मंगलवार, 2 नवंबर 2010

अंग्रेज़ी देवी– अब इन्हें भी पूजेंगे लोग!

 

अंग्रेज़ी देवी

My Photoमनोज कुमार

२७ अक्तूबर के अखबार में एक समाचार पढा था - “मनोकामना पूर्ण करेंगी ‘अंग्रेज़ी देवी’।” ख़बर के मुताबिक अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी चाहिए तो भारत-नेपाल सीमा पर बने मंदिर के करें दर्शन!

मंदिर निर्माण परियोजना से जुड़े चन्द्रभान प्रसाद का मानना है कि अंग्रेज़ी जीवन की सच्चाई है। यदि आप अंग्रेज़ी नहीं जानते तो अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी नहीं पा सकते। अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी दोनों के के लिए अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान होना वर्तमान समय की मांग है।

भारत-नेपाल सीमा स्थित मोहमदाबाद तहसील के बांगा गांव में एक ऐसा मंदिर बनाया गया है, जहां सिर्फ़ ‘अंग्रेज़ी देवी’ की ही पूजा होती है। अंग्रेज़ी देवी की प्रतिमा दिल्ली से मंगाई गई है। मंदिर में देवी के एक हाथ में क़लम और दूसरे में कम्प्यूटर है। एक मंज़िले इस मंदिर की सीढियां ‘की बोर्ड’ की तरह है। सोमवार, २५ अक्तूबर, लॉर्ड मैकाले के जन्मदिन के अवसर पर इसका उद्घाटन होना था पर बारिश ने सब गूड़ गोबर कर दिया। अब शायद इस महीने इसका विधिवत उद्घाटन किया जाए।

इस मानसिकता क्या कहना?!

मैं दो महान विभूतियों के विचार रख रहा हूं – उसके बाद बताइए कि आपका क्या कहना है?

 

बाबा नागार्जुन ने कहा था

“संसार की निगाहों में हमारी यह अंग्रेज़ी भक्ति भारतीय जनता की मानसिक पंगुता का चटकीला विज्ञापन साबित हो रहा है।”

 

मोटूरि सत्यनारायण ने कहा था,

“सभ्य समाज में जूते और टोपी दोनों की प्रतिष्ठा देखी जाती है। जूतों का दाम साधारणतया टोपी से ज़्यादा ही होता है। दैनिक जीवन में जूतों की अनिवार्यता भी सर्वत्र देखी जाती है। पर इससे टोपी की उपयोगिता तथा मान मर्यादा में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। कोई भूल कर भी सिर पर जूता नही रखता और न पैरों में टोपी पहनता है। जो ऐसा करता है वह पागल माना जाता है। हिंदी हमारी गांधी टोपी के समान है, तो अंग्रेज़ी जूता है।”

9 टिप्‍पणियां:

  1. अंग्रेज़ी देवी का मंदिर ????????/ अजीबो-गरीब बात ...
    महान विभूतियों के विचार अच्छे लगे.

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  2. मनोज भाई! इतने बड़े लोगों की बात आपने लिख दी है कि उनकी बात को काटना भी धृष्टता कि श्रेणी में आएगा. हिंदी के नाम पर हमने सड़क के नामों का हिंदीकरण किया है (बकौल राही मासूम रज़ा) और अंग्रेज़ी को गाली दी है. हमारा बस चलता तो आपके कोलकाता में स्थित जॉब चार्नक के मकबरे का नाम बदलकरसुभाष बोस की समाधि रख देते.
    और रही बात अंग्रेज़ी को गरियाने की तो मैं एहसानमंद हूँ अंग्रेज़ी का जिसने हिंदी के महान साहित्यकार दिये. उदाहरण डॉ. हरिवंश राय बच्चन, श्री कृष्ण देव प्रसाद गौड़ (बेढब बनारसी) और प्रसिद्ध उर्दू शायर जनाब रघुपति सहाय फिराक़ .
    मैं कभी भी किसी रेखा को छोटा करके अपना बड़प्पन साबित करने में विश्वास नहीं रखता. और भाषा तो भाषा है इसमें श्रेष्ठ और निकृष्ट का प्रश्न ही कहाँ पैदा होता है. टोपी औत जूते की अलग अलग उपयोगिता है, तलवार से कपड़ों की सिलाई करता आदमी उतना ही हास्यास्पद दृश्य उपस्थित करेगा जितना सिर पर जूता पहने. जब पैरों में कील चुभती है भाई साहब तो सिर पर जमी गाँधी टोपी किसी काम की नहीं.

