सोमवार, 8 नवंबर 2010

ज़रूरी और मजबूरी …..


इन्सान की ज़िन्दगी
सुख और दुःख से भरी
सुख क्षणिक मात्र
दुःख की अवधि बड़ी ।
हर इंसान अपने दुःख को बड़ा
और दूसरे के दुःख को
हल्का समझता है
उसके जितना कोई
व्यथित प्राणी नहीं

यही मान लेता है।
पर क्या तुमने कभी
ख़ुद से बाहर निकल कर देखा है ?
देखो --
ज़रा अपने नेत्र खोलो
अपने आस - पास दृष्टि दौड़ाओ

तुम पाओगे कि
दुःख तो चारों ओर फैला है।
तुम कहीं से लाचार नही हो
फिर भी लाचारी ओढ़ते हो
जो दुःख तुमने पाले हैं
उनके बीज भी ख़ुद ही बोते हो ।
और फिर अपने आंसुओं से
बीजों को सींचा भी करते हो
फल - फूल जाते हैं वो बीज
तो फिर और अधिक रोते हो ।



देखो -
उस बालक को
जिसके पाँव नही
पाँव के नीचे पटरी लगी है
हाथों से ठेल वो
अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी
खींच रहा है
और , लोगों के सामने
मुस्कुराता हुआ गीत गा रहा है
क्यों ?
क्यों कि ये उसके लिए ज़रूरी है।


और तुम ,
हर तरह से भरे - पूरे
पूर्ण रूप से सक्षम
फिर भी दुःख का
जैसे अधिकार लिए
दुखी प्राणी बने
ख़ुद से जूझते हुए
व्यर्थ की चिन्त्ताओं से घिरे
ख़ुद को व्यथित करते हुए
तुमने यातनाओं को ओढ़ लिया है
क्यों ?
क्यों कि ये शायद तुम्हारी मजबूरी है .


संगीता स्वरुप

27 टिप्‍पणियां:

  1. सोचने को विवश करती रचना..बहुत उम्दा!

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  2. बहुत अच्छी रचना। विचारोत्तेजक।

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  3. यह सही है कि दूसरों का दुख देखने के बाद अपना बहुत छोटा लगने लगता है। यही संसार हैं। दुख तो कांटे का भी होता है और तलवार का भी। दुख तो दुख ही है।

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  4. इन्सान की ज़िन्दगी
    सुख और दुःख से भरी
    सुख क्षणिक मात्र
    दुःख की अवधि बड़ी ।
    इंसान पूरी कोशिश करता है अपनी जिन्दगी में कि उसे खुशियाँ और सुख प्राप्त हों परन्तु ऐसा हो नहीं पाता और सुख की कामना से वो दुखी रहता है ...और ऐसी अवस्था में वो भूल जाता है कि सुख और दुःख तो एक दुसरे के पूरक हैं ...क्यूंकि जीवन विरोधाभासों का संगम है ...काश हम इस सचाई को समझ पाते...सुंदर

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  5. तुम कहीं से लाचार नही हो
    फिर भी लाचारी ओढ़ते हो
    जो दुःख तुमने पाले हैं
    उनके बीज भी ख़ुद ही बोते हो ।
    विचारोत्तेजक पँक्तियाँ। शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  6. देखो -
    उस बालक को
    जिसके पाँव नही
    पाँव के नीचे पटरी लगी है
    हाथों से ठेल वो
    अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी
    खींच रहा है
    और , लोगों के सामने
    मुस्कुराता हुआ गीत गा रहा है
    क्यों ?
    क्यों कि ये उसके लिए ज़रूरी है

    बहुत ही सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  7. देखो -
    उस बालक को
    जिसके पाँव नही
    पाँव के नीचे पटरी लगी है
    हाथों से ठेल वो
    अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी
    खींच रहा है
    और , लोगों के सामने
    मुस्कुराता हुआ गीत गा रहा है
    क्यों ?
    क्यों कि ये उसके लिए ज़रूरी है

    बहुत ही सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  8. तुमने यातनाओं को ओढ़ लिया है
    क्यों ?
    क्यों कि ये शायद तुम्हारी मजबूरी है .
    Aapne to saara jeevan darshan kholke rakh diya! Bilkul sahi nhai jo aap kahtee hain...aisahee karte hain ham!

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  9. बहुत ही विचारोत्तेजक रचना...सोचने समझने को विवश करती हुई

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  10. एक सकारात्मक सोच की ओर अग्रसर करती हुई रचना. ये कुछ लोगों की आदत में शुमार होता है कि वे अपने को सबसे बड़ा दुखी समझते हैं औरों की ओर देखने की उन्हें फुरसत ही नहीं होती है. ये हमारे नजरिये पर निर्भर करता है कि हम अपनी परिस्थितियों को कैसे अपने अनुकूल बनाते हैं.. पूर्ण सुखी दिखने वाले भी कहीं न कहीं से दुखी होते हैं लेकिन हमें नजर नहीं आते है.

