सोमवार, 17 जनवरी 2011

अस्तित्व


जब आया पैगाम मेरी मौत का मेरे पास
कहा मैंने ठहर अभी उसका ख़त आएगा
गर ठहर तू जायेगी कुछ देर और
तो क्या धरा पर भूचाल आ जायेगा ।



हंस कर बोली यूँ मुझसे मौत तब
ज़िन्दगी हो गई है अब तेरी पूरी
चाह तेरी निकली नही अब तलक
भटक रही है क्यों तू लिए आशा अधूरी ।

छोड़ दे ये अधूरी आस तू
मत भटक अब इस संसार में
ज़िन्दगी के क्षण तुझे जितने मिले
बिता दिए तुने उन्हें बस प्यार में ।

आई थी जब अकेली इस संसार में
कोई भी बंधन तुझसे नही जुडा था
बंध गई तू इन सांसारिक बंधनों से
कि तुझ पर झूठा आवरण एक पड़ा हुआ था ।

जब असलियत " मैं " आ गई सामने तेरे
अब भी तुझे एहसास नही होता है
काट दे इन सांसारिक बंधनों को
कि इंसान का बस यही अस्तित्व  होता है.






संगीता स्वरुप

27 टिप्‍पणियां:

  1. आशा का संचार करती सुन्दर कविता.. मन मुग्ध हो गया सुबह सुबह..

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  2. ... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

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  3. यही अकाट्य सत्य है ……………मगर ये बंधन इतने आसानी से कहाँ छूटते हैं और गर छूट जाये तो जीना सार्थक हो जाता है……………बेहद खूबसूरत प्रस्तुति।

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  4. नहीं जानता कि आपने आस्तित्व लिखा है या अस्तित्व!
    कविता की उडान तो रचनाधर्मी ही समझ सकता है!
    --
    फिर भी रचना बहुत सुन्दर बन पड़ी है!

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  5. शास्वत सत्य।
    उसे आना ही है एक बार।
    जिसकी बरसों से प्रतीक्षा है।

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  6. दीदी,

    यह शास्वत सत्य है, अन्य सब मोहबँधन!!

    ऐसी रचना पढकर आपार शांति महसुस होती है.

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  7. आप सभी सुधि पाठकों का शुक्रिया ..

    @ शास्त्री जी ,

    त्रुटि की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए आभार

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  8. जब आया पैगाम मेरी मौत का मेरे पास
    कहा मैंने ठहर अभी उसका ख़त आएगा
    ....
    kaisa hai ye jaal moh ka
    kaise pakke dhage !

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  9. • इस कविता मॆं एक दर्शन और जीने के हठ का संकेत है। थोड़ा अमूर्तन, थोड़ी अभिधा, थोड़ी फैंटेसी है, मगर अनूठापन है। बाहर-भीतर का दृश्यात्मक प्रकाश है।

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  10. Sangeetaji Behad prabhavpoorn abhivyakti. Abhi bahar hoon isliye Hindi me comment nahin de pa rahi hoon. lekin kavita itani pyari hai ki khud ko rok bhi nahin pa rahi hoon . Itani sundar abhivyakti ke liye badhai evam shubhkamnayen.

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  11. जब असलियत " मैं " आ गई सामने तेरे
    अब भी तुझे एहसास नही होता है
    काट दे इन सांसारिक बंधनों को
    कि इंसान का बस यही अस्तित्व होता है.


    सटीक बात कहती हुई रचना-
    शुभकामनाएं

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  12. आई थी जब अकेली इस संसार में
    कोई भी बंधन तुझसे नही जुडा था
    बंध गई तू इन सांसारिक बंधनों से
    कि तुझ पर झूठा आवरण एक पड़ा हुआ था

    बस यही शास्वत सत्य है .हर कोई इसे मान ले तो जिंदगी कितनी आसान हो जाये.
    बहुत प्रभावी रचना.

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  13. जीवन के साथ मृत्‍यु शाश्‍वत है लेकिन फिर भी सभी समझते हैं कि मैं मृत्‍यु से परे हूँ। अन्तिम क्षण तक भी आशाएं पीछा नहीं छोड़ती।

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  14. जीवन के शास्वत सत्य से रुबरु कराती प्रभावशाली रचना ।

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  15. संगीता दी!
    मोक्ष उसी जाल को काटने का नाम है! जीवन दर्शन प्रस्तुत करती कविता!!

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  16. बहुत ही अच्‍छे भाव...बेहद खूबसूरत प्रस्तुति।

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  17. संगीता जी ,
    बहुत ही भावपूर्ण कविता .....बिल्कुल सच्चाई बयां करती हुई.

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  18. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना आज मंगलवार 18 -01 -2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/2011/01/402.html

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  19. इन्सान के वजूद पर सार्थक रचना

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  20. हमेशा की तरह लाजवाब और अपने ही निराले अंदाज़ में बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति

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