहेज-प्रथा की भयंकरता दिखाई गई है। 'मोटर के छिंटे', 'सत्याग्रह' आदि में हास्य-व्यंग्य की पुट है। 'आत्माराम' कहानी को जिसमें कंजूस महादेव सुनार को डाकुओं का धन पाकर उदार बनने की कथा के साथ-साथ उसका 'आत्माराम' नामक तोते पर प्रगाढ़ प्रेम दिखाया गया है-इसे प्रेमचंद जी ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कहानियों में गिना है।'दंड' नामक कहानी में अफसरों की रिश्वतखोरी और मुकदमेंबाजी का चित्र खिंचा गया है। 'पंचपरमेश्वर' में पंचायत-प्रथा की महत्ता बताई गई है। 'बड़े घर की बेटी' में संयुक्त परिवार का वर्णन किया गया है। 'शतरंज के खिलाड़ी' में लखनवी नवाबों के ठाठ-बाठ और शतरंज के भयंकर परिणामों को दिखाया गया है। 'अमावस्या की रात्रि 'और 'मंत्र' में डाक्टरों और वैद्यों की स्वार्थमय प्रवृत्ति तथा गरीब जनता की सात्विकता का चित्र चित्र अंकित किया गया है। 'सत्याग्रह','विनोद','मोटेराम की डायरी' और 'बूढ़ी काकी' सुंदर हास्यरस की कहानियां हैं।

उपन्यास: (1) प्रतिज्ञा या प्रेमा(1904)- विधवा समस्या को लेकर लिखा गया है।
(2) वरदान(1906)- इसमें सामयिक राजनैतिक आन्दोलन प्रतिबिम्बित है।
(3) सेवासदन(1914)-नारी समस्या, विशेषत: वेश्या-सुधार और निम्नमध्यवर्ग की दुर्बलता को लेकर लिखा गया है।
(4) प्रेमाश्रम(1918)- इसमें जमींदारों के द्वारा किसानों के शोषण का चित्र मुख्य रूप से अंकित हुआ है।
(5) निर्मला(1923)- इसमें दहेजप्रथा और बेमेल विवाह के दुष्परिणाम दिखानेवाली एक करुण कथा है।
(6) रंगभूमि(1926)- औद्योगिक शोषण,राजनैतिक दासता तथा अंतर-जातीय विवाह की समस्याओं को लेकर चलने वाला एक बड़ा उपन्यास है।
(7) कायाकल्प(1928)- मध्यवर्ग के मिथ्या अभिमान से विद्रोह कर आत्मा के रहस्यों में खो जाने वाली रचना।
(8) गबन(1930)- निम्न-मध्यवर्ग की पारिवारिक समस्या की भयंकरता का सजीव चित्रण है।
(9) कर्मभूमि(1932)- किसान आन्दोलन और अछूतोद्धार को लेकर यह उपन्यास लिखा गया है।
(10)गोदान(1936)- भारतीय किसान के जीवन-संघर्ष को लेकर लिखा गया यह एक महत्त्वपूर्ण गौरवग्रंथ है।
(11) मंगलसूत्र(अपूर्ण 1936) - लेखक की साहित्य साधना में आने वाले कष्टों का इसमें हृदयस्पर्शी चित्र अंकित हुआ है।

निबंध--'कुछ विचार' के नाम से उनके निबंधों का संग्रह प्रकाशित हुआ है।

नाटक--'संग्राम','कर्बला', 'प्रेम की बेदी' -यह तीन प्रेमचंद जी के नाटक हैं।

जीवनियां--'महात्मा शेखसादी', 'दुर्गादास', 'कलम तलवार और त्याग'।

अनुवाद --'सृष्टि का आरंभ'(बर्नाड शॉ), 'टालस्टाय की कहानियां', 'सुखदास'(जार्ज इलियट का साइलस मेरिनर), 'अहंकार','छाया'(अनातोले फ्रांस), 'चांदी की डिबिया','न्याय','हड़ताल' तीनों गाल्सवर्दो के नाटकों का अनुवाद और 'आज़ाद-कथा'(रतननाथ सरशार)।

(मोबाइल: 09855422289)

बुधवार, 4 जुलाई 2012

प्रेमचन्द : साहित्यिक योगदान


प्रेमचन्द : साहित्यिक योगदान
मनोज कुमार

धनपत राय की शिक्षा  फ़ारसी से शुरू हुई थी। उर्दू में वे नवाब राय के नाम से अफ़साना-निगारी करते थे। चौदह-पन्द्रह वर्ष की उम्र में उन्होंने खेल-खेल में एक नाटक लिख डाला। उनके नाते के मामू की आशनाई एक दलित जाति की स्त्री से हो गई थी, जिसके चलते उन्हें उसके परिवार वालों से पिटना पड़ा था। उसी घटना को आधार बनाकर उन्होंने नाटक की रचना कर डाली थी। लेकिन कायदे से उनकी पहली उर्दू रचना “ओलिवर क्रॉमवेल” नामक लेख था जो 1903 में प्रकाशित हुआ था। यह लेख धनपत राय के नाम से बनारस से प्रकाशित पत्र “आवाज़-ए-ख़ल्क़” में प्रकाशित हुआ था। इसी पत्र में उनका पहला उर्दू उपन्यास “असरारे मआबिर उर्फ़ देवस्थान रहस्य” धारावाहिक के रूप में 1903-04 में प्रकाशित हुआ था।

कानपुर से प्रकाशित “ज़माना” में वे नवाब राय के नाम से लिखते थे। 1906 में उनका दूसरा उपन्यास “हम खुर्मा व हम शवाब” उर्दू में और 1907 में “प्रेमा अर्थात्‌ दो सखियों का विवाह” नाम से हिन्दी में प्रकाशित हुआ। “किशना” उपन्यास भी 1906 में ही प्रकाशित हुआ था। 1907 में उनकी पहली कहानी “‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन” छपी थी। “ज़माना” में 1908 में “इश्क़े दुनिया और हुब्बे वतन” कहानी प्रकाशित हुई थी। ये देश की आज़ादी के लिए अपने को क़ुरबान करने की कहानियां थीं। इसी वर्ष “ज़माना” में ही उनका उर्दू उपन्यास “रूठी रानी” धारावाहिक रूप में प्रकाशित हो रहा था।

जून 1908 में वतन-परस्ती के ज़ज़्बे से लबरेज़ उनका पहला कहानी संग्रह 'सोज़े-वतनप्रकाशित हुआ। इसमें “दुनिया का सबसे अनमोल रतन”, “शेख़ मख़मूर”, “यही मेरा वतन है”, “सिल-ए-मातम” और “इश्क़े दुनिया और हुब्बे वतन” कहानियां संकलित थीं। ये कहानियां बरतानि हुकूमत को हज़म नहीं हुई। किसी प्रकार सरकार को पता चल गया कि इस संग्रह के लेखक ‘नवाब राय’ वास्तव में धनपत राय हैं। नौकरी तो बच गईं पर उनके लिखने पर पाबंदी लगा दी गई। 'सोज़े-वतन'की हज़ारों प्रतियां क्या जली वतन को प्रेमचन्द मिल गया। नवाब की कलम पर हुकूमत की पाबन्दी हो गयी थी। नवाब भूमिगत हो गए किन्तु कलम चलती रही।  लिपि बदल गयी, जुबान कमोबेश वही रहा। तेवर वही रहे और जज्बे में कोई तबदीली मुमकिन थी क्या ?

प्रेमचन्द के नाम से दिसम्बर 1910 में ‘ज़माना’ में उनकी पहली कहानी “बड़े घर की बेटी” छपी। 1915 तक वे प्रेमचन्द के नाम से उर्दू में कहानियां लिखते रहे। इस बीच 1912 में उनका “जलवए-ईसार” नामक उर्दू उपन्यास प्रकाशित हुआ। 1915 के आसपास उनका ध्यान हिन्दी में लिखने की तरफ़ गया। उर्दू अख़बारों से आमदनी कोई खास नहीं थी। हिन्दी में लिखी उनकी पहली कहानी “सौत” थी, जो ‘सरस्वती’ के दिसम्बर 1915 के अंक में प्रकाशित हुई। इस तरह उनका उर्दू और हिंदी में साथ-साथ लिखना शुरू हुआ। 1917 में उर्दू में “बज़ारे हुस्न” उपन्यास प्रकाशित हुआ जो बाद में “सेवा सदन” नाम से हिन्दी में छपा। यह प्रेमचन्द का पहला हिंदी उपन्यास कहा जा सकता है। इसी तरह 1918 में उर्दू में छपा “गोशाए आफ़ियत” हिन्दी में “प्रेमाश्रम” नाम से प्रकाशित हुआ। ‘चौगाने हस्ती” (1922) का हिंदी रूपान्तर “रंगभूमि” नाम से 1925 में छपा। उनका पहला हिंदी में लिखा उपन्यास “कायाकल्प” (1926) है। इसके बाद निर्मला (1927), प्रतिज्ञा (1929), गबन (1931), कर्मभूमि (1932), और गोदान (1936) प्रकाशित हुआ। प्रेमचन्द का एक और अधूरा रह गया उपन्यास “मंगलसूत्र” उनकी मृत्यु के बाद 1948 में प्रकाशित हुआ।