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  11. एक सकारात्मक सोच की ओर अग्रसर करती हुई रचना. ये कुछ लोगों की आदत में शुमार होता है कि वे अपने को सबसे बड़ा दुखी समझते हैं औरों की ओर देखने की उन्हें फुरसत ही नहीं होती है. ये हमारे नजरिये पर निर्भर करता है कि हम अपनी परिस्थितियों को कैसे अपने अनुकूल बनाते हैं.. पूर्ण सुखी दिखने वाले भी कहीं न कहीं से दुखी होते हैं लेकिन हमें नजर नहीं आते है.

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  12. apne aap se nikal kar anubhav karenge to yah satya aatmsaat kar paayenge ki auron ke dookh ke samaksh hamara dukh kuch bhi nahi!
    sundar rachna!!

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  13. सोचने को विवश करती है आपकी ये रचना…………इंसान खुद ही स्वंय को लाचार बनाता है वरना और भी गम हैं ज़माने मे अपने ही गमों के सिवा……………सिर्फ़ इतना समझ ले तो जीना सरल हो जाये…………………बेहद उम्दा प्रस्तुति।

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  14. खुद को व्यथित करते हुए
    तुमने यातनाओं को ओढ़ लिया है।

    मन के भीतर की दशा का अच्छा चित्रण।

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  15. मन को उद्देलित करती है आपकी ये रचना..बहुत कुछ सोचने को विवश करती हुई.
    बेहद उम्दा.

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  16. ...शिक्षाप्रद उत्तम कृति!...बधाई!

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  17. तुम कहीं से लाचार नही हो
    फिर भी लाचारी ओढ़ते हो
    जो दुःख तुमने पाले हैं
    उनके बीज भी ख़ुद ही बोते हो ।
    और फिर अपने आंसुओं से
    बीजों को सींचा भी करते हो
    फल - फूल जाते हैं वो बीज
    तो फिर और अधिक रोते हो ।

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    बहुत सही लिखाआपने। यदि हम दूसरों का दुःख समझें , तो अपना दुःख हल्का लगने लगेगा ।

    .

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  18. मजबूरी का मार्मिक चित्रण करती हुई बहुत ही सम्वेनशील सुन्दर रचना!

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  19. प्रेरक और सार्थक सन्देश देती एक हृदयस्पर्शी कविता. बहुत-बहुत बधाई .

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  20. बहुत ही प्रेरणादायी और विचारपूर्ण रचना ! जिस दिन इंसान अपने ओढ़े हुए दुखों की चादर उतार कर पर दुःख कातर हो जाएगा और दूसरे के दुःख और पीड़ा को समझने की कोशिश करेगा अपने दुःख उसे स्वयं छोटे और बेमानी लगने लगेंगे ! सार्थक पोस्ट के लिये बहुत बहुत बधाई !

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  21. इंसान अपने ही दायरे से नहीं निकल पाता और अपने दुख में ही इतना दुखी महसूस करता है की दुनियां में फैले दुखो को देखने से पहले ही अपने दुख से आँखे मुंद जाती हैं उसकी...सच कहा आपने अपने से नीचे वाले को इंसान देखे, अपने से ज्यादा दुखी को देखे तो समझे की दूसरों का दुख कितना बड़ा है.

    विचारणीय रचना.

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  22. तुम कहीं से लाचार नही हो
    फिर भी लाचारी ओढ़ते हो
    जो दुःख तुमने पाले हैं
    उनके बीज भी ख़ुद ही बोते हो ।
    और फिर अपने आंसुओं से
    बीजों को सींचा भी करते हो
    फल - फूल जाते हैं वो बीज
    तो फिर और अधिक रोते हो ।
    आत्ममंथन को प्रेरित करती ...सकारात्मक द्रष्टिकोण लिए बहुत सशक्त प्रस्तुति !

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  23. बहुत सही निरूपण किया है संगीता जी ,
    'नाहिन कछु अवगुन तुम्हार, अपराध मोर मैं माना।
    ग्यान भवन तनु दियहु नाथ सोउ पाय न मैं प्रभुजाना॥३॥
    - जानबूझ कर फँसे रहना ही तो ..!

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  24. raj bhasha me sangita ji ki umdaa rachnaa.. kal isey main charcha manch par sheyar karungi...aapka aabhaar

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  25. संगीता स्वरूप जी की एक और सशक्त, सार्थक एवं अपना संदेश देने में कामयाब कविता|

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