सोमवार, 3 जनवरी 2011

उफान …सोच के


सोच ,
सर्फ़ के झाग की तरह
कुछ देर
फेनिल झागों के समान उभरी
और ख़त्म हो गई
दूध में उफान की तरह
विचार उफनते हैं
और कुछ समय बाद
ठंडे हो जाते हैं
उन झागों की तरह
जो स्वयं नीचे बैठ गए हों ।
और फ़िर -
वही बेरौनक सी ज़िन्दगी
कैसे , कब और कहाँ शुरू हुई
एहसास नही रहता
कल आज और कल
बीतते जाते हैं
पर उनका हिसाब नही रहता
इस बेहिसाबी दुनिया में
तुम बीता कल ढूँढते हो
पर यहाँ तो अब
आज का हिसाब नही मिलता
वक्त नही है
अब सोचने का
कल का क्या सोचें
कर्म किए जाओ
फ़िर -
वक्त कहीं का कहीं पहुंचे.



27 टिप्‍पणियां:

  1. सचमुच बीते कल को याद करने का वक्त नहीं है अब , वक्त के साथ आगे बढ़ते जाना ही जिंदगी है . सुन्दर अभिव्यक्ति .

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  2. इस बेहिसाबी दुनिया में
    तुम बीता कल ढूँढते हो
    पर यहाँ तो अब
    आज का हिसाब नही मिलता
    वक्त नही है...

    तभी तो ये जलजला है
    और सब मिटता जा रहा है ....

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  3. बिलकुल सही बात है कल का सोचते हुये वर्तमान भी जीने से रह जाता है। अच्छी रचना के लिये बधाई।

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  4. बहुत सुन्दर और प्रभावशाली रचना ! आज की व्यस्ततम और तनावग्रस्त ज़िंदगी में ना तो बीते हुए कल का किसीको ख़याल है, ना आज के पल छिन का कुछ हिसाब किताब और ना ही आने वाले कल की चिंता ! सब बस दौड़े जा रहे हैं ! कहाँ, क्यों, किसलिए शायद यह भी नहीं जानते ! बस जैसे यह भी एक रवायत है ! बहुत शानदार प्रस्तुति ! मेरी बधाई एवं नव वर्ष की मंगलकामनाएं स्वीकार करें !

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  5. दीदी,

    बीत गया सो रीत गया।
    वर्तमान भी तो अगले क्षण ही अतित बन जाता है।
    भविष्य को सार्थक करने का प्रयास ही सत्य है।

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  6. सर्फ के झाग जब बनते हैं
    मैंल धुल जाता है
    दूध में झाग जब बनते हैं
    मलाई बन घी निथर आता है
    आज के चिन्‍तन से
    कल सँवर जाता है
    विचार मन को सँवारते हैं
    कल को बुहारते हैं
    कर्म करने को पुकारते हैं।

    संगीता जी, यह भी एक विचार है। जितने विचार होंगे उतना ही अधिक श्रेष्‍ठ जीवन होगा।

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  7. बडी गहरी रचना लिखी है और आज तो ये लगा जैसे मुझ पर ही लिखी है क्योंकि पिछले दिनो ऐसी सोच से गुज़र रही थी एक मानसिक या आन्तरिक अन्तर्द्वंद से……………बेहद खूबसूरत प्रस्तुति।

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  8. विम्बो के माध्यम से गंभीर बात कहती रचना अच्छी है...एक प्रव्हाव्शाली कविता के लिए बधाई...

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  9. विम्बो के माध्यम से गंभीर बात कहती रचना अच्छी है...एक प्रव्हाव्शाली कविता के लिए बधाई...

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  10. जय श्री कृष्ण...आपका लेखन वाकई काबिल-ए-तारीफ हैं....नव वर्ष आपके व आपके परिवार जनों, शुभ चिंतकों तथा मित्रों के जीवन को प्रगति पथ पर सफलता का सौपान करायें .....मेरी कविताओ पर टिप्पणी के लिए आपका आभार ...आगे भी इसी प्रकार प्रोत्साहित करते रहिएगा ..!!