1936 में लखनऊ में एक अधिवेशन में भाषण देते हुए प्रेमचंद जी ने कहा था,
साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”

प्रेमचंद साहित्य को उद्देश्य परक मानते थे। इसीलिए उनके साहित्य में सामान्य मनुष्य कि पृष्ठभूमि में न रखकर केंद्र में रखा गया है और उसकी संवेदना, पीड़ा और संकट को साहित्य में उठाया गया है। प्रेमचंद के पहले हिन्दी उपन्यास साहित्य रोमानी ऐयारी और तिलस्मी प्रभाव में लिखा जा रहा था। उन्होंने उससे इसे मुक्त किया और यथार्थ की ठोस ज़मीन पर उतारा। यथातथ्यवाद की प्रवृत्ति के साथ प्रेमचंद जी हिंदी साहित्य के उपन्यास का पूर्ण और परिष्कृत स्वरूप लेकर आए। आम आदमी की घुटन, चुभन व कसक को अपने कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने प्रतिबिम्बित किया। इन्होंने अपनी रचनाओं में समय को ही पूर्ण रूप से चित्रित नहीं किया वरन भारत के चिंतन व आदर्शों को भी वर्णित किया है। जब हम उनके उपन्यासों का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि उनके साहित्य में ऐसे पात्र भी हैं जो रूढ़ि जर्ज़र संस्कारों से संघर्ष ही नहीं करते बल्कि उन औपनिवेशिक शक्तियों के ख़िलाफ़ भी खड़े होते हैं, जो उनका शोषण कर रहे हैं। उनके पात्रों में में ऐसी व्यक्तिगत विशेषताएं मिलने लगीं जिन्हें सामने पाकर अधिकांश लोगों को यह भासित होता था कि कुछ इसी तरह की विशेषता वाले व्यक्ति को हमने कहीं देखा है।

प्रेमचंद का जीवन औसत भारतीय जन जैसा है। यह साधारणत्व एवं सहजता प्रेमचंद की विशेषता है। परिवार से उन्हें गहरा लगाव था। उनके प्राण अपने लड़कों में बसते थे। प्रेमचंद दरिद्रता में जनमे, दरिद्रता में पले और दरिद्रता से ही जूझते-जूझते समाप्त हो गए। फिर भी वे भारत के महान साहित्यकार बन गए थे। उन्होंने अपने को सदा मज़दूर समझा। बीमारी की हालत में, मरने के कुछ दिन पहले तक भी अपने कमज़ोर शरीर को लिखने पर मज़बूर करते थे। कहते थे, “मैं मज़दूर हूं! मज़दूरी किए बिना  मुझे भोजन का अधिकार नहीं है।”

उनके हृदय में इतनी वेदनाएं, इतने विद्रोह भाव, इतनी चिन्गारिया थी कि वे उसे संभाल नहीं सकते थे। उनका हृदय अगर उसे प्रकट नहीं कर देता तो वे शायद पहले ही बंधन तोड़ देते। धूर्तता और मक्कारी से अनभिज्ञ, विनम्रता की वे प्रतिमूर्ति थे। लाखों-करोडों भूखे, नंगे, निर्धनों की वे ज़बान थे। धार्मिक ढ़कोसलों को ढ़ोंग मानते थे और मानवता को सबसे बड़ी वस्तु। उनके उपन्यासों में उठाई गई प्रत्येक समस्या के मूल में आर्थिक विषमताओं का हाथ है। उनके उपन्यासों में प्रत्येक घटना इसी विषमता को लेकर आगे बढती है। शायद पहली बार शोषित, दलित एवं ग़रीब वर्ग को नायकत्व प्रदान किया। इनमें मुख्य रूप से किसान, मज़दूर और स्त्रियां हैं।

प्रेमचन्द जिस समय लिख रहे थे, वह समय भारतीय समाज में पूंजीवाद का शुरुआती दौर था। पूंजीवाद ने उन सारे रिश्तों को खोखला बना दिया था, जिस पर हमारी सामाजिक संरचना टिकी थी। उन्होंने जीवन के अनुभव के संदर्भ में पूंजीवाद के अमानवीय पहलू को जहां एक ओर उभारा वहीं दूसरी ओर सामाजिक मान्यताओं, अंधविश्वासों और कुरीतियों की आलोचना भी की। सेवासदन, ग़बन, कर्मभूमि, निर्मला, प्रेमाश्रम और गोदान इन सबमें मूल रूप में वही आर्थिक और नैतिक समस्याएं हैं। ‘निर्मला’ में दहेज-प्रथा ने अनमेल विवाह की स्थिति पैदा की। धनाभाव के कारण मुंशी तोताराम के परिवार में संघर्ष चलते हैं। ‘ग़बन’ का नायक रामनाथ ‘गोदान’ के होरी को भी आर्थिक समस्या से जूझना पड़ता है। प्रेमचंद ने जो अभिशाप देखा था, अपने जीवन में भोगा था, उसी को उन्होंने अपने साहित्य में प्रमुख स्थान दिया। डॉ. नगेन्द्र कहते हैं,
“गत युग के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आर्थिक विषमताओं के जितने भी रूप संभव थे, प्रेमचंद की दृष्टि उन सभी पर पड़ी और उन्होंने अपने ढंग से उन सभी का समाधान प्रस्तुत किया है, परन्तु उन्होंने अर्थवैषम्य को सामाजिक जीवन का ग्रंथि नहीं बनने दिया। .. उनके पात्र आर्थिक विषमताओं से पीड़ित हैं परंतु वे बहिर्मुखी संघर्ष द्वारा उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, मानसिक कुंठाओं का शिकार बनकर नहीं रह जाते।”

आज की चर्चा को एक साहित्यकार की टिप्पणियों से विराम देना चाहूंगा,
“प्रेमचन्द कोई फ़रिश्ता नहीं थे, पर शैतान भी नहीं थे; दाने-दाने को मुहताज न थे, पर अमीर भी न थे; बहुत से मामलों में दकियानूस भी थे, पर एक औसत आदमी से ज़्यादा प्रगतिशील और जागरूक थे; अंतर्विरोध उनके चरित्र में था, पर मनोवैज्ञानिक कुंठाओं से ग्रस्त नहीं थे; दुनिया के दस महान साहित्यकारों में उनकी गिनती न हो, पर हज़ारों साहित्यकारों से ऊपर उनका स्थान अवश्य है। प्रेमचन्द एक साधारण इंसान, पर बड़े लेखक हैं। भारतीय कथा साहित्य में उनका स्थान प्रथम पंक्ति में सुरक्षित है। हिंदी कथा साहित्य के सम्राट वे अपने समय में भी थे और आज भी हैं।”
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मंगलवार, 5 जून 2012

गिरता रुपया देश की खोखली अर्थव्यवस्था की ओर कर रहा है इशारा

गिरता रुपया : देश की खोखली अर्थव्यवस्था की ओर इशारा

AIbEiAIAAABDCOfE87DiktCQTiILdmNhcmRfcGhvdG8qKGQyMmMwOTc5M2E3NzM0ZTAwMjc5ZjhkMTk4Y2ZiNjZkYjI1YTljZjAwAWm5rQn5UZTmF-r64rk6zu1s5kWWअरुण चन्द्र रॉय

सबसे पहले बता दूं कि मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं और जो कोई अपना घर चला लेता है वह अर्थशास्त्री ही  है. जहाँ तक देश की  अर्थव्यवस्था का सवाल है, हाल ही  में जिस तरह डालर के मुकाबले रुपया तेज़ी से गिरा है, यह कोई आर्थिक घटना मात्र नहीं है बल्कि देश की खोखली हो चुकी   अर्थव्यवस्था की ओर इशारा कर रहा है.

आम बोलचाल की भाषा में समझे तो डालर के मुकाबले रुपये  के भाव का गिरने का कारण है आयात और निर्यात में अंतर. तकनीकी भाषा में इसे करेंट अकाउंट घाटा कहते हैं. करेंट अकाउंट का तात्पर्य है व्यापार संतुलन अर्थात कुल  निर्यात में से कुल आयात जिसमे उत्पाद और सेवा शामिल हैं को घटाकर प्राप्त आंकड़ा और जिस अर्थव्यवस्था का व्यापार संतुलन सकारात्मक होता है वह सबल और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था मानी जाती है.

बार बार यह जोर देकर कहा जाता है कि देश चौतरफा प्रगति कर रहा  है लेकिन सच बात यह है कि यह प्रगति उधार की है.

चौंकाने वाला तथ्य यह है कि आज़ादी के बाद जब देश विषम परिस्थितियों में था तब भी हमारा व्यापार संतुलन सकारात्मक था और यह स्थिति कमोवेश सत्तर के दशक तक बनी हुई थी. सत्तर के दशक में करेंट अकाउंट घाटा नहीं था बल्कि यह १ बिलियन डालर सकारात्मक था, वहीँ  २०११ में यह घाटा सकल घरेलू उत्पाद का ४% से अधिक हो कर १९ बिलियन यूएस डालर से अधिक पहुच गया है. ऐसे में दुनिया का विश्वास हमारी अर्थव्यवस्था पर डगमगाना बहुत सामान्य है.

