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| मुंशी प्रेमचंद |
मंगलवार, 10 जुलाई 2012
हिंदी के अमर कथाकार,उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी
बुधवार, 4 जुलाई 2012
प्रेमचन्द : साहित्यिक योगदान
“साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”
“गत युग के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में आर्थिक विषमताओं के जितने भी रूप संभव थे, प्रेमचंद की दृष्टि उन सभी पर पड़ी और उन्होंने अपने ढंग से उन सभी का समाधान प्रस्तुत किया है, परन्तु उन्होंने अर्थवैषम्य को सामाजिक जीवन का ग्रंथि नहीं बनने दिया। .. उनके पात्र आर्थिक विषमताओं से पीड़ित हैं परंतु वे बहिर्मुखी संघर्ष द्वारा उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, मानसिक कुंठाओं का शिकार बनकर नहीं रह जाते।”
“प्रेमचन्द कोई फ़रिश्ता नहीं थे, पर शैतान भी नहीं थे; दाने-दाने को मुहताज न थे, पर अमीर भी न थे; बहुत से मामलों में दकियानूस भी थे, पर एक औसत आदमी से ज़्यादा प्रगतिशील और जागरूक थे; अंतर्विरोध उनके चरित्र में था, पर मनोवैज्ञानिक कुंठाओं से ग्रस्त नहीं थे; दुनिया के दस महान साहित्यकारों में उनकी गिनती न हो, पर हज़ारों साहित्यकारों से ऊपर उनका स्थान अवश्य है। प्रेमचन्द एक साधारण इंसान, पर बड़े लेखक हैं। भारतीय कथा साहित्य में उनका स्थान प्रथम पंक्ति में सुरक्षित है। हिंदी कथा साहित्य के सम्राट वे अपने समय में भी थे और आज भी हैं।”***
मंगलवार, 5 जून 2012
गिरता रुपया देश की खोखली अर्थव्यवस्था की ओर कर रहा है इशारा
गिरता रुपया : देश की खोखली अर्थव्यवस्था की ओर इशारा
सबसे पहले बता दूं कि मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं और जो कोई अपना घर चला लेता है वह अर्थशास्त्री ही है. जहाँ तक देश की अर्थव्यवस्था का सवाल है, हाल ही में जिस तरह डालर के मुकाबले रुपया तेज़ी से गिरा है, यह कोई आर्थिक घटना मात्र नहीं है बल्कि देश की खोखली हो चुकी अर्थव्यवस्था की ओर इशारा कर रहा है.
आम बोलचाल की भाषा में समझे तो डालर के मुकाबले रुपये के भाव का गिरने का कारण है आयात और निर्यात में अंतर. तकनीकी भाषा में इसे करेंट अकाउंट घाटा कहते हैं. करेंट अकाउंट का तात्पर्य है व्यापार संतुलन अर्थात कुल निर्यात में से कुल आयात जिसमे उत्पाद और सेवा शामिल हैं को घटाकर प्राप्त आंकड़ा और जिस अर्थव्यवस्था का व्यापार संतुलन सकारात्मक होता है वह सबल और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था मानी जाती है.
बार बार यह जोर देकर कहा जाता है कि देश चौतरफा प्रगति कर रहा है लेकिन सच बात यह है कि यह प्रगति उधार की है.
चौंकाने वाला तथ्य यह है कि आज़ादी के बाद जब देश विषम परिस्थितियों में था तब भी हमारा व्यापार संतुलन सकारात्मक था और यह स्थिति कमोवेश सत्तर के दशक तक बनी हुई थी. सत्तर के दशक में करेंट अकाउंट घाटा नहीं था बल्कि यह १ बिलियन डालर सकारात्मक था, वहीँ २०११ में यह घाटा सकल घरेलू उत्पाद का ४% से अधिक हो कर १९ बिलियन यूएस डालर से अधिक पहुच गया है. ऐसे में दुनिया का विश्वास हमारी अर्थव्यवस्था पर डगमगाना बहुत सामान्य है.
फरवरी २०१२ में डालर का मूल्य लगभग ४८ रुपया था लेकिन अचानक क्या हो गया कि इसमें लगभग १६% की गिरावट आ गई और यह ५६ रूपये से अधिक पहुच गया. इसका सबसे बड़ा कारण है भारत का करेंट अकाउंट घाटा जो कि जी ड़ी पी का ४% से अधिक हो गया है, जिसकी भरपाई मुश्किल होती है. ताज्जुब की बात यह है कि जिस देश के प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री अर्थशास्त्री हो और पिछले दस वर्षो से देश की कमान उनके हाथ में हो . वहां इस घाटे को कम करने के कोई उपाय नहीं किये जा रहे. आम तौर पर जीडीपी का २.५% तक व्यापारिक घाटा सुरक्षित माना जाता है क्योंकि इसकी भरपाई आकस्मिक स्थिति में ऍफ़ आई आई, एन आर आई डिपोजिट से पूरी की जा सकती है लेकिन अभी देश एक तरह से कंगाली के ज्वालामुखी पर खड़ा है.
