मनोज कुमार
इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्योंकि इन्हें खा नहीं सकता" –१
इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्योंकि इन्हें खा नहीं सकता" –२
इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्योंकि इन्हें खा नहीं सकता"-३
इस कृत्रिम व्यवस्था में जो चालाक व्यापारी थे या कर्ज देने वाले थे वे तो लाभ कमा ही लेते थे। क्योंकि बाजार में जिस भाव में बिकता था, वे चीजों को उससे कम मूल्य पर खरीदते थे। पर कमर तो टूटती थी असल में पैदा करने वाले की। फिर इस क्षेत्र में कोई निवेश करना चाहता नहीं था। थोड़ी बहुत जो भी निवेश होता था वह उत्पादकता बढ़ाने में पर्याप्त होता था। अक्सरहाँ ऐसा देखने में मिलता था कि यदि किसी कृषक ने थोड़ा बहुत धन संचय कर लिया तो वह व्यापारी, सूदखोरी या बड़े हद तक किसी दूसरे कृषकों के लगान पर बटाईदारी पर दे देना बेहतर समझता था बनिस्बत की खुद के द्वारा खेती करने को। परजीवियों की तरह अपने पूरे जोखिम को दूसरे के मत्थे मढ़ने में अपनी भलाई समझता था। वस्तुतः कैपिटलिस्ट फार्मिंग करना सबसे बड़ी मूर्खता थी उसके लिए।
कृषि का वाणिज्यीकरण अकसरहाँ एक वलात् प्रक्रिया हुआ करती थी। अधिकांश कृषक गरीब थे। उन्हें पैसों की आवश्यकता पड़ती थी। क्योंकि राजस्व की वसूली तो जमींदार छोड़ने से रहे। फिर लगान तो नकद ही देना होता था। लगान नकद चुकाने की व्यवस्था के कारण किसानों को अपना अनाज एवं कच्चा माल मंडियों में बेचना पड़ता था, जिसे कम्पनी के अधिकारी बिचौलियों के माध्यम से खरीद कर उनका निर्यात करते थे। इन दो बढ़ती हुई समस्याओं के बोझ के नीचे दबा कृषक समुदाय आह भी नहीं भर पाता था। मजबूर था वह कैश क्रॉप उगाने को!
एक ब्रिटिश कलक्टर एक बार कोयम्बतूर के इलाके से जा रहा था। उसने देखा कि पूरे कृषि क्षेत्र में कपास की पैदावार की बहुतायत है। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। चावल आदि की जगह ये फसल? उसने कारण जानना चाहा। तो एक कृषक सामने आया और उसने जो कहा वह कृषि के वाणिज्यीकरण का कटु यथार्थ था। उसने कहा,
“हम कपास की खेती सिर्फ इसलिए करते हैं, क्योंकि इन्हें हम खा नहीं सकते।”
इस कथन में उनकी वेदना निहित है। अपने और अपने परिवार की उदरपूर्ति कर या न कर पाए, पर कैसे लगान चुकाई जाए उसकी चिंता उसे सालती रहती थी। लगान तो कैश में ही चुकेगी। और कैश आएगा सिर्फ कैश क्रॉप की बिक्री से। अगर वह अन्न उगाता तो हो सकता था कि भूख से बिलबिलाते अपने परिवार एवं खुद की विवशता के आगे उन्हें बेचने के वजाए खा ही जाता। पर अब वे अपना पेट काट कर ऐसी फसल बो रहे थे जिससे राजस्व की मांग की पूर्ति तो कर सकते थे।
अतः वाणिज्यिक फसलों की तरफ़ उनका झुकाव अपनी इच्छा से नहीं था बल्कि राजस्व एवं लगान के दवाब के तहत था। ये शिफ्ट गरीबों के अनाज जवार, बाजड़ा या दाल से अलग था, कृत्रिम था, एवं विवशता से था। जहाँ एक ओर इन फसलों से व्यापारी वर्ग व कंपनी को लाभ हुआ, वहीं इसने किसान की गरीबी को और बढ़ाया। क्योंकि व्यापारी वर्ग खड़ी फसलों को सस्ते दामों पर खरीद लेते थे और किसान, अपनी तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, अपनी फसल मंडी में न ले जाकर कटाई के समय खेत में ही बेच देते थे। हालांकि कुछ महीनों बाद, बेचारा वही फसल अपनी बिक्री की कीमत से अधिक कीमत देकर खरीदता था। यह उसकी तबाही को बढ़ाती ही थी। अगर किसान के पास धन होता तो वे थोड़ी देर प्रतीक्षा कर सकने की स्थिति में होते जिससे उन्हें अपनी फसल का अधिक मूल्य प्राप्त हो सकता था। लेकिन विवशता के जाल में फँसा कृषक फसल के समय ही सौदा करने को मजबूर था और फलतः उसे अपनी उपज से बहुत कम राशि प्राप्त होती थी। फिर इस शोषण के चक्रव्यूह में फँसा कृषक साहूकारों के चंगुल में बुरी तरह से फँसा ही रहता था। क्योंकि इन पैदावारों के लिए अधिक लागत की जरूरत पड़ती थी, यानी अधिक अग्रिम राशि, अधिक शोषण।