फरवरी २०१२ में डालर का मूल्य लगभग ४८ रुपया था लेकिन अचानक क्या हो गया कि इसमें लगभग १६% की गिरावट आ गई और यह ५६ रूपये से अधिक पहुच गया. इसका सबसे बड़ा कारण है भारत का करेंट अकाउंट घाटा जो कि जी ड़ी पी का ४% से अधिक हो गया है, जिसकी भरपाई मुश्किल होती है. ताज्जुब की बात यह है कि जिस देश के प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री अर्थशास्त्री हो और पिछले दस वर्षो से देश की कमान उनके हाथ में हो . वहां  इस घाटे को कम करने के कोई उपाय नहीं किये जा रहे. आम तौर पर जीडीपी का २.५% तक व्यापारिक घाटा सुरक्षित माना जाता है क्योंकि इसकी भरपाई आकस्मिक स्थिति में  ऍफ़ आई आई, एन आर आई डिपोजिट से पूरी की जा सकती  है लेकिन अभी देश एक तरह से कंगाली के ज्वालामुखी पर खड़ा है.

देश में ८०% से अधिक पेट्रोलियम उत्पादों का आयात हो रहा है, साथ ही ऊर्जा के अन्य श्रोतों जैसे कोयले का आयत भी किया जा रहा है. कुछ समय से सोने के आयात में भी काफी मुद्रा की जरुरत हो रही है. इनके आयात पर ना कोई नियंत्रण है न कोई ठोस नीति, फिर रूपये के स्वास्थ्य पर इनका असर पड़ना स्वाभाविक है. फिर भी वर्तमान अवस्था के लिए हमारी नीतियां जिम्मेदार हैं जब भारतीय रुपये  को नब्बे के दशक के मध्य में एक्सचेंज रेट तंत्र में लाया गया. आर्थिक उदारीकरण की दिशा में यह प्रमुख कदम माना गया था लेकिन इस से व्यापर असंतुलन वाली अपनी  अर्थव्यवस्था की मुद्रा को ट्रेडिंग में डाल दिया गया जिससे रुपये  पर विश्व के किसी में कोने में होने वाली आर्थिक घटना का प्रभाव पड़ने लगा. थोड़ी सी स्मृति पर जोर डालेंगे तो पायेंगे कि जैसे ही रुपया एक्सचेज रेट तंत्र में आया वैसे ही एशियाई बाज़ार में संकट आया और रुपया अचानक से डालर के मुकाबले तेज़ी से गिरा था. कुछ ऐसा ही अब हुआ है जब यूरो ज़ोन में अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है, यूरो देशों से निवेश वापिस जा रहा है, एक के बाद एक घोटालो के कारण कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जारी नोटिस के कारण, देश की साख घटी है,  अपना देश चारो ओर से आर्थिक दलदल में है.

वित्त मंत्री और आर बी आई किसी तरह के नीतिगत कदम उठाने में असमर्थ  हैं. सबसे आसान था पेट्रोलियम उत्पादों का दाम बढ़ाना, जो किया जा चुका है, जबकि कच्चे तेल के दाम में हुई कमी के वावजूद देश में पेट्रोल के दाम बढ़ाना, कतई भी तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है. आज परिस्थियाँ पहले से अधिक गंभीर हैं. हमारा व्यापर घाटा लगातार बढ़ रहा है. सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धिदर में कमी आई है. हमारे पारंपरिक आर्थिक आधार जैसे कृषि में नकारात्मक वृद्धि है. ऐसे में यदि अर्थव्यवस्था में अनुशासन नहीं आता है, आयात पर लगाम नहीं लगते हैं तो आने वाला समय हमारी अर्थव्यवस्था के लिए  और भी संकटप्रद होगा. रुपये  के मोल का गिरना केवल रुपये  का गिरना भर नहीं है. यह बता रहा है कि कमजोर पड़ रहे हैं हमारी  अर्थव्यवस्था के  स्तम्भ.

मंगलवार, 8 मई 2012

औद्योगिक उत्पादन में कमी गंभीर आर्थिक बीमारी का संकेत


औद्योगिक उत्पादन में कमी गंभीर आर्थिक बीमारी का संकेत 

अरुण चंद्र रॉय

वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट के दौड़ से गुजर रही है. विकसित देशों में विकास का डर लगातार नकारात्मक हो रहा है. दुनिया भर की निगाहें उन विकासशील और गरीब देशों पर टिकी हैं जहाँ दोहन संभव हो सके. कुछ वर्ष पूर्व भारत भी उन्हीं देशों में से एक था. विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के बिगड़ने का सबसे बड़ा कारण होता है खपत में कमी. मांग में संत्रिप्तता. ऐसे में उनकी कंपनियों को नए बाज़ार की तलाश होती है. कभी नई प्रोद्योगिकी के नाम पर, तो कभी विकास के नए सोपान को दिखा कर विकसित देश पहले उन देशों की अर्थव्यवस्था को बाज़ार के लिए खोलते हैं. भारत में उदारीकरण को इसी घटनाक्रम में देखने की जरुरत है. धीरे धीरे भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी उद्योग और व्यापारिक क्षेत्र निवेश के नाम पर खुले. लेकिन गत दो दशक में सिवाय शहरीकरण, बाजारीकरण और अंधाधुंध उपभोक्तावाद के अधिक कुछ नहीं हासिल नहीं हुआ है. 

पिछले वित्तीय वर्ष में निर्यात और आयात की खाई और भी चौड़ी हो गई है. व्यापारिक संतुलन लगातार ख़राब हो रहा है. आम भाषा में कहें तो विदेशों से हम अधिक खपत करते हैं और हमारे उत्पाद कम मात्रा में दूसरे देशों में जाते हैं. जहाँ हमारा घरेलू उत्पादन, विनिर्माण में लगातार कमी हो रही वहीँ हमारा आयात 31% की दर से बढ़ा है (अप्रैल-अक्टूबर 2012 ) जो कि एक चिंता का विषय है. यह दर्शाता है कि हमारी खपत और मांग विदेशों पर कितनी निर्भर हो गई है. जनवरी 2002 में भारत का व्यापारिक असंतुलन लगभग 2ओ मिलियन अमेरिकी डालर का था जबकि मार्च, 2012 में यह घाटा बढ़ कर 13,906 मिलियन अमेरिकी डालर हो गया है. यह दर्शाता है कि हमारी आत्मनिर्भरता कम होने की बजाय बढ़ी है. आम आदमी के लिए ये आंकडे भले ही समझ ना आये लेकिन अंततः भुक्तभोगी वही होता है. 

हाल में ही जारी औद्यगिक उत्पादन सूचकांक (आई आई पी ) के आंकडे बताते हैं कि औद्योगिक उत्पादन पिछले वित्तीय वर्ष यानि 2011-12 में महज 3.5% की वृद्धि हुई. किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए विनिर्माण, खनन और विद्युत् क्षेत्र का विकास बहुत मायने रखते हैं. भारत जैसे विकासशील देश के लिए विनिर्माण यानि मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र कभी अर्थव्यवस्था का आधार हुआ करता था. जहाँ विनिर्माण क्षेत्र में लोगों को रोजगार मिलता है वहीँ अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ आधार भी. अभी अपने देश के आधे गाँव तक बिजली पहुचनी है, विद्युत् क्षेत्र का विकास भी बहुत महत्वपूर्ण है. किन्तु चिंता की का विषय है कि खनन क्षेत्र में नकारात्मक वृद्धि हुई है, जबकि विनिर्माण क्षेत्र में विकास की गति केवल 3.7 % रहा है जो कि औसत जीडीपी के दर से भी काफी कम है. इस से प्रतीत होता है भारतीय अर्थव्यवस्था के पारंपरिक आधार खिसक रहे हैं. 

बुधवार, 28 मार्च 2012

सरकारी स्कूल नक्सली नहीं परिवर्तनकारी पैदा करते हैं

सरकारी स्कूल नक्सली नहीं परिवर्तनकारी पैदा करते हैं

arunpicअरुण चन्द्र रॉय

अच्छा हुआ कि श्री श्री रविशंकर जी ने यह बयान दिया कि सरकारी स्कूल नक्सली पैदा करते हैं. कम से कम सरकारी स्कूल बनाम पब्लिक स्कूल की एक बहस तो शुरू होगी. इस विषय पर मेरा अध्यनन कुछ नहीं है लेकिन सरकारी स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय से पढ़ कर निकला हूं तो थोडा अहम् को ठेस तो लगा ही है.


