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बुधवार, 24 नवंबर 2010

इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्‍योंकि इन्‍हें खा नहीं सकता"-४

015मनोज कुमार

इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्‍योंकि इन्‍हें खा नहीं सकता" –१

इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्‍योंकि इन्‍हें खा नहीं सकता" –२
इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्‍योंकि इन्‍हें खा नहीं सकता"-३

इस कृत्रिम व्‍यवस्‍था में जो चालाक व्‍यापारी थे या कर्ज देने वाले थे वे तो लाभ कमा ही लेते थे। क्‍योंकि बाजार में जिस भाव में बिकता था, वे चीजों को उससे कम मूल्‍य पर खरीदते थे। पर कमर तो टूटती थी असल में पैदा करने वाले की। फिर इस क्षेत्र में कोई निवेश करना चाहता नहीं था। थोड़ी बहुत जो भी निवेश होता था वह उत्‍पादकता बढ़ाने में पर्याप्‍त होता था। अक्‍सरहाँ ऐसा देखने में मिलता था कि यदि किसी कृषक ने थोड़ा बहुत धन संचय कर लिया तो वह व्‍यापारी, सूदखोरी या बड़े हद तक किसी दूसरे कृषकों के लगान पर बटाईदारी पर दे देना बेहतर समझता था बनिस्‍बत की खुद के द्वारा खेती करने को। परजीवियों की तरह अपने पूरे जोखिम को दूसरे के मत्थे मढ़ने में अपनी भलाई समझता था। वस्‍तुतः कैपिटलिस्‍ट फार्मिंग करना सबसे बड़ी मूर्खता थी उसके लिए।

कृषि का वाणिज्‍यीकरण अकसरहाँ एक वलात् प्रक्रिया हुआ करती थी। अधिकांश कृषक गरीब थे। उन्‍हें पैसों की आवश्‍यकता पड़ती थी। क्‍योंकि राजस्‍व की वसूली तो जमींदार छोड़ने से रहे। फिर लगान तो नकद ही देना होता था। लगान नकद चुकाने की व्‍यवस्‍था के कारण किसानों को अपना अनाज एवं कच्‍चा माल मंडियों में बेचना पड़ता था, जिसे कम्‍पनी के अधिकारी बिचौलियों के माध्‍यम से खरीद कर उनका निर्यात करते थे। इन दो बढ़ती हुई समस्‍याओं के बोझ के नीचे दबा कृषक समुदाय आह भी नहीं भर पाता था। मजबूर था वह कैश क्रॉप उगाने को!

एक ब्रिटिश कलक्‍टर एक बार कोयम्‍बतूर के इलाके से जा रहा था। उसने देखा कि पूरे कृषि क्षेत्र में कपास की पैदावार की बहुतायत है। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। चावल आदि की जगह ये फसल? उसने कारण जानना चाहा। तो एक कृषक सामने आया और उसने जो कहा वह कृषि के वाणिज्‍यीकरण का कटु यथार्थ था। उसने कहा,

हम कपास की खेती सिर्फ इसलिए करते हैं, क्‍योंकि इन्‍हें हम खा नहीं सकते।

इस कथन में उनकी वेदना निहित है। अपने और अपने परिवार की उदरपूर्ति कर या न कर पाए, पर कैसे लगान चुकाई जाए उसकी चिंता उसे सालती रहती थी। लगान तो कैश में ही चुकेगी। और कैश आएगा सिर्फ कैश क्रॉप की बिक्री से। अगर वह अन्‍न उगाता तो हो सकता था कि भूख से बिलबिलाते अपने परिवार एवं खुद की विवशता के आगे उन्‍हें बेचने के वजाए खा ही जाता। पर अब वे अपना पेट काट कर ऐसी फसल बो रहे थे जिससे राजस्‍व की मांग की पूर्ति तो कर सकते थे।

अतः वाणिज्यिक फसलों की तरफ़ उनका झुकाव अपनी इच्‍छा से नहीं था बल्कि राजस्‍व एवं लगान के दवाब के तहत था। ये शिफ्ट गरीबों के अनाज जवार, बाजड़ा या दाल से अलग था, कृत्रिम था, एवं विवशता से था। जहाँ एक ओर इन फसलों से व्‍यापारी वर्ग व कंपनी को लाभ हुआ, वहीं इसने किसान की गरीबी को और बढ़ाया। क्‍योंकि व्‍यापारी वर्ग खड़ी फसलों को सस्‍ते दामों पर खरीद लेते थे और किसान, अपनी तत्‍कालीन आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए, अपनी फसल मंडी में न ले जाकर कटाई के समय खेत में ही बेच देते थे। हालांकि कुछ महीनों बाद, बेचारा वही फसल अपनी बिक्री की कीमत से अधिक कीमत देकर खरीदता था। यह उसकी तबाही को बढ़ाती ही थी। अगर किसान के पास धन होता तो वे थोड़ी देर प्रतीक्षा कर सकने की स्थिति में होते जिससे उन्‍हें अपनी फसल का अधिक मूल्‍य प्राप्‍त हो सकता था। लेकिन विवशता के जाल में फँसा कृषक फसल के समय ही सौदा करने को मजबूर था और फलतः उसे अपनी उपज से बहुत कम राशि प्राप्‍त होती थी। फिर इस शोषण के चक्रव्‍यूह में फँसा कृषक साहूकारों के चंगुल में बुरी तरह से फँसा ही रहता था। क्‍योंकि इन पैदावारों के लिए अधिक लागत की जरूरत पड़ती थी, यानी अधिक अग्रिम राशि, अधिक शोषण।

एक ध्‍यान देने वाली प्रमुख बात यह है कि भारत में कृषि के व्‍यवसायीकरण की प्रक्रिया, इंगलैंड की प्रक्रिया से सर्वथा भिन्‍न थी। इंगलैंड में बाजार के मूल्‍यों की वृद्धि के साथ साथ कृषि उत्‍पादन के मूल्‍यों की भी वृद्धि होती थी। इससे किसान की समृद्धि हुई, कृषि का विकास हुआ। कृषि क्षेत्र के अतिरेक ने जहाँ एक ओर औद्योगिक क्रांति को प्रोत्‍साहित किया, वहीं नई तकनीकों एवं वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग से कृषि क्षेत्र को भी प्रोत्‍साहन मिला। परंतु ऐसी स्थिति भारत में नहीं थी। भारत में तो कृषि का व्‍यवसायीकरण सम्राज्‍यवादी आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए जबरदस्‍ती थोपा गया था। फलतः व्‍यवसायीकरण की इस प्रक्रिया ने कृषि अर्थव्‍यवस्‍था के अन्‍तरविरोधों को न सिर्फ दूर किया, बल्कि उसमें और तीव्रता ही लाई।

santhalsanthalkaiiलेकिन क्‍या कृषक वर्ग सदा चुप चाप इन शोषणों को सहन करते रहे? क्‍या वे इसे नीयति मान कर सदा चुप रहने वाले थे? ऐसी बात नहीं थी। इन दुःखों के बावजूद, यातायात में सुधार एवं एक नई अर्थव्‍यवस्‍था के विकास के कारण गांव और गांव, तथा शहर और गांव एक दूसरे के करीब आए। उनमें आपसी सहयोग की भावना का विकास हुआ। एक नई चेतना का प्रादुर्भाव हुआ। इस चेतना ने उन्‍हें शोषणकारियों के विरूद्ध अपने अधिकारों के लिए विद्रोह को उकसाया। कई इलाकों में किसानों ने, बटाइदारों ने, आर्थिक संकट बढ़ने के कारण लगान देने से इंकार कर दिया। इतिहास में कई उदाहरण हैं – बंगाल का बटाईदार विद्रोह, संथाल विद्रोह, मराठा किसानों का साहूकारों के खिलाफ बगावत, चंपारण में नील की खेतिहरों का विद्रोह, मोपला विद्रोह आदि। ये सभी विद्रोह प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्‍वतंत्रता आंदोलन को मदद पहुँचा रहे थे। ब्रिटिश शोषणकारी नीति ने किसान को भाग्यवादिता से उबार कर उनमें परिस्थितियों का सामना करने की भावना पैदा की।

कृषि के क्षेत्र में ब्रिटिशों द्वारा व्‍यवसायीकरण की जो नीति अपनाई गई थी उसके कारण जो प्रतिविकास या घातक्रिया हुई उसमें यह महत्त्‍वूपर्ण नहीं है कि कृषकों को काफी संकटों या दुःखों का सामना करना पड़ा, बल्कि ध्‍यान देने वाली बात ये है कि उन्‍हें ये दुःख असत्‍व (कुछ भी नहीं) के लिए अकारण ही झेलना पड़ा। इन वाणिज्‍यीक फसलों की पैदरावार बढ़ाने के कारण खाद्यान्‍नों में कमी आना स्‍वाभाविक था। जिससे आए दिन अकाल पड़ने लगे। इन अकालों का दंश उन्‍हें भी झेलना पड़ा। कृषि के क्षेत्र में नाम मात्र का सुधार किया गया, जो अपर्याप्‍त था। अतः जब गहरे विश्‍लेषण में हम पैठते हैं तो पाते हैं कि यह वाणिज्‍यीकरण एक कृत्रिम ही नहीं बल्कि वलात् प्रक्रिया थी जिससे कृषि में बिना किसी वास्‍तविक विकास के विभेदीकरण हुआ। अंगरेजों ने भारतीय समाज के ढाँचे को तोड़ डाला और बिना किसी पुननिर्माण के पुरानी व्‍यवस्‍था को नष्‍ट-भ्रष्‍ट कर डाला। साथ ही अपनी पश्चिमी दुनियाँ के अनुरूप भौतिकवाद की नींव रखनी चाही।

----बस----

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्‍योंकि इन्‍हें खा नहीं सकता"-३

015मनोज कुमार

पिछले अंक

इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्‍योंकि इन्‍हें खा नहीं सकता" –१

इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्‍योंकि इन्‍हें खा नहीं सकता" -२

ब्रिटिश सरकार की वाणिज्‍यीकरण की नीति के तहत 1833 ई. में अंगरेजों को भारत में जमीन खरीदने तथा बगाल लगाने की अनुमति मिल गई। अंगरेजों ने बगान लगाकर उसमें काम करने वाले श्रमिकों की जो दुर्दशा की उसका वृतांत स्‍पष्‍ट करता है कि भारत को कृषि के वाणिज्‍यीकरण से कोई लाभ नहीं हुआ। बंगाल की प्रमुख पैदावार थी धान। अंगरेज यहाँ के किसानों को जबरन नील की खेती करने पर मजबूर करते थे, जबकि किसान अपनी बढि़या उपजाऊ जमीन पर धान उगाना चाहते थे। ज्‍यादातर नील उत्‍पादक यूरोपीय थे। इस क्षेत्र में नील उगाने वाले खेतिहरों पर उनका अत्‍याचार प्रबल था। इसके अलावा इस क्षेत्र के साहिब जमींदार अपने रैयतों से ऊंची दर पर नियत लगान वसूलते थे। नील की पैदावार में किसानों को मुनाफा भी काफी कम एवं अनिश्चित होता था तथा फसल के नष्‍ट हो जाने का खतरा भी बना ही रहता था। इससे भी महत्‍वपूर्ण बात यह है कि भारत से नील इंग्‍लैंड भेजा जाता था। जिन देशों को नील खरीदना होता था, वे अब भारत से न खरीद कर इंग्‍लैंड से खरीदते थे। इससे अंगरेजी पूँजीपतियों को काफी लाभ हुआ।

इसी तरह चाय बगान की खेती भी शुरू हुई। 1835 ई. में पहला चाय बगान लगाया गया। भारत में उत्‍पादित चाय लंदन में बेची जाती थी। चाय बगान में स्‍थानीय लोग काम करना नहीं चाहते थे। अतः दलालों के जरिये दूसरे क्षेत्रों से श्रमिकों को लालच देकर यहां काम करने के लिए लाया जाता था। फिर इनकी हालत गुलामों की तरह ही हो जाती थी। वे यहां से अपनी मर्जी से जा नहीं पाते थे। इन लोगों का शोषण किया जाता था जो स्‍पष्‍ट करता है कि वाणिज्‍यीकरण की प्रक्रिया से किसानों एवं मजदूरों की समृद्धि कतई नहीं हुई।