देश में ८०% से अधिक पेट्रोलियम उत्पादों का आयात हो रहा है, साथ ही ऊर्जा के अन्य श्रोतों जैसे कोयले का आयत भी किया जा रहा है. कुछ समय से सोने के आयात में भी काफी मुद्रा की जरुरत हो रही है. इनके आयात पर ना कोई नियंत्रण है न कोई ठोस नीति, फिर रूपये के स्वास्थ्य पर इनका असर पड़ना स्वाभाविक है. फिर भी वर्तमान अवस्था के लिए हमारी नीतियां जिम्मेदार हैं जब भारतीय रुपये को नब्बे के दशक के मध्य में एक्सचेंज रेट तंत्र में लाया गया. आर्थिक उदारीकरण की दिशा में यह प्रमुख कदम माना गया था लेकिन इस से व्यापर असंतुलन वाली अपनी अर्थव्यवस्था की मुद्रा को ट्रेडिंग में डाल दिया गया जिससे रुपये पर विश्व के किसी में कोने में होने वाली आर्थिक घटना का प्रभाव पड़ने लगा. थोड़ी सी स्मृति पर जोर डालेंगे तो पायेंगे कि जैसे ही रुपया एक्सचेज रेट तंत्र में आया वैसे ही एशियाई बाज़ार में संकट आया और रुपया अचानक से डालर के मुकाबले तेज़ी से गिरा था. कुछ ऐसा ही अब हुआ है जब यूरो ज़ोन में अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है, यूरो देशों से निवेश वापिस जा रहा है, एक के बाद एक घोटालो के कारण कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जारी नोटिस के कारण, देश की साख घटी है, अपना देश चारो ओर से आर्थिक दलदल में है.
वित्त मंत्री और आर बी आई किसी तरह के नीतिगत कदम उठाने में असमर्थ हैं. सबसे आसान था पेट्रोलियम उत्पादों का दाम बढ़ाना, जो किया जा चुका है, जबकि कच्चे तेल के दाम में हुई कमी के वावजूद देश में पेट्रोल के दाम बढ़ाना, कतई भी तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है. आज परिस्थियाँ पहले से अधिक गंभीर हैं. हमारा व्यापर घाटा लगातार बढ़ रहा है. सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धिदर में कमी आई है. हमारे पारंपरिक आर्थिक आधार जैसे कृषि में नकारात्मक वृद्धि है. ऐसे में यदि अर्थव्यवस्था में अनुशासन नहीं आता है, आयात पर लगाम नहीं लगते हैं तो आने वाला समय हमारी अर्थव्यवस्था के लिए और भी संकटप्रद होगा. रुपये के मोल का गिरना केवल रुपये का गिरना भर नहीं है. यह बता रहा है कि कमजोर पड़ रहे हैं हमारी अर्थव्यवस्था के स्तम्भ.
मंगलवार, 8 मई 2012
औद्योगिक उत्पादन में कमी गंभीर आर्थिक बीमारी का संकेत
बुधवार, 28 मार्च 2012
सरकारी स्कूल नक्सली नहीं परिवर्तनकारी पैदा करते हैं
सरकारी स्कूल नक्सली नहीं परिवर्तनकारी पैदा करते हैं
अच्छा हुआ कि श्री श्री रविशंकर जी ने यह बयान दिया कि सरकारी स्कूल नक्सली पैदा करते हैं. कम से कम सरकारी स्कूल बनाम पब्लिक स्कूल की एक बहस तो शुरू होगी. इस विषय पर मेरा अध्यनन कुछ नहीं है लेकिन सरकारी स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय से पढ़ कर निकला हूं तो थोडा अहम् को ठेस तो लगा ही है.
पब्लिक स्कूल की अवधारणा
इतिहास का तो नहीं पता लेकिन मुझे लगता है कि पब्लिक स्कूल की अवधारणा भारत में अंग्रेज़ों के आने के बाद शुरू हुई है. कहीं पढ़ रहा था कि भारत में जातीय और धार्मिक विद्वेष पहले उतना नहीं था, यह तो अंग्रेज़ों ने आकर पैदा किया. उनके हित साधन के लिए, यानी भारत पर शासन करने के लिए भारतीय समाज में दो वर्ग पैदा करना ज़रुरी था, एक जो शासन करे और एक जिस पर शासन चले. शासक वर्ग को तब तक अलग नहीं किया जा सकता था जब तक कि उनके बच्चे को समाज से अलग न हों और वहीं से शुरू हुई अलग स्कूल की जरुरत. यहीं पडी थी पब्लिक स्कूल की नींव. देश आज़ाद तो हुआ लेकिन मानसिकता नहीं बदली. सो चलते रहे इस तरह के स्कूल. आर्थिक उदारीकरण के बाद समाज में यह खाई और बढ़ी और स्कूल बन गए स्टेटस सिम्बल. पब्लिक स्कूल बन गए बाज़ार. बाज़ार का नियम है एक उत्पाद तब तक नहीं चल सकता जब तक कि उसके प्रतिस्पर्धी उत्पाद को निकृष्ट न दिखाया जाय. बाज़ार में होड़ होना ज़रुरी है. यही होड़ आज अपने चरम पर है जो बेहतर पढाई के नाम पर मध्यवर्गीय भारतीय समाज की जेब काट रहा है.