पब्लिक स्कूल की अवधारणा 

इतिहास का तो नहीं पता लेकिन मुझे लगता है कि पब्लिक स्कूल की अवधारणा भारत में अंग्रेज़ों के आने के बाद शुरू हुई है. कहीं पढ़ रहा था कि भारत में जातीय और धार्मिक विद्वेष पहले उतना नहीं था, यह तो अंग्रेज़ों ने आकर पैदा किया. उनके हित साधन के लिए, यानी भारत पर शासन करने के लिए भारतीय समाज में दो वर्ग पैदा करना ज़रुरी था, एक जो शासन करे और एक जिस पर शासन चले. शासक वर्ग को तब तक अलग नहीं किया जा सकता था जब तक कि उनके बच्चे को समाज से अलग न हों और वहीं से शुरू हुई अलग स्कूल की जरुरत. यहीं पडी थी पब्लिक स्कूल की नींव. देश आज़ाद तो हुआ लेकिन मानसिकता नहीं बदली. सो चलते रहे इस तरह के स्कूल. आर्थिक उदारीकरण  के बाद समाज में यह खाई और बढ़ी और स्कूल बन गए स्टेटस सिम्बल. पब्लिक स्कूल बन गए बाज़ार. बाज़ार का नियम है एक उत्पाद तब तक नहीं चल सकता जब तक कि उसके प्रतिस्पर्धी उत्पाद को निकृष्ट न दिखाया जाय. बाज़ार में होड़ होना ज़रुरी है. यही होड़ आज अपने चरम पर है जो बेहतर पढाई के नाम पर मध्यवर्गीय भारतीय समाज की जेब काट रहा है.

भारत में विद्यालय

भारत एक विशाल देश है. अधिकाश लोगों को भारत के भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक विषमता और व्यापकता का आभास ही नहीं है.  सरकारी आकड़ों को मान लें, तो भी अभी देश के आधे गाँव में चार घंटे बिजली नहीं पहुची है. सौ लोगों तक की आबादी वाले मोहल्ले तक सड़क पहुचने के लक्ष्य से काफी दूर है अपनी सरकार. ऐसे में स्कूल तक कितनी पहुंच होगी देश के नौनिहालों की, यह सहज सोचा और महसूस किया जा सकता है. देश में अभी लगभग सात लाख प्राथमिक विद्यालय हैं. लेकिन एक बच्चे को 1 से 3 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है प्राथमिक विद्यालय तक पहुचने के लिए.  माध्यमिक विद्यालय तक यह दूरी और बढ़ जाती है. कालेज के लिए तो यह दूरी 25 से 50 किलोमीटर तक भी हो जाती है.  जिन लोगों का कभी गाँव या सुदूर गाँव से पाला नहीं पड़ा है वे सोच भी नहीं सकते हैं कि बिना भवन और शिक्षक के कैसे स्कूल चलते हैं. यह तो है देश में शिक्षा की दयनीय तस्वीर. लेकिन हर दयनीय व्यक्ति नक्सली है, यह नहीं हो सकता.

सरकारी स्कूल बनाम पब्लिक स्कूल 

school1देश में तीन तरह के विद्यालय हैं. एक खास सरकारी. एक पब्लिक स्कूल और एक बड़ा तबका स्कूल का सरकारी स्कूल को बदनाम करते हुए बिना मान्यता के चलते हैं. ऐसे स्कूलों की संख्या बड़ी तादाद में है. खैर यह एक अलग मुद्दा है. 52वे राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण आकडे के अनुसार देश में उच्च विद्यालय में लगभग 86 %  बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और शेष 14 % पब्लिक स्कूलों में, जिसमे असंगठित रूप से चल रहे पब्लिक स्कूल भी शामिल हैं.  सरकारी स्कूल भी तीन तरह के हैं. एक केंद्रीय विद्यालय, जिसमे अधिकांशतः शहरी, सरकारी कर्मचारियों के बच्चे पढ़ते हैं. दूसरे सुदूर क्षेत्र में अवस्थित नवोदय विद्यालय और तीसरे देश के विभिन राज्यों में चलते प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च विद्यालय. गौरतलब है कि इन तीनो विद्यालयों का परीक्षा परिणाम लगातार तथाकथित पब्लिक स्कूलों को पीछे छोड़ रहा है.

schol2एक अध्ययन के अनुसार 2001 से 2011 तक की अवधि में जवाहर नवोदय विद्यालय (जो कि एक सरकारी स्कूल ही है) में दसवी की परीक्षा में सफलता के परिणाम में लगातार सुधार हुआ है और 2001 में 87% पास परिणाम की तुलना में 2011 में पास हुए विद्यार्थियों की प्रतिशतता बढ़ कर 97.5% हो गई है. जबकि पब्लिक स्कूलों की पास प्रतिशतता 2011 में 92 प्रतिशत रही है. केंद्रीय विद्यालयों का औसत भी पब्लिक स्कूलों की तुलना में बेहतर ही है. भारतीय प्रसाशनिक सेवा अधिकारीयों पर किये गए एक अध्यनन के अनुसार 73% आई ए एस अधिकारी ग्रामीण पृष्टभूमि से होते हैं और सरकारी स्कूलों से पढ़े होते हैं. 

जीवन में उपलब्धिया 

एक पुस्तक "डाइवर्सिटी एंड चेंज़ इन माडर्न इण्डिया - एंटोनी ऍफ़ हीथ और रोज़र जेफरी (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) "  के अनुसार भारत में सफल जीवन जीने वाले लोग आम तौर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और उनमे परिवर्तन करने और नेतृत्व क्षमता अधिक होती है. देश में बदलाव लाने वालों की अगली कतार में वे हैं जिनका संघर्ष अधिक रहा है. ऐसे लोगों की सूची में देश के बड़े वैज्ञानिको, खिलाडियों, शिक्षाविदो के नाम हैं जिन्होंने आधुनिक भारत की नीव रखी है. भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का नाम भी इसमें शामिल है. एक शोधपत्र "एक्सेस, सटिस्फैक्शन एंड फ्यूचर : अंडर ग्रैज़ुएट  एजुकेशन इन इण्डिया - आर वर्मा " में स्पष्ट उल्लेख है कि सरकारी स्कूलों और खुद पढ़ कर आये छात्र में रचनात्मकता और नवोंन्मेषण तुलनात्मक रूप से अधिक होती है और वे अपने जीवन को नए नज़रिए से देखते हैं तथा नए समाधान के लिए उत्त्प्रेरक का काम करते हैं.  इसके अतिरिक्त सरकारी स्कूल से सैकड़ों ड्रॉप आउट बच्चे ऐसे हैं जो कुशल, अर्धकुशल कामगार के रूप में देश के आर्थिक विकास में अपना योगदान कर रहे हैं. क्या श्रम का योगदान आर्थिक विकास के चित्र से हटा दिया जायेगा ?

ऐसे में, श्री श्री रविशंकर से आग्रह है,

आप कभी भारत के उन गाँव, कस्बो की यात्रा करें, सरकारी स्कूलों में एक दिन बिताएं, जहाँ बच्चे सूरज, चाँद, खेत खलिहान, फसल, तालाब, पोखर से सीखते हुए बड़े होते हैं. जीवन जीने की कला उनमे प्राकृतिक रूप से आती है. वे नक्सल नहीं होते. वे परिवर्तनगामी होते हैं. 

सरकारी स्कूल – यानी असरकारी स्कूल!

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

भारत और भुखमरी

भारत और भुखमरी

arunpicअरुण चन्द्र रॉय

कुछ माह पूर्व इसी ब्लॉग पर इसी शीर्षक से मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ था. बाद में किसी अखबार ने उसे प्रकाशित कर दिया. ब्लॉग जगत में लोग जिन मुद्दों पर लिखते हैं मुझे भी लग रहा था कि ये क्या मैंने लिख दिया. वास्तव में ब्लॉग जगत एक ऐसी आभासी दुनिया हैं जहाँ से ज़मीनी हक़ीक़त दिखता नहीं शायद. खैर. अभी एक सम्मलेन में प्रधानमंत्री जी ने कहा कि देश में कुपोषण और भुखमरी की हालत शर्मनाक है. हम कई अफ़्रीकी देशों से भी नीचे हैं. लेकिन अफ़सोस कि इतने बड़े मुद्दे को ऐसे ढक दिया गया कि इस पर एक दिन भी चर्चा नहीं हुई. सारी चर्चाएं हाथियों को ढकने पर ही लगी रहीं.

एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार पांच साल के कम के अत्यंत कुपोषित बच्चों की कुल संख्या में से लगभग आधे बच्चे भारत में हैं. विश्व बैंक के मुताबिक दुनिया भर में 146  मिलियन बच्चे कुपोषित हैं और इनमे से लगभग 65 मिलियन बच्चे भारत में हैं. देश में पांच साल से कम के बच्चो में लगभग 46% बच्चो को नियमित भोजन प्राप्त नहीं होता है. एक और अध्ययन के अनुसार लगभग 19 लाख बच्चे जो पैदा तो जीवित होते हैं किन्तु अपना प्रथम जन्मदिन नहीं मना पाते हैं. भारत में प्रत्येक 1000 जीवित पैदा हुए बच्चों में से 32 बच्चे जन्म के कुछ ही माह के बाद कुपोषण का शिकार हो मर जाते हैं. और यह विडम्बनापूर्ण स्थिति केवल अफ़्रीकी देशों में ही है. बच्चो में कुपोषण के मामले में हम हैती, मंगोलिया और वियतनाम जैसे देशो के साथ खड़े हैं.