पूर्वी बंगाल में जूट की पैदावार होती थी। व्‍यापारिक हितों को ध्‍यान में रख कर सरकार द्वारा इन कृषि-उत्‍पादनों को बढ़ाने के लिए अग्रिम धन राशि भी दी जाती थी। यह ऋण के रूप में होता था। फसल पैदा होते ही सूद सहित मूल भी चुकाना उनकी मजबूरी होती थी। अकसरहाँ वे पूर्णरूपेण ऋण से मुक्‍त नहीं ही हो पाते थे। बल्कि ऊपर से उन्‍हें लगान भी कैश में देना होता था जिसके लिए भी कई बार ऋण लेना पड़ता था। इस तरह यह कुचक्र चलता रहता था।

उन्‍नीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक ब्रिटिश का सामुद्रिक एवं वैदेशिक व्‍यापार पर पूरा नियंत्रण था। अतः निर्यात से हाने वाले मुनाफे पर लगभग पूरा का पूरा कब्‍जा विदेशी कंपनियों को ही था। ये धन विदेश चले जाते थे। कुछ हिस्‍से भारतीय व्‍यापारियों एवं महाजनों तथा बिचौलियों के पल्‍ले भी पड़ता था। पर वह ऊंट के मुँह में जीरे के फोरन के बराबर होता था। किन्‍तु ऐसे चारा डाल कर ब्रिटिश यहां के जोतदारों एवं कृषकों को जुताई-बुआई के लिए अग्रिम राशि देते थे। ये निर्धन कृषक बुरी तरह ऐसे ऋणों पर आश्रित होते जा रहे थे, क्‍योंकि जमीन के किराए का बोझ बढ़ता जाता था। एक उदाहरण लें बिहार एवं यू.पी के चीनी मिल मालिक जमींदारों एवं महाजनों को ठेकेदार के रूप में नियुक्‍त करते थे। इनका काम होता था स्‍थानीय कृषकों से गन्ना संग्रह करना था मिल मालिकों को पहुँचाना। अब अपने इस काम में वे कृषकों को ऋण मुहैया कराते थे ताकि पैदावार अवाधित होती रहे। बस इस कुचक्र में भू स्‍वामियों एवं साहूकारों द्वारा गरीब, निरीह कृषकों का अविराम दोहन शोषण होता था।

किन्तु इस व्‍यवस्‍था से न तो भारतीय जमींदार वर्ग का फायदा हुआ और न ही कृषकों का। यह तो औपनिवेशिक शक्तियों के इरादे की पूर्ति में सहायक हुआ। उनका उद्देश्‍य था आर्थिक एवं कृषि अधिशेष को भारत से निकालना। हालांकि कहीं कहीं आधुनिक सिंचाई व्‍यवस्‍था, एवं अन्‍य उत्‍पादकता तकनीकी विकास तो हुए, जैसे दक्षिण का कपास क्षेत्र, आंध्र में गोदावरी कृष्णा एवं कावेरी का डेल्टा क्षेत्र, तथा तमिल नाडु एवं पंजाब के कई क्षेत्र, परंतु कृषि व्‍यवस्‍था को ऐसा बना दिया गया कि यह सब आधुनिकीकरण कृषकों के हित की रक्षा नहीं कर पाते थे। क्‍योंकि यहाँ की कृषि व्‍यवस्‍था दूर स्थित बाजार की मांगों पर पूरी तरह आश्रित थी। और इस मांग आपूर्ति के सिलसिले में बिचौलियों की महत्‍वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी। जितने ज्‍यादा बिचौलिए, उतना ही ज्‍यादा कृषकों पर बोझ एवं मुनाफा कम। साथ ही बुरी तरह बदलते दरों की मार भी कृषकों को ही सहनी पड़ती थी। जैसे 1860 के दशक के शुरू में अमरिकी गृह युद्ध के कारण कपास के निर्यात की मांग काफी थी। अतः दक्‍कन के कापस क्षेत्र के कृषकों को काफी मुनाफा हो रहा था। वे काफी उत्‍साह से पैदावार कर रहे थे। पर 1864 में यह युद्ध खत्‍म हो गया और नतीजे के तौर पर कपास निर्यात में काफी मंदी आई और कीमतें हठात काफी नीचे आ गई। क्‍योंकि विश्‍व बाजार में उत्तर अमेरिका, अर्जेन्‍टीना एवं अस्‍ट्रेलिया से कच्‍चे कपास की भारी आपूर्ति होने लगी थी। कपास की कीमतों की गिरावट का किसानों पर बहुत बुरा असर पड़ा इसी दौरान 1867 ई. में सरकार ने भू राजस्व की दर में करीब .50% की वृद्धि कर दी बस क्‍या था भारी कर्ज के बोझ के नीचे दब गए बेचारे कृषक। उस पर से अकाल एवं कृषि दंगों ने सत्‍यानास कर डाला।

ज़ारी……  अगले अंक में समाप्य

सोमवार, 22 नवंबर 2010

इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्‍योंकि इन्‍हें खा नहीं सकता" -२

इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्‍योंकि इन्‍हें खा नहीं सकता" –१

015

मनोज कुमार

पिछ्ले अंक से ज़ारी …..

एक निश्चित आय का स्‍त्रोत निर्धारित हो जाने के बावजूद भी अंग्रेजों की साम्राज्‍यवादी लालसा बढ़ती ही जा रही थी। लगातार भू-करों को बढ़ाते रहना राजनीतिक दृ‍ष्टि से बुद्धिमता पूर्ण नहीं था। 1813 के बाद भारत में व्‍यापारिक एकाधिकार समाप्‍त कर दिया गया और मुक्‍त व्‍यापार की नीति अपनाई गई। अंगरेजों ने भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को इंग्‍लैंड की अर्थव्‍यवस्‍था के उपनिवेश के रूप में इस्‍तेमाल किया। शुरू में तो वे व्‍यापारियों की तरह यहाँ से धनादोहन कर रहे थे। भारतीय वस्‍तुओं को यहाँ से खरीद कर इंगलैंड एवं यूरोप के बाजार में बेचकर मुनाफा कमा रहे थे। पर इंग्‍लैंड में हुंए औद्योगिक क्रांति के उपरान्‍त इस पूरे व्‍यापार का पैटर्न ही बदल गया।

मुक्‍त व्‍यापारिक व्‍यवस्‍था ने भारत को इंगलैंड के वस्‍त्र एवं अन्‍य उद्योग धंघों के लिए कच्‍चे माल का स्रोत बना दिया। फलतः ब्रिटिश पूँजीपतियों के लिए भारत एक मंडी बन गया। चूँकि औद्योगिक क्रांति के परिणामस्‍वरूप ब्रिटेन में उद्योग काफी फल-फूल रहे थे अतः उसे सस्‍ते कच्‍चे माल की आवश्‍यकता थी एवं उसके लिए अंगरेजों को भारत सबसे अच्छी जगह दिखाई दिया। भारत उनके लिए कच्‍चे माल का उत्‍पादन करने वाला देश बना दिया गया। और उसी कच्‍चे माल से इंगलैंड में तैयार वस्‍तुएं फिर भारत में लाकर बेची जाती थी। यह हुई दोहरी मार। इस परिवर्तन के कारण हमें अब केवल उन्‍हीं वस्‍तुओं का उत्‍पादन करना पड़ता था जिनकी इंगलैंड की मिलों की आवश्‍यकता थी। भारत अब विश्‍व के बाजारों के लिए फसल उगाने लगा।

कहने को तो आधुनिकीकरण की ओर उठाया गया यह एक कदम था, लेकिन भारतीय कृषकों के पास अच्‍छी खेती करने के उपयुक्‍त साधनों का अभाव था। दूसरी बात थी, कर तो मुद्रा में देना था। इसलिए भी किसान को अब उन फसलों को उगाना मजबूरी हो गई थी जिसको बाजार में आसानी से खरीदा बेचा जा सके। पहले किसान वे चीजें उगाते थे जिसको वे खाते थे या जिनका गांवों में विनिमय हो जाता था। किन्‍तु अब वे उस तरह की फसल उगाने को मजबूर थे जो बाजार एवं ब्रिटिश की मांगो पर निर्धारित होता था। इस तरह उत्‍पादन के स्‍वरूप में मूलभूत परिवर्तन आया। फलस्‍वरूप न सिर्फ भारत के पारम्‍परिक हस्‍तशिल्‍प को जोरदार आघात लगा बल्कि कृषि के क्षेत्र में भी उल्‍लेखनीय परिवर्तन हुआ।

पारम्‍परिक कृषि को छोड़ कर कृषक चाय, कपास, गन्‍ने आदि की पैदावार कर रहे थे, ताकि उन्‍हें उसका बाजार आसानी से मिल सके। कृषि को बाजार व्‍यवस्‍था से जोड़ा गया। इस प्रक्रिया को "कृषि का वाणिज्‍यीकरण" कहा जाता है। अब किसान वे वस्‍तुएं उगाने लगे जिनका देशी और विदेशी बाजार के दृष्टिकोण से अधिक मूल्‍य था। जैसे बंगाल में जूट, पंजाब में गेहूँ पैदावार पर अधिक ध्‍यान दिया जाने लगा। चाय काफी, कपास, पटनसन, गन्‍ना, तम्‍बाकू, नील, रबर आदि कुछ ऐसी ही फसलें थीं। किसानों को इनका उत्‍पादन करने के लिए विवश किया गया, जिससे इंगलैंड के उद्योगों को कच्‍चा माल मिल सके। कृषि के वाणिज्‍यीकरण की इस प्रक्रिया को अंगरेजों द्वारा आधुनिकीकरण एवं वृद्धि एवं विकास की निशानी बताया जाता था। क्‍या यह सोच सही थी? क्‍या ये विकास था? क्या कृषक सही मायने में लाभदायक स्थिति में थे?

आइए विचार करें।

कृषि के वाणिज्‍यीकरण की सरल व्‍याख्‍या है कि जो अधिशेष है उसके लिए बाजार है। उन्‍हें वहां बेचकर आमदनी प्राप्‍त की जा सकती है। फलतः ग्रामीण इलाके की समृ‍द्धि होगी। अधिक अतिरेक अधिक आय। अगले चरण में कैपिटलिष्‍ट फार्मिंग का आना यानि उत्‍पादकता में वृद्धि। परन्‍तु यह प्रक्रिया इतनी सरल भी नहीं थी। बड़े शातिर एवं पक्‍के तरीके से भारतीय धन का शेषण करना ही अंगरेजों के मंशे थे। विभिन्‍न क्षेत्रों एवं विभिन्‍न समयों में इसकी पद्धति भी अलग अलग थी। वह फसल की प्रकृति पर निर्भर करती थी। जैसे चाय की खेती हमारे विदेशी शासक खुद किया करते थे। यदि  किसी ने उनकी इच्‍छा के विरूद्ध कुछ भी‍ आनाकानी की तो उनके साथ अमानवीय व्‍यवहार किया जाता था। कम पैसे देकर उनसे अधिक मजदूरी कराई जाती थी। उनका तो हर कीमत पर अधिक से अधिक मुनाफा कमाना ही उद्देश्‍य था। बिल्‍कुल दासता की प्रथा का नमूना था यह।

अगले अंक में ....... अभी ज़ारी है .......

