रविवार, 23 जनवरी 2011

कहानी ऐसे बनी-20 :: बिना ब्याहे घर नहीं लौटे..... !

कहानी ऐसे बनी-20

बिना ब्याहे घर नहीं लौटे..... !

हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतिम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रही इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं करण समस्तीपुरी।

रूपांतर :: मनोज कुमार

जय हो ! जनता-जनार्दन !! कैसी रही मकर संक्रांति? सब कुशल है ना.... ? अरे भाई क्या बताएं .... हमारी संक्रांति में तो ऐसा धमाल मचा कि ज़िन्दगी भर नहीं भूलेंगे। बहुत शौक से गए थे गाँव संक्रांति मनाने .... लेकिन वही हो गया, 'शौक में सोहारी [रोटी] ! आलू बैगन के तरकारी !!'

खैर चलिए, सप्ताह भर बाद आप लोगों से मिल रहे हैं। ज़िन्दा बच गए, बहुत ख़ुशी हो रही है। कहावत भी है, 'जान बचे लाखो पाई !' अब पूछिये आप, क्या हुआ ? अरे भाई क्या नहीं हुआ.... ? पूस में गए थे संक्रांति मनाने हो गया मौगत। वो कोठा पर वाले खखनु ठाकुर नहीं हैं ..... अरे वही जिनकी उजड़ी हुई ज़मींदारी बची है। उन्ही का बेटा है न बिगडुआ। भैंस चढ़ते बिगडु ठाकुर अधबयस [जिसकी आधी उम्र निकल गयी हो] हो गया था, लेकिन घोड़ी पर चढ़ने का नसीब नहीं हुआ। नालायक़ न तो पढ़ा-लिखा, और न कोई गुण-ज्ञान ही सीखा ...... खखनु ठाकुर जैसी पहलवानी भी नहीं कर सकता था ..... ऊपर से डेढ़ आँख का मालिक। पुरानी ज़मींदारी और दो-चार माल मवेशी पर गृहलक्ष्मी कैसे आयें!

बिगडुआ को अब चालिसवां लगने को आया तो बेचारे खखनु ठाकुर के हाथ-पैर जोड़ने और आरजू-मिन्नत पर घरजोरे पंडित जी पिघल गए। बंगाल बोर्डर के गाँव बिच्छुपुर में बिगडु ठाकुर की जोड़ी निकाल ही दिए। बात तय हुई कि दोतरफ़ा खर्चा खखनु ठाकुर ही करेंगे। पंडित जी बहुत खुश थे। दक्षिणा अच्छा मिला था। इसी महीने का सगुन धराया था। संक्रांति से दो दिन पहले का। गाँव गए संक्रांति में तो पता चला। मंगल पेठिया पर बिगडुआ ने तो बताया ही ठाकुरजी ख़ुद भी घर आ कर बारात चलने का न्योता दे गए थे।

भाई अधबयस है तो क्या .... बारात तो है ठाकुर की। ज़मींदारी न चली गई है, रोआब तो अभी है ही है। राजा भोज जैसी बारात सजी थी। हाथी-घोड़ा, ऊँट-बगेड़ा सब आया। बाराती भी दमदार थी। आखिर ठाकुर जी के एकलौते कुलदीपक की बारात थी। चली सज के रेवा-खंडी बाराती।

यात्रा थी दूर की। पहुंचते-पहुंचते सांझ का धुंधलका फैलने लगा था। वैसे तो रास्ते में चूरा-दही हो ही गया था लेकिन दूर से ही जलबासा देख कर 'मुदित बरातिन्ह हने निसाना....!'  है। अरे!! यह क्या!!! .......... जलबासा पर तो एक बाराती पहिले से ही थी। हमने सोचा बिच्छुपुर में आज दो-दो लगन है। बैंड बाजा और नाच में अच्छा कम्पटीशन होगा।