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  11. जय श्री कृष्ण...आपका लेखन वाकई काबिल-ए-तारीफ हैं....नव वर्ष आपके व आपके परिवार जनों, शुभ चिंतकों तथा मित्रों के जीवन को प्रगति पथ पर सफलता का सौपान करायें .....मेरी कविताओ पर टिप्पणी के लिए आपका आभार ...आगे भी इसी प्रकार प्रोत्साहित करते रहिएगा ..!!

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  12. जय श्री कृष्ण...आपका लेखन वाकई काबिल-ए-तारीफ हैं....नव वर्ष आपके व आपके परिवार जनों, शुभ चिंतकों तथा मित्रों के जीवन को प्रगति पथ पर सफलता का सौपान करायें .....मेरी कविताओ पर टिप्पणी के लिए आपका आभार ...आगे भी इसी प्रकार प्रोत्साहित करते रहिएगा ..!!

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  13. पीछे मुड कर न देख प्यारे आगे चल.
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

    उत्तर देंहटाएं
  14. वक्त नही है
    अब सोचने का
    कल का क्या सोचें
    कर्म किए जाओ
    फ़िर -
    वक्त कहीं का कहीं पहुंचे.

    सुन्दर अभिव्यक्ति .

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  15. संगीता दी!
    अच्छा संदेश देती नज़्म... हम एक बड़ी ख़ुशी के इंतज़ार में रोज़ाना की छोटी छोटी खुशियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं... आपकी नज़्म उसी आज को जीने की प्रेरणा देती है!!

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  16. महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के ब्लॉग हिन्दी विश्‍व पर राजकिशोर के ३१ डिसेंबर के 'एक सार्थक दिन' शीर्षक के एक पोस्ट से ऐसा लगता है कि प्रीति सागर की छीनाल सस्कृति के तहत दलाली का ठेका राजकिशोर ने ही ले लिया है !बहुत ही स्तरहीन , घटिया और बाजारू स्तर की पोस्ट की भाषा देखिए ..."पुरुष और स्त्रियाँ खूब सज-धज कर आए थे- मानो यहां स्वयंवर प्रतियोगिता होने वाली ..."यह किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर के विश्‍वविद्यालय के औपचारिक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग ना होकर किसी छीनाल संस्कृति के तहत चलाए जाने वाले कोठे की भाषा लगती है ! क्या राजकिशोर की माँ भी जब सज कर किसी कार्यक्रम में जाती हैं तो किसी स्वयंवर के लिए राजकिशोर का कोई नया बाप खोजने के लिए जाती हैं !

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  17. sangeeta di
    vaise to aapki sari prastutiyan hi hridangam karne wali haoti hain,
    par jo aaj aapne likha bikul alag aur sateek.
    वही बेरौनक सी ज़िन्दगी
    कैसे , कब और कहाँ शुरू हुई
    एहसास नही रहता
    कल आज और कल
    बीतते जाते हैं
    पर उनका हिसाब नही रहता
    इस बेहिसाबी दुनिया में
    तुम बीता कल ढूँढते हो
    पर यहाँ तो अब
    आज का हिसाब न मिलता
    nav-varshh par aapko hardik abhinandan
    poonam

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  18. सुन्दर प्रस्तुति,
    आप की कविता बहुत अच्छी लगी
    बहुत बहुत आभार

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  19. वक्त नही है
    अब सोचने का
    कल का क्या सोचें
    कर्म किए जाओ
    फ़िर -
    वक्त कहीं का कहीं पहुंचे

    कर्म प्रधान सुन्दर कविता

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  20. वास्तविकता के दर्शन करवाती उत्तम रचना.

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  21. कल का क्या सोचें
    कर्म किए जाओ
    फ़िर -
    वक्त कहीं का कहीं पहुंचे.

    aapne to geeta ka sandesh de diya. shubhkamna .

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  22. जीवन चलने का नाम चलते रहो सुबहो शाम जीवन का एक और सत्य

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