विश्व के अन्य देशो जहाँ कुपोषण और भुखमरी मौजूद है वह या तो प्रतिकूल प्राकृतिक अवस्था जैसे बाढ़, भूकंप हैं या फिर वे देश युद्ध जैसी परिस्थिति में रह रहे हैं. विडंबना यह है कि ऐसी स्थिति भारत में नहीं है फिर भी देश के आधे बच्चे भूखे रह रहे हैं. यह स्थिति मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, ओड़िसा, बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में अधिक भयावह है. ये वही क्षेत्र हैं जहाँ सरकार की मशीनरी या तो नहीं पहुची है या पहुच कर भी प्रभावी नहीं रही है. राष्ट्रीय स्वस्थ्य सर्वेक्षण में मध्य्रदेश और छतीसगढ़ में बच्चो में कुपोषण की प्रतिशत 60% से भी अधिक है.

आश्चर्य है कि दहाई में जी ड़ी पी में वृद्धि, आर्थिक और सामरिक महाशक्ति का दावा करने वाले देश के प्रधानमंत्री जी को कुपोषण को राष्ट्रीय लज्जा मानना पड़ रहा है और कहना पड़ रहा है कि इस बारे में योजना बनाने की जरुरत है. अब कौन पूछेगा संसद और सरकार से कि इन पैंसठ सालों में सरकार इस बारे में कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठा सकी ? योजना आयोग क्या कर रही थी इन वर्षो में ? चूँकि देश के ये बच्चे ना तो वोट बैंक हैं कि इन पर ध्यान रखा जाए,  न उपजाऊ ज़मीन कि इनके अधिग्रहण के लिए को योजना बने, न ही खनिज खान  कि इनसे राजस्व प्राप्त होगा, या फिर कोई स्पेक्ट्रम भी नहीं हैं ये बच्चे की नीलाम कर दिया जाये कौड़ी के भाव जल्दीबाजी में... !

बुधवार, 9 नवंबर 2011

हिन्दी के पाणिनि - आचार्य किशोरीदास बाजपेई-8

अंक-8

हिन्दी के पाणिनि - आचार्य किशोरीदास बाजपेई

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा अपनी साहित्यिक विरासत नागरी प्रचारिणी सभा काशी को सील बन्द बंडलों में इस निर्देश के साथ दी गयी थी कि वब उनकी मृत्यु के बाद खोली जाए।

इसके बाद 1939 में साहित्य-सम्मेलन का अधिवेशन नागरी प्रचारिणी सभा काशी के परिसर में आयोजित किया गया। जिसमें पं. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी अध्यक्ष थे। इस अधिवेशन में बाबू श्यामसुन्दर दास आदि महानुभाव भी उपस्थित थे। स्वयं आचार्य किशोरीदास वाजपेयी भी अधिवेशन में भाग लेने के लिए वाराणसी पहुँचे थे। इसी अधिवेशन के दौरान आचार्य जी ने नागरी प्रचारिणी सभा के अधिकारियों/पदाधिकारियों से उन बंडलों के विषय में पूछताछ की, पर सभी ने उससे अपनी अनभिज्ञता ही व्यक्त की। अन्त में आचार्य वाजपेयी ने एक प्रस्ताव तैयार कर साहित्य-सम्मेलन के लोगों के सामने रखा कि आचार्य द्विवेदी जी के साहित्यिक दस्तावेजों को सबके सामने खोले जाएँ, ताकि सभी लोग उसे देखें। लेकिन यह प्रस्ताव सम्मेलन के लोगों को ठीक नहीं लगा, क्योंकि साहित्य-सम्मेलन और नागरी प्रचारिणी सभा दोनों अलग-अलग संस्थाएँ हैं और एक दूसरे के काम में दखल देना ठीक नहीं। पर आचार्य वाजपेयी जी को उनकी बातें अच्छी नहीं लगीं। लेकिन राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की बात वे न टाल सके और अपना प्रस्ताव फाड़कर फेंक दिए।

अपना प्रस्ताव फाड़ने के बाद वे वहाँ से उठकर सीधे एक प्रेस गए और एक पर्चा छपवाए। पर्चे में छपा था कि आचार्य द्विवेदी ने जो कागजात प्रचारिणी सभा को सौंपे थे, उन्हें इस अवसर पर खोला जाए। अधिवेशन में पर्चों को आचार्य जी ने तुरन्त वितरित कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप अधिवेशन में कानाफूसी शुरु हो गयी। पर कोई परिणाम सामने नहीं आया।

इसके बाद काशी से लौटने के बाद उन्होंने अपनी माँग विभिन्न पत्रों में भी प्रकाशित करा दी। प्रत्युत्तर में नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से भी पत्रों में प्रकाशित करवाया गया कि आचार्य द्विवेदी जी ने एक बंडल में कुछ रुपये अभिवादन महोत्सव पर दिए थे और वे उनके आदेशानुसार खर्च कर दिए गए। उनके दिए और कोई बंडल सभा के पास नहीं है। इस लिफाफा आन्दोलन पर अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लोग आचार्य वाजपेयी की बातों को निरर्थक सिद्ध करने के लिए अपनी-अपनी बातें प्रकाशित करवाने लगे। यहाँ तक कि बाबू गुलाब राय जी ने भी आगरा से निकलनेवाले साहित्य-संदेश के सम्पादकीय में नागरी प्रचारिणी सभा के पक्ष का काफी जोरदार ढंग से समर्थन किया था। इससे आचार्य वाजपेयी की स्थिति बिलकुल किंकर्तव्यविमूढ़ सी हो गयी थी।

इसी बीच आगरा से प्रकाशित होने वाले साहित्यिक पत्र मराल के संचालक महोदय ने कनखल में आचार्य जी से मिलकर इसके प्रधान सम्पादक के रूप में काम करने का आग्रह किया। आचार्य जी को भी इस समय एक पत्रिका के सहारे की आवश्यकता थी। अतएव बात इस पर तय हो गयी कि आचार्य जी कनखल से ही सम्पादकीय लिखकर भेज दिया करेंगे और सम्पादन का शेष कार्य डॉ. श्यामसुन्दर दीक्षित देखेंगे। इसके बदले जो भी उन्हें मिलेगा, स्वीकार्य होगा।

आचार्य वाजपेयी जी इस पत्र में आचार्य द्विवेदी जी द्वारा सभा को दिए गए बडलों और उनके गायब होने के लिए नागरी प्रचारिणी सभा के विरुद्ध आरोपात्मक बातें लगातार लिखते लगे। जिसका विरोध प्रयाग से प्रकाशित होनेवाले इंडियन प्रेस के देशदूत नामक पत्र में किया गया था। जिसपर आचार्य जी ने मराल में लिखा कि देशदूत इंडियन प्रेस का पत्र है और सभा का प्रकाशन कार्य करता है। अतएव दबाव देकर मालिकों के इशारे पर यह सबकुछ प्रकाशित करवाया गया होगा। इसमें बेचारे सम्पादक क्या करें। परिणाम स्वरूप देशदूत के सम्पादकों ने आचार्य जी को अदालती नोटिस भेजा कि उनकी टिप्पणी से इंडियन प्रेस के मालिकों का अपमान हुआ है, अतएव वे उनसे क्षमा माँगें, नहीं तो अदालत में मानहानि का दावा किया जायगा।

आचार्य जी ने भी उसका जबाब देते हुए चुनौती दे डाली कि ठीक है, अब सब अदालत में ही देखा जाएगा। पर वह केवल बन्दर-घुड़की ही सिद्ध हुई। कोई कहीं नहीं गया। हाँ, मराल का प्रकाशन अवश्य बन्द करवा दिया गया।

इस कार्य के कारण अचार्य वाजपेयी जी की काफी फजीहत हुई। कोई भी पत्र इस सम्बन्ध में उनकी कोई चीज प्रकाशित करने को तैयार नहीं था। लेकिन वे अपने उद्देश्य से विचलित नहीं हुए। वे इस कार्य को गुरु ऋण की तरह मानते थे। उनके हृदय में आचार्य द्विवेदी जी के प्रति असीम श्रद्धा थी। उन दिनों लाहौर से विश्वबन्धु नामक साप्ताहिक पत्र निकलता था। अतएव उन्होंने इस विषय में कुछ न कुछ लिखकर वहाँ से प्रकाशित कराना शुरु कर दिया। जब नागरी प्रचारिणी सभा ने उसपर अपनी आपत्ति की, तो इस पत्र के सम्पादक ने सभा को लिखा कि वाजपेयी जी की बातें तर्क-संगत हैं और सभा को कुछ कहना हो, तो वह लिखकर दे। वे उसे भी प्रकाशित करेंगे। लेकिन एक ही बात को घुमाफिरा कर कितना लिखा जा सकता था, अतएव यहाँ इस मामले को उन्हें विराम देना पड़ा।