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  3. अंग्रेजी और देवी !!!!!!!!
    अब इन टिप्पणियों के आगे कुछ कहने को है नही ।

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  4. तथा कथित अंगरेजी देवी का मंदिर बनाने और वहां इस तथा कथित देवी की पूजा करने का स्वांग रचने वाला व्यक्ति शायद उन लोगों के हाथों की कठ-पुतली बन गया है ,जो इस देश को एक बार फिर अंग्रेजों का गुलाम बनाना चाहते हैं .अगर अंग्रेज दोबारा इस देश पर कब्जा करने आएं , तो शायद ऐसे ही लोग आरती की थाल ले कर उनकी पूजा करेंगे . वैसे जिस तेजी से हिन्दी के खिलाफ अंगरेजी को पूरे देश में प्राथमिक शिक्षा से ले कर उच्च शिक्षा तक जिस तरह महिमा मंडित किया जा रहा है , उसे देख कर लगता है कि ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी से भारत माता को आज़ाद कराने की लड़ाई में लाखों देश भक्तों की शहादत व्यर्थ जा रही है .कोई भी भाषा बुरी नहीं होती , हम अंगरेजी भी ज़रूर सीखें , पर उसे अपने देश, अपने समाज और अपनी संस्कृति पर हावी न होने दें, इसका ध्यान रखना ज़रूरी है . आपने एक ज्वलंत मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया है . आभार . दीपावली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं

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  5. सलिल जी और स्वराज्य करुण जी आप दोनों के मतों का सम्मान करते हुए यह कहना है कि करुण जी से सहमत हूं।
    आज वैश्वीकरण के इस दौर में अंग्रेज़ी भाषा का महत्व अगर बढा है तो यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि हिन्दी के साथ साथ अन्य हिन्दुस्तानी भाषा की भी अच्छी जानकारी होनी ही चाहिए।
    भाषाएं सीखनी एक बात है, लेकिन अपनी मातृभाषा को त्यागकर विदेशी भाषा को सिर पर बिठाना उसकी पूजा करना दूसरी बात है। एक खास वर्ग ने अंग्रेज़ी को इसलिए अपनाए रखा कि वो आम आदमी से अलग दिखना चाहते थे। अफसरी की भाषा तो है ही यह। इसलिए अधिकारी आम आदमी की दुख दर्द को समझते ही नहीं। ऐसे लोग भी हैं जो खाते तो हैं हिन्दी का मगर गुण गाते हैं अंग्रेज़ी का। मैं जब फ़िल्मी दुनिया की महान हस्तियों को देखता हूं जो हिन्दी की फ़िल्में करके करोड़ों रुपए कमाते हैं और जब बात करने आते हैं तो अपने अंग्रेज़ी ज्ञान का प्रदर्शन करते हैं, तो कुफ़्त होती है। दुख होता है। ऐसे और भी उदाहरण हैं।
    मोहमदाबाद वालों ने तो जो हमें दिख सके (प्रत्यक्ष) मंदिर बनाया है, जो नहीं दिखता, वह अंग्रेज़ी देवी का मंदिर तो हर नगर में मौज़ूद है। हमें तो कई जगह महसूस हुआ कि हिन्दी बोलना, माने गंवार पन की निशानी समझते हों लोग!

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  6. aruna kapoor, rohini, delhi. का कहना है :
    27 Oct, 2010 05:09 PMमुझे यह हास्यास्पद लग रहा है दलितों का पिछडापन शिक्षा के अभाव से है..ना कि अंग्रेज़ी भाषा न आने कि वजह से है! ...अग्रेज़ी बोली जाने वाले देशो में क्या सभी पढेलिखे होते है?....हमारे यहाँ भी अँग्रेज़ी के कई ऐसे जानकार लोग है, जो अंग्रेज़ी बोलते तो है ..लेकिन पढ़ेलिखे न होने की वजह से मजदूरी कर रहे है!.....दलितों को पहले उसी भाषा में शिक्षित करना चाहिए,जो भाषा वे समझ सकते है!...अँग्रेज़ी देवी की पूजा एक पाखंड है! ..हमारे देश में देवी-देवताओं की संख्या में शायद कमी थी..इसलिए अंग्रज़ी देवी की मूर्ति को डाल कर संख्या में इज़ाफा किया गया!....क्या देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित कर ,काम नहीं चलाया जा सकता था?

    मेरा यह कोमेंट नव्भारत टाइम्स में इसी ख्बर को ले कर प्रकाशित हुआ था!...इससे बडी संख्या में लोगों ने सहमति जताई थी!

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  7. आज अंग्रेजी हमारी जिन्दगी का अहम हिस्सा बन चूका है ,उसके बिना ऐसा लगता है की हम आगे नहीं बढ पाएंगे, लेकिन वास्तविकता यह नहीं है , यह हमारी मानसिकता का परिणाम है .
    तभी तो अंग्रेजी देवी की पूजा करने की जरुरत पड़ रही है , आज इस बात पर विचार करने की नितांत आवश्यकता है
    सार्थक पोस्ट

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  8. satynarayan ji ki baat me dam hai.

    aur kam se kam udghatan nahi hua angrezi ki devi ka lekin aap chitr laga kar ham darshnabhilashiyon ki kaamna to poorn kar dete.:(

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  9. प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का कुछ पता चले,तो बताइए।

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