भारत में विद्यालय
भारत एक विशाल देश है. अधिकाश लोगों को भारत के भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक विषमता और व्यापकता का आभास ही नहीं है. सरकारी आकड़ों को मान लें, तो भी अभी देश के आधे गाँव में चार घंटे बिजली नहीं पहुची है. सौ लोगों तक की आबादी वाले मोहल्ले तक सड़क पहुचने के लक्ष्य से काफी दूर है अपनी सरकार. ऐसे में स्कूल तक कितनी पहुंच होगी देश के नौनिहालों की, यह सहज सोचा और महसूस किया जा सकता है. देश में अभी लगभग सात लाख प्राथमिक विद्यालय हैं. लेकिन एक बच्चे को 1 से 3 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है प्राथमिक विद्यालय तक पहुचने के लिए. माध्यमिक विद्यालय तक यह दूरी और बढ़ जाती है. कालेज के लिए तो यह दूरी 25 से 50 किलोमीटर तक भी हो जाती है. जिन लोगों का कभी गाँव या सुदूर गाँव से पाला नहीं पड़ा है वे सोच भी नहीं सकते हैं कि बिना भवन और शिक्षक के कैसे स्कूल चलते हैं. यह तो है देश में शिक्षा की दयनीय तस्वीर. लेकिन हर दयनीय व्यक्ति नक्सली है, यह नहीं हो सकता.
सरकारी स्कूल बनाम पब्लिक स्कूल
देश में तीन तरह के विद्यालय हैं. एक खास सरकारी. एक पब्लिक स्कूल और एक बड़ा तबका स्कूल का सरकारी स्कूल को बदनाम करते हुए बिना मान्यता के चलते हैं. ऐसे स्कूलों की संख्या बड़ी तादाद में है. खैर यह एक अलग मुद्दा है. 52वे राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण आकडे के अनुसार देश में उच्च विद्यालय में लगभग 86 % बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और शेष 14 % पब्लिक स्कूलों में, जिसमे असंगठित रूप से चल रहे पब्लिक स्कूल भी शामिल हैं. सरकारी स्कूल भी तीन तरह के हैं. एक केंद्रीय विद्यालय, जिसमे अधिकांशतः शहरी, सरकारी कर्मचारियों के बच्चे पढ़ते हैं. दूसरे सुदूर क्षेत्र में अवस्थित नवोदय विद्यालय और तीसरे देश के विभिन राज्यों में चलते प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च विद्यालय. गौरतलब है कि इन तीनो विद्यालयों का परीक्षा परिणाम लगातार तथाकथित पब्लिक स्कूलों को पीछे छोड़ रहा है.
एक अध्ययन के अनुसार 2001 से 2011 तक की अवधि में जवाहर नवोदय विद्यालय (जो कि एक सरकारी स्कूल ही है) में दसवी की परीक्षा में सफलता के परिणाम में लगातार सुधार हुआ है और 2001 में 87% पास परिणाम की तुलना में 2011 में पास हुए विद्यार्थियों की प्रतिशतता बढ़ कर 97.5% हो गई है. जबकि पब्लिक स्कूलों की पास प्रतिशतता 2011 में 92 प्रतिशत रही है. केंद्रीय विद्यालयों का औसत भी पब्लिक स्कूलों की तुलना में बेहतर ही है. भारतीय प्रसाशनिक सेवा अधिकारीयों पर किये गए एक अध्यनन के अनुसार 73% आई ए एस अधिकारी ग्रामीण पृष्टभूमि से होते हैं और सरकारी स्कूलों से पढ़े होते हैं.
जीवन में उपलब्धिया
एक पुस्तक "डाइवर्सिटी एंड चेंज़ इन माडर्न इण्डिया - एंटोनी ऍफ़ हीथ और रोज़र जेफरी (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) " के अनुसार भारत में सफल जीवन जीने वाले लोग आम तौर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और उनमे परिवर्तन करने और नेतृत्व क्षमता अधिक होती है. देश में बदलाव लाने वालों की अगली कतार में वे हैं जिनका संघर्ष अधिक रहा है. ऐसे लोगों की सूची में देश के बड़े वैज्ञानिको, खिलाडियों, शिक्षाविदो के नाम हैं जिन्होंने आधुनिक भारत की नीव रखी है. भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का नाम भी इसमें शामिल है. एक शोधपत्र "एक्सेस, सटिस्फैक्शन एंड फ्यूचर : अंडर ग्रैज़ुएट एजुकेशन इन इण्डिया - आर वर्मा " में स्पष्ट उल्लेख है कि सरकारी स्कूलों और खुद पढ़ कर आये छात्र में रचनात्मकता और नवोंन्मेषण तुलनात्मक रूप से अधिक होती है और वे अपने जीवन को नए नज़रिए से देखते हैं तथा नए समाधान के लिए उत्त्प्रेरक का काम करते हैं. इसके अतिरिक्त सरकारी स्कूल से सैकड़ों ड्रॉप आउट बच्चे ऐसे हैं जो कुशल, अर्धकुशल कामगार के रूप में देश के आर्थिक विकास में अपना योगदान कर रहे हैं. क्या श्रम का योगदान आर्थिक विकास के चित्र से हटा दिया जायेगा ?