इसके बाद तभी आचार्य जी को सभा के प्रधानमंत्री श्री रामबहोरी लाल शुक्ल का एक पत्र मिला, जिसमें लिखा गया था कि सभा के रिकार्ड के अनुसार द्विवेदी जी के कागज-पत्रों का कुछ पता नहीं है और न ही यहाँ के पुराने अधिकारी कुछ बता रहे हैं। लेकिन सभा के दूसरे प्रधानमंत्री उन दस्तावेजों की खिल्ली उड़ा रहे थे। आचार्य जी की आर्थिक स्थिति भी काफी खराब थी। किसी तरह बाल-बच्चों के लिए रूखी-सूखी रोटी जुटा पा रहे थे। वे लिखते हैं कि उनका काफी धन इस ऋषि-श्राद्ध में लग चुका था। इसके बाद भी कोई रास्ता न निकल पाया था और न ही कोई रास्ता सूझ रहा था।

एक दिन इसी ऊहापोह में अपनी आलमारी में पड़ी सरस्वती का द्विवेदी स्मृति अंक उन्होंने निकाला और कई दिन तक वे उसी को उलटते-पुलटते रहे। अन्त में उन्हें उसमें एक लेख पढ़ने को मिला, जिसमें लेखक ने लिखा था कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के भेंट किए कागज-पत्रों के बंडल उनकी मृत्यु के बाद उनके (लेखक के) और उनके मित्र की उपस्थिति में खोले गए थे और वे बड़े ही काम के हैं। लेखक ने हिन्दी जगत से इस बहुमूल्य सामग्री का सदुपयोग करने के लिए अपील की थी।

अब तो मानो आचार्य वाजपेयी जी के हाथों ब्रह्मास्त्र लग गया था। आचार्य जी ने तुरन्त उस लेख को आधार बनाकर नागरी प्रचारिणी सभा को एक अदालती नोटिस दे डाली। नोटिस पंजीकृत डाक से नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमन्त्री के नाम से भेजी गयी। इस नोटिस का असर जादू की तरहा हुआ। एक सप्ताह में ही आचार्य जी को उसका जबाब आ गया, जिसमें लिखा था कि द्विवेदी जी के सभी कागज-पत्र सभा में सुरक्षित हैं और कोई भी सभा में आकर उन्हें देख सकता है। आचार्य जी लिखते हैं कि इस प्रकार यह यज्ञ पूर्णरूपेण सफल हुआ। आचार्य जी ने काशी जाकर उन दस्तावेजों को देखा भी।

पहले तो इस विषय को संक्षेप में लिखना चाहता था। लेकिन बाद में लगा कि जो कार्य आचार्य किशोरीदास वाजपेयी जी के लिए ऋषि-श्राद्ध, गुरु-ऋण और यज्ञ के तुल्य था, तो क्यों न इसके लिए उनके द्वारा किए गए भगीरथ प्रयास को थोड़ा विस्तार से लिखा जाय। इसलिए इसे एक अंक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

अगले अंक में फिर कुछ और।

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मंगलवार, 8 नवंबर 2011

देश को ढूंढना है अभी इस प्रश्न का उत्तर !

देश को ढूंढना है अभी इस प्रश्न का उत्तर !




arunpicअरुण चन्द्र रॉय
पिछले एक महीने में काफी घूमना हुआ. स्क्रीन प्रिंटरों की छोटी अँधेरी गलियों से लेकर कारपोरेट दफ्तरों की चमक दमक तक. दिल्ली की पोश कालोनियों से लेकर बिहार स्थित बिना बिजली सड़क वाले अपने गाँव तक का. कभी बड़े-बड़े ब्रांड के प्रबंधको से लेकर रेडलाईट पर खड़े बच्चों से भी मिला. कुछ बातें मन में उथल पुथल मचा रही थीं. इसी बीच देश के नीति-नियंताओं ने कह दिया कि ३२ रूपये काफी हैं जीवन यापन के लिए.
दिल्ली के विकास मार्ग के अंतिम छोड़ पर करकरडूमा रेडलाईट पर पिंटू नाम का एक लड़का खिलौने बेचता है. पहले लगता था कि ये लड़का उद्यमी है. लेकिन इस से पूछने पर बताया कि माल कोई और दे जाता है और उसे हर खिलौने पर दो रूपये मिलते हैं. कुल मिला कर वह चार हज़ार रूपये कमा लेता है. माननीय मोंटेक साहब के हिसाब से वह गरीबी रेखा से ऊपर है लेकिन उसका जीवन तो देखिये... ट्रैफिक के कम हो जाने के बाद रात को कोई दो बजे करकरडूमा फ्लाई ओवर के नीचे सो जाता है वह. वहीँ पास के नाले के पास शौच जाता है. ढाबे पर खा लेता है. पढाई के नाम पर केवल रूपये गिनने आते हैं उसे. कुछ पैसे जो जमा करता है उसकी माँ आके छीन कर ले जाती है. अफीम, चरस गांजा सब चख चुका है और नियमित नशा करता है. दिल्ली के सैकड़ो रेडलाईट पर कम से कम तीन हज़ार बच्चे हैं जो मेहनत भी करते हैं, पैसे भी कमाते हैं लेकिन उनका जीवन कैसा है, क्या है ! काफी दिनों से पिंटू दिमाग पर छाया हुआ है. अपने बेटे की छवि बार-बार पिंटू में चेहरे पर मोर्फ हो रही है.
एक और चित्र है आलम का. हमारी गली के नुक्कड़ पर एक बाइक पंक्चर बनाने वाली दुकान पर काम करता है. एक दिन बाइक पंक्चर हो गया. मुझे पास में ही जाना था. उसकी दुकान के सामने गुज़र रहा था सो आलम को कहता गया. स्कूटर से चल कर वो मेरे घर तक आया. बाइक से पहिया निकाल कर अपनी दुकान पर ले गया, दस पंद्रह मिनट में बाइक का पहिया लेकर लौटा. उसने सेंट टॉमस स्कूल की टीशर्ट पहन रखी थी. कितना विरोधाभास है. आलम स्कूल क्या मदरसे तक नहीं गया है. पैसे तो चार पांच हज़ार रूपये तक कमा लेता है लेकिन जीवन क्या उसका . वही दुकान पर सोता है. वही जीवन है उसका. जो पैसे बचते हैं वो उसके बाबूजी  लेके जाते हैं. मेरठ के पास किसी गाँव का रहने वाला है आलम. 
मेरे गाँव के एक चाचा हैं.  नोएडा के औद्योगिक सेक्टर में चाय की ठेली लगाते हैं. दस हज़ार रूपये तक कमा लेते हैं लेकिन परिवार के साथ नहीं रह सकते नहीं तो पांच लोगो का परिवार नहीं चल पायेगा. ठेली ही उनका जीवन है पिछले सात आठ वर्षों से.
दिल्ली में आधे से अधिक स्क्रीन प्रिंटर अँधेरी गलियों में हैं. आठ गुणा आठ फुट के कमरे में पंद्रह पंद्रह घंटे काम होता है, कम रौशनी, कम हवा पानी और दस साल से सत्तर साल तक के कामगार. पैसे के लिहाज़ से भले गरीबी रेखा से ऊपर हों लेकिन जीवन क्या है उनका है. एक कमरे में पंद्रह पंद्रह लडको का रहना. ना शिक्षा, ना भविष्य.  झुग्गी पर जब भी चर्चा होती है अक्सर हम कह बैठते हैं कि झुग्गियों में सारी सुविधाएँ मौजूद हैं. टीवी, फ्रिज आदि आदि . लेकिन कभी एक दिन गुज़ार का देखिये. कुछ घंटे रहना मुश्किल है वहां. अमानवीय परिस्थिति में रहते हैं लोग. भले लोग भूखे ना हो लेकिन भूख से बाहर भी तो जिंदगी है.
जब पिछले कुछ महीनो से देश २ ज़ी स्पेक्ट्रम घोटाले, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर इतनी बहस हो रही हो, मुझे लगता है कि देश की नीतियों में ऐसे हजारों बच्चे और कामगारों की गिनती कहाँ है, इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना है बाकी है !

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

चलिए अन्ना गाँव की ओर

चलिए अन्ना गाँव की ओर

arunpicअरुण चन्द्र रॉय

सरकार ने आनन फानन में लोकपाल बिल को संसद में पेश कर दिया है. सब एक ओर से कह रहे हैं, मान रहे हैं कि यह बिल प्रभावी रूप से देश में भ्रष्टाचार को रोकने में कामयाब नहीं होगा. सच भी है. अब अन्ना साहब और उनकी सिविल सोसाइटी ने घोषणा कर दी है कि वे अनशन पर बैठेंगे. सरकार ने अन्ना साहब को बता दिया है कि वे जंतर मंतर पर धरने पर नहीं बैठ सकते. दिल्ली पुलिस ने उन्हें औपचारिक रूप से सूचित भी कर दिया है. अब अन्ना और उनकी टीम किसी वैकल्पिक स्थान की तलाश में हैं. अन्ना और उनकी सिविल सोसाइटी की पहली हार यही है. किसी लोकतान्त्रिक देश में जब आपको किसी खास स्थल पर विरोध प्रदर्शन नहीं करने दिया जाय तो इस से बड़ी अलोकतांत्रिक बात और क्या होगी.

