शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

राजभाषा आयोग, 1955

राजभाषा आयोग, 1955

संविधान में राजभाषा आयोग और उसकी सिफारिशों की जांच करने के लिए राजभाषा समिति गठित करने की व्‍यवस्‍था है। तदनुसार राष्‍ट्रपति ने संविधान के अनुच्‍छेद 344 (1) में प्रदत्‍त शक्तियों का प्रयोग करते हुए 7 जून 1955 को श्री बी.जी. खेर की अध्‍यक्षता में निम्‍नाकिंत विषयों पर सिफारिशें करने के लिए राजभाषा आयोग का गठन किया: –

(क) संघ के सरकारी कामकाज के लिए हिन्‍दी भाषा का क्रमश: अधिक से अधिक से प्रयोग।

(ख) संघ के सभी या कुछ सरकारी कामों के लिए अग्रेंजी भाषा के प्रयोग की मनाही ।
(ग) संविधान के अनुच्‍छेद 348 में वर्णित सभी अथवा कुछ कार्यो के लिए किस भाषा का
प्रयोग किया जाए ।
(घ) संघ के किसी या किन्‍ही खास कार्यो के लिए प्रयोग में आने वाले अंकों का रूप

(ड़) एक समग्र अनुसूची तैयार करना जिसमें ये बताया जाए कि कब और किस प्रकार संघ की राजभाषा तथा संघ एवं राज्‍यों के बीच और एक राज्‍य और दूसरे राज्‍यों के बीच
संचार की भाषा के रूप में अग्रेंजी का स्‍थान धीरे धीरे हिन्‍दी लें ।
अपनी सिफारिशें करते समय आयोग को इस बात का ध्‍यान रखना था कि उन सिफारिशों से भारत की औद्योगिक , सांस्‍कृतिक और वैज्ञानिक प्रगति में किसी प्रकार की बाधा न पहुंचे और सरकारी नौकरियों के मामले में हिन्‍दीतर क्षेत्रों के लोगों के उचित अधिकार और हित सुरक्षित रहे । आयोग ने अपने विचारार्थ विषय के विभिन्‍न पहलुओं से आधुनिक भाषा, भारतीय भाषाओं का स्‍वरूप, पारिभाषिक शब्‍दावली, संघ की भाषा और शिक्षा पद्धति, सरकारी प्रशासन में भाषा, कानून और न्‍यायालयों की भाषा, संघ की भाषा , लोक सेवाओं की परीक्षाएं , हिन्‍दी और प्रादेशिक भाषाओं का प्रचार और विकास, राष्‍ट्रीय भाषा संबधी कार्यक्रम को कार्य रूप देने के लिए संस्‍थाओं आदि की व्‍यवस्‍था आदि के बारे में विस्‍तार से विवेचन तथा विचार विमर्श करने के पश्‍चात 31 जुलाई 1956 को अपना प्रतिवेदन राष्‍ट्रपति को प्रस्‍तुत किया।

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