शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

हिंदी भाषा के स्‍वरूप

हिंदी भाषा के स्‍वरूप

अब, आगे हम हिंदी भाषा के उन स्‍वरूपों से परिचय करना चाहेंगे जो इनके प्रकृतिगत रूप हैं और प्रयोगपरक रूप अर्थात प्रयोजनपरक अथवा व्‍यवसायगत रूप हैं ।

1 . हिंदी के प्रकृतिक रूप पाँच हैं

(क) मातृभाषा हिंदीः हिंदी का मातृभाषिक प्रदेश दिल्‍ली और दिल्‍ली से लगा उत्तर प्रदेश का जिला मेरठ मात्र है। वस्‍तुतः मातृभाषा वह भाषा है जिसे व्‍यक्ति अपनी माता की गोद में सीखता है, अर्थात् उसे माँ-बाप, उसे अड़ोस-पड़ोस, उसके अपने संस्‍कार की भाषा मातृभाषा होती है। मातृभाषा की पहचान के संबंध में गुलाब राय ने अपने लेख मातृभाषा की महत्ता में लिखा है कि यदि किसी की मातृभाषा का पता करना हो और, यह किसी भी प्रकार पता नहीं चल पाएं तो अचानक पीछे से उसकी पीठ पर मुक्‍का मारो। ऐसी स्थिति में जिस भाषा में वह अपनी आह व्‍य‍क्‍त करे वहीं उसकी मातृभाषा होगी। कारण, कोई कितना भी विदेशी भाषा का ज्ञान रखने वाला हो, अतिशय सुख अथवा अतिशय दुःख की अवस्था में वह अपनी मातृभाषा में ही अपने हृदय का भाव व्‍यक्‍त करेगा। यह एक अजीब-सी बात देखने को मिलती है कि जो हिंदी मातृभाषा के रूप में मात्र दिल्‍ली और उससे लगे मेरठ जिले एंव उसके आस-पास के एक छोटे से भू-भाग में प्रयोग में रही, द्वितीय भाषा के रूप में लगभग सारे भारत के विस्‍तार में प्राजल संपर्क का एक मात्र साधन बन चुकी है।

(ख) संपर्क भाषा हिंदीः

एक भाषा भाषी जिसे भाषा के माध्‍यम से किसी दूसरी भाषा के बोलने वालों के साथ संपर्क स्‍थापित कर सके, उसे संपर्क भाषा (Link Language) कहते हैं। ऐसी भाषा मात्र दो या दो से अधिक भिन्‍न-भिन्‍न भाषा भाषियों के बीच संपर्क का माध्‍यम नहीं बनती जो एक दूसरे की भाशा से परिचित नहीं हैं, अपतु दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्‍न भाषाभाषी राज्‍यों के बीच तथा केंद्र और राजयों के बीच भी संपर्क स्‍थापित करने का माध्‍यम बन सकती हैं। भारत के ही प्राचीन इतिहास पर यदि हम नजर डालते हैं तो पाते हैं कि यहाँ हर युग में राष्‍ट्र की एक प्रमुख भाषा संपर्क भाषा की भूमिका का निर्वाह करती रही है। आधुनिक भारतीय भाषाओं के उद्भव और विकास से पहले संपर्क भाषा की इसी पंरपरा के क्रम में हम संस्‍कृत, पालि, प्राकृत और अपभ्रंश का प्राजल प्रयोग पाते हैं। बाद में, मुगल शासन, देशी राजाओं और अंग्रेजी शासन काल में हिंदी को संपूर्ण रूप से तो नहीं, किंतु आंशिक रूप से संपर्क भाषा के रूप में व्‍यवहार किया गया। आजादी की लड़ाई के समय में गाँधी और सुभाष जैसे गैर हिंदी भाषी नेताओं ने देश के विभिन्‍न क्षेत्रों में क्रांति संदेश देने और दो भिन्‍न-भाषियों के बीच संपर्क के लिए हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में अपनाया। आजादी के बाद हमारी यहां हिंदी देश की सर्वमान्‍य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है।

