बुधवार, 19 जनवरी 2011

हिंदी आलोचना

हिंदी आलोचना

मनोज कुमार

काव्‍य शास्‍त्र की परंपरा काफी पहले से चली आ रही है। पर आलोचना का एक शास्‍त्र के रूप में उद्भव और विकास काफी बाद में हुआ, बल्कि यूँ कहें कि आलोचना साहित्य का शास्‍त्र न होकर साहित्‍य सृजन का वह जीवन है जो बार बार सृजित किया जाता है- ज्‍यादा उपयुक्‍त होगा।

काव्‍यशास्‍त्र तो सिद्धांतों और प्रतिमानों का निरूपण होता है। आलोचना में उन्‍हीं सिद्धांतों के प्रकाश में रचना की परख और मूल्‍यांकन किया जाता है। कुछ सृजन, जिसे “नया” भी कह सकते हैं, आलोचना के स्‍थापित या स्‍वीकृत प्रतिमानों को चुनौती देता है। तब आलोचना करनेवाले इस नए सृजन के मूल्‍यांकन के लिए नए प्रतिमानों की तलाश करता है। यह एक व्‍यावहारिक प्रक्रिया है, जो चलती रहती है- सिद्धांतों और सृजन बीच। यही प्रक्रिया तो सिद्धांतों और सृजन के संबंधों में बदलाव के चक्र को गतिमान रखती है।

संस्‍कृत काव्‍यशास्‍त्र, रीतिशास्‍त्र और पश्चिमी काव्‍यशास्‍त्र का विवेचन प्रधानतः सिद्धांत परक है। आलोचना की टकराहट शास्‍त्र से कम, नवीन सृजन, नवीन विचारधाराओं से और वैचारिक सरोकारों से अधिक रही है। हिंदी आलोचना को वैचारिक स्‍वरूप आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल ने दिया। उन्हें हिंदी का प्रथम आधुनिक आलोचक, या यों कहें कि हिंदी आलोचना का युग पुरूष कहा जाता है।

साहित्‍य की अनेक विधाएं है। ये नाडि़यों की तरह है जिनके भीतर विचारों का रक्‍त प्रवाहित होता है। विचारों में निहित शक्ति ही साहित्यिक सृजन के रूप में आकारगत परिवर्तन होते हैं। साहित्य की विधाओं पर विचार करने का विशेष काम आलोचना ही तो करती है। जहां पद्य में भाव की प्रधानता होती है वहीं गध की विधाओं में विचार की प्रधानता होती है।

परिवेश और युग की प्रेरणा से सृजनात्‍मक मानसिकता में परिवर्तन आते हैं। इसका प्रभाव साहित्य की विधाओं पर भी पड़ता है। हर युग की मानसिकता विभिन्‍न विधाओं में प्रकट होती है। जहां प्राचीन युग में महाकाव्‍य प्रधान विधा थी वहीं आधुनिक युग में उपन्‍यास, कहानी, रिपोर्ताज, रेखाचित्र आदि ने स्‍थान लिया। विधाएं चाहे कोई भी हों, इनका रूप चाहे कितना भी नया-नया आकार ले ले पर ये लोकमानस के विचार-बिंबों को प्रतिबिम्‍बित करती हैं।

भारतेन्दु युग में हिंदी आलोचना का सूत्रपात पत्र-पत्रिकाओं में छपी व्यावहारिक समीक्षाओं से हुआ। सर्जक चिंतक के रूप में भारतेन्दु ने आलोचना को दिशा प्रदान की। भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग में आलोचना के सरोकार सामाजिक होते गए।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिंदी आलोचना को दिशा और दृष्टि प्रदान की। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा है, “कविता का उद्देश्य हृदय को लोक-सामान्य की भावभूमि पर पहुंचा देना है।” यानी व्यक्ति धर्म के स्थान पर लोक-धर्म श्रेयस्कर है। मतलब साहित्य में जीवन और जीवन में साहित्य प्रतिष्ठित हो। इस तरह से जो समीक्षा होती है वह व्यावहारिक समीक्षा है। ‘भाव’ मन की वेगयुक्त अवस्था-विशेष है। भाव में बोध, अनुभूति और प्रवृत्ति तीनों मौज़ूद हैं। आचार्य शुक्ल के अनुसार, ‘प्रत्यय बोध, अनुभूति और वेगयुक्त प्रवृत्ति इन तीनों के गूढ संश्लेषण का नाम भाव है।’ यही वह आधार है जिसपर आचार्य शुक्ल काव्य में लोक-मंगल के आदर्श की प्रतिष्ठा करते हैं। इस प्रकार काव्य सामजिक चेतना के उत्तरदायित्व से युक्त होना चाहिए।