एक ध्यान देने वाली प्रमुख बात यह है कि भारत में कृषि के व्यवसायीकरण की प्रक्रिया, इंगलैंड की प्रक्रिया से सर्वथा भिन्न थी। इंगलैंड में बाजार के मूल्यों की वृद्धि के साथ साथ कृषि उत्पादन के मूल्यों की भी वृद्धि होती थी। इससे किसान की समृद्धि हुई, कृषि का विकास हुआ। कृषि क्षेत्र के अतिरेक ने जहाँ एक ओर औद्योगिक क्रांति को प्रोत्साहित किया, वहीं नई तकनीकों एवं वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग से कृषि क्षेत्र को भी प्रोत्साहन मिला। परंतु ऐसी स्थिति भारत में नहीं थी। भारत में तो कृषि का व्यवसायीकरण सम्राज्यवादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जबरदस्ती थोपा गया था। फलतः व्यवसायीकरण की इस प्रक्रिया ने कृषि अर्थव्यवस्था के अन्तरविरोधों को न सिर्फ दूर किया, बल्कि उसमें और तीव्रता ही लाई।
लेकिन क्या कृषक वर्ग सदा चुप चाप इन शोषणों को सहन करते रहे? क्या वे इसे नीयति मान कर सदा चुप रहने वाले थे? ऐसी बात नहीं थी। इन दुःखों के बावजूद, यातायात में सुधार एवं एक नई अर्थव्यवस्था के विकास के कारण गांव और गांव, तथा शहर और गांव एक दूसरे के करीब आए। उनमें आपसी सहयोग की भावना का विकास हुआ। एक नई चेतना का प्रादुर्भाव हुआ। इस चेतना ने उन्हें शोषणकारियों के विरूद्ध अपने अधिकारों के लिए विद्रोह को उकसाया। कई इलाकों में किसानों ने, बटाइदारों ने, आर्थिक संकट बढ़ने के कारण लगान देने से इंकार कर दिया। इतिहास में कई उदाहरण हैं – बंगाल का बटाईदार विद्रोह, संथाल विद्रोह, मराठा किसानों का साहूकारों के खिलाफ बगावत, चंपारण में नील की खेतिहरों का विद्रोह, मोपला विद्रोह आदि। ये सभी विद्रोह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को मदद पहुँचा रहे थे। ब्रिटिश शोषणकारी नीति ने किसान को भाग्यवादिता से उबार कर उनमें परिस्थितियों का सामना करने की भावना पैदा की।
कृषि के क्षेत्र में ब्रिटिशों द्वारा व्यवसायीकरण की जो नीति अपनाई गई थी उसके कारण जो प्रतिविकास या घातक्रिया हुई उसमें यह महत्त्वूपर्ण नहीं है कि कृषकों को काफी संकटों या दुःखों का सामना करना पड़ा, बल्कि ध्यान देने वाली बात ये है कि उन्हें ये दुःख असत्व (कुछ भी नहीं) के लिए अकारण ही झेलना पड़ा। इन वाणिज्यीक फसलों की पैदरावार बढ़ाने के कारण खाद्यान्नों में कमी आना स्वाभाविक था। जिससे आए दिन अकाल पड़ने लगे। इन अकालों का दंश उन्हें भी झेलना पड़ा। कृषि के क्षेत्र में नाम मात्र का सुधार किया गया, जो अपर्याप्त था। अतः जब गहरे विश्लेषण में हम पैठते हैं तो पाते हैं कि यह वाणिज्यीकरण एक कृत्रिम ही नहीं बल्कि वलात् प्रक्रिया थी जिससे कृषि में बिना किसी वास्तविक विकास के विभेदीकरण हुआ। अंगरेजों ने भारतीय समाज के ढाँचे को तोड़ डाला और बिना किसी पुननिर्माण के पुरानी व्यवस्था को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। साथ ही अपनी पश्चिमी दुनियाँ के अनुरूप भौतिकवाद की नींव रखनी चाही।