ऐसे में, श्री श्री रविशंकर से आग्रह है,
आप कभी भारत के उन गाँव, कस्बो की यात्रा करें, सरकारी स्कूलों में एक दिन बिताएं, जहाँ बच्चे सूरज, चाँद, खेत खलिहान, फसल, तालाब, पोखर से सीखते हुए बड़े होते हैं. जीवन जीने की कला उनमे प्राकृतिक रूप से आती है. वे नक्सल नहीं होते. वे परिवर्तनगामी होते हैं.
सरकारी स्कूल – यानी असरकारी स्कूल!
मंगलवार, 17 जनवरी 2012
भारत और भुखमरी
भारत और भुखमरी
कुछ माह पूर्व इसी ब्लॉग पर इसी शीर्षक से मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ था. बाद में किसी अखबार ने उसे प्रकाशित कर दिया. ब्लॉग जगत में लोग जिन मुद्दों पर लिखते हैं मुझे भी लग रहा था कि ये क्या मैंने लिख दिया. वास्तव में ब्लॉग जगत एक ऐसी आभासी दुनिया हैं जहाँ से ज़मीनी हक़ीक़त दिखता नहीं शायद. खैर. अभी एक सम्मलेन में प्रधानमंत्री जी ने कहा कि देश में कुपोषण और भुखमरी की हालत शर्मनाक है. हम कई अफ़्रीकी देशों से भी नीचे हैं. लेकिन अफ़सोस कि इतने बड़े मुद्दे को ऐसे ढक दिया गया कि इस पर एक दिन भी चर्चा नहीं हुई. सारी चर्चाएं हाथियों को ढकने पर ही लगी रहीं.
एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार पांच साल के कम के अत्यंत कुपोषित बच्चों की कुल संख्या में से लगभग आधे बच्चे भारत में हैं. विश्व बैंक के मुताबिक दुनिया भर में 146 मिलियन बच्चे कुपोषित हैं और इनमे से लगभग 65 मिलियन बच्चे भारत में हैं. देश में पांच साल से कम के बच्चो में लगभग 46% बच्चो को नियमित भोजन प्राप्त नहीं होता है. एक और अध्ययन के अनुसार लगभग 19 लाख बच्चे जो पैदा तो जीवित होते हैं किन्तु अपना प्रथम जन्मदिन नहीं मना पाते हैं. भारत में प्रत्येक 1000 जीवित पैदा हुए बच्चों में से 32 बच्चे जन्म के कुछ ही माह के बाद कुपोषण का शिकार हो मर जाते हैं. और यह विडम्बनापूर्ण स्थिति केवल अफ़्रीकी देशों में ही है. बच्चो में कुपोषण के मामले में हम हैती, मंगोलिया और वियतनाम जैसे देशो के साथ खड़े हैं.
विश्व के अन्य देशो जहाँ कुपोषण और भुखमरी मौजूद है वह या तो प्रतिकूल प्राकृतिक अवस्था जैसे बाढ़, भूकंप हैं या फिर वे देश युद्ध जैसी परिस्थिति में रह रहे हैं. विडंबना यह है कि ऐसी स्थिति भारत में नहीं है फिर भी देश के आधे बच्चे भूखे रह रहे हैं. यह स्थिति मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, ओड़िसा, बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में अधिक भयावह है. ये वही क्षेत्र हैं जहाँ सरकार की मशीनरी या तो नहीं पहुची है या पहुच कर भी प्रभावी नहीं रही है. राष्ट्रीय स्वस्थ्य सर्वेक्षण में मध्य्रदेश और छतीसगढ़ में बच्चो में कुपोषण की प्रतिशत 60% से भी अधिक है.