इधर सारे बाराती पानी, शरबत, चाय, नाश्ता का रास्ता देखने लगे। बहुत देर हो गई। कुछ लोगों ने सोचा कि चलो अभी उस तरफ वाली बाराती में बँट रहा होगा तो उधर ही पा लेंगे। लेकिन यह क्या .... इस तरफ भी ठक-ठक माला सीताराम!! खैर, दोनों बाराती में बात-चीत बढी। आप कहाँ से आये हैं ? तो आप कहाँ से आये हैं ?? फिर आप किसके यहाँ आये हैं? तो आप किसके यहाँ ?? दो घड़ी तो बात हुई कि सारा मज़मा बिगड़ गया। अब आपको विश्वास नहीं होगा ........... लेकिन क्या कहें..... अरे महाराज दोनों बाराती एक ही लड़की पर आई थी। अब समझ में आया कि साराती सब क्यों गायब थे? उधर जिस तेजी से दोनों बाराती पहले हिल-मिल रहे थे वैसे ही अब फटाक से दू फार हो गया!

अब नाश्ता-पानी तो दूर फ़िक्र तो इस बात की थी कि यहाँ भी बिगडु ठाकुर का मंगलम भगवान विष्णु होगा कि कपाल पर लाठी ! इधर हम लोगों की बारात के कुछ सुर्खुरू आदमी गए उस साइड के बाराती को समझाने...... । लेकिन क्या मजाल कि मान जाएँ ! आखिर वह भी तो ठाकुरों की ही बारात थी। फिर कुछ लोग खखनु ठाकुर को समझाने लगे। तलवार पुरानी भले ही थी लेकिन काट तो वही थी। राजपूती खून खौल उठा। जमींदारी रोआब दहाड़ मारने लगा। ठाकुर जी बेंत चमका-चमका कर कहने लगे, 'ससुरा.... हमारे दादा के रैय्यत-मोख्तारी करने वाला आज हमरे बेटे के सामने बाराती लाएगा.... ? कलेजा तोड़ देंगे लेकिन पीठ नहीं दिखाएँगे।’

इधर न लड़की वाले का पता ना ... पंडित घरजोरे का। इधर अभी तक चुप-चाप सज-संवर कर बैठा बिगडुआ ने भी युद्ध का शंख नाद कर दिया। हमको आल्हा-रुदाल के नाच वाली कहावत याद आ गई, "बिना ब्याहे घर नहीं लौटें, चाहे जान रहे या जाय.....!" कुछ इसी टोन में बोला था बिगाडुआ। बेटा बिगड़ुआ भी तो नाच का पक्का शौक़ीन था बचपन से ही। जब हो गया ऐलान तब .... कौन पीछे हटे ? उधर से भी लाठी-भाला निकलने लगा। इधर भी बल्लम-बरछी तैयार हो गया। फिर गांव वाले भी टपक पड़े। पहिले दोनों बारात को समझाया गया। लेकिन समझे कौन ? फिर शुरू हो गया ........ 'अथ श्री महाभारत कथा'। वहाँ तो दुतरफ़ा ही होता था यहाँ तो तीन तरफ़ा हो गया। दे दनादन....ले टनाटन...! हम तो गत्ते से जान बचा कर सामने एक झोपड़ी में छुप कर सारा तमाशा देखने लगे। बिगड़ुआ सेहरा उतार कर फेंका और फिर 'आल्हा' वाली कहावत दुहराया, "बिना ब्याहे घर नहीं लौटें चाहे जान रहे या जाए....!" बगल वाले से एक लाठी झपट कर जो भी सामने आये सबको भैंसे की तरह हांकने लगा।

