शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

आचार्य चतुरसेन

आचार्य चतुरसेन

आचार्य चतुरसेन जी का जन्म 26 अगस्त 1891 ई० में हुआ था। वो चालीस वर्षों तक निरंतर साहित्य साधना करते रहे। फलतः गुण और मात्रा दोनों दृष्टियों से हिंदी साहित्य की समृद्धि में उनकी देन महत्वपूर्ण है।

वे बहुमुखी प्रतिभा के कलाकार थे। साढ़े चार सौ कहानियों के अतिरिक्त उन्होंने बत्तीस उपन्‍यास तथा अनेक नाटक लिखे। साथ ही गद्यकाव्य, इतिहास, धर्म, राजनीति, समाज स्वास्थ्य- चिकित्सा आदि विभिन्न विषयों पर भी उन्होंने लेखनी चलाई। उनकी प्रकाशित रचनाओं की संख्या 186 है। उनकी कथा साहित्य हिंदी के लिए गौरव है।

उपन्यासों में वैशाली की नगरवधू सोमनाथ, वयं रक्षामः उनके बहुचर्चित उपन्यास हैं।

वैशाली की नगरवधू लिखकर उन्होंने हिंदी उपन्यासों के संबंध में एक नया मोड़ उपस्थित किया थाउपन्यास केवल मनोरंजन तथा चरित्र चित्रण भर की सामग्री नहीं रह गईउनका उपन्यास वयं रक्षामः इस दिशा में एक और कदम था इस उपन्यास में प्राग्वेदकालीन नर, नाग, देव, दैत्य-दानव, आर्य, अनार्य आदि सविविध नृवंशों के जीवन के वे विस्मृत पुरातन रेखा चित्र हैं जिन्हें धर्म के रंगीन शीशे में देखकर सारे संसार ने अन्तरिक्ष का देवता मान लिया था। आचार्य चतुरसेन जी ने इस उपन्यास में उन्हें नर रूप में हमारे समक्ष उपस्थित करने का साहस किया। आज तक कभी मनष्य की वाणी से न सुनी गई बातें वे हमको सुनाने पर आमादा हुए … उपन्यास में उनके अपने जीवन भर के अध्ययन का सार है

चतुरसेन साहित्य

उपन्यास

वयं रक्षामः

वैशाली की नगरवधू

सोमनाथ

सोना और खून भाग 1

सोना और खून भाग – 2

सोना और खून भाग – 3

सोना और खून भाग – 4

खग्रास

पत्थर युग के दो बुत

बगुला के पंख

हृदय को प्यास

धर्मपुत्र

कहानियां

बाहर भीतर

दुखवा मैं कासे कहूँ

धरती और आसमान

सोया हुआ शहर

कहानी खत्म हो गई

स्वास्थ्य चिकित्सा

स्वास्थ्य रक्षा

नोरोग-जीवन

आदर्श भोजन

हमारा शरीर

बालोपयोगी

अच्छी आदतें

महापुरूषों की झांकियां

2 फरवरी 1960 को सत्तर वर्ष की अवस्था में आपका देहांत हो गया।

7 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य चतुरसेन जी के कुछ उपन्यास जो मैंने पढ़े हैं, "ह्रदय की परख" और "लाल किला" के कुछ प्रसंग तो अद्भूत हैं.
    हिंदी साहित्य में उनका योगदान अगणित है.

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