आश्चर्य है कि दहाई में जी ड़ी पी में वृद्धि, आर्थिक और सामरिक महाशक्ति का दावा करने वाले देश के प्रधानमंत्री जी को कुपोषण को राष्ट्रीय लज्जा मानना पड़ रहा है और कहना पड़ रहा है कि इस बारे में योजना बनाने की जरुरत है. अब कौन पूछेगा संसद और सरकार से कि इन पैंसठ सालों में सरकार इस बारे में कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठा सकी ? योजना आयोग क्या कर रही थी इन वर्षो में ? चूँकि देश के ये बच्चे ना तो वोट बैंक हैं कि इन पर ध्यान रखा जाए, न उपजाऊ ज़मीन कि इनके अधिग्रहण के लिए को योजना बने, न ही खनिज खान कि इनसे राजस्व प्राप्त होगा, या फिर कोई स्पेक्ट्रम भी नहीं हैं ये बच्चे की नीलाम कर दिया जाये कौड़ी के भाव जल्दीबाजी में... !
बुधवार, 9 नवंबर 2011
हिन्दी के पाणिनि - आचार्य किशोरीदास बाजपेई-8
अंक-8
हिन्दी के पाणिनि - आचार्य किशोरीदास बाजपेई
आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा अपनी साहित्यिक विरासत नागरी प्रचारिणी सभा काशी को सील बन्द बंडलों में इस निर्देश के साथ दी गयी थी कि वब उनकी मृत्यु के बाद खोली जाए।
इसके बाद 1939 में साहित्य-सम्मेलन का अधिवेशन नागरी प्रचारिणी सभा काशी के परिसर में आयोजित किया गया। जिसमें पं. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी अध्यक्ष थे। इस अधिवेशन में बाबू श्यामसुन्दर दास आदि महानुभाव भी उपस्थित थे। स्वयं आचार्य किशोरीदास वाजपेयी भी अधिवेशन में भाग लेने के लिए वाराणसी पहुँचे थे। इसी अधिवेशन के दौरान आचार्य जी ने नागरी प्रचारिणी सभा के अधिकारियों/पदाधिकारियों से उन बंडलों के विषय में पूछताछ की, पर सभी ने उससे अपनी अनभिज्ञता ही व्यक्त की। अन्त में आचार्य वाजपेयी ने एक प्रस्ताव तैयार कर साहित्य-सम्मेलन के लोगों के सामने रखा कि आचार्य द्विवेदी जी के साहित्यिक दस्तावेजों को सबके सामने खोले जाएँ, ताकि सभी लोग उसे देखें। लेकिन यह प्रस्ताव सम्मेलन के लोगों को ठीक नहीं लगा, क्योंकि साहित्य-सम्मेलन और नागरी प्रचारिणी सभा दोनों अलग-अलग संस्थाएँ हैं और एक दूसरे के काम में दखल देना ठीक नहीं। पर आचार्य वाजपेयी जी को उनकी बातें अच्छी नहीं लगीं। लेकिन राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की बात वे न टाल सके और अपना प्रस्ताव फाड़कर फेंक दिए।
अपना प्रस्ताव फाड़ने के बाद वे वहाँ से उठकर सीधे एक प्रेस गए और एक पर्चा छपवाए। पर्चे में छपा था कि आचार्य द्विवेदी ने जो कागजात प्रचारिणी सभा को सौंपे थे, उन्हें इस अवसर पर खोला जाए। अधिवेशन में पर्चों को आचार्य जी ने तुरन्त वितरित कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप अधिवेशन में कानाफूसी शुरु हो गयी। पर कोई परिणाम सामने नहीं आया।
इसके बाद काशी से लौटने के बाद उन्होंने अपनी माँग विभिन्न पत्रों में भी प्रकाशित करा दी। प्रत्युत्तर में नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से भी पत्रों में प्रकाशित करवाया गया कि आचार्य द्विवेदी जी ने एक बंडल में कुछ रुपये अभिवादन महोत्सव पर दिए थे और वे उनके आदेशानुसार खर्च कर दिए गए। उनके दिए और कोई बंडल सभा के पास नहीं है। इस लिफाफा आन्दोलन पर अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लोग आचार्य वाजपेयी की बातों को निरर्थक सिद्ध करने के लिए अपनी-अपनी बातें प्रकाशित करवाने लगे। यहाँ तक कि बाबू गुलाब राय जी ने भी आगरा से निकलनेवाले साहित्य-संदेश के सम्पादकीय में नागरी प्रचारिणी सभा के पक्ष का काफी जोरदार ढंग से समर्थन किया था। इससे आचार्य वाजपेयी की स्थिति बिलकुल किंकर्तव्यविमूढ़ सी हो गयी थी।
इसी बीच आगरा से प्रकाशित होने वाले साहित्यिक पत्र मराल के संचालक महोदय ने कनखल में आचार्य जी से मिलकर इसके प्रधान सम्पादक के रूप में काम करने का आग्रह किया। आचार्य जी को भी इस समय एक पत्रिका के सहारे की आवश्यकता थी। अतएव बात इस पर तय हो गयी कि आचार्य जी कनखल से ही सम्पादकीय लिखकर भेज दिया करेंगे और सम्पादन का शेष कार्य डॉ. श्यामसुन्दर दीक्षित देखेंगे। इसके बदले जो भी उन्हें मिलेगा, स्वीकार्य होगा।