(ग) राष्ट्र भाषा हिंदीः

राष्ट्रभाषा का अर्थ है राष्ट्र की भाषा। इस तरह राष्ट्र की जितनी भी भाषाएं है, सभी राष्ट्रभाषा है। फल्स्वरूप भारत के संविधान की अष्टम अनुसूची में सम्मिलित 22 भाषाओं के अतिरिक्त देश की दर्जनों अन्य भाषाएं भी जो अपने अपने क्षेत्रों में लोक सम्प्रेषण के माध्यम है हमारी राष्ट्र भाषाएं है। यही कारण है कि भारत के संविधान में इनमें से किसी भी एक भाषा को राष्ट्रभाषा के नाम से अभिहित नहीं किया गया है। यही राजभाषा, संघभाषा अथवा संपर्क भाषा जैसे शब्दों का ही व्यवहार हुआ है। परंतु इतना होते हुए भी एक विशिष्ट अर्थ में राष्ट्रभाषा की संकल्पना और उसकी सार्थकता से हम इन्कार नहीं कर सकते और इस सार्थकता एवं यथार्थता के हकदार भी अपनी स्थिति के चलते हिंदी हो रही है।

राजभाषा अथवा संपर्क भाषा अपनी एक सीमा में परिधि में बंधी है, परन्तु, उस परिधि की सीमा के आर-पार विस्तृत व्यापक आयामों में परिव्याप्त, राष्ट्र के प्रशासन समस्त कार्य व्यापार, व्यवसाय रीति-नीति तकनीक तथा संस्कति और परंपरा को अभिव्यक्ति देने वाली तथा विश्व के विभिन्न देशों तक इन्हें पहुचाने में समर्थ राष्ट्र की एक सुगम सुबोध एवं सशक्त भाषा राष्ट्र भाषा होती है। भारत में इस रूप में राष्ट्रभाषा के स्वरूप में भी हिंदी स्वभावतः प्रतिष्ठित है। वस्तुतः राष्ट्रभाषा राष्ट्र की वह भाषा होती है जो अपने व्यापक परिवेश और विकासोन्मुख प्रवर्धमान शक्तियों के चलते अपनी क्षेत्रीयता की सीमा से उपर उठते हुए देश के विभिन्न क्षेत्रों संवेदन स्पंदन को अपनी आत्मा में समेट कर उसे प्रकाश, अभिव्यक्ति देती है, और जो विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न भाषा भाषियों के बीच भावनात्मक ऐक्य स्थापित करने में सेतु का काम करता है। हिंदी इन दोनों ही दायित्वों का बखूबी निर्वाह कर रही है, और इसलिए इसकी राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठा किसी कृत्रिम प्रयास का नहीं, स्वाभाविक गति का परिणाम है –

(घ) राजभाषा हिंदीः

राजभाषा का अर्थ है वह भाषा जो राजकाज. प्रशासन-तंत्र के कार्य के संपादन को गतिविधि की कार्यकलापों की भाषा हो जैसे हर देश के अपने प्रतीक स्वरूप झंडे होते है और उसे राष्ट्रध्वज के नाम से पुकारते हैं, उसी तरह हर देश की समग्रता की अभिव्यक्ति माध्यम के रूप में सार्वदेशिक स्वरूप रखनेवाली उसकी राजकीय गतिविधि के संपादन की एक भाषा भी होती है और उस भाषा को राजभाषा की संज्ञा दी जाती है। परंतु ऐसे संघ राष्ट्रों में जहां देश राष्ट के भिन्न भिन्न राज्यों का अलग अलग राजभाषाएं है वहां भाषा संघ की राजभाषा होती है जो आमतौर पर समस्त देश में अथवा देश के अधिकांश भागों में परस्पर भिन्न भिन्न भाषभाषियों के बीच संपर्क माध्यम का कार्य तो करती ही है , देश की शिक्षा, देश का ज्ञान विज्ञान, रीति-नीति, कला संस्कृति आदि से संबंधित समस्त कार्यव्यापारी का निर्वाह भी करती है । हिंदी बखूबी इन दायित्वों का निर्वाह करती है । यह आजादी से पहले मुगल शासन काल में और अंग्रेजी शासन काल में अनेक देशी राजाओं के राज्य की राजभाषा देश के व्यापक क्षेत्रों की संपर्क भाषा तथा मुगल एवं अंग्रेजी शासन में ऊपरी तौर पर द्वितीय राजभाषा की तरह प्रयोग की जाती रही ।

आजादी की लड़ाई में इसे विभिन्न भाषाभाषी सेनानियों के बीच भावों विचारों एवं कार्ययोजनाओं के संपादन के लिए संपर्क भाषा के रूप में अपनाया गया । यही कारण था कि संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को इस प्राजल भारतीय संपर्क भाषा एवं राष्ट्रभाषा को संघ की राजभाषा बनाने का संकल्प पारित किया।

