गुरुवार, 4 नवंबर 2010

हर साल दीपावली मनाएंगे



लौटे थे राम
वनवास से
इसलिए हम
दीपावली मनाएंगे
और अपने
अंतस के राम को
वनवास दे आयेंगे ।



बिजली से चमकते
अपने घर में
और दिए जलाएंगे
पर किसी गरीब की
अँधेरी कोठरी में
एक दिया भी
नहीं रख पायेंगे ।


जिनके भरे हों
पेट पहले से
उन्हें और
मिष्टान्न खिलाएंगे
लेकिन भूखे पेट
किसी को हम
भोजन नहीं कराएँगे

पटाखे चलाएंगे
फुलझडी छुटायेंगे
और इसी तरह से
हर साल दीपावली मनाएंगे


संगीता स्वरुप

26 टिप्‍पणियां:

  1. यही करते आ रहे हैं यही करते रहेंगे । कविता अच्छी लगी ।

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  2. अच्छी रचना!


    सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
    दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
    खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
    दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

    -समीर लाल 'समीर'

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  3. आपको और आपके परिवार को दीपावली की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं ! !

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  4. जिनके बाक्‍स टिप्‍पणियों से भरे हों
    उन्‍हें और टिप्‍पणी दे आएंगे
    खाली बॉक्‍स पडें है कितने
    उनको छूकर आ जाएंगे।

    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  5. bahoot kuchh sonchane ko mazboor karti hui behatareen kavita.......deepavali ki hardik shubh kamnayen

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  6. ाच्छी रचना के लिये बधाई। आपको और आपके परिवार को दीपावली की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं

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  7. antas ke ram ko bhi vanwas kyun ?
    sab miljul saath rahenge aur raushni utsav manayenge...

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  8. चिरागों से चिरागों में रोशनी भर दो,
    हरेक के जीवन में हंसी-ख़ुशी भर दो।
    अबके दीवाली पर हो रौशन जहां सारा
    प्रेम-सद्भाव से सबकी ज़िन्दगी भर दो॥
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
    सादर,
    मनोज कुमार

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  9. यही तो हो रहा है हमेशा……………सोचने को मजबूर करती है आपकी ये रचना।
    दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।

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  10. दिपावली विषयक सुंदर रचना!...दिपावली की ढेरों शुभ कामनाएं!

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  11. पर किसी गरीब की
    अंधेरी कोठरी में
    एक दिया भी
    नहीं रख पाएंगे।

    अंतर्मन से अभिव्यक्त की गई गहन अर्थयुक्त कविता।

    आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की शुभकामनाएं।

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  12. सही बात है हर साल यही करते आये हैं और यही करेंगे .
    दिवाली की हार्दिक शुभकामनाये.

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  13. कितनी तिक्त व्यंग्योक्तियाँ हैं ये...! बधाई!

    आपको और आपके परिवार में सभी को दीपावली की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं ! !

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  14. सोचने को मजबूर करती है आपकी ये रचना।
    दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।

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  15. जिनके भरे हों
    पेट पहले से
    उन्हें और
    मिष्टान्न खिलाएंगे
    लेकिन भूखे पेट
    किसी को हम
    भोजन नहीं कराएँगे ...

    sateek vyang !

    .

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  16. काश इसे पढ़ कर ही किसी की सोच बदल जाए और अपने में कुछ बदलाव ले आयें.

    सुंदर रचना.

    आप सब को दीपावली की शुभकामनाएं.

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  17. दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें !

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  18. Aap jahan bhi Rahe Aabad Rahe,
    Vaibhav Sukh Shanti Saath Rahe,
    Punit hriday se kahata hu,
    Jag ki khusiyan sada Pas rahe.
    Wish you a Happy and prosperous Diwali.

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  19. श्रीमान महोदय / महोदया जी,

    आप व आपके परिवार को दीपावली, गोबर्धन पूजा और भैया दूज की हार्दिक शुभकामनायें. शुभाकांक्षी-रमेश कुमार सिरफिरा. विनम्र अनुरोध के साथ ही इच्छा हैं कि-अगर आपको समय मिले तो कृपया करके मेरे (http://sirfiraa.blogspot.com, http://rksirfiraa.blogspot.com, http://mubarakbad.blogspot.com, http://aapkomubarakho.blogspot.com, http://aap-ki-shayari.blogspot.com, जल्द ही शुरू होगा http://sachchadost.blogspot.com) ब्लोगों का भी अवलोकन करें. हमारी या हमारे ब्लोगों की आलोचनात्मक टिप्पणी करके हमारा मार्गदर्शन करें. हम आपकी आलोचनात्मक टिप्पणी का दिल की गहराईयों से स्वागत करने के साथ ही प्रकाशित करने का आपसे वादा करते हैं.

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  20. ओफ्फोह!संगीता दी,इतनी भी तल्ख़ी भी अच्छी नहीं... ऐसे लोग अगर दस हैं तो सौ लोग उनसे उलट भी हैं... दीवाली पर अंधेरा मिटे और प्रकाश फैले.. इसी शुभकामनाओं के साथ!!

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  21. संगीता दी... झकझोरती हुई कविता और किसी भी पर्व के पीछे छिपी हक़ीक़त को उभारती कविता...

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  22. आपको भी दीपवाली की हार्दिक शुभकानाएं

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  23. मीठे शब्दों में कड़वी हकीकत का बयान करती अच्छी कविता, बशर्ते समाज कुछ सबक ले . बहरहाल रचनाकार का काम समाज को जगाना और झकझोरना है. आपकी यह कविता भी अपना यह फ़र्ज़ निभाती नज़र आ रही है . आभार . ज्योति-पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

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  24. मीठे शब्दों में कड़वी हकीकत का बयान करती अच्छी कविता, बशर्ते समाज कुछ सबक ले . बहरहाल रचनाकार का काम समाज को जगाना और झकझोरना है. आपकी यह कविता भी अपना यह फ़र्ज़ निभाती नज़र आ रही है . आभार . ज्योति-पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.

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  25. बात तो आप सही कह रही हैं. हम वो करते हैं जो जरूरी नहीं है लेकिन वो नहीं करते जिसके लिए जरूरत है. ये तो हमारी समझदारी है कि हम इस युग में व्याप्त रावनों को जानकर भी नजरअंदाज करते रहते हैं. एक भी ऐसे काम नहीं कर पाते कि जिससे सही मायनों में दिवाली सार्थक हो सके. करोड़ों की बारूद में आग लगा कर उड़ा सकते हैं लेकिन इस दिन किसी एक गरीब को भी भरपेट रोटी नहीं खिला पाते हैं. एक गरीब के बच्चे के हाथ में एक पटाखा या मिठाई का एक टुकड़ा नहीं दे पाते हैं.
    बस सब कुछ 'स्व' के लिए करते हैं , 'पर' की परिभाषा ही भूल गए हैं.

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