आचार्य वाजपेयी जी इस पत्र में आचार्य द्विवेदी जी द्वारा सभा को दिए गए बडलों और उनके गायब होने के लिए नागरी प्रचारिणी सभा के विरुद्ध आरोपात्मक बातें लगातार लिखते लगे। जिसका विरोध प्रयाग से प्रकाशित होनेवाले इंडियन प्रेस के देशदूत नामक पत्र में किया गया था। जिसपर आचार्य जी ने मराल में लिखा कि देशदूत इंडियन प्रेस का पत्र है और सभा का प्रकाशन कार्य करता है। अतएव दबाव देकर मालिकों के इशारे पर यह सबकुछ प्रकाशित करवाया गया होगा। इसमें बेचारे सम्पादक क्या करें। परिणाम स्वरूप देशदूत के सम्पादकों ने आचार्य जी को अदालती नोटिस भेजा कि उनकी टिप्पणी से इंडियन प्रेस के मालिकों का अपमान हुआ है, अतएव वे उनसे क्षमा माँगें, नहीं तो अदालत में मानहानि का दावा किया जायगा।
आचार्य जी ने भी उसका जबाब देते हुए चुनौती दे डाली कि ठीक है, अब सब अदालत में ही देखा जाएगा। पर वह केवल बन्दर-घुड़की ही सिद्ध हुई। कोई कहीं नहीं गया। हाँ, मराल का प्रकाशन अवश्य बन्द करवा दिया गया।
इस कार्य के कारण अचार्य वाजपेयी जी की काफी फजीहत हुई। कोई भी पत्र इस सम्बन्ध में उनकी कोई चीज प्रकाशित करने को तैयार नहीं था। लेकिन वे अपने उद्देश्य से विचलित नहीं हुए। वे इस कार्य को गुरु ऋण की तरह मानते थे। उनके हृदय में आचार्य द्विवेदी जी के प्रति असीम श्रद्धा थी। उन दिनों लाहौर से विश्वबन्धु नामक साप्ताहिक पत्र निकलता था। अतएव उन्होंने इस विषय में कुछ न कुछ लिखकर वहाँ से प्रकाशित कराना शुरु कर दिया। जब नागरी प्रचारिणी सभा ने उसपर अपनी आपत्ति की, तो इस पत्र के सम्पादक ने सभा को लिखा कि वाजपेयी जी की बातें तर्क-संगत हैं और सभा को कुछ कहना हो, तो वह लिखकर दे। वे उसे भी प्रकाशित करेंगे। लेकिन एक ही बात को घुमाफिरा कर कितना लिखा जा सकता था, अतएव यहाँ इस मामले को उन्हें विराम देना पड़ा।
इसके बाद तभी आचार्य जी को सभा के प्रधानमंत्री श्री रामबहोरी लाल शुक्ल का एक पत्र मिला, जिसमें लिखा गया था कि सभा के रिकार्ड के अनुसार द्विवेदी जी के कागज-पत्रों का कुछ पता नहीं है और न ही यहाँ के पुराने अधिकारी कुछ बता रहे हैं। लेकिन सभा के दूसरे प्रधानमंत्री उन दस्तावेजों की खिल्ली उड़ा रहे थे। आचार्य जी की आर्थिक स्थिति भी काफी खराब थी। किसी तरह बाल-बच्चों के लिए रूखी-सूखी रोटी जुटा पा रहे थे। वे लिखते हैं कि उनका काफी धन इस ऋषि-श्राद्ध में लग चुका था। इसके बाद भी कोई रास्ता न निकल पाया था और न ही कोई रास्ता सूझ रहा था।
एक दिन इसी ऊहापोह में अपनी आलमारी में पड़ी सरस्वती का द्विवेदी स्मृति अंक उन्होंने निकाला और कई दिन तक वे उसी को उलटते-पुलटते रहे। अन्त में उन्हें उसमें एक लेख पढ़ने को मिला, जिसमें लेखक ने लिखा था कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के भेंट किए कागज-पत्रों के बंडल उनकी मृत्यु के बाद उनके (लेखक के) और उनके मित्र की उपस्थिति में खोले गए थे और वे बड़े ही काम के हैं। लेखक ने हिन्दी जगत से इस बहुमूल्य सामग्री का सदुपयोग करने के लिए अपील की थी।
अब तो मानो आचार्य वाजपेयी जी के हाथों ब्रह्मास्त्र लग गया था। आचार्य जी ने तुरन्त उस लेख को आधार बनाकर नागरी प्रचारिणी सभा को एक अदालती नोटिस दे डाली। नोटिस पंजीकृत डाक से नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमन्त्री के नाम से भेजी गयी। इस नोटिस का असर जादू की तरहा हुआ। एक सप्ताह में ही आचार्य जी को उसका जबाब आ गया, जिसमें लिखा था कि द्विवेदी जी के सभी कागज-पत्र सभा में सुरक्षित हैं और कोई भी सभा में आकर उन्हें देख सकता है। आचार्य जी लिखते हैं कि इस प्रकार यह यज्ञ पूर्णरूपेण सफल हुआ। आचार्य जी ने काशी जाकर उन दस्तावेजों को देखा भी।
पहले तो इस विषय को संक्षेप में लिखना चाहता था। लेकिन बाद में लगा कि जो कार्य आचार्य किशोरीदास वाजपेयी जी के लिए ऋषि-श्राद्ध, गुरु-ऋण और यज्ञ के तुल्य था, तो क्यों न इसके लिए उनके द्वारा किए गए भगीरथ प्रयास को थोड़ा विस्तार से लिखा जाय। इसलिए इसे एक अंक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
अगले अंक में फिर कुछ और।
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मंगलवार, 8 नवंबर 2011
देश को ढूंढना है अभी इस प्रश्न का उत्तर !