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

इतिहास :: "ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्‍योंकि इन्‍हें खा नहीं सकता"

इतिहास

"ये फसल इसलिए उगाता हूँ कि क्‍योंकि इन्‍हें खा नहीं सकता"

मनोज कुमार

हड़प्‍पन काल से 1947 ई, भारत के स्‍वतंत्र होने तक के चार हजार वर्षों के इतिहास में देश पर अनेक विदेशी शासकों ने शासन किया। इस लिहाज से देखें तो अंगरेजों द्वारा यहां शासन करना किसी विदेशी द्वारा शासन कोई नई बात नहीं थी, किंतु ब्रिटिश शासन ने हमारी आर्थिक एवं सामाजिक व्‍यवस्‍था को जितना प्रभावित किया उतना किसी अन्‍य शासकों ने नहीं। अंगरेजों के अलावा अन्‍य जितने भी विदेशी शासक यहॉं शासन किए वे अपने शासित राज्‍य को अपना समझते थे, अर्थात प्रजा को अपनी प्रजा की तरह मानते थे और उनके विकास में ही अपने शासन का उत्‍कर्ष देखते थे। यहॉं तक कि उनकी संस्‍कृतियाँ यहाँ कि मूल सांस्‍कृतिक धारा से मिल कर नई सांस्‍कृतिक धारा को जन्‍म दीं जो आज भी भारत भूमि पर सदावाही नदियों की तरह प्रवाहित हो रही है। लेकिन अंगरेजों का शासक के रूप में भी उद्देश्‍य अर्थ दोहन मात्र था। उन्‍होंने भारतीयों को कभी भी अपनी प्रजा नहीं समझा। जिसका परिणाम यह हुआ कि यहाँ की सांस्‍कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक व्‍यवस्‍था पूर्णरूपेण छिन्‍न-भिन्‍न हो गई। उपनिवेशवाद एवं साम्राज्‍यवाद के उद्देश्‍य की पूर्ति हेतु उन्‍होंने नई-नई नीतियों बनाकर पूंजीवाद स्‍थापित किया। इन नीतियों से सबसे अधिक क्षति यहाँ की कृषि को हुआ। अंगरेजों के शासन काल में कृषकों का इतना शोषण हुआ कि भारत के ही नहीं विश्‍व के इतिहास में शोषण का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। उनकी औपनिवेशिक नीतियों के कारण कृषि का वाणि‍ज्‍यीकरण हुआ एवं उसके कुपरिणाम कृषकों को झेलने पड़े।

अंगरेजों के भारत आगमन के पहले हमारे गांव आत्‍म-निर्भर हुआ करते थे। गांव के लोगों की आवश्‍यकता की सभी चीजों का उत्‍पादन एवं विनिमय गांव में ही होता था। फलतः गांव और शहर का संबंध सीमित था। हलांकि सामंती व्‍यवस्‍था थी, पर भूमि पर किसी व्‍यक्ति विशेष का स्‍वामित्‍व नहीं होता था। भूमि पर स्‍वामित्‍व पूरे कृषक समुदाय का था। जमीन न तो बेची जा सकती थी और न ही खरीदी जा सकती थी। लगान फसल का एक भाग होता था नकद मुद्रा के रूप में नहीं। शासक हमेशा भू-राज्‍स्‍व का निर्धारण एवं उसकी वसूली की व्‍यवस्‍था उत्‍पादन के आधार पर करते थे। जब ब्रिटिशों के रूप में पूँजीवादी व्‍यवस्‍था का भारत पर हमला हुआ तो तत्‍कालीन भारतीय सामंती व्‍यवस्‍थार उसका विरोध न कर सकी। साम्राज्‍यवादी अंगरेजों ने आत्‍मनिर्भर गाँवों के हृदय पर वार किया और जो चीजें व्‍यापारिक नहीं थी, जिनकी खरीद बिक्री नहीं होती थी, उन्‍हें भी व्‍यापारिक बना दिया। दूरगामी प्रभाव लिए यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन था।

1757 ई में प्‍लासी की लड़ाई के बाद इंग्‍लैंड की ईष्ट इंडिया कंपनी का बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर कब्‍जा हो गया। इसे हम भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की स्‍थापना मान सकते हैं। 1765 ई. में कंपनी को बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा के भू-राजस्‍व प्रशासन का भार भी मिल गया। धीरे-धीरे उन्‍होंने अपनी इस पकड़ को और सुदृढ़ करने के प्रयास की ओर ध्‍यान देना शुरू किया तो प्राचीन काल से चले आ रही कर प्रणाली को बढ़ाने के लिए साथ साथ नए नए करों की गुंजाइश को खोजने का प्रयास करने लगे। भू-राजस्व उस समय उनका एकमात्र सबसे बड़ा आय का स्रोत था। सबसे पहले उन्‍होंने बोली लगाने की प्रथा शुरू की और उच्‍चतम बोली लगाने वाले को भूराज्‍स्‍व का अधिकार देने लगे। इस व्‍यवस्‍था के कारण परंपरागत जमींदारों के साथ साथ नए बनिए जमींदार वर्गों ने ऊँची बोली लगाकर राज्‍सव वसूली का अधिकार पा लिया। ये वर्ग भूमि को एक निवेश का साधन समझते थे। उससे मुनाफा कमाना इनका उद्देश्‍य बन गया। अंगरेजों के लिए राजस्व इकट्ठा करने के नाम पर वे न सिर्फ किसानों से अत्‍यधिक मांग करते थे बल्कि उसकी पूर्ति के लिए कठोर तरीके भी अपनाते थे। अधिक कर निर्धारण एवं नए जमींदारों की धन-लिप्‍सा के शोषण का खेतिहरों को शिकार होना पड़ा।

ब्रिटिश भू-राजस्‍व -व्‍यवस्‍था के बड़े दूरगामी परिणाम हुए। पहला राजस्‍व की दर ऊँची होने के कारण कृषि एवं कृषकों का विकास नहीं हो पाया। इस नई व्‍यवस्‍था ने गरीब कृषक वर्ग को और गरीब बनाया। कृषि व्‍यवस्‍था में ऐसे बदलाव लाए गए जिससे अंगरेजों के लिए भारतीय कृषकों का शोषण सरल हो गया। दूसरे, पहले से चली आ रही मान्यताएं एवं व्‍यवस्‍थाओं का विखंडन हुआ। जमीन पर निजी स्‍वामित्‍व को बढ़ावा दिया गया ताकि व्‍यक्तिगत कर निर्धा‍रण किया जा सके। इस तरह व्‍यक्तिगत कर अदायगी की प्रथा शुरू हुई। तीसरे, पारंपरिक सामाजिक व्‍यवस्‍था में बुनियादी परिवर्तन आया। भू-राजस्‍व के बंदोबस्‍त के कारण समाज में एक ऐसे कुलीन वर्ग का उदय हुआ जो अंगरेजों के हितों की पूर्ति में उनके सहायक बने। ये जमींदार वर्ग किसानों से मनमानी रकम वसूल कर निश्चित राशि सरकार को देता था और अपने लिए काफी मुनाफा कमाता था। चौथे, आर्थिक व्‍यवस्था एवं कर भुगतान के तरीके में परिवर्तन आया। पहले लगान खड़ी फसल का एक भाग होता था, और इसका निर्धारण फसल की पैदावार के अनुसार हर साल अलग-अलग होता था। किन्‍तु अब भूमि के टुकड़े के आधार पर लगान निर्धारण होने लगा। फसल अच्‍छी हो या बुरी "कर" की राशि निश्चित होती थी। लगान का भुगतान फसल के बजाए नकद कैश में किया जाता था , जिसका किसान के पास सदा अभाव रहता था। परिणाम यह हुआ कि कर देने के बाद जो कुछ किसान के पास बचता था उससे उसका जिन्‍दा रहना भी दुभर हो जाता था। मुद्रा में कर देने के लिए उसे फसल बेच देनी पड़ती थी। अपने जीवन निर्वाह और भू-राजस्‍व के नकद भुगतान के लिए किसानों को महाजन से कर्ज लेना पड़ता था। विपत्ति के समय, जमींदार का कर चुकाने के लिए, या कर की जरूरतों को पूरा करने के लिए भूमि को गिरवी रखा जाता था या बेच दिया जाता था। फलतः भूमि के दाम बढ़ने लगे। रेहन में दी गई जमीन, साहूकारों के हाथों से शायद ही कभी वापस आती थी। सूद चुकाने में ही जीवन बीत जाता था, मूल तो ज्‍यों का त्‍यों पड़ा रहता था। ऋण या लगान न चुका सकने की स्थिति में भूमि पर साहूकार कब्‍जा कर लेते थे या यूँ कहें कि किसानों को भूमि से बेदखल कर दिया जाता था। इस तरह जो किसान, पहले, पहले मालिक होता था जमीन का, अब धीरे-धीरे विवशता में अपने जीवन यापन के लिए दूसरे की जमीन जोतने वाला खेतिहर मजदूर बनने को मजबूर हो जाता था। ग्रामीण संगठन के ढांचे में आई यह दरार साबित करती थी कि भारतीय सामाजिक और आर्थिक जीवन पर कितनी बड़ी चोट थी यह। जो जमीन पहले पूरे गांव की मिलकियत थी उसे अलग अलग लोगों में बाँट दिया गया। अंगरेजों की औपनिवेशिक आर्थिक नीतियाँ, भू-राजस्‍व की नई प्रणाली और उपनिवेशवादी प्रशासनिक एवं न्‍यायिक व्‍यवस्‍था ने किसानों की कमर तोड़ दी।

ज़ारी ……

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

इतिहास :: मुग़ल काल में सत्ता का संघर्ष

मुग़ल काल में सत्ता का संघर्ष

IMG_0531मनोज कुमार

मुगल शासन व्‍यवस्‍था में उतराधिकार का कोई नियम नहीं था। फलतः सुलतान के मरते ही शहजादे गद्दी के लिए आपस में संघर्ष किया करते थे। मुगल साम्राज्‍य के इतिहास में गद्दी के दावे के लिए अनेक गृह युद्ध हुए हैं जिन्‍होंने मुगलों की शक्ति और प्रतिष्‍ठा को भारी क्षति पहुंचाई।

बाबर और हुमायूं ने भारत में मुगल राजवंश की स्‍थापना तो कर दी थी परंतु वे इसे स्‍थायित्‍व नहीं दे पाये। अकबर ने इस काम को पूरा किया। उसने राज्‍य के विस्‍तार के अलावा इसके सुदृढ़ीकरण की भी व्‍यवस्‍था की पर उसके जीवनकाल में ही जहांगीर ने गद्दी पर अधिकार करने के लिए विद्रोह कर दिया था, अकबर ने उसे समझा-बुझाकर शांत किया था।

जहांगीर के शासनकाल में शहजादों के विद्रोह ने बड़ा विकृत रूप धारण कर लिया। उसके शासनकाल में पहला विद्रोह शहजादा खुसरो का हुआ था परंतु जहांगीर ने अपनी काबिलियत से उसे दबा दिया। खुसरो की सहायता करने के अपराध में जहांगीर ने सिखों के गुरू अर्जुन देव जी को फांसी की सजा दी। इससे मुगल सिख संबंध अच्‍छे नहीं रहे। खुसरो के विद्रोह से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण खुर्रम का विद्रोह था। नूरजहां अपने दामाद शहरयार को गद्दी दिलवाना चाहती थी। इसलिए शहजादा खुर्रम ने विद्रोह कर दिया। हालांकि उसने बाद में जहांगीर से माफी मांग ली पर उसके इस विद्रोह के कारण मुगलों को कंधार खोना पड़ा।

शाहजहां ने अपने भाइयों व भतीजों का वध करके गद्दी हासिल की थी। बाप के चरण चिह्नों पर चलते हुए औरंगजेब ने भी यही इतिहास दुहराया। खुद औरंगजेब के शासनकाल में शहजादों के विद्रोह ने सम्राट को परेशान किये रखा। ऐसे विनाशकारी संघर्षों में धन-जन की भारी हानि हुई और साम्राज्‍य को गहरा धक्‍का लगा। इन सभी गद्दी के दावों के लिए हुए युद्धों में से जो शाहजहां के बेटों के बीच लड़ा गया, वह कई अर्थों में विशिष्‍ट था। पहली बात तो यह कि शासक के जीवित रहते हुए उत्तराधिकार का जो विद्रोह हुआ, वह शाहजहां के समय में जितने लंबे समय तक चला और जितने विस्‍तृत क्षेत्र में यह संघर्ष हुआ, ऐसा इसके पूर्व कभी नहीं हुआ। इस संघर्ष में एक विद्रोही राजकुमार विजयी होता है और स्‍वयं सत्ता संभाल लेता है। जब मुगलकाल में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष की बात होती है तो हमारा ध्‍यान बरबस यहीं आ टिकता है।