शुक्ल जी के अनुसार काव्य के रसास्वादन का लक्ष्य आनंद नहीं ‘भाव-योग’ है। कविता जीवन से पलायन नहीं है, बल्कि वह हमें जीवन में अधिक व्यापक पैमाने पर अधिक गहराई में उतारती है। अधिक अनुभूतिमय, अधिक बोधवान और अधिक कर्मण्य बनाती है, या बनने की प्रेरणा देती है। काव्य में मूल और महत्त्वपूर्ण है – प्रस्तुत भाव। अप्रस्तुत या तो प्रस्तुत का पोषण करे या उसके सदृश्य हो। शुक्लजी ने समीक्षा-सिद्धांत रचनाओं के आधार पर स्थापित किए हैं। अतः उनकी सैद्धांतिक और व्यावहारिक समीक्षा में संगति है। वे व्यवहार से सिद्धांत पर पहुंचते हैं। वे आधुनिक और वैज्ञानिक समीक्षक हैं। समीक्षक के लिए सहृदय होना बहुत ज़रूरी है। समीक्षक को आलोच्य रचना या कृति के उत्कृष्ट स्थल की पहचान कर उसको प्रमुखता देना चाहिए। साथ ही वह रचना की युगानुकूल व्याख्या करे।

आचार्य शुक्ल ने हिंदी आलोचना को जो प्रौढता प्रदान किया थी उसे आगे ले जाने और दिशा परिवर्तन का चुनौतीपूर्ण काम नन्ददुलारे वाजपेयी, हजारी प्रसाद द्विवेदी और नगेन्द्र ने किया। शुक्ल जी की नैतिक और बौद्धिक दृष्टि की अपेक्षा नये समीक्षकों ने सौंदर्य-अनुभूति और कला-प्रधान दृष्टि अपनाया। वाजपेयी ने काव्य सौष्ठव को सर्वोपरि महत्त्व दिया। वे किसी सहित्येतर मूल्य को मूल्यांकन के लिए निर्णायक स्थिति में रखने के पक्षधर नहीं थे। द्विवेदी जी का मानना था कि मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है। वे सांस्कृतिक निरंतरता और अखंडता के समर्थक थे। जन-जीवन के प्रति मोह के कारण उनका मानवतावादी दृष्टिकोण था। उन्होंने सामयिक आधुनिक प्रश्नों पर पूरा ध्यान दिया। नगेन्द्र का दृष्टिकोण व्यक्तिवादी था। नगेन्द्र ने शुरु में व्यवाहारिक आलोचना किया। बाद में वे भी सिद्धांत-विवेचन करने लगे। उनकी आलोचनाओं में खंडन-मंडन नहीं, व्याख्या-विश्लेषण और अनुशंसा ही अधिक है।

1936 से हिंदी साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन की शुरुआत हो गई थी। कुछ समय बाद रचनात्मक प्रयोगशीलता के उदाहरण भी दिखाई देने लगे। शुरु में आलोचना की शब्दावलि मूल्यकेन्द्रित रही। मार्क्सवाद के आयात करने पर जनाधार और मानववादी दृष्टिकोण की बात प्रमुख हो गई।

शुक्‍लोत्तर आलोचना के प्रमुख और महत्‍वपूर्ण स्‍तम्‍भ है डॉ. रामविलास शर्मा। रामविलास शर्मा तक आते-आते प्रगतिशील आलोचना का जातीय चरित्र निर्मित हो गया। उनका मानना था, ‘‘साहित्य भी शुद्ध विचारधारा का रूप नहीं है, उसका भावों और इन्द्रिय-बोध से घनिष्ठ संबंध है।” उन्होंने शुक्ल की विरासत और जनवादी परंपरा को आगे बढाया। शुक्लोत्तर आलोचना में, विशेषकर पचास के बाद की आलोचना से पश्चिमोन्मुखता की शिकायत अक्सर की जाती रही है। आलोचना में पश्चिम सरोकारों और अवधारणा के आयात का एक कारण यह भी रहा कि स्वयं रचनाओं पर भी यह प्रभाव कम नहीं रहा। दरअसल यह आयातित विचार से ज़्यादा आयातित बौद्धिक मुद्रा थी। आलोचकों में नामवर सिंह और रचनाकारों में अज्ञेय ने यह प्रभाव बख़ूबी अपना लिया।