मुझे लगता है कि अन्ना साहब की इस मामले में तैयारी कम थी. जब सरकार संसद में लोकपाल बिल पेश कर रही है तो अन्ना को धरने के लिए उपयुक्त स्थान तलाशने की बजाय जानता के बीच जाना चाहिए. जानता वो नहीं है जो उनके साथ जंतर मंतर पर थी या ई-मेल और फ़ोन के जरिये उनका साथ दे रही थी. जनता वो है जो आज भी दो जून की रोटी के लिए लड़ रही है. जनता वो है जिसके हिस्से का इंदिरा आवास पंचायत तक पहुच कर भी उस तक नहीं पहुचता. जनता वो है जिसे अपने मनरेगा की मजदूरी के लिए गाँव के मुखिया को आधी मजूरी देनी पड़ती है. सरकार न्यूनतम मजदूरी तय करती है और जिन्हें बारह घंटे काम करने के बाद भी वो मजदूरी नहीं मिलती है वे है जनता. और अन्ना जी को जरुर पता होगा कि संसद जो चला रहे हैं वे आपकी बात नहीं सुन रहे, आपसे नहीं डर रहे क्योंकि उन्हें पता है कि आपकी पहुँच वहां तक नहीं है.

सिविल सोसाइटी बनाम पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़

वर्तमान स्थिति और सत्तर के दशक की इमर्जेंसी से काफी मेल खा रही है. जिस तरह २-ज़ी स्पेक्ट्रम घोटाले और राष्ट्र मंडल खेलों में अनियमितता में प्रधानमत्री और उनके कार्यालय पर उंगलियाँ उठ रही हैं.. उच्चतम  न्यायालय तक से फटकार मिल रही और सरकार तानाशाह की तरह व्यव्हार कर रही है, ऐसी ही मिलती जुलती स्थिति १९७५ में भी थी. १२ जून १९७५ को इलाहबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन सिन्हा ने श्रीमती इंदिरागांधी की श्री राजनारायण पर लोकसभा के चुनाव में जीत को खारिज कर दिया था और श्रीमती गाँधी की भ्रष्ट तरीके से चुनाव जीतने के कारण लोकसभा की सदयस्ता समाप्त कर दी थी. उस समय जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, राज नारायण, जॉर्ज फर्नांडीज़ जैसे नेता देश भर के किसानो, मजदूरों, कामगारों और छात्रों को एक जुट करने में लगे थे. जयप्रकाश नारायण की एन जी ओ संस्था पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़ की इसमें प्रमुख भूमिका थी. ये नेतागण देश के कोने कोने में लोगों को कांग्रेस और उसके भ्रष्ट आचरण के खिलाफ खड़ा करने का काम कर रहे थे. ऐसा आन्दोलन स्वतंत्रता पूर्व ही देखा गया था. लेकिन आज परिस्थितियां एक और आन्दोलन के लिए तैयार हैं लेकिन नेतृत्व दिल्ली से निकल कर गाँव, देहात, मजदूरों और कामगारों तक पहुचने में नाकामयाब है. आज की सिविल सोसाइटी और जय प्रकाश नारायण की पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़ में बहुत अंतर है.

चांदनी चौक में सर्वेक्षण : गहराई और गंभीरता दोनों में कमी

अन्ना और उनकी टीम का विज़न कम होता दिख रहा है. उनके सत्याग्रह का प्रभाव कम होता प्रतीत हो रहा है. जिस तरह एक के बाद एक भूषण द्वय पर सरकार की ओर से हमले होने शुरू हुए, जब बाबा रामदेव को रामलीला मैदान से खदेड़ा गया, तभी से सरकार की नीयत साफ़ थी. ऐसे में सबसे बढ़िया रणनीति होती कि आप जनता के पास जाएँ. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अन्ना और उनकी टीम जनता के पास जाने की बजाय राजनीतिक दलों के पास समर्थन के लिए गए. लेकिन यह बात तो साफ़ है कि राजनीति में कोई भी दल ऐसा लोकपाल नहीं चाहेगा जो सांसदों, प्रधानमंत्री को भी कठघरे में खड़ा करने की ताकत रखता हो. हास्यास्पद तो तब लगता है जब अन्ना हजारे की सिविल सोसाइटी चांदनी चौक में सर्वेक्षण करने गए. यदि सर्वेक्षण करना ही था तो करते महाराष्ट्र के गाँव में, मध्य प्रदेश में, बिहार में, गुजरात में, उड़ीसा में, उत्तर प्रदेश में. लेकिन उन धूल भरे गाँव में कौन जाए. इस कारण से अन्ना के सत्याग्रह में गहराई और गंभीरता दोनो में कमी आई है. आम जनता की विश्वशनीयता भी कम हुई है. जो लोग बिल्कुल जमीन से जुड़े हैं वे खुद को अन्ना के सत्याग्रह के साथ जुड़ा महसूस नहीं करते. उन्हें लगने लगा है कि अन्ना और उनकी टीम का लक्ष्य भ्रष्टाचार को ख़त्म करना नहीं बल्कि अपने लिए सुविधाजनक जमीन तैयार करना है. सरकार भी उनकी इस कमजोरी को भांप रही है.

चलो गाँव की ओर
एक समय था जब जॉर्ज फर्नांडीज़ के एक आह्वान पर लाखों रेलवे कर्मचारी क्रांति के लिए तैयार रहते थे. लाखों मिल मजदूर मोरारजी देसाई की एक आवाज़ पर सड़क पर उतर आते थे. जय प्रकाश नारायण, लोहिया, राजनारायण के आह्वान पर देश के किसान और छात्र गाँव गाँव से उठ कर दिल्ली, पटना, लखनऊ से लोहा लेने के लिए तैयार रहते थे. पूरी तरह लोकतान्त्रिक तरीके से. लाठी झेल कर. गोली झेल कर. लेकिन आज के नेतृत्व में वो पहुँच, वह जुझारूपन दिख नहीं रहा. और जब आपकी एक आवाज़ पर लाखो किसान मजदूर भाई बहन संसद पर कूच करने के लिए तैयार रहे तभी सरकार भी सुनती है. देश में भ्रष्टाचार तब तक आम आदमी का प्राथमिक मुद्दा नहीं बन सकता जब तक उसकी रोज़ी-रोटी और छत के मुद्दे का समाधान हो जाये. एक मजदूर यदि अपनी मजदूरी में से दस रूपये देने के लिए तब तक तैयार रहेगा जब तक कि उसके पास कोई विकल्प उपलब्ध नहीं हो जाता है. और उसके सामने यह विकल्प नहीं है न ही निकट भविष्य में कोई विकल्प दिख रहा है. ऐसे में आम जनता का इस मुद्दे के साथ पूरी तरह खड़ा होना अभी दूर ही दिख रहा है. सरकार ने बहुत ही सुनियोजित रूप से किसान, मजदूर की एकता को ख़त्म किया है. 

इसलिए अन्ना हजारे और भूषण द्वय के लिए बेहतर विकल्प है कि इन इन्टरनेट पीढी के वर्चुअल समर्थन के बजाय गाँव, देहात की यात्रा करें, पद यात्रा करें, साइकल यात्रा करें, किसानों से मिले, फैक्ट्री मजदूरों से मिले, निर्माण मजदूरों से मिले, कॉलेज के छात्रो से मिले और उनका समर्थन प्राप्त करें. तभी यह सत्याग्रह देश का आग्रह बन पायेगा. सरकार भी जनता का दवाब महसूस करेगी. अन्यथा सिब्बल साहब धमकी देंगे और आप धरने के लिए वैकल्पिक स्थान और तिथि का का चुनाव करने में अपनी ऊर्जा लगायेंगे.