भारत के संविधान के अनुसार “देवनागरी लिपि में हिंदी संघ की राजभाषा होगी । ”

वस्तुतः संविधान की अष्टम अनुसूची में सम्मिलित देश की बाइसों (22) भाषाएं देश की राजभाषाएं है । परंतु जब हम पूरे देश को ध्यान में रखकर राजभाषा की चर्चा करते हैं तो उसका एक मात्र अर्थ होता है संघ की राजभाषा जो संघ के प्रशासनिक कार्यों संघ और राज्यों के बीच संपर्क तथा अपने देश का दूसरों देशों के साथ राजनायिक संबंध और परस्पर आदान प्रदान के माध्यम के रूप में प्रायुक्त होता है । यही हिंदी भारत के संघ की राजभाषा है।

(ङ) बहुराष्ट्रीय भाषा हिंदी अथवा विश्वात्मक भाषा हिंदीः

बहुराष्ट्रीय भाषा अथवा विश्वात्मक भाषा से उस भाषा का बोध होता है जो एक से अधिक देशें में प्रयोग किया जाता है । हिंदी गुयाना, फिजी, सुरिनाम, मॉरीशस त्रिनिदाद आदि अनेक देशों में बहुसंख्यक जनता के बीच संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग की जाती है । भारत के पड़ोसी देश नेपाल,बर्मा, श्रीलंका आदि के अतिरिक्त इंग्लैंड अमेरिका, कनाडा, अफ्रिका, आदि देशों में काभी संख्या में एशियाई लोग हैं जिनके बीच हिंदी संपर्‍क भाषा है । मुस्लिम देशों में तो हिंदी इतनी परिचित एवं सुलभ है कि वे अनेक हिंदी सीरियल बड़े चाव से और नियमित रूप से देखते हैं । विश्व के अधिकांश बड़े देशों में विश्वविद्यालय स्तर तक हिंदी का पाठ्यक्रम है और उसमें काफी छात्र-छात्राएं अध्ययनरत है । आज. विश्वात्मक गणना के आधार पर हिंदी विश्व में सबसे अधिक बोली समझी जाने वाली भाषाओं में पहले स्थान पर है । तात्पर्य यह है कि विश्व में किसी एक भाषा बोलने समझने वालों में हिंदी बोलने समझने वाले सर्वाधिक लोग है ।

भारत में आद्योगित उदारीकरण के फलस्वरूप बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन और उनके द्वारा इस देश में अपने व्यवसाय के प्रसार के उद्देश्य से देश की व्यापक जन भाषा हिंदी को व्यावसायिक संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग तथा टी.वी चैनलों क्षरा हिंदी के अनेक कार्यक्रमों का एक साथ भारतख्‍ अरब इंग्लैंड, अमेरिका आदि में प्रसारण से पहले विश्व के अनेक देशों में हिंदी का प्रयोग होने की जानकारी के बावजूद इस भाषा के बहुराष्ट्रीय भाषिक स्वरूप अथवा यूँ कहें कि विश्वात्मक स्वरूप से आम तौर पर इस देश के बुद्धिजीवी भी परिचित नहीं थे । विश्व स्तर पर सबसे अधिक लोगों द्वारा जानी समझी जाने वाली भाषाओं के बीच प्रथम स्थान ग्रहण्‍ करने के पश्चात भी हमारे पढ़े-लिखे भारतीय की मानस दशा कुछ ऐसी हो चुकी है कि हम बुद्धिजीवी भी हिंदी के विश्वात्मक स्वरूप को अपने मानस-पटल पर उतार पाने में बड़ी कठिनाई अनुभव कर रहे हैं, जन सामान्य की तो बात ही क्या? फिर भी आज हिंदी के विश्वात्मक प्रकृति से हम अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते, न ही इस तथ्य को झुठला सकते है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. संबंधित विषयों पर अच्‍छी जानकारी ।

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  2. हिंदी पर आपकी टिप्पणी बहुत सूचनात्मक है । इस सूचना के लिए धन्यवाद ।

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  3. Gujarati Script is simple modified scrip of Devanagari Script.Why not adopt this simple script without horizontal lines in writing Hindi.

    People in Gujarat do write Sanskrit Shlokas in Gujarati Script.

    If Gujarat and other States can learn Devanagari Script in schools why not Hindi states can learn simple Gujarati Script?

    You may read this blog.

    http://kiranomics.wordpress.com/2010/03/01/hindi-not-our-national-language-2/#comment-25

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