मंगलवार, 9 अगस्त 2011
चलिए अन्ना गाँव की ओर
चलिए अन्ना गाँव की ओर
सरकार ने आनन फानन में लोकपाल बिल को संसद में पेश कर दिया है. सब एक ओर से कह रहे हैं, मान रहे हैं कि यह बिल प्रभावी रूप से देश में भ्रष्टाचार को रोकने में कामयाब नहीं होगा. सच भी है. अब अन्ना साहब और उनकी सिविल सोसाइटी ने घोषणा कर दी है कि वे अनशन पर बैठेंगे. सरकार ने अन्ना साहब को बता दिया है कि वे जंतर मंतर पर धरने पर नहीं बैठ सकते. दिल्ली पुलिस ने उन्हें औपचारिक रूप से सूचित भी कर दिया है. अब अन्ना और उनकी टीम किसी वैकल्पिक स्थान की तलाश में हैं. अन्ना और उनकी सिविल सोसाइटी की पहली हार यही है. किसी लोकतान्त्रिक देश में जब आपको किसी खास स्थल पर विरोध प्रदर्शन नहीं करने दिया जाय तो इस से बड़ी अलोकतांत्रिक बात और क्या होगी.
मुझे लगता है कि अन्ना साहब की इस मामले में तैयारी कम थी. जब सरकार संसद में लोकपाल बिल पेश कर रही है तो अन्ना को धरने के लिए उपयुक्त स्थान तलाशने की बजाय जानता के बीच जाना चाहिए. जानता वो नहीं है जो उनके साथ जंतर मंतर पर थी या ई-मेल और फ़ोन के जरिये उनका साथ दे रही थी. जनता वो है जो आज भी दो जून की रोटी के लिए लड़ रही है. जनता वो है जिसके हिस्से का इंदिरा आवास पंचायत तक पहुच कर भी उस तक नहीं पहुचता. जनता वो है जिसे अपने मनरेगा की मजदूरी के लिए गाँव के मुखिया को आधी मजूरी देनी पड़ती है. सरकार न्यूनतम मजदूरी तय करती है और जिन्हें बारह घंटे काम करने के बाद भी वो मजदूरी नहीं मिलती है वे है जनता. और अन्ना जी को जरुर पता होगा कि संसद जो चला रहे हैं वे आपकी बात नहीं सुन रहे, आपसे नहीं डर रहे क्योंकि उन्हें पता है कि आपकी पहुँच वहां तक नहीं है.
सिविल सोसाइटी बनाम पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़
वर्तमान स्थिति और सत्तर के दशक की इमर्जेंसी से काफी मेल खा रही है. जिस तरह २-ज़ी स्पेक्ट्रम घोटाले और राष्ट्र मंडल खेलों में अनियमितता में प्रधानमत्री और उनके कार्यालय पर उंगलियाँ उठ रही हैं.. उच्चतम न्यायालय तक से फटकार मिल रही और सरकार तानाशाह की तरह व्यव्हार कर रही है, ऐसी ही मिलती जुलती स्थिति १९७५ में भी थी. १२ जून १९७५ को इलाहबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन सिन्हा ने श्रीमती इंदिरागांधी की श्री राजनारायण पर लोकसभा के चुनाव में जीत को खारिज कर दिया था और श्रीमती गाँधी की भ्रष्ट तरीके से चुनाव जीतने के कारण लोकसभा की सदयस्ता समाप्त कर दी थी. उस समय जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, राज नारायण, जॉर्ज फर्नांडीज़ जैसे नेता देश भर के किसानो, मजदूरों, कामगारों और छात्रों को एक जुट करने में लगे थे. जयप्रकाश नारायण की एन जी ओ संस्था पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़ की इसमें प्रमुख भूमिका थी. ये नेतागण देश के कोने कोने में लोगों को कांग्रेस और उसके भ्रष्ट आचरण के खिलाफ खड़ा करने का काम कर रहे थे. ऐसा आन्दोलन स्वतंत्रता पूर्व ही देखा गया था. लेकिन आज परिस्थितियां एक और आन्दोलन के लिए तैयार हैं लेकिन नेतृत्व दिल्ली से निकल कर गाँव, देहात, मजदूरों और कामगारों तक पहुचने में नाकामयाब है. आज की सिविल सोसाइटी और जय प्रकाश नारायण की पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़ में बहुत अंतर है.