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चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच अन्य संत व धर्मोपदेशक जैसे संत नामदेव, व संत तुकाराम ने महाराष्ट्र में, संत ज्ञनेश्वर व संत दादू दयाल ने गुजरात में तथा बाद में गोस्वामी तुलसीदास, संत सूरदास एवं मीराबाई ने भक्ति आंदोलन को आगे बढ़ाया। गोस्वामी तुलसी दास ने रामपंथ को बढ़ावा दिया। संत सूरदास संत वल्लभाचार्य के शिष्य थे। उन्होंने ब्रजभाषा में “सूरसागर” लिखा। उन्होंने श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार किया। रास्थान की मीराबाई एक संत ही नहीं कवयित्री भी थीं। हालाकि उनके बड़े अनुयायी नहीं हुए फिर भी उनके भक्ति-गीत बहुत ही महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय हैं।
महाराज छत्रपति शिवाजी के समकालीन संत तुकाराम महाराष्ट्र क्षेत्र में सक्रिय थे। उन्होंने भगवान बिठोवा की अर्चना को लोकप्रिय बनाया। उनका मंदिर पंढ़ारपुर में है। बाद में बिठोवा भगवान को श्रीकृष्ण का अवतार माना जाने लगा। संत तुकाराम ने भी हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया। संत तुकाराम के ही उपदेशों का प्रभाव था कि महारज शिवाजी मुस्लिम प्रजा के प्रति काफी उदार भाव रखते थे।
निर्गुण भक्ति की परंपरा में संत कबीर दास और गुरु नानक देवजी के साथ एक और नाम है संत दादू दयाल का। उन्होंने नैतिक शुद्धता पर बल दिया। उन्होंने भक्ति के द्वारा समाज सेवा एवं मानवतावादी दृष्टिकोण लोगों के सामने प्रस्तुत किए। विभिन्न विरोधी सम्प्रदायों को भ्रातृत्व और प्रेम में बांधकर एक करने की कामना से उन्होंने एक अलग पंथ का निर्माण किया जो “दादू पंथ” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। “दादू ग्रंथावली” में उनकी संकल्पनाएं संग्रहीत हैं।
ईश्वर की प्राप्ति के लिए ज्ञान और तप का मार्ग छोड़ कर भक्ति का मार्ग अपनाना इस आंदोलन का विशेष गुण था। यद्यपि भक्ति-मार्ग के विभिन्न संतों के विचारों में पूर्ण समानता नहीं थी, तथापि अधिकांश एकेश्वरवाद में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि ईश्वर एक है, उसके नाम अलग-अलग हैं। वे मानते थे कि यदि पूर्ण श्रद्धा से ईश्वर की भक्ति की जाए तो मोक्ष की प्राप्ति होगी। अत: मनुष्य को ईश्वर के चरणों में पूर्ण समर्पण कर देना चाहिए। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ को जीत कर ईश्वर की भक्ति में रम जाना चाहिए। उनका मानना था कि ईश्वर मंदिरों में नहीं, बल्कि लोगों के हृदय में बसते हैं। अगर सच्ची भक्ति हो तो जीवात्मा का परमात्मा से मिलन संभव है। परन्तु इसके लिए सांसारिक इच्छाएँ एवं प्रलोभनों का त्याग करना होगा। इसके अलावा भक्त को एक गुरु की आवश्यकता पड़ेगी जो कि भक्ति के मार्ग पर उसे दिशा-निर्देश देगा। गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती क्योंकि वही अत्मा को सुषुप्तावस्था से जागृत कर सकता है।
गल्ला मंडी में क़ीमत की स्थिरता अलाउद्दीन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। उसके जीवित रहते, इनके मूल्यों में तनिक भी वृद्धि नहीं हुई। तीनों बाजारों की अपनी अलग-अलग समस्याएं थी। मंडी की समस्या थी कि कैसे उपयोगी वस्तुओं की सतत आपूर्ति बनाए रखी जाए एवं इसकी उपभोक्ताओं में वितरण की व्यवस्था कैसे की जाए ? इसके अलावा समुचित फसल उत्पादन न हो पाने या बाढ़ जैसी आकस्मिक स्थिति का सामना कैसे किया जाए? यह तय था कि दुकानदारों को यदि वस्तुएं पर्याप्त मात्रा और सही समय में नहीं मिलेंगी तो वे नियत दरों पर माल नहीं बेच सकेंगे। इसके अलावा चोर-बजारी भी करेंगे। अतः अलाउद्दीन का निर्देश था कि भू-राजस्व कैश में न लेकर उत्पाद का एक तिहाई भाग लिया जाए। इस राजस्व की अदायगी के बाद कृषक अपने पास उतना ही अनाज रखें जितने कि उनको अगले फसल उत्पादन तक के लिए अपनी आवश्यकताओं हेतु ज़रूरत थी बाकी का अतिरिक्त उत्पादन सरकारी अधिकारियों द्वारा खरीद लिया जाता था। मंडी में सिर्फ पंजीकृत व्यापारी ही कारोबार कर सकते थे। व्यापारी अपनी इच्छा से मूल्य में कोई भी परिवर्तन नहीं कर सकते थे। उत्पादन मूल्य उत्पादकों की लागत से बहुत ज्यादा नही होता था। इससे उत्पादकों को उनकी लागत का उचित मूल्य भी मिलता था और व्यापारियों को अधिक मुनाफाखोरी का अवसर नहीं मिल पाता था।