यह लड़ाई 1657-58 ई. के बीच हुई थी। हालांकि औरंगजेब के चार बेटे थे, पर यह लडाई मुख्‍य रूप से शाहजहां के पुत्र दारा और औरंगजेब के बीच लड़ी गई थी। दारा सबसे बड़ा था और हमेशा शाहजहां के साथ रहता था तथा उत्तरी भारत का उत्तराधिकारी भी था। वह उदार और दयालु स्‍वाभाव का था। शाहजहां उससे बहुत प्‍यार करता था। दूसरा बेटा शाह शुजा बंगाल का शासक था लेकिन वह अकर्मण्‍य एवं विलासी था। तीसरा औंरगजेब दक्षिण का शासक था। वह सैनिक गुणों एवं कूटनीतिज्ञता में माहिर था। चौथा मुराद गुजरात एवं मालवा का शासक था। उसमें भी सैनिक एवं प्रशासनिक योग्‍यता का अभाव था।

चूंकि चारों बेटे चार अलग-अलग क्षेत्र के शासक थे तो ऐसा प्रतीत होता है कि शायद शाहजहां अपने बेटों के बीच राज्‍य का बंटवारा करना चाहता था। पर वास्‍तविकता क्‍या थी, कहा नहीं जा सकता। स्थिति ऐसी थी कि उत्‍तराधिकार की समस्‍या पर कभी भी लड़ाई हो सकती थी क्‍योंकि चारों के पास सैनिक थे और चारों गद्दी के लिए लालायित थे। ऐसी स्थिति में 16 सितंबर, 1657 ई. में शाहजहां जब सख्‍त बीमार पड़ा और उसके बचने की उम्‍मीद न के बराबर थी, तब चारों बेटों-दारा, शुजा, औरंगजेब और मुराद के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हो गया क्‍योंकि वे अपनी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे। सिंहासन प्राप्‍त करने की महत्‍वकांक्षा वाले उसके सभी पुत्र अपनी अपनी योजनाएं बनाने लगे। इसकी शुरूआत शुजा ने की। उसने बंगाल में स्‍वयं को सम्राट घोषित कर दिल्‍ली की ओर प्रस्‍थान किया। फिर क्‍या था – मुराद भी खुद को शासक घोषित कर दिल्‍ली की ओर चल पड़ा। औरंगजेब ने खुद को शासक तो घोषित नहीं किया, पर दिल्‍ली की ओर इस घोषणा के साथ चल पड़ा कि वह अपने बीमार पिता को देखने जा रहा है।

इधर शाहजहां की बीमारी के समय दारा उसके साथ दिल्‍ली में ही था। उसने शाहजहां की बीमारी की खबर को रोकने के प्रयास किए। साथ ही पिता को लेकर दिल्‍ली से आगरा आ गया। पर परिणाम उलटा हुआ। लोगों में यह अफवाह फैल गई कि शाहजहां वास्‍तव में मर गया है और दारा इस खबर को छिपाकर खुद को बादशाह घोषित करना चाहता है। इस बीच दारा की सेवा-सुश्रुषा में शाहजहां थोड़ा ठीक हुआ। उसे जब उत्तराधिकारी के संघर्ष की जानकारी लगी, तो उसने अपने बेटों को पत्र लिखा कि अपने-अपने क्षेत्र वापस लौट जाएं। वे स्‍वस्‍थ हैं। इस पर किसी ने भी ध्‍यान नहीं दिया। बल्कि औरंगजेब ने कहा कि यह पत्र जाली है। इधर शाहजहां ने संघर्ष टालने के इरादे से दारा को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया। पर इसका प्रभाव दारा के अन्‍य भाइयों पर विपरीत ही पड़ा और वे गद्दी पर अधिकार प्राप्‍त करने के लिए व्‍याकुल हो उठे।

इतिहास भी तो अपने आप को दुहराता है। मुगलों के बीच उत्तराधिकार का मामला, अधिकांशतः तलवारों के द्वारा ही निर्धारित हुआ था। शाहजहां ने भी तो खुद इस रास्‍ते गद्दी पाई थी। फिर उसके बेटे कहां चूकने वाले थे। युद्ध एवं रक्‍तपात अवश्‍यंभावी था। पर इस बार इसमें एक विशेषता थी। पहले के उत्तराधिकार का संघर्ष सम्राट की मृत्‍यु के पश्‍चात हुआ था। इस बार यह तब होने जा रहा था जबकि शाहजहां अभी जीवित था। इस युद्ध में न सिर्फ उसके चार बेटे ही लड़े बल्कि उसकी बेटियां ने भी परोक्ष रूप से हिस्‍सा लिया। जहांआरा ने दारा शिकोह की सहायता की तो रोशन आरा ने औरंगजेब की मदद की तथा गौहन आरा ने मुराद बख्‍श का पक्ष लिया।

औरंगजेब ने मुराद को अपने पक्ष में मिलाकर आपस में राज्‍य का बंटवारा कर लेने का समझौता किया तथा दोनों की मिलीजुली सेना आगरा की तरफ़ कूच कर कई। उधर शाह शुजा भी बनारस तक आ पहुंचा था। तब शाहजहां एवं दारा के पास उनको युद्ध में पराजित करने के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्‍होंने अपनी सेना भेजने का निश्‍चय किया।

दारा के पुत्र सुलेमान शिकोह के नेतृत्‍व में एक सेना शाह सुजा को पराजित करने के लिए भेजी गई और दूसरी सेना राजा जसवंतसिंह के नेतृत्‍व में मालवा की तरफ़ औरंगजे‍ब एवं मुराद के खिलाफ युद्ध के लिए भेजी गई। सुलेमान शिकोह की सेना के हाथों शाह शुजा की पराजय हुई और वह बंगाल भाग गया परंतु अप्रैल, 1658 में राजा जसवंत सिंह के नेतृत्ववाली शाही सेना को औरंगजेब एवं मुराद के विरूद्ध धरमत के युद्ध में मुंह की खानी पड़ी। वास्‍तव में जसवंतसिंह को यह जानकारी नहीं थी कि उसे औरंगजेब एवं मुराद की मिलीजुली सेना का सामना करना पड़ेगा। वह तो सिर्फ मुराद की सेना की उम्मीद कर रहा था। फलतः उचित संसाधनों के अभाव में उन दोनों के संगठित सैन्‍य बल का मुकाबला वह नहीं कर पाया। यह विजय मुराद एवं औरंगजेब की हौसला अफजाई के लिए काफी थी । अब वे आगरा की तरफ बढ़ेब।

परिस्थिति की गंभीरता को भांपकर दारा ने भी मैदान ए जंग में कूदने का निर्णय लिया। उसने एक विशाल सेना इकट्ठी की एवं अपने बागी भाइयों का सामना करने चल दिया। जून, 1658 में दोनों पक्षों की सामूगढ़ में भिड़ंत हुई। औरंगजेब एवं मुराद की सेना एवं उनकी युद्ध-कुशलता के आगे दारा टिक न सका। उसकी बुरी तरह से हार हुई। निराश-हताश दारा शाहजहां से भी मिलने का साहस न जुटा सका और अपने परिवार के साथ दिल्‍ली की तरफ भाग गया और वहां से लाहौर चला गया। इस प्रकार औरंगजेब और मुराद की स्थिति काफी मजबूत हो गई। सामूगढ़ की लड़ाई ने दारा का भविष्‍य निर्धारित कर दिया। औरंगजेब ने आगरे के किले पर अधिपत्‍य जमाया तथा अपने पिता शाहजहां को बंदी बनाकर कैदखाने में डाल दिया, जहां शाहजहां अपनी मृत्‍यु पर्यन्‍त जनवरी 31,1666 ई. तक कैद में ही रहा। बाप बेटे के बीच पत्रों का आदान-प्रदान तो होता था पर दोनों में कभी आमना-सामना नहीं हुआ।

औरंगजेब काफी महत्त्वाकांक्षी था। उसने अपनी और गद्दी के बीच आनेवाली हर बाधा को दूर करने का निश्‍चय किया। आगरा के किले पर फतह के बाद औरंगजेब ने दारा पर खास ध्‍यान केंद्रित नहीं किया। अब उसके सामने मुख्‍य बाधा थी – मुराद एवं उसका सैन्‍य बल। मुराद स्‍वतंत्र रूप से रहने लगा था। अतः औरंगजेब को उसकी तरफ़ से खतरे का एहसास था। उसी तरह मुराद भी उसकी तरफ शंका की दृष्ष्टिकोण रखता थे। औरंगजेब ने अपने रास्‍ते से मुराद को हटाने का निर्णय लिया। उसने मुराद को कई बार दावत पर बुलाया, पर हर बार मुराद नकार जाता था। एक बार शिकार से लौटते हुए मथुरा के निकट एक रात की दावत के औरंगजेब के नयौते को उसने अपने एक अधिकारी की सलाह पर स्‍वीकार कर लिया। उस अधिकारी को औरंगजेब ने धन देकर अपनी तरफ मिला लिया था। मुराद को खासी तगड़ी दावत खाने को मिली। तत्पश्‍चात एक सुंदर दासी को मुराद की मालिश करने को भेजा गयास। काफी चालाकी से उसने मुराद को गहरी नींद सुला दिया एवं उसके सभी शस्‍त्र उसके पास से हटा दिए। इस प्रकार निहत्‍था मुराद आसानी से बंदी बना लिया गया।

औरंगजेब मथुरा से दिल्‍ली आ गया। बिना किसी प्रतिरोध के उसने दिल्‍ली पर अधिपत्‍य जमाया और राज्‍यभिषेक कर खुद को सम्राट घोषित कर दिया। दारा सामूगढ़ की हार के बाद भटकता रहा था। बाद में उसे भी पकड़ कर बंदी बना लिया गया तथा मृत्‍यु दंड दे दिया गया। शुजा भी बनारस की लड़ाई के बाद बंगाल लौटा। वहां भी औरंगजेब के द्वारा तंग किए जाने पर आसाम से होते हुए बर्मा गया और वहीं उसकी मृत्‍यु हो गई।

सन 1658 तक औरंगजेब के सभी विरोधी खत्‍म हो गये। गद्दी के सभी दावेदार समाप्‍त हो गए। उसकी स्थिति काफी मजबूत हो गई। उसने शाहजहां को बंदी बना लिया था और स्वयं को शासक घोषित कर चुका था।

गद्दी के उत्तराधिकार के इस संघर्ष का परिणाम बहुत बुरा रहा। ढेर सारे लोग मारे गए। इसके कारण साम्राज्‍य को आर्थिक एवं सैनिक, दोनों की भारी क्षति पहुंची। एक वर्ष तक मुगल साम्राज्‍य इसमें उलझा रहा। इससे साम्राज्‍य विरोधियों का मनोबल काफी बढ़ा। मराठा अपनी शक्ति को बढ़ाने लगे। उत्तर पश्चिमी सीमा पर अफगानियों ने विद्रोह किया। इस बीच दक्षिण भारत से भी मुगल साम्राज्‍य का ध्‍यान हटा रहा।

दूसरी ओर उत्तराधिकार के इस संघर्ष में इसकी सफलता अभूतपूर्व थी। इसकी सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि भविष्‍य में सत्ता पर अधिकार करने के लिए उत्तराधिकार का फैसला तलवार द्वारा ही संभव है।

इस तरह उत्तराधिकार का यह संघर्ष, मुगल साम्राज्‍य के लिए तात्‍कालिक और दूरगामी, दोनों ही तरह से, हानिकारक सिद्ध हुआ । औरंगजेब का 50 वर्ष का शासनकाल शांति और सुव्‍यवस्‍था की जगह समस्‍याओं का काल रहा। औरंगजेब के अंत तक साम्राज्‍य की एकाग्रता एवं संगठन समाप्‍त हो चुका था और महान मुगल साम्राज्‍य का पतन शुरू हो गया था। और उस पतन के बीज उत्तराधिकार के संघर्ष में ही छिपे थे। यह संघर्ष धीरे धीरे साम्राज्‍य को खोखला करता गया और एक दिन वह बीज विशाल वृक्ष बन कर उसके पतन की राह प्रशस्‍त कर गया।