समकालीन आलोचना में एक नयी पीढी नए तेवर के साथ आए। इनका मुहावरा नया था। इनमें यथार्थ दृष्टि का आग्रह भी प्रबल था। समकालीन आलोचक वास्तविक मूल्यांकन की कूंजी आलोच्य कृति के भीतर तलाशते हैं। उनके अनुसार रचना से रचनाकर तक पहुंचना समीक्षक का लक्ष्य होना चाहिए। इस दौर में एक तरफ़ मलयज की ‘निर्मम तटस्थता’ है तो दूसरी ओर रमेशचंद्र शाह की ‘सर्जनात्मक समीक्षा’ है। मलयज न फ़तवे देते हैं, न नारे उछालते हैं। पूरी संवेदनशीलता और अलोचनात्मक विवेक से सही जगह उंगली रख देते हैं। शाह रचनाकार की सृजन प्रक्रिया का आत्मीय विश्लेषण ज़रूरी समझते थे।

वर्तमान हिंदी आलोचना अनेक प्रकार की विसंगतियों से घिर गई है। जागरूकता तो निभाती रही है, पर समसामयिकता का आग्रह अधिक प्रबल हो गया। आज की आलोचना में व्यापक परिदृश्य बोध का स्पष्ट अभाव दिखता है। पम्परा से संबंध विच्छेद हो गया लगता है। अधिकांश आलोचना कर्म व्यवहारिक समीक्षा के रूप में है। कोई गंभीर या मूलभूत सवाल नहीं उठाए जाते हैं। स्थापित-विस्थापित करने की नीयत से अतिरंजित शब्दावलि लिए ये प्रशंशा-निंदा के आगे कम ही बढते हैं। इसलिए विश्वसनीयता कम होती जा रही है। कुछ हद तक सनसनीख़ेज़ पत्रकारिता के समान आज की आलोचना हो गई है। न उन्हें रचनात्मक साहित्य की चिंता है, न रचनाकारों को उनकी परवाह। आलोचना की भाषा का कोई निश्चित चरित्र नहीं बन पाया है। मूल्यांकन के मानदंडों और पाद्धतियों की दृष्टि से भी पर्याप्त आराजकता है। आलोचना बहुत हैं, सैद्धांतिकी नहीं के बराबर। मूल्यांकन के मानदंडों की विविधता है। समसामयिकता का आग्रह सबसे प्रबल है। नये प्रयोगों और पद्धतियों की तलाश चलती रहती है। समीक्षा में रचना की सृजन प्रक्रिया का विश्लेषण पर ज़ोर दिया जाता है।

आज देश में जैसा परिदृश्य है हिंदी साहित्य में भी उसी के अनुरूप परिवर्तन आया है। सत्ता की उठापटक, आर्थिक संकट, भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद आदि से संस्कृति, कला और साहित्य भी प्रभावित हैं। पाठक का विकल्प आलोचक नहीं हैं। जागरूक पाठक अपना विमर्श खुद तैयार कर लेता है। सृजन और आलोचना दोनों में समीक्षा का अर्थ बदल गया है। परंपरा और संस्कृति का विरोध आम बात हो गई है। जहां एक ओर सृजन के नाम पर सतही रचनाएं आ रहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ़ आलोचना के नाम पर या तो दलबंदी हो रही है या पत्थरबाज़ी। लगता है विचार का अंधेरा छाया है। पता ही नहीं चल रहा कि साहित्य को परखने की कसौटी क्या है? आलोचना में वक्तव्यबाज़ी अधिक हो रही है, इस परिस्थिति में रचना को बोलने का अवसर ही नहीं मिल रहा है। रचना में भी सपाटबयानी अधिक, और स्वानुभव की मुद्रा फूहड़ता की हद तक प्रबल है।

12 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकाशन की अधिकता के इस दौर में उसी साहित्‍य की जानकारी आसानी से होती है, जिसका हल्‍ला हो. वांछित सत-साहित्‍य कई बार इस भीड़ में खो जाता है या देर से मिल पाता है.

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  2. आलोतना पर बहुत दिनों बाद कोई कायदे का लेख पढ़ने को मिला!
    आभार इस प्रस्तुति के लिए!

