गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

कब टूटेगी ये बेरी !

कब टूटेगी ये बेरी !

आज हम बात करेंगे हमारी बेरियों की। बेरी जो कब से जकर रक्खी हमें। हमारी संस्कृति को। हमारी अभिव्यक्ती को। जी हाँ ! हम कर रहे हैं, भाषिक बेरी का। वो बेरी जिसमें आजादी के दशकों बाद भी हमारी रोज मर्रा की जिंदगी सिसक रही है॥ आख़िर कब तक करते रहेंगे हम विदेशी भाषा की गुलामी ? आप भी रखिए अपनी बेबाक राय इस विषय पर। आप भी चाहें तो टिपण्णी के माध्यम से इस बहस में शामिल हो सकते हैं। आपका स्वागत है॥



भारत सरकार के अधीनस्थ कार्यालयों में `` क्षेत्र के लिए 55 प्रतिशत हिंदी में पत्राचार करने का लक्ष्य है।क्षेत्र यानी हिंदीतर भाषी क्षेत्र।औरक्षेत्र के लिए यह लक्ष्य और भी ज़्यादा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के प्रति केन्द्र सरकार के कार्यालयों में काम करने वाले अधिकारी और कर्मचारी कितने गंभीर हैं ? 1949 में केन्द्रीय सरकार द्वारा यह तय किया गया था कि सरकारी काम काज में हिंदी का उपयोग किया जाएगा, 60 वर्षों बाद कितने सफल हुए हैं, सबको पता है। और वे इसकी प्राप्ति के प्रति कितने समर्पित हैंउनका दिल गवाही देगा।

कितने आश्चर्य की बात है कि विश् में एकमात्र हिन्दी ही ऐसी भाषा है जिसमें शब्द जैसा लिखा जाता है, उसे, ठीक वैसा ही पढ़ा जाता है। भारत में यद्यपि प्रान्तीय भाषाओं का प्रचलन काफी अधिक है परन्तु पूरे देश में एकमात्र हिन्दी ही ऐसी भाषा है जिसे सभी प्रान्तों के लोग अच्छी तरह समझ और बोल पाते हैं। वैसे तो भारतीय साहित्य की प्रांजलता, विविधता में एकता और सरसता, भारतवर्ष जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में प्रचलित विभिन्न भाषाओं के अमूल्य योगदान में निहित है, फिर भी जन सामान्य द्वारा बोली, पढ़ी और लिखी जाने वाली भाषा हिन्दी को ही केन्द्रीय सरकार ने राजकाज की भाषा का दर्ज़ा प्रदान कर उसे एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। राजभाषा के रूप में हिन्दी को अपनाने के पीछे सबसे बड़ा कारण हिन्दी का सरल, सुबोध और प्रचलित होना था। केन्द्र सरकार के स्तर पर राजभाषा हिन्दी को सरकारी कामकाज में प्रचलित करने के लिए अब तक अनेक प्रयास किए जा चुके हैं। क्या ये प्रयास नाकाफ़ी हैं?

इसी से जुड़ा एक पहलू यह भी है कि जब एक विदेशी पॉप गायक दिवंगत होता है तो हम दुखी होते हैं, हमें लगता है यह अपूरनीय क्षति है। टीवी और अखबारों में वह प्रमुखता पाता है और उसकी मौत के कारणों पर घंटों बहस होती है। उसके पेट में दाने की जगह दवा / ड्रग्स हैं उस पर तवज्जो दी जाती है। हमारा दिल रोता है कि अब कौन हमें दिखाएगा मून वॉक। एक पहलू यह है। एक पहलू यह भी है कि जब कोई हबीब तनबीर हमसे दूर हो जाता है तो किसी अख़बार के कोने में थोड़ी सी जगह पाता है। क्योंकि वह आगरा बाज़ार के ककड़ी, मूली, तरबूज वालों के लिए लिखता था, क्योंकि वह चरनदास चोर की बात करता था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के 63 वर्षों पश्चात् भी हिन्दी को वह दर्ज़ा नहीं मिल पाया है, जिसकी वह हक़दार है। इसके पीछे बड़ी बाधा है --- हमारी मानसिकता। हममें से अधिकांश व्यक्ति अंग्रेज़ी बोलने में गर्व महसूस करता है और हिन्दी बोलते समय उसे हीनता का अनुभव होता है। क्योंकि, हमारी दृष्टि में प्रत्येक विदेशी वस्तु श्रेष्ठ है, भले वह कोई उपभोक्ता सामग्री हो, पॉप गीत या फिर भाषा। पश्चिमी देशों की संस्कृति, भाषा, लोक-व्यवहार का अंधानुकरण करने में ही हमें आधुनिकता दिखाई देती है। आप आज के बच्चों से हिंदी में कुछ पूछिए तो जवाब अंग्रेजी में मिलेगा। यह एक सच्चाई है। मेट्रोशहरों में तो अभिजात्य वर्ण के लोग हिंदी का व्यवहार शायद तभी करते होंगे जब वे सब्जी ख़रीदने जाते होंगे।

मेंडरिन के बाद दुनिया भर में हिंदी सबसे ज़्यादा लोगों द्वारा बोली जाती है। इनमें भारतीय मूल के लोगों के अलावा विदेशी भी हैं। हिंदी बोलने वाले विदेशियों की संख्या 24 लाख से भी ज़्यादा है। हिंदी अब विश्वस्तरीय हो चुकी है। पश्चिम के लोगों में हिंदी पढ़ने और लिखने में दिलचस्पी काफी बढ़ी है। कैसी विडंबना है कि विदेशों में हिन्दी को विश्वभाषा का सम्मान प्राप्त है और भारत में उसे राजभाषा का सम्मान दिलाने के लिए कठोर नीतियां अपनानी पड़ती है। पश्चिमी देशों के लोग हिन्दी को अपनाकर भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को जानना और समझना चाह रहे हैं और हम हैं कि विदेशी चकाचौंध के मोह से मुक्त नहीं हो पा रहे।

3 टिप्‍पणियां:

  1. पश्‍चिमी देशों के लोग हिन्दी को अपनाकर भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को जानना और समझना चाह रहे हैं और हम हैं कि विदेशी चकाचौंध के मोह से मुक्त नहीं हो पा रहे.........बहुत सही लिखा आपने. यही तो विडम्बना है.


    ....................
    "शब्द-शिखर" पर इस बार अंडमान के आमों का आनंद लें.

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  2. स्वतंत्रता प्राप्ति के 63 वर्षों पश्‍चात् भी हिन्दी को वह दर्ज़ा नहीं मिल पाया है, जिसकी वह हक़दार है। इसके पीछे बड़ी बाधा है --- हमारी मानसिकता।
    बिल्कुल सही कहा है।

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