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-४)

इतिहास मध्यकालीन भारत

धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-४)

IMG_0545मनोज कुमार

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-१)

मध्यकालीन भारत धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२)    
मध्यकालीन भारत धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-3)

Shri mahaprabhuji.jpgपश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृष्ण पंथ के अगुआ थे संत वल्लभाचार्य (1479-1531) और पूर्वी भारत में संत चैतन्य महाप्रभू (1485-1533)। दोनों का भक्ति मार्ग में विश्‍वास था। दोनों ने ही श्रीकृष्ण एवं राधा के बीच प्रेम को ईश्‍वर के प्रति निष्ठा के मॉडल के रूप में अपनाया। संत वल्लभाचार्य का जन्म 1479 ई. में दक्षिण भारत के एक तेलुगु परिवार में कांकरवाडग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्रीलक्ष्मणभट्टजी की पत्नी इलम्मागारूके गर्भ से काशी के समीप हुआ था। उन्हें वैश्वानरावतार [अग्नि का अवतार] कहा गया है। इनके पिता काशी में आकर बस गए थे। उनका मानना था कि ब्रह्म और आत्मा में कोई भेद नहीं है। आत्मा भक्ति के माध्यम से अपने बंधनों से छुटकारा पा सकती है। भक्त को वसुदेव के चरणों में स्वयं को अर्पित कर देना चाहिए, क्योंकि वही मनुष्य को पापों से छुटकारा दिला सकता है। उन्होंने कृष्ण को अपना आराध्य देव बनाया। वे नृत्य-गान और भक्ति के द्वारा भगवान को रिझाने का प्रयास करने लगे। उन्होंने विशेष रूप से भगवान की प्रतिमा पूजा पर बल दिया। वे विजयनगर सम्राट कृष्णदेव राय की सभा में राज पंडित के रूप में रहते थे। उनकी प्रसिद्ध पुस्कें हैं “सुबोधिनी” एवं “सिद्धान्त रहस्य”। संत वल्लभचार्य की मृत्यु के पश्‍चात् दुर्भाग्यवश उनके पंथ में कुछ अवांछनीय प्रथा का प्रवेश हो गया।

Chaitanya mahaprabhu.jpgदूसरी ओर संत चैतन्य महाप्रभू के सम्प्रदाय ने दृढ़ अनुशासन के द्वारा नैतिकता का स्तर बनाए रखा। वे सरल, आडम्बर रहित भक्ति में विश्‍वास रखते थे। उनका यह भी मानना था कि ईश्‍वर के प्रति प्रेम, भक्ति, भजन और नृत्य द्वारा परम आनंद की एक एंसी स्थिति उत्पन्न होगी जिसमें ईश्‍वर का साक्षात्कार होगा। उनका कहना था कि भगवान श्रीकृष्ण की उपासना एवं गुरु की सेवा से कोई भी व्यक्ति ईश्‍वर से एकीकृत हो सकता है। आध्यात्मिक उत्साह के कारण इस सम्प्रदाय में संकीर्तन का विकास हुआ। संत चैतन्य ने भी ब्राह्मण धर्म के कर्मकाण्डी स्वरूप तथा जाति प्रथा की निन्दा की एवं अपने पंथ में निम्न वर्ग यहां तक कि मुसलमानों को भी सम्मिलित किया।

रसखान का कृष्णपंथ में बहुत ही सक्रिय योगदान रहा है। अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना के भी कई दोहे श्रीकृष्ण को समर्पित हैं। संत चैतन्य ने न सिर्फ़ भक्ति आंदोलन में सुधार किया बल्कि बंगाल की सामाजिक व्यवस्था में भी सुधार के प्रयास किए।

चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच अन्य संत व धर्मोपदेशक जैसे संत नामदेव, व संत तुकाराम ने महाराष्ट्र में, संत ज्ञनेश्‍वर व संत दादू दयाल ने गुजरात में तथा बाद में गोस्वामी तुलसीदास, संत सूरदास एवं मीराबाई ने भक्ति आंदोलन को आगे बढ़ाया। गोस्वामी तुलसी दास ने रामपंथ को बढ़ावा दिया। संत सूरदास संत वल्लभाचार्य के शिष्य थे। उन्होंने ब्रजभाषा में “सूरसागर” लिखा। उन्होंने श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार किया। रास्थान की मीराबाई एक संत ही नहीं कवयित्री भी थीं। हालाकि उनके बड़े अनुयायी नहीं हुए फिर भी उनके भक्ति-गीत बहुत ही महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय हैं।

महाराज छत्रपति शिवाजी के समकालीन संत तुकाराम महाराष्ट्र क्षेत्र में सक्रिय थे। उन्होंने भगवान बिठोवा की अर्चना को लोकप्रिय बनाया। उनका मंदिर पंढ़ारपुर में है। बाद में बिठोवा भगवान को श्रीकृष्ण का अवतार माना जाने लगा। संत तुकाराम ने भी हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया। संत तुकाराम के ही उपदेशों का प्रभाव था कि महारज शिवाजी मुस्लिम प्रजा के प्रति काफी उदार भाव रखते थे।

निर्गुण भक्ति की परंपरा में संत कबीर दास और गुरु नानक देवजी के साथ एक और नाम है संत दादू दयाल का। उन्होंने नैतिक शुद्धता पर बल दिया। उन्होंने भक्ति के द्वारा समाज सेवा एवं मानवतावादी दृष्टिकोण लोगों के सामने प्रस्तुत किए। विभिन्न विरोधी सम्प्रदायों को भ्रातृत्व और प्रेम में बांधकर एक करने की कामना से उन्होंने एक अलग पंथ का निर्माण किया जो “दादू पंथ” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। “दादू ग्रंथावली” में उनकी संकल्पनाएं संग्रहीत हैं।

अगले अंक में उपसंहार और समापन (चित्र आभार गूगल सर्च)

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

मध्यकालीन भारत धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-3)

मध्यकालीन भारत

धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-3)

मनोज कुमार

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-१)
मध्यकालीन भारत धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२)

निर्गुणपंथी संत कबीरदास का जन्म 1440 ई. के लगभग हुआ था। कबीरदासजी भक्त संत ही नहीं समाज सुधारक भी थे। डनहोंने अंधविश्‍वास, कुरीतियों और रूढ़िवादिता का विरोध किया। विषमताग्रस्त समाज में जागृति पैदा कर लोगों को भक्ति का नया मार्ग दिखाना इनका उद्देश्य था। जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए। उन्होंने हिंदु-मुस्लिम एकता के प्रयास किए। उन्होंने राम और रहीम के एकत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने दोनों धर्मों की कट्टरता पर समान रूप से फटकार लगाई। वे मूर्ति पूजा और कर्मकांड का विरोध करते थे। वे भेद-भाव रहित समाज की स्थापना करना चाहते थे। उन्होंने ब्रह्म के निराकार रूप में विश्‍वास प्रकट किया। एकेश्‍वरवाद के समर्थक संत कबीरदास का मानना था कि ईश्‍वर एक है। उन्होंने व्यंग्यात्मक दोहों और सीधे-सादे शब्दों में अपने विचारों को व्यक्त किया। फलत: बड़ी संख्या में सभी धर्मों एवं जातियों के लोग उनके अनुयायी हुए। संत कबीर के अनुयाई कबीरपंथी कहलाए। उनके उपदेशों का संकलन बीजक में है।

इस परंपरा में संत कबीर के साथ जो अनेक संत और महात्मा हुए उनमें गुरु नानक देवजी, रैदास, धन्ना, सुन्दर दास, दादू दयाल, मलूक दास और धरणी दास के नाम काफी प्रचलित हैं। गुरु नानक देवजी का जन्म तलवंडी (नानकाना साहिब) में 1469 में हुआ था। उन्होंने भी एकेश्‍वरवाद का उपदेश दिया। संत कबीरदास और गुरु नानक देवजी दोनों का मानना था कि सभी धर्मों का लक्ष्य एक ही है। सिर्फ उनके कर्मकांड अलग-अलग होते हैं। पुजारी वर्ग कर्मकाण्ड पर अधिक ज़ोर देकर भेद पैदा करते हैं। इन दोनों महात्माओं का मानना था कि जाति प्रथा उचित नहीं है और इसे समाप्त कर देना चाहिए।

इन समान विचारों के बावज़ूद दोनों महापुरुषों में मूलभूत अंतर था। संत कबीर एक आलोचक थे। उनका विश्‍वास था कि समाज की रूढ़िवादिता की निन्दा करके ही इसे समाप्त किया जा सकता है। जबकि गुरु नानक देवजी एक रचनात्मक प्रतिभा वाले व्यक्ति थे। उन्होंने अपनी शक्ति केवल निन्दा में ही नहीं लगाई। उन्होंने समाज सुधार का एक रचनात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। उन्होंने लंगर का एक प्रस्ताव रखा जिसमें विभिन्न जाति के लोग साथ-साथ भोजन कर सकें। उन दिनों उठाया जाने वाला यह क़दम निश्चित तौर से क्रान्तिकारी था। उनका विचार था कि एक नई धारणा का प्रचार किया जाए तो निश्चित रूप से हिन्दू एवं इस्लाम दोनों पंथों के लोग अंतत: एक प्लेटफॉर्म पर आ जाएंगे।

गुरु नानक देवजी ने संत कबीर की तुलना में अपने सम्प्रदाय को प्रभावशाली ढ़ंग से एक संगठनात्मक रूप दिया। संत कबीर ने कोई संस्था नहीं बनाई। अत: उनके बाद उनके विचारों को उतना महत्व नहीं मिला जितना उनके जीवनकाल में था। गुरु नानक देवजी ने गुरु प्रथा पर आधारित संस्‍था चलाई। जिस कारण सिख समुदाय को हमेशा एक गुरु का नेतृत्व मिलता रहा और उन्होंने गुरु के आदेशों का पालन भी किया। गुरु नानाक देव के उपदेशों ने एक नए धर्म की स्थापना का आधार तैयार किया जो आनेवाले समय में गुरु गोविंद ‍िसंहजी के नेतृत्व में सिख धर्म के नाम से प्रचलित हुआ। उनके विचारों का संकलन गुरु ग्रंथ साहिब में किया गया।

गुरु नानक देवजी के बाद इस सम्प्रदाय का विशदीकरण किया गुरु अर्जुन दासजी ने मसनद के द्वारा। उनके समय में सिखों एवं मुग़लों के बीच मतभेद उभरे। इस संघर्ष के कारण सिखवाद ने आक्रामक तेवर अपना लिया एवं अकाली पंथ का उदय हुआ। बाद में सिख पंथ में ही एक उदासीन वर्ग का उदय हुआ। सिखपंथ को विकास या प्रगति प्रदान करने के लिए आर्थिक ढ़ांचा भी था जिसका कबीरपंथियों में सदा अभाव रहा। इसके कारण गुरु नानक देव एवं सिखपंथ को संत कबीर दास की तुलना में काफी फ़ायदा मिला।

ज़ारी …संत वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभू, संत नामदेव, संत तुकाराम, संत ज्ञनेश्‍वर, संत दादू दयाल, गोस्वामी तुलसीदास, संत सूरदास एवं मीराबाई। अगले अंक में…

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२)

मध्यकालीन भारत

 

धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२)

मनोज कुमार

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-१)

श्री शंकराचार्य जब उत्तरी भारत में सक्रिय थे उसी समय दक्षिणी भारत में वैष्णव संत अलवार और शैव संत नयनार ने मोक्ष प्राप्ति के लिए भक्ति का रास्ता लोगों को दिखाया। इन लोगों ने मुक्ति के लिए इष्ट देवता के प्रति निष्ठा की शिक्षा दी। उन्होंने भक्ति को मोक्ष का सर्वश्रेष्ठ साधन माना। उन्होंने अपने विचार तमिल में कविताओं एवं छंदों के माध्यम से लोगों के सामने रखे। इनके विचार सर्वसाधारण की समझ में आते थे। शिव और विष्णु के प्रति समर्पित इनके छंद “तिरूमुरई’ और “नलयिराप्रबंधम” में संकलित हैं।