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  3. आलोचना पर बहुत अच्‍छा आलेख। आज आलोचना के कारण साहित्‍य पर संकट आ गया है। गुटबाजी के चलते आलोचना की जा रही है इस कारण अच्‍छी पुस्‍तकें नकार दी जाती हैं और बेकार पुस्‍तकें आलोचना की दृष्टि से श्रेष्‍ठ बन जाती हैं, परिणाम पाठकों में कमी। विदेशों में किसी भी पुस्‍तक को खरीदने से पूर्व उसके रिव्‍यू देखे जाते हैं और उसकी के आधार पर पुस्‍तक को खरीदा जाता है लेकिन हिन्‍दी की पुस्‍तकों के लिए ऐसा नहीं है।
    ब्‍लाग जगत भी इस बीमारी से अछूता नहीं है। किसी भी रचना को केवल वाह-वाही ही मिलती है, आलाचकीय दृष्टि नहीं मिल पाती। इसलिए यहाँ भी पेनल बनाने चाहिएं, विधा विशेष के लिए। इससे रचनाकार को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

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  4. सृजन और आलोचना दोनों में समीक्षा का अर्थ बदल गया है। परंपरा और संस्कृति का विरोध आम बात हो गई है। जहां एक ओर सृजन के नाम पर सतही रचनाएं आ रहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ़ आलोचना के नाम पर या तो दलबंदी हो रही है या पत्थरबाज़ी। लगता है विचार का अंधेरा छाया है। पता ही नहीं चल रहा कि साहित्य को परखने की कसौटी क्या है? आलोचना में वक्तव्यबाज़ी अधिक हो रही है, इस परिस्थिति में रचना को बोलने का अवसर ही नहीं मिल रहा है।

    इस विषय पर बहुत अच्छा लेख पढने को मिला ...सच है सृजनकर्ता ऐसी गुटबंदी आलोचना से हताश हो जाता है

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  5. मनोज जी , बहुत अच्छा लगा इस विषय पर पढ़कर। हम चाहते हैं हिंदी के जानकार लेख़क अपना ज्यादा से ज्यादा योगदान करें हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में।

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  6. रचना धर्मिता और समीक्षा-कर्म दोनों के साथ अब कम न्याय होता दिख रहा है.आपका इस विषय पर आलेख बड़ा सही,सामयिक,सटीक और सुन्दर है. साहित्य से जुड़े लोगों को आप सही रास्ता दिखाते चल रहे हैं .

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  7. शुक्ल जी के अनुसार काव्य के रसास्वादन का लक्ष्य आनंद नहीं ‘भाव-योग’ है। कविता जीवन से पलायन नहीं है, बल्कि वह हमें जीवन में अधिक व्यापक पैमाने पर अधिक गहराई में उतारती है। अधिक अनुभूतिमय, अधिक बोधवान और अधिक कर्मण्य बनाती है, या बनने की प्रेरणा देती है। काव्य में मूल और महत्त्वपूर्ण है – प्रस्तुत भाव। अप्रस्तुत या तो प्रस्तुत का पोषण करे या उसके सदृश्य हो।

    आलोचना स्वस्थ होने पर सृजन भी सार्थक हो जाता है………और आज ऐसी स्वस्थ आलोचनाओ की ही जरूरत है …………शुक्ल जी का दृष्टिकोण बेहद उम्दा है …………काव्य मे भाव पक्ष का सबल होना ही उसकी सार्थकता का प्रमाण होता है।

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  8. काव्य में मूल और महत्त्वपूर्ण है – प्रस्तुत भाव। अप्रस्तुत या तो प्रस्तुत का पोषण करे या उसके सदृश्य हो। शुक्लजी ने समीक्षा-सिद्धांत रचनाओं के आधार पर स्थापित किए हैं। अतः उनकी सैद्धांतिक और व्यावहारिक समीक्षा में संगति है। वे व्यवहार से सिद्धांत पर पहुंचते हैं। वे आधुनिक और वैज्ञानिक समीक्षक हैं। समीक्षक के लिए सहृदय होना बहुत ज़रूरी है। समीक्षक को आलोच्य रचना या कृति के उत्कृष्ट स्थल की पहचान कर उसको प्रमुखता देना चाहिए। साथ ही वह रचना की युगानुकूल व्याख्या करे.
    -मनोज जी एकदम आँखें खोलने वाला आलेख है .आज के तथाकथित आलोचकों को जरुर पढ़ना चाहिए.
    शुक्ल जी के आलोचनात्मक विचार तो अब कहीं दिखाई नहीं पड़ते.अब तो आलोचना का मतलब रचना का विश्लेषण करके उसकी कमियों खूबियों को इंगित कर रचनाकार का उत्साह बढ़ना नहीं बल्कि रचनाकार का मनोबल गिरा देना होता है.गुटबाजी ,पत्थरबाजी मानमर्दन की हद तक होती है

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  9. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (20/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  10. आलोचना के विषय पर साहित्यिक शोध के साथ लिखा गया वैज्ञानिक आलेख!!

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  11. बहुत ही सरल शब्दों में एक सार्थक आलेख. आलोचना के विविध पहलू से परिचय करवाने का आभार

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