इधर घमासान मचा हुआ था। तभी बिच्छुपुर के मुखिया सरपंच सब जुट गए। गहमा-गहमी के बीच में दोनों पार्टी से बात की गई। लडकी वालों को बुला कर खूब सुनाया। लड़की वाले अंत मे तैयार हो गया कि भाई, हमें कोई ऐतराज़ नहीं। हमसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई। अब ये दोनों बाराती आपस में फैसला कर लें। जिस से कहें हम कन्यादान कर देंगे। अभी एक राउंड झगरा-झंझट हुआ ही था। हम सोचने लगे अभी शांति होगी। लेकिन बिगडुआ फिर से बादल की तरह फट पड़ा, "अब आ गए हैं बाराती लेकर तो दुल्हन लेकर ही जायेंगे ! बिना ब्याहे घर नहीं लौटें.....!!" हालांकि गांव वालों का मन भी उस पक्ष के लड़के पर डोल रहा था लेकिन उस साइड की बाराती ने हिम्मत हार दी थी। उधर के लड़के के बापू बोले, 'हमारा लेन-देन लौटा दें, हम अपने बेटे को कहीं और ब्याह लेंगे। बेचारा दूल्हा मन-मसोस कर रह गया।

बात पटरी पर आ गयी तो हम भी झोपड़ी से निकले। इधर खखनु बाबू भी खुश थे। बोले, लेन-देन तो हम ही लौटा देंगे। और फटाफट बटुआ खोल कर गिन भी दिए। इस तरह से उधर की बारात खाली हाथ ही लौट गई। और बिगडुआ जिसे लड़की वाले ना भी पसंद कर रहे थे फिर भी दुल्हन लेके लौटा।

तो यह था कहावत का कमाल, "बिना ब्याहे घर नहीं लौटे ! चाहे जान रहे या जाय !!" देखिये बिगड़ुआ था वज्र मूर्ख लेकिन बात किया बड़ी दूर की। और जो कहा उसने वह किया भी। आखिर उसकी कहावत का मतलब ही है पुरषार्थ से लबालब।

अर्थात "जिस काम के लिए आये हैं वो कर के ही जायेंगे। जोखिम के डर से लक्ष्य से नहीं भूलेंगे।" जब ऐसा दृढ निश्चय था तब लक्ष्य भी मिल ही गया। आखिर ब्याह हो गया न। और उधर की बाराती में यही निश्चय नहीं था। थोड़ी सी घुड़की देखे कि फुसफुसा गए। फिर तो समर्थन होने के बावजूद भी दुल्हन, यानी कि लक्ष्य से वंचित रहना पड़ा। तो भैय्या यही थी अद्भुत बारात की बात। अब आप लोग टिपिया के बताइयेगा कैसी लगी !!!

9 टिप्‍पणियां:

  1. हम ने भी सोच लिया पोस्ट चाहे कितनी लम्बी हो बिना पढे घर नही जायेंगे। कुछ तो असर हुया ना इस कहावत का। अच्छी लगी पोस्ट। बधाई।

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  2. दिलचस्प कहावत के पीछे की यह दिलचस्प कहानी भला किसे दिलचस्प नहीं लगेगी ? सुंदर आलेख. रोचक प्रस्तुति. आभार .

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  3. कहावतों को कहने का बढ़िया अंदाज़ ...बहुत अच्छी लगी कहानी .

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  4. ये सब देसी कहावतें इसी तरह किसी न किसी घटना से उपजी हैं.. आप इनको बड़े ही दिलचस्प अंदाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं.. आरम्भ से अंत तक रोचकता बनी रहती है!!

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  5. हर कहावत की पृष्ठभूमि में कोई घटना होती है।इसी को आधार मान कर जो कुछ भी आप प्रस्तुत करते हैं,अच्छा लगता है।

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  6. कहावतों का रूपान्तर
    और कहावतों से कहानी
    मान्यताओं और रीति रिवाजों की रवानी!
    मुझे बहुत अच्छी लगी!

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  7. बताइए साहब,सारा पुरसार्थ सादिए के लिए बचाके रखा था। जमींदारी बचाने के लिए रखा होता,त आज खखनु बाबू के यहां केतना लड़कीवाला सब खेखनाता।

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