दूसरा बाजार सराय-ए-अदल (न्याय का स्थान) निर्मित वस्तुओं तथा बाहर के प्रदेशों से आनेवाले माल का बाजार था। मुख्य रूप से यह वस्त्र बाजार था। इसमें अलाउद्दीन स्थानीय निर्मित वस्त्रों का मूल्य नियंत्रण तो कर सकता था पर आयात किए गए वस्त्रों, जैसे रेशमी वस्त्र ईरान से आता था, का नियंत्रण कर पाना संभव नहीं था। कपड़े की कीमतों के निर्धारण से व्यापारी दिल्ली में माल बेचने के इच्छुक नहीं थे। व्यापारी दिल्ली के बाहर से कपड़ा खरीदते थे, उसे दिल्ली में लाने में धन खर्च करते थे और उन्हें दिल्ली में निर्धारित मूल्य पर बेचना पड़ता था। कपड़ा व्यापारियों को खाद्यान्नों के व्यापारियों की तुलना में अधिक सुविधाएं दी जाती थी। जैसे बाहर से माल लाकर दिल्ली में बेचने के लिए उन्हें अग्रिम धन दिया जाता था।
अपनी व्यक्तिगत रूचि एवं कठोर दंड प्रावधानों से वह इन व्यवस्थाओं का दृढ़ता से पालन कर पाने में सफल हुआ। इस प्रकार की पद्धति से वह सामान के मूल्यों की देखभाल, बाट-बंटखरे की जांच करता था। कालाबाजारी, बेइमानी करनेवाले या अधिक मूल्य लेने पर व्यापारियों को सख्त सजा दी जाती थी। मूल्य निर्धारण, राशनिंग वस्तु विवरण आदि के बारे में अलाउद्दीन के नियम बड़े कठोर थे। अगर तौल कम किया तो उतने की वजन का मांस काट लिया जाता था। नियत दरों से अधिक भावों पर बेचने पर कोड़े लगवाये जाते थे। कड़ी निगरानी एवं कठोर दंड के प्रावधान ने इस योजना की सफलता सुनिश्चित की। इस योजना के प्रभाव के बारे में यह तय है कि अमीरों एवं सैनिकों को इस योजना से काफी फायदा हुआ। उनकी क्रय शक्ति काफी बढ़ गई। अकबर के समय में एक सामान्य नागरिक के लिए 3 से 4 टंका प्रति माह भरण-पोषण हेतु पर्याप्त राशि थी। अलाउद्दीन ने मनमाने ढंग से व्यापारियों के विरूद्ध काम नहीं किया। उसने व्यापारियों के मुनाफा कमाने की गुंजाइश को कम तो किया पर व्यापारियों को कभी घाटे का सामना नहीं करना पड़ा।
उसकी मृत्यु के बाद सैन्य गतिविधियां प्रायः समाप्त हो गई। एक वृहत सेना की आवश्यकता भी नहीं रह गई थी। अतः यह योजना उस दृष्टिकोण से अनावश्यक हो गई थी। फिर भी यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ऐसी योजना उस काल के हिसाब से किसी आश्यर्च से कम नहीं थी।
वह दिल्ली सल्तनत का महान शासक था जिसने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी दूरदर्शिता और मौलिकता प्रदर्शित की। हालांकि अलाउद्दीन खिलजी शिक्षित नहीं था फिर भी उसमें व्यावहारिक ज्ञान की कमी नहीं थी और वह अपने राज्य की आवश्यकताओं को भली-भांति समझता था। यह सही है कि उसने कुछ ऐसे कदम उठाये थे जो अमीरों एवं उलेमाओं जैसे प्रभावशाली वर्ग के हितों के विपरीत थे। यह चौदहवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशक में एक राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था को दर्शाता है। यह प्रयोग नया था। इस योजना से अलाउद्दीन खिलजी को जो सफलता मिली वह काफी रोचक एवं असाधारण है। वस्तुओं के जो नियंत्रित मूल्य अलाउद्दीन खिलजी ने रखे उसका अनुपालन दृढ़तापूर्वक हो उसने व्यक्तिगत तौर पर सुनिश्चित किया।