 ग्यारहवीं शताब्दी में श्री शंकराचार्य के अद्वैतवाद एवं दक्षिण भारतीय भक्तिवाद के विचारों को वैष्णव संत रामानुज ने संयुक्त कर प्रस्तुत किया। उनके इस सफल प्रयास के कारण उन्हें मध्यकालीन भारत के भक्ति आंदोलन का संस्थापक कहा जाता है। उनका जन्म तिरुपति के निकट 12वीं शताब्दी के प्रथम चरण में हुआ था। भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों में आचार्य रामानुज का नाम सर्वोपरि है। आचार्य रामानुज विशिष्टाद्वैतवाद के प्रवर्तक थे। वे सगुण ईश्‍वर के उपासक थे। उन्होंने विशिष्ट अद्वैतवाद की धारणा प्रतिपादित की। उनका मानना था कि कर्म का रास्ता लोगों को माया में उलझा देता है। इसलिए उसकी मुक्ति संभव नहीं है। इसी तरह ज्ञान का मार्ग उसे इच्छाओं और सम्पत्ति की कामना से मुक्ति दिलाएगा, और यह मुक्ति भी अधूरी है। अत: उनके अनुसार सिर्फ भक्ति के द्वारा ही मोक्ष संभव है। जहां एक ओर वे श्री शंकराचार्य के अद्वैतवाद में विश्‍वास रखते थे वहीं दूसरी ओर इस मत को ग्रहण करने के लिए व्यक्ति में किसी खास प्रकार की योग्यता होना आवश्यक नहीं मानते थे। संत रामानुज का मानना था कि सर्वोच्च सत्ता की विशेषता उसकी दया में है। उनका कहना था कि मोक्ष परमात्मा की दया से संभव है। उनकी दया प्राप्ति के लिए हमें उनके (ईश्‍वर के) प्रति अनन्य भक्ति भाव से निष्ठावान होना चाहिए। इस मत के अनुसार ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है। वहीं सृष्टि की रचना करने वाले हैं, पालक है और संहारकर्ता है। जीवात्मा और जड़ जगत ईश्वर के ही भाग है। तीनों ही एक हैं। यह सत्य होते हुए भी उससे अलग है। जीवात्मा ईश्वर भक्ति के द्वारा ही मोक्ष पा सकती है।

संत रामानुज के भक्ति आंदोलन के सिद्धांत धार्मिक सुधार तक ही सीमित थे, इसमें समाज सुधार के प्रति रुचि नगण्य थी। बल्कि उनका सिद्धांत वर्ग के बीच अंतर का अनुमोदन करता था। इन दो अलग-अलग वर्ग के व्यक्तियों के लिए मोक्ष प्राप्ति के लिए उन्होंने अलग-अलग मार्ग बताए : भक्ति :- उच्च कुल में जन्मे व्यक्ति के लिए श्रद्धा या निष्ठा के द्वारा मोक्ष प्राप्ति तथा प्रपत्ति :- निम्न कुल में जन्मे व्यक्ति को, उनके अनुसार आत्म समर्पण के द्वारा ही मोक्ष संभव था। हालाकि उच्च जातियों के अधिकारों को उन्होंने क़ायम रखा फिर भी हम यह मान सकते हैं कि उन्होंने निचले तबके के लोगों के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया, चाहे वह भेद-भाव मूलक आत्म समर्पण द्वारा ही क्यों न बताया गया हो। उस युग में सामाजिक समानता की दिशा में उठाया गया यह पहला महत्वपूर्ण क़दम था। उनके सम्प्रदाय ने लाखों शूद्रों और अछूतों को अपना अनुयायी बनाया। आचार्य रामानुज मानव कल्याण की भावना से ओत-प्रोत, प्रेम और उदारता की महान मूर्ति थे। आचार्य रामानुज ही ऐसे संत थे जिन्होंने छुआछूत की भावनाओं को अलग रखकर निम्र वर्ग के व्यक्ति के लिए ईश्वर भक्ति के निषेध को अनुचित माना। यहां तक कि उन्होंने हरिजनों को ईश्वर भक्ति के लिए मंदिर प्रवेश को भी सही ठहराया।

संत निम्बार्काचार्य एवं संत माधवाचार्य उनके समकालीन थे। संत निम्बार्क मराठा क्षेत्र में भक्ति आंदोलन के संस्थापक थे। उन्होंने कृष्ण भक्ति पर बल दिया। उनके विचार काफी क्रंतिकारी थे। वे धार्मिक कर्मकाण्ड (व्रत, उपवास, आदि) में विश्‍वास नहीं रखते थे। ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को उन्होंने नकारा। वे मानते थे कि सिर्फ भक्ति या श्रद्धापूर्ण निष्ठा से ही मोक्ष संभव है। उन्होंने कहा कि जीवन में दु:ख के बाद सुख एवं सुख के बाद दु:ख का क्रम चलता रहता है अत: आदमी जब सुख में रहे तो उसे भगवान को भूलना नहीं चाहिए तथा दु:ख में उसकी निंदा नहीं करनी चाहिए। माधवाचार्य ने कहा कि ईश्‍वर एवं आत्मा पृथक हैं। वे लक्ष्मी-नारायण के भक्त थे। उनका मानना था कि गुरु की सहायता से एवं ईश्‍वर के प्रति प्रेम से मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

संत रामानुज के अनुयायियों में सबसे महत्वपूर्ण नाम है संत रामानंद। उनका जन्म 14वीं शताब्दी में इलाहाबाद के निकट एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। भक्ति आंदोलन को उत्तरी भारत में लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। यह कहना कदापि ग़लत नहीं होगा कि उत्तरी भारत के भक्ति आंदोलन के वे अगुआ थे। भगवान विष्णु के एक दूसरे अवतार राम उनके आराध्य देव थे एवं उन्होंने राम पंथ को प्रतिपादित किया। उस काल के विचारकों में वे पहले थे जिन्होंने स्पष्ट रूप से और ज़ोरदार ढ़ंग से जातिप्रथा के विरुद्ध एवं स्त्रियों की समानता के लिए आवाज़ उठाई। उन्होंने अपने निकटतम शिष्यों में निम्न जाति के कई लोगों को स्वीकार कया। जिसका सुखद परिणाम यह हुआ कि उनके बाद भी हमें कई धार्मोपदेशक निम्न जाति के भी देखने को मिलते हैं। यह स्थापित प्रथा में एक क्रांतिकारी बदलाव था। संत रामानंद के विचारों ने लोगों के दिमाग में जागृति की लहर पैदा की।

संत रामानंद विचार से कट्टरपंथी थे, किन्तु आचार से दयालु और उदार। उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायी दो दलों में बंट गए। एक दल में संत नाभा दास और तुलसी दास जैसे वर्णाश्रम धर्म में विश्‍वास रखने वाले संत थे तो दूसरे दल में कबीर दास जैसे संत थे जो आडम्बरपूर्ण धार्मिक प्रथाओं का विरोध करते थे। नान्हा, पीपा, धन्ना, साईं दास, रैदास, गुरु नानक आदि उनके अन्य प्रसिद्ध शिष्य हैं। ये सभी रामानंद परंपरा के उदारवादी संत थे।

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

इतिहास-मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल(१)

इतिहास


मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल-भाग-१


मनोज कुमार

चौदहवीं तथा पंद्रहवीं शताब्दी में आस्था एवं भक्ति के मध्य से व्यापक आंदोलन की एक ऐसी बलवती धारा फूटी जिसने वर्ण-व्यवस्था पर आधारित समाज, कट्टरता और रूढ़िवादिता पर आधारित धर्मान्धता को चुनौती दी।

हमारे देश में हिन्दू समाज में प्राचीन काल से ही वेदों पर आधारित परंपरा मान्य रही है। मध्यकाल तक आते-आते वर्णाश्रम व्यवस्था जटिल हो चुकी थी। जातियों में विभाजित समाज में ब्राह्मणों का वर्चस्व था। सामाज में तरह-तरह के भेद-भाव विद्यमान थे। मनुष्यता स्त्री-पुरुष, ऊंच-नीच एवं धर्मों के आधार पर बंटी हुई थी। छुआछूत के कठोर नियम थे। ईश्‍वर की उपासना एवं मोक्ष प्राप्ति में भी भेद-भाव था। वैदिक कर्मकांड तथा रूढ़िवादिता से स्थिति बड़ी जटिल थी। समय-समय पर इस तरह की व्यवस्था के प्रति प्रतिक्रियाएं जन्म लेती रहीं। ये प्रतिक्रियाएं रूढ़िवादी समाज में परिवर्तन के लिए अल्प प्रयास ही साबित हुईं। किन्तु चौदहवीं तथा पंद्रहवीं शताब्दी में आस्था एवं भक्ति के मध्य से व्यापक आंदोलन की एक ऐसी बलवती धारा फूटी जिसने वर्ण-व्यवस्था पर आधारित समाज, कट्टरता और रूढ़िवादिता पर आधारित धर्मान्धता को चुनौती दी।

यह सुव्यवस्थित, योजनाबद्ध और क्रमिक रूप से चलने वाला आंदोलन नहीं था, बल्कि समय-समय पर संत, विचारक और समाज सुधारक भक्ति-मार्गी विचारधारा के द्वारा सुधारों का प्रयास करते रहे और यह एक आंदोलन का रूप लेता गया। इस आंदोलन से संतों का एक नया वर्ग आगे आया। जातिप्रथा, अस्पृश्यता और धार्मिक कर्मकांड का विरोध कर सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं में सुधार उनका लक्ष्य था। इनमें से अधिकांश संत समाज की छोटी जातियों से आए थे। इस आंदोलन के संतों ने अनेक जातियों एवं सम्प्रदायों में विभक्त समाज, अनेक कुसंस्कारों से पीड़ित देश, सैंकड़ों देवताओं और आडंबरों एवं कट्टरता में उलझे धर्म, के भेद-भाव की दीवार ढ़हाने का एक सार्थक प्रयास किया। संतों ने समाज में लोगों के बीच वर्तमान आपसी वैमनस्य को मिटाने और सामाजिक वर्ग विभेद को समाप्त कर सबको समान स्तर पर लाने का प्रयास किया।

ईश्‍वर की प्राप्ति के लिए ज्ञान और तप का मार्ग छोड़ कर भक्ति का मार्ग अपनाना इस आंदोलन का विशेष गुण था। यद्यपि भक्ति-मार्ग के विभिन्न संतों के विचारों में पूर्ण समानता नहीं थी, तथापि अधिकांश एकेश्‍वरवाद में विश्‍वास रखते थे। उनका मानना था कि ईश्‍वर एक है, उसके नाम अलग-अलग हैं। वे मानते थे कि यदि पूर्ण श्रद्धा से ईश्‍वर की भक्ति की जाए तो मोक्ष की प्राप्ति होगी। अत: मनुष्य को ईश्‍वर के चरणों में पूर्ण समर्पण कर देना चाहिए। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ को जीत कर ईश्‍वर की भक्ति में रम जाना चाहिए। उनका मानना था कि ईश्‍वर मंदिरों में नहीं, बल्कि लोगों के हृदय में बसते हैं। अगर सच्ची भक्ति हो तो जीवात्मा का परमात्मा से मिलन संभव है। परन्तु इसके लिए सांसारिक इच्छाएँ एवं प्रलोभनों का त्याग करना होगा। इसके अलावा भक्त को एक गुरु की आवश्यकता पड़ेगी जो कि भक्ति के मार्ग पर उसे दिशा-निर्देश देगा। गुरु के बिना ईश्‍वर की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती क्योंकि वही अत्मा को सुषुप्तावस्था से जागृत कर सकता है।

मध्यकाल में धार्मिक सुधार की भावना का विचारधारा के रूप में एक आंदोलन का रूप लेना कोई नई बात नहीं थी। एक धारणा के रूप में भक्ति मार्ग काफी पहले से प्रचलित था।