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

परंपरा भंजक अज्ञेय : एक महाकाव्य सा जीवन

परंपरा भंजक अज्ञेय : एक महाकाव्य सा जीवन
(जन्म शती पर विशेष)
    (जन्म 07 मार्च, 1911 देवरिया जनपद (उ.प्र।)
   

प्रेमसागर सिंह
इस हसीन जिंदगी के सप्तरंगी इंद्रधनुष की तरह अज्ञेय जी की रचनाओं के रंग भी बेशुमार हैं। जिंदगी को जितने रंगों में जिया जा सकता है,अज्ञेय को उससे कहीं ज्यादा रंगों मे कहा जा सकता है। उनकी रचनाओं का चोला कुछ इस अंदाज का है कि जिंदगी का बदलता हुआ हर एक रंग उस पर सजने लगता है और उसकी फबन में चार चाँद लगा देता है। इसीलिए साहित्य जगत में एक लंबी दूरी तय करने तथा पर्दा करने के बाद भी अज्ञेय आज भी ताजा दम हैं, हसीन हैं और दिल नवाज भी। "
                                    
                                   प्रेम सागर सिंह


अज्ञेय हिंदी कविता के ऐसे पुरूष हैं जिनकी जड़े हिंदी कविता में बड़े गहरे समाई हैं। 1937 ई. में अज्ञेय ने सैनिक पत्रिका और पुन: कोलकाता से निकलने वाले विशाल भारत के सम्पादन का कार्य किया। हिंदी साहित्य जगत में पदार्पण के पूर्व सचिदानंद हीरानंद वात्सयायन अज्ञेय  सन 1943 में सेना में भर्ती हो गए लेकिन सन 1947 में सेना की नौकरी छोड़ कर प्रतीक नामक हिंदी पत्र के संपादन कार्य में जुट गए और अपना संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य के चतुर्दिक विकास के लिए समर्पित कर दिया। इसी पत्रिका के माध्यम से वे सचिदानंद हीरानंद वात्सयायन के नाम से साहित्यजगत में प्रतिष्ठित हुए। ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के अवसर पर आयोजित समारोह में अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा था –“ लेखक परंपरा तोड़ता है जैसे किसान भूमि तोड़ता है। मैंने अचेत या मुग्धभाव से नही लिखा :जब परंपरा तोड़ी है तब यह जाना है कि परंपरा तोड़ने के मेरे निर्णय का प्रभाव आने वाली पीढियों पर भी पड़ेगा इस तरह अपने को परंपराभंजक कहे जाने के आरोप को भी साधार ठहराने वाले अज्ञेय का व्यक्तित्व कालजयी है।

अज्ञेय हिंदी कविता में नए कविता के हिमायती ऐसे कवियों में हैं, जिन्होंने कविता के इतिहास पर युगव्यापी प्रभाव छोड़ा है। कविता, कथा साहित्य, उपन्यास, निबंध, संस्मरण, यात्रा-वृत, सभी विधाओं में एक सी गति रखने वाले अज्ञेय अपने जीवन में साहित्य की ऐसी किंवदंती बन गए थे, जिनकी शख्सियत, विचारधारा और काव्यात्मक फलश्रुति को केंद्र मे रख कर एक लंबे काल तक बहसें चलाई गई हैं।  हिंदी कविता जिस तरह प्रगतिवाद मार्क्सवादी दर्शन की अवधारणाओं को रचनाधार बनाकर सामने आई, उसी तरह अज्ञेय ने पश्चिम के कला-आंदोलनों की भूमि पर प्रयोगवाद की नींव स्थापित की। प्रगतिवादी कविता को कलात्मक मानदंडों के निकष पर खारिज करने वाले अज्ञेय ने 1943 में सात कवियों का एक प्रयोगवादी काव्य-संकलन तारसप्तकशीर्षक से संपादित किया। इसी क्रम में दूसरा सप्तक (1957), तीसरा सप्तक (1959) तथा चौथा सप्तक (1979) का प्रकाशन हुआ। इन सप्तकों को लेकर उनके और प्रगतिवादी खेमे के साहित्यकारों के बीच लगातार खिंचाव बना रहा। इनकी निम्नलिखित रचनाएं इन्हे एक सजग रूपवादी कलाकार सिद्ध करती हैं।
    
काव्य- भग्नदूत, चिंता, इत्यलम, हरी घास पर छड़ भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनुष रौंदे हुए थे, अरी ओ करूणा प्रभामय, आँगन के पार-द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि उसे मैं जानता हूँ, सागर मुद्रा, महावृक्ष के नीचे, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ,।
    
उपन्यास- शेखर एक जीवनी (दो भाग), नदी के द्वीप, अपने-अपने अजनबी।

कहानीसंग्रह- विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जय दोल, ये तेरे प्रतिरूप आदि।

 गीति-नाट्य- उत्तर प्रियदर्शी

 निबंध-संग्रह- त्रिशंकु, आत्मनेपद, हिंदी साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य, सब रंग और कुछ राग, भवन्ती, अंतरा, लिखी कागद कोरे, जोग लिखी, अद्यतन, आल-बाल, वत्सर आदि।

यात्रा-वृतांत- अरे यायावर रहेगा याद, एक बूँद सहसा उछली।

अनुवाद- त्याग पत्र (जैनेन्द्र) और श्रीकांत (शरतचंद्र) उपन्यासों का अंग्रेजी अनुवाद।

लगभग पिछले छह दशकों तक अज्ञेय के प्रयोगवाद की काफी धूम रही है। इस बीच उनके कई काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए। पूर्वा, इत्यलम, बावरा अहेरी, हरी घास पर छड़ भर, असाध्य वीणा, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि उसे मैं जानता हूं, महावृक्ष के नीचे, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूं, तथा ऐसा कोई घर आपने देखा है आदि। उनकी शेखर एक जीवनी तथा नदी के द्वीप तो उपन्यास साहित्य में इस शती की मानक कृतियाँ हैं। उनकी कहानियों, निबंधों एवं यात्रा संस्मरणों ने उनके व्यक्तित्व को एक अलग ही आभा दी है। प्रभूत लेखन के बावजूद प्राय: उनकी कलावादी प्रवृतियों के कारण उनके प्रति खास तरह के नकार का भाव भी साहित्यकारों में जड़ जमाए रहा है.परंतु प्रयोगवादी कविता को कोसते हुए अक्सर आलोचक इस तथ्य को नकार जाते हैं कि विषम परिस्थितियों में भी अज्ञेय ने प्रयोगवादी कविता की एक नयी जमीन तैयार की। छायावादी रूढ़ियों को तोड़ कर एक नयी लीक बनायी। हमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्वीकार करना होगा कि प्रयोगवादी कविता अपने वस्तु और रूप में पर्याप्त नयापन लेकर सामने आयी, यह और बात है कि प्रयोगवाद की भी अपनी सीमाएं थीं और अज्ञेय की भी। उनका कहना था कि आज की कविता का मुहावरा वक्तव्यप्रधान रहा है, जिसे साठोत्तर कविता के नायक धूमिल ने सार्थक काव्य-परिणति दी ।

सदैव बहसों के केन्द्र में रहे अज्ञेय के व्यक्तित्व की कृतियाँ नि:सदेह लोगों को आकृष्ट करती रही हैं। उनकी काव्य-यात्रा के साथ-साथ साहित्यिक सांस्कृतिक अंतर्यात्राएं-साहित्यिक गतिविधियाँ नवोन्मेष का परिचायक हैं। उनके अंतिम दिनों की कविता में एक खुलापन दिखाई देता है। अज्ञेय ने अपने अंतिम संकलन ऐसा कोई  घर आपने देखा है”–इस ओर संकेत भी किय़ा है।

मैं सभी ओर से खुला हूँ,
वन-सा, वन-सा अपने में बंद हूँ,
शब्दों में मेरी समाई नही होगी,
मैं सन्नाटे का छंद हूँ।

अज्ञेय जैसे कवि युग की धरोहर हैं। युग का तापमान हैं। ऐसे कवि कभी मरते नही। वे तो बस दूसरा शरीर धारण करते हैं। अज्ञेय ने काल पर अपनी एक ऐसी सनातन छाप छोड़ी है जो सदियों तक मिटने वाली नही है। वे निरंतर अपने शिल्प को तोड़ कर आगे बढते हैं, यहाँ तक की जटिलता तथा नव्यतम प्रयोगों से भरी पूरी उनकी कविता ऐसा कोई घर आपने देखा है-के कुछ अंश नीचे दिए गए हैं।

फिर आउंगा मै भी
लिए झोली में अग्निबीज
धारेगी जिसको धरा
ताप से होगी रत्नप्रसू।.

उनकी एक कविता कलगी बाजरे की का नीचे दिया गया एक अंश उनके सप्तरंगी उदगार को कितना प्रभावित कर जाता हैं-

अगर मैं तुमको ललाती साँझ की नभ की अकेली तारिका 
अब नही कहता,
या शरद के भोर की नीहार-न्हायी कुँई,
टटकी कली चंपे की, वगैरह तो
नही कारण कि मेरा हृदय उथला या सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है।
बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गए हैं।
देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच।

अज्ञेय के जीवन काल से ही उन्हे और मुक्तिबोध को आमने-सामने खड़ा कर देखने की कोशिशें की जाती हैं। यह सच है कि मुक्तिबोध की आलोचनात्मक स्थापनाएं साहसिक एवं सामयिक हैं तथा उनकी कविताओं में युगीन विसंगतियों का प्रभाव देखने को मिलता है। उन्होंने अपने हर अनुभव को वागर्थ की मार्मिकता से संपन्न करना चाहा है, अर्थ के नए स्तरों को स्पर्श करना चाहा है तथा ऐसा कर पाने में वे सफल रहे हैं। अज्ञेय इस भववादी संसार में जीवन के आखिरी छोर पर पहुँच कर ऐसे अद्वितीय, अज्ञेय प्रश्नों से टकराने लगे थे, जिनके उत्तर सहजता से पाए नही जा सकते। एक महाकाव्य की तरह फैले अज्ञेय के जीवन और रचना फलक की भले ही आज अनदेखी की जा रही हो, यह सच है कि अज्ञेय के रचना संसार ने एक  ऐसा अद्वितीय अनुभव-लोक रचा है जिसकी प्रासंगिता सदैव रहेगी।
विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

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