चांदनी चौक में सर्वेक्षण : गहराई और गंभीरता दोनों में कमी
अन्ना और उनकी टीम का विज़न कम होता दिख रहा है. उनके सत्याग्रह का प्रभाव कम होता प्रतीत हो रहा है. जिस तरह एक के बाद एक भूषण द्वय पर सरकार की ओर से हमले होने शुरू हुए, जब बाबा रामदेव को रामलीला मैदान से खदेड़ा गया, तभी से सरकार की नीयत साफ़ थी. ऐसे में सबसे बढ़िया रणनीति होती कि आप जनता के पास जाएँ. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अन्ना और उनकी टीम जनता के पास जाने की बजाय राजनीतिक दलों के पास समर्थन के लिए गए. लेकिन यह बात तो साफ़ है कि राजनीति में कोई भी दल ऐसा लोकपाल नहीं चाहेगा जो सांसदों, प्रधानमंत्री को भी कठघरे में खड़ा करने की ताकत रखता हो. हास्यास्पद तो तब लगता है जब अन्ना हजारे की सिविल सोसाइटी चांदनी चौक में सर्वेक्षण करने गए. यदि सर्वेक्षण करना ही था तो करते महाराष्ट्र के गाँव में, मध्य प्रदेश में, बिहार में, गुजरात में, उड़ीसा में, उत्तर प्रदेश में. लेकिन उन धूल भरे गाँव में कौन जाए. इस कारण से अन्ना के सत्याग्रह में गहराई और गंभीरता दोनो में कमी आई है. आम जनता की विश्वशनीयता भी कम हुई है. जो लोग बिल्कुल जमीन से जुड़े हैं वे खुद को अन्ना के सत्याग्रह के साथ जुड़ा महसूस नहीं करते. उन्हें लगने लगा है कि अन्ना और उनकी टीम का लक्ष्य भ्रष्टाचार को ख़त्म करना नहीं बल्कि अपने लिए सुविधाजनक जमीन तैयार करना है. सरकार भी उनकी इस कमजोरी को भांप रही है.
चलो गाँव की ओर
एक समय था जब जॉर्ज फर्नांडीज़ के एक आह्वान पर लाखों रेलवे कर्मचारी क्रांति के लिए तैयार रहते थे. लाखों मिल मजदूर मोरारजी देसाई की एक आवाज़ पर सड़क पर उतर आते थे. जय प्रकाश नारायण, लोहिया, राजनारायण के आह्वान पर देश के किसान और छात्र गाँव गाँव से उठ कर दिल्ली, पटना, लखनऊ से लोहा लेने के लिए तैयार रहते थे. पूरी तरह लोकतान्त्रिक तरीके से. लाठी झेल कर. गोली झेल कर. लेकिन आज के नेतृत्व में वो पहुँच, वह जुझारूपन दिख नहीं रहा. और जब आपकी एक आवाज़ पर लाखो किसान मजदूर भाई बहन संसद पर कूच करने के लिए तैयार रहे तभी सरकार भी सुनती है. देश में भ्रष्टाचार तब तक आम आदमी का प्राथमिक मुद्दा नहीं बन सकता जब तक उसकी रोज़ी-रोटी और छत के मुद्दे का समाधान हो जाये. एक मजदूर यदि अपनी मजदूरी में से दस रूपये देने के लिए तब तक तैयार रहेगा जब तक कि उसके पास कोई विकल्प उपलब्ध नहीं हो जाता है. और उसके सामने यह विकल्प नहीं है न ही निकट भविष्य में कोई विकल्प दिख रहा है. ऐसे में आम जनता का इस मुद्दे के साथ पूरी तरह खड़ा होना अभी दूर ही दिख रहा है. सरकार ने बहुत ही सुनियोजित रूप से किसान, मजदूर की एकता को ख़त्म किया है.
इसलिए अन्ना हजारे और भूषण द्वय के लिए बेहतर विकल्प है कि इन इन्टरनेट पीढी के वर्चुअल समर्थन के बजाय गाँव, देहात की यात्रा करें, पद यात्रा करें, साइकल यात्रा करें, किसानों से मिले, फैक्ट्री मजदूरों से मिले, निर्माण मजदूरों से मिले, कॉलेज के छात्रो से मिले और उनका समर्थन प्राप्त करें. तभी यह सत्याग्रह देश का आग्रह बन पायेगा. सरकार भी जनता का दवाब महसूस करेगी. अन्यथा सिब्बल साहब धमकी देंगे और आप धरने के लिए वैकल्पिक स्थान और तिथि का का चुनाव करने में अपनी ऊर्जा लगायेंगे.