संतों ने किसी नये धर्म की स्थापना के बजाए समाज में प्रचलित धार्मिक-सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया साथ ही इन आंदोलनकारी संतों ने अन्य पंथों या धर्मों के प्रति आदर का भाव रखते हुए विश्‍व-प्रेम और विश्‍व-बंधुत्व का संदेश दिया। इन संतों ने दोहा, गीत आदि छांदसिक कविताओं के माध्यम से सरल और स्थानीय भाषाओं में अपने-अपने मतों का प्रचार किया। फलत: भक्ति आंदोलन का काफी स्वागत हुआ। दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद भारत में हिन्दू धर्म और इस्लाम धर्म के बीच मतों, धारणाओं एवं आस्थाओं का आदान-प्रदान हुआ। परिणामस्वरूप कुछ ऐसे पंथ और अनेक ऐसे संत आए जो हिन्दू और इस्लाम धर्म के बीच के भेद-भाव को मिटाना चाहते थे।

मध्यकाल में धार्मिक सुधार की भावना का विचारधारा के रूप में एक आंदोलन का रूप लेना कोई नई बात नहीं थी। एक धारणा के रूप में भक्ति मार्ग काफी पहले से प्रचलित था। भक्ति आंदोलन का आरंभ सातवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में हो चुका था। हिन्दू धर्म में मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्ग बताए गये थे : ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग एवं भक्ति मार्ग। मध्यकालीन भारत में ज्ञान मार्ग पर शंकराचार्य ने विशेष बल दिया था। उन्होंने अद्वैतवाद के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया। उनके अनुसार संसार में एक ही सर्वोच्च सत्ता है अन्य सारी घटनाएं उसी सत्ता का प्रतिबिम्ब हैं। हमारा अस्तित्व एक मिथ्या है। ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है। आत्मा-परमात्मा ही है, अलग नहीं। सांसारिक माया के कारण मनुष्य आत्मा-परमात्मा के एकत्व को न पहचानने की भूल करता है। जीवात्मा का परमात्मा के मिलन से ही मोक्ष संभव है। इसकी प्राप्ति ज्ञान से संभव है।

इस विचारधारा के साथ कठिनाई यह थी कि यह सामान्य लोगों की समझ से बाहर थी। इसके अलावा जातिप्रथा एवं रूढ़िवादिता के कारण पढ़ाई-लिखाई एवं अक्षरों का ज्ञान उस समय में समाज के ऊंचे तबके के लोगों तक ही सीमित था। अत: जनसाधरण इस दार्शनिक मार्ग को न तो अधिक समझ ही पाया और न ही यह आम जनता का लोकप्रिय समर्थन ही पा सका।

ज़ारी … अगला अंक गुरुवार ७ सितंबर २०१० को।

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2


मनोज कुमार

भाग-१ यहां पढें

अलाउद्दीन ने बाजारों की व्‍यवस्‍था की नीति के कार्यान्‍वयन के लिए दीवान-ए-रियासत नाम से एक विभाग खोला। दिल्‍ली में तीन अलग-अलग बाजारों की स्‍थापना की गई। पहला था गल्‍ला मंडी – खाद्यान्‍न के लिए बाजार, दूसरा था सराय-अदल (अर्थात न्‍याय का स्‍थान) - यह मुख्‍यतः वस्‍त्र बाजार था एवं तीसरा था घोड़े, दासों, पशुओं आदि का बाजार।

गल्‍ला मंडी में क़ीमत की स्थिरता अलाउद्दीन की महत्‍वपूर्ण उपलब्धि थी। उसके जीवित रहते, इनके मूल्‍यों में तनिक भी वृद्धि नहीं हुई। तीनों बाजारों की अपनी अलग-अलग समस्‍याएं थी। मंडी की समस्‍या थी कि कैसे उपयोगी वस्‍तुओं की सतत आपूर्ति बनाए रखी जाए एवं इसकी उपभोक्‍ताओं में वितरण की व्‍यवस्‍था कैसे की जाए ?  इसके अलावा समुचित फसल उत्‍पादन न हो पाने या बाढ़ जैसी आकस्मिक स्थिति का सामना कैसे किया जाए? यह तय था कि दुकानदारों को यदि वस्‍तुएं पर्याप्‍त मात्रा और सही समय में नहीं मिलेंगी तो वे नियत दरों पर माल नहीं बेच सकेंगे। इसके अलावा चोर-बजारी भी करेंगे। अतः अलाउद्दीन का निर्देश था कि भू-राजस्‍व कैश में न लेकर उत्‍पाद का एक तिहाई भाग लिया जाए। इस राजस्‍व की अदायगी के बाद कृषक अपने पास उतना ही अनाज रखें जितने कि उनको अगले फसल उत्‍पादन तक के लिए अपनी आवश्‍यकताओं हेतु ज़रूरत थी बाकी का अतिरिक्‍त उत्‍पादन सरकारी अधिकारियों द्वारा खरीद लिया जाता था। मंडी में सिर्फ पंजीकृत व्‍यापारी ही कारोबार कर सकते थे। व्‍यापारी अपनी इच्‍छा से मूल्य में कोई भी परिवर्तन नहीं कर सकते थे। उत्‍पादन मूल्‍य उत्‍पादकों की लागत से बहुत ज्‍यादा नही होता था। इससे उत्‍पादकों को उनकी लागत का उचित मूल्‍य भी मिलता था और व्‍यापारियों को अधिक मुनाफाखोरी का अवसर नहीं मिल पाता था।

आपातकाल जैसी स्थिति के लिए बफर स्‍टॉक की व्‍यवस्‍था थी, ताकि फसल उत्‍पादन न हो सकने की स्थिति का सामना किया जा सके। सौदागर दिल्‍ली के चारों ओर सैकड़ों कोस की दूरी तक बसनेवाले किसानों से नियत दरों पर गल्‍ला खरीदकर राजधानी की गल्‍ला मंडी या सरकारी गोदामों में लाते थे। अनेक वस्‍तुओं को एक नगर से दूसरे नगर तक सरकारी परमिट के बिना लाने ले जाने की मनाही कर दी गई थी। ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं कि अलाउद्दीन ने राशन व्‍यवस्‍था भी लागू की थी। अकाल या अनाज की कमी की स्थिति में निश्चित मात्रा से अधिक गेहूं किसी को नहीं दिया जाता था और वैसी परिस्थिति में राशनिंग भी कर दी जाती थी। मोहल्‍लों के दुकानदार सरकारी गादामों से अनाज ले आते थे और प्रत्‍येक परिवार को 6-7 सेर गेहूं प्रतिदिन के हिसाब से दिया जाता था। कई बार कपड़े और अन्‍य मूल्‍यवान वस्‍तुओं का राशन कर दिया जाता था।

दूसरा बाजार सराय-ए-अदल (न्‍याय का स्‍थान) निर्मित वस्‍तुओं तथा बाहर के प्रदेशों से आनेवाले माल का बाजार था। मुख्‍य रूप से यह वस्‍त्र बाजार था। इसमें अलाउद्दीन स्‍थानीय निर्मित वस्‍त्रों का मूल्‍य नियंत्रण तो कर सकता था पर आयात किए गए वस्‍त्रों, जैसे रेशमी वस्‍त्र ईरान से आता था, का नियंत्रण कर पाना संभव नहीं था। कपड़े की कीमतों के निर्धारण से व्‍यापारी दिल्‍ली में माल बेचने के इच्‍छुक नहीं थे। व्‍यापारी दिल्‍ली के बाहर से कपड़ा खरीदते थे, उसे दिल्‍ली में लाने में धन खर्च करते थे और उन्‍हें दिल्‍ली में निर्धारित मूल्‍य पर बेचना पड़ता था। कपड़ा व्‍यापारियों को खाद्यान्‍नों के व्‍यापारियों की तुलना में अधिक सुविधाएं दी जाती थी। जैसे बाहर से माल लाकर दिल्‍ली में बेचने के लिए उन्‍हें अग्रिम धन दिया जाता था।

तीसरी तरह के बाजार की प्रमुख समस्‍या दलाल थे। अलाउद्दीन ने दलालों को निकाल बाहर किया। उसने निरीक्षकों की नियुक्ति की। निरीक्षक घोड़ों एवं दासों का परीक्षण एवं उनकी श्रेणी का निर्धारण करते थे। एक बार श्रेणी का निर्धारण हो जाने के बाद उनका मूल्‍य निश्चित किया जाता था एवं व्‍यापारी उसी नियत मूल्‍य पर उनकी बिक्री करने के हकदार होते थे।

अपनी व्‍यक्तिगत रूचि एवं कठोर दंड प्रावधानों से वह इन व्‍यवस्‍थाओं का दृढ़ता से पालन कर पाने में सफल हुआ। इस प्रकार की पद्धति से वह सामान के मूल्‍यों की देखभाल, बाट-बंटखरे की जांच करता था। कालाबाजारी, बेइमानी करनेवाले या अधिक मूल्‍य लेने पर व्‍यापारियों को सख्‍त सजा दी जाती थी। मूल्‍य निर्धारण, राशनिंग वस्‍तु विवरण आदि के बारे में अलाउद्दीन के नियम बड़े कठोर थे। अगर तौल कम किया तो उतने की वजन का मांस काट लिया जाता था। नियत दरों से अधिक भावों पर बेचने पर कोड़े लगवाये जाते थे। कड़ी निगरानी एवं कठोर दंड के प्रावधान ने इस योजना की सफलता सुनिश्चित की। इस योजना के प्रभाव के बारे में यह तय है कि अमीरों एवं सैनिकों को इस योजना से काफी फायदा हुआ। उनकी क्रय शक्ति काफी बढ़ गई। अकबर के समय में एक सामान्‍य नागरिक के लिए 3 से 4 टंका प्रति माह  भरण-पोषण हेतु पर्याप्‍त राशि थी। अलाउद्दीन ने मनमाने ढंग से व्‍यापारियों के विरूद्ध काम नहीं किया। उसने व्‍यापारियों के मुनाफा कमाने की गुंजाइश को कम तो किया पर व्‍यापारियों को कभी घाटे का सामना नहीं करना पड़ा।

अलाउद्दीन अनपढ़ व्‍यक्ति था। अकबर की तरह टोडरमल या अबुल फजल जैसे काबिल सलाहकार भी उसके पास नहीं थे। अतः अलाउद्दीन ने जो भी सफलता प्राप्‍त की वह उसे अपनी सामान्‍य जानकारी के बदौलत ही मिली। इस योजना को मदद पहुंचानेवाले किसी वृहत ढांचे, तकनीकी दक्षतायुक्‍त निरीक्षण, तकनीकी सलाह और संगठित प्रशासनिक कुशलता के बिना ही, सिर्फ अपनी इच्‍छा शक्ति के बल पर उसने अल्‍पा‍वधि में ही चिरस्‍थाई प्रभाव पैदा किए।

किसी भी वस्‍तु का मूल्‍य उसकी उत्‍पादन दर से कम नियत नहीं किया गया। सामान्‍यतया मुनाफे की सीमा में कटौती के प्रयास का व्‍यापारियों द्वारा विरोध तो किया ही जाता था, कितु अलाउद्दीन की इस योजना में व्‍यक्तिगत रुचि एवं कठोर दंड प्रावधानों ने इसके कार्यान्‍वयन को सफल बनाया। यह सही है कि अलाउद्दीन ने कृषकों एवं शिल्‍पकारों को बाध्‍य किया कि वे अपनी वस्‍तुओं और अनाजों को इन बाजारों में नियत मूल्‍य पर ही बेचें। इसका उन्‍होंने निश्चित रूप से विरोध किया। किंतु अलाउद्दीन ने उनका नुकसान नहीं होने दिया। जहां एक ओर उन्‍हें नियत मूल्‍य के लिए बाध्‍य किया वहीं दूसरी ओर अन्‍य वस्‍तुओं के मूल्‍य भी कम किए गए। मुनाफा दर घटी ज़रूर पर कुल मिलाकर उनकी क्रय शक्ति कम नहीं हुई। यद्यपि कृषक अन्‍य जगहों पर अपना अनाज बेचने को स्‍वतंत्र थे पर भंडारण क्षमता के अभाव में वे अन्‍य व्‍यापारियों की सौदेबाजी पर ही आश्रित थे। इसके अलावा अतिरेक (सरप्लस) की कीड़ों एवं प्राकृतिक आपदाओं से नष्‍ट हो जाना आम बात थी। फलतः वे व्‍यापारियों की दया पर निर्भर होते थे। अतिरेक से रूपया आना उतना आसान भी नहीं था। इस व्‍यवस्‍था से उन्‍हें राशि आनी निश्चित तो थी, वे उसे दूसरी पैदावार में लगा भी सकते थे। अलाउद्दीन ने जो न्‍यूनतम मूल्‍य निर्धारित किये थे उसमें कुछ मुनाफे की भी गुंजाइश थी। इस तरह हम पाते हैं कि इस व्‍यवस्‍था में किसी भी वर्ग को हानि नहीं थी।

अलाउद्दीन की यह सबसे महत्‍वपूर्ण उपलब्धि थी। जब तक वह जीवित रहा बाजार में निश्चित कीमतों में तनिक भी वृद्धि नहीं हुई। जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि अलाउद्दीन अनपढ़ व्‍यक्ति था। अकबर की तरह टोडरमल या अबुल फजल जैसे काबिल सलाहकार भी उसके पास नहीं थे। अतः अलाउद्दीन ने जो भी सफलता प्राप्‍त की वह उसे अपनी सामान्‍य जानकारी के बदौलत ही मिली। इस योजना को मदद पहुंचानेवाले किसी वृहत ढांचे, तकनीकी दक्षतायुक्‍त निरीक्षण, तकनीकी सलाह और संगठित प्रशासनिक कुशलता के बिना ही, सिर्फ अपनी इच्‍छा शक्ति के बल पर उसने अल्‍पा‍वधि में ही चिरस्‍थाई प्रभाव पैदा किए। इस खास उपलब्धि ने अलाउद्दीन को भारतीय इतिहास में चिरस्‍थाई ख्‍याति प्रदान की। अलाउद्दीन की मृत्‍यु के बाद यह योजना अंततोगत्‍वा समाप्‍त हो गई। वैसे भी उसकी मृत्‍यु के बाद सैन्‍य गतिविधियां प्रायः समाप्‍त हो गई। एक वृहत सेना की आवश्‍यकता भी नहीं रह गई थी। अतः यह योजना उस दृष्टिकोण से अनावश्‍यक हो गई थी। फिर भी यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ऐसी योजना उस काल के हिसाब से किसी आश्‍यर्च से कम नहीं थी।

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१

मनोज कुमार

चौदहवीं शताब्‍दी में, दिल्‍ली सल्‍तनत का एक ऐसा शासक हुआ जिसने अपनी दृढ़ इच्‍छा-शक्ति एवं कठोर अनुशासन से यह साबित कर दिया कि, शासक चाहे तो किसी भी योजना या नीति का कार्यान्‍वयन असंभव नहीं है, चाहे वह समाज के प्रभावशाली वर्ग के हितों के विरूद्ध क्‍यों न हो? वह शासक था- अलाउद्दीन खिलजी, जिसने मध्‍यकालीन भारत में आम लोगों के हित के लिए उपयोगी वस्‍तुओं को न केवल सस्‍ती दरों पर मुहैया किया और न केवल बाजार को नियंत्रित किया बल्कि वस्‍तुओं के मूल्यों को भी नियत किया एवं उस मूल्‍य पर व्‍यापारियों द्वारा वस्‍तुओं का विक्रय भी सुनिश्चित किया। अलाउद्दीन खिलजी ने सन् 1296 ई. में अपने बूढ़े चाचा जलालुद्दीन खिलजी को धोखे से मरवाकर स्‍वयं को दिल्‍ली का शासक घोषित किया। उसका शासनकाल काफी महत्‍वपूर्ण था मध्‍यकालीन इतिहास में उसके कुछ सुधार पूर्णतः नवीन प्रयोग कहे जा सकते हैं।

वह दिल्‍ली सल्‍तनत का महान शासक था जिसने विभिन्‍न क्षेत्रों में अपनी दूरदर्शिता और मौलिकता प्रदर्शित की। हालांकि अलाउद्दीन खिलजी शिक्षित नहीं था फिर भी उसमें व्‍यावहारिक ज्ञान की कमी नहीं थी और वह अपने राज्‍य की आवश्‍यकताओं को भली-भांति समझता था। यह सही है कि उसने कुछ ऐसे कदम उठाये थे जो अमीरों एवं उलेमाओं जैसे प्रभावशाली वर्ग के हितों के विपरीत थे। यह चौदहवीं शताब्‍दी के प्रारंभिक दशक में एक राज्‍य नियंत्रित अर्थव्‍यवस्‍था को दर्शाता है। यह प्रयोग नया था। इस योजना से अलाउद्दीन खिलजी को जो सफलता मिली वह काफी रोचक एवं असाधारण है। वस्‍तुओं के जो नियंत्रित मूल्‍य अलाउद्दीन खिलजी ने रखे उसका अनुपालन दृढ़तापूर्वक हो उसने व्‍यक्तिगत तौर पर सुनिश्चित किया।

सामायन्‍यतः यह माना जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी द्वारा इस योजना को लागू करनें का मुख्‍य उद्देश्‍य सैनिकों की आवश्‍यकताओं की पूर्ति पर आधारित था। एक बड़ी सेना को अपेक्षाकृत कम खर्च पर कायम रखना इसका उद्देश्‍य था। अलाउद्दीन का शासनकाल सतत युद्ध का काल था इसके लिए एक वृहत् एवं मजबूत सेना की आवश्‍यकता थी।

यह कहना उचित नहीं है कि अलाउद्दीन ने आर्थिक सुधार केवल सेना को ही ध्‍यान में रखकर किए थे। क्‍योंकि यह नीति सैन्‍य अभियान समाप्‍त होने के बाद भी चालू रखी गई। दूसरी बात यह है कि अलाउद्दीन द्वारा चौदहवीं शताब्‍दी के पहले दशक में दिया जाने वाला 234 टंका प्रतिवर्ष या 19.5 टंका प्रतिमाह कोई छोटी राशि नहीं थी। खासकर जब हम इसकी तुलना बाद के शासकों अकबर 240 रू. प्रतिवर्ष से करते हैं। अलाउद्दीन अकबर से 6 रू. कम एवं शाहजहां से 34 रू. प्रतिवर्ष अधिक देता था अतः हम यह कह नहीं सकते कि सैनिकों की तनख्‍वाह कम थी। जब बाद के दिनों में लगभग इसी वेतन से अकबर एवं शाहजहां के अधीन सेना संतुष्‍ट थी, तब अलाउद्दीन के समय यह राशि अल्‍प नहीं कही जा सकती। अतः इस ध्‍येय से मूल्‍य नियंत्रण आवश्‍यक नहीं था।

दूसरी ध्‍यान देनेवाली बात यह है कि अलाउद्दीन ने न सिर्फ अनिवार्य उपयोगी वस्‍तुओं का मूल्‍य नियंत्रण किया था बल्कि रेशम आदि विलास वस्‍तुओं के मूल्‍य पर भी अंकुश लगाया था। फिर एक और बात यह है कि मूल्‍य नियंत्रण का लाभ सिर्फ सैनिकों के लिए ही नहीं था बल्कि पूरी आम जनता के हित में था। हर कोई बाजार से नियत दर पर सामान खरीद सकता था। अगर यह सिर्फ सैनिक के लिए होता तो इसकी व्‍याप्ति सीमित होती। अलाउद्दीन का उद्देश्‍य तो अपनी प्रजा को इस कल्‍याणकारी उपाय द्वारा मदद करना था। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि लोक हितकारी विचार से यह योजना बनायी गयी थी।

इस विषय पर एक अधिक तार्किक पक्ष यह है कि यह योजना मुद्रास्‍फीति नियंत्रण के उद्देश्‍य से लागू की गई थी। युद्ध में विजयोपरांत दिल्‍ली के नागरिकों के बीच धन का प्रचुर वितरण होता था। जिसके कारण दिल्‍ली में सोने एवं चांदी के सिक्‍कों की मात्रा में तेजी से वृद्धि हो गई थी। परंतु वस्‍तुओं की आपूर्ति उस अनुपात में पर्याप्‍त न होने के कारण मूल्‍य वृद्धि होना लाजिमी था। ऐसी परिस्थिति में जब दिल्‍ली में मुद्रा का संचालन में अधिक होना, व्‍यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा था और व्‍यापारी कृत्रिम अभाव पैदा कर मूल्‍य वृद्धि करने को प्रवृत हो रहे थे। फलतः अलाउद्दीन को व्‍यापारी वर्ग के इस जोड़ तोड़ को रोकने के लिए मूल्‍य नियंत्रण योजना लागू करना आवश्‍यक हो गया था। अलाउद्दीन ने खाने, पहनने व जीवन की अन्‍य आवश्‍यक वस्‍तुओं के भाव नियत कर दिए। यहां तक कि गुलामों, नौकरों एवं दास-दासियों के भाव भी निश्चित थे।

कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि सस्‍ते में रोटी उपलबध कराकर अलाउद्दीन ने सफल शासन का जंतर प्राप्त कर लिया। अगर वह वस्‍तुओं के मूल्‍यों को नीचे लाता है तो उसे प्रसिद्धि मिल जाएगी एवं वह सफलतापूर्वक शासन कर पाएगा। एक तरफ उसने जहां अमीरों की कई सुविधाओं में कटौती की वहीं दूसरी ओर उन्‍हें विलास-वस्‍तुओं को कम कीमत पर मुहैया कराने का प्रबंध किया। अतः इस योजना का उद्देश्‍य एक व्‍यापक राजनीतिक हित साधन था।

मूल्‍य नियंत्रण की आज्ञा केवल दिल्‍ली के लिए दी गई थी या पूरी सल्‍तनत के लिए, यह विवादास्‍पद प्रश्‍न है। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि यह योजना सिर्फ दिल्‍ली शहर तक सीमित थी। अगर यह सिर्फ दिल्‍ली तक ही सीमित रही होती तो क्‍या सेनाओं के वेतन के लिए दुहरा मापदंड रखा गया था? संभवतया नहीं क्‍योंकि यदि यह योजना सिर्फ सेना के लिए थी तो सेना सिर्फ दिल्‍ली में ही नहीं रहती थी। और फिर अलग-अलग जगह रहनेवाली सेनाओं का वेतन अलग-अलग हो, यह व्‍यावहारिक प्रतीत नहीं होता। दूसरी बात यह है कि यदि सिर्फ दिल्‍ली में ही मूल्‍य नियंत्रण होता तो दूरदराज के व्‍यापारी दिल्‍ली में आकर कम मूल्‍य पर अपना सामान क्‍यों बेचते? वे उसे कहीं और बेच सकते थे जहां उन्‍हें अधिक मुनाफा मिलता। ऐसा भी कहीं उल्‍लेख नहीं मिलता कि दिल्‍ली में आकर व्‍यापार करने के लिए प्रशासन की तरफ से कोई बाध्‍यता थी। तो हम तार्किक रूप से यह निष्‍कर्ष निकाल सकते हैं कि नियंत्रित बाजार सिर्फ दिल्‍ली में ही नहीं थे, बल्कि कुछ और बड़े केंद्रो में भी यह व्‍यवस्‍था थी। उन दिनों जब सरकारी मशीनरी इतनी संगठित नहीं थी, इस तरह की योजनाओं को सल्‍तनत के प्रत्‍येक शहर में लागू करना सहज नहीं था। यहां एक और ध्यान देनेवाली बात यह है कि इसका प्रमुख उद्देश्‍य मूल्‍य वृद्धि को नीचे लाना तथा मुद्रास्‍फीति पर नियंत्रण रखना था। सोने एवं चांदी के सिक्‍कों की बहुतायत के कारण सिर्फ दिल्‍ली या फिर कुछेक बड़े शहरों में मूलय नियंत्रण से बाहर जा रहा था। अतः इस योजना की आवश्‍यकता दिल्‍ली एवं कुछेक बड़े शहरों में ही पड़ी होगी, बाकी मूल्‍य नीचे ही रहे होंगे। (ज़ारी…)

यह आलेख कांदंबिनी में प्रकाशित हुआ था|