शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

नहीं रहे “राग दरबारी” शुक्ल

नहीं रहे “राग दरबारी” शुक्ल

मनोज कुमार

यह एक बहुत ही दुखद खबर थी। पद्मभूषण श्रीलाल शुक्ल नहीं रहे!

“रागदरबारी” जैसी कालजयी कृति के रचयिता मशहूर व्यंग्यकार और आज़ादी के बाद भारतीय समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, पाखंड, अंतर्विरोध और विसंगतियों पर गहरा प्रहार करने वाले समाज के वंचितों और हाशिए के लोगों को न्याय दिलाने के पक्षधर लेखक श्रीलाल शुक्ल ने कल शुक्रवार, 28 अक्तूबर को 11.30 बजे लखनऊ के सहारा अस्पताल में अंतिम सांसें ली। वे 86 वर्ष के थे।

31 दिसम्बर 1925 को लखनऊ के अतरौली गांव में जन्मे श्रीलाल शुक्ल पिछले दो वर्ष से बीमार चल रहे थे। पिछले दिनों अमरकान्त के साथ उन्हें भी संयुक्त रूप से 45वें ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए चुना गया। वे इतने बीमार थे कि ज्ञानपीठ पुरस्कार देने के लिए उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री बी.एल. जोशी अस्पताल गये और उन्हें सम्मानित किया। 2008 में उन्हें पद्मभूषण से नवाज़ा गया था।

उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1947 में स्नातक की उपाधि ग्रहण की और 1949 में राज्य सिविल सेवा में नौकरी ग्रहण की थी। 1983 में उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश ग्रहण किया। “रागदरबारी” के लिए उन्हें 1969 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वे अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाले हिन्दी के सबसे कम उम्र के लेखक हैं। इस पुस्तक का अब तक 16 भाषाओं में अनुवाद हो चुका था। “विश्रामपुर का संत” के लिए उन्हें व्यास सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके अलावे उन्हें लोहिया सम्मान, यश भारती सम्मान, मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार, और शरद जोशी सम्मान भी मिला है।

उनका पहला उपन्यास 1957 में “सूनी घाटी का सूरज” छपा था। पहला व्यंग्य संग्रह “अंगद का पांव” 1958 में छपा था। “रागदरबारी” 1967 में छपा था। उनकी अन्य प्रसिद्ध कृतियां हैं – जहालत के पचास साल, खबरों की जुगाली, अगली शताब्दी का सहर, यह घर मेरा नहीं, उमराव नगर में कुछ दिन, आदि।

उनकी रचनाओं में भारत का सच्चा रूप दिखता है। गांव और शहर के बीच के संबंध पर तस्वीर खींचने वाले और ग्रामीण परिवेश की रोमानी अवधारणा को ध्वस्त करने वाले शुक्ल जी का निधन हिन्दी साहित्य के लिए अपूरनीय क्षति है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. श्री शुक्ल जी के बारे में जानकारी अच्छी लगी ..विनम्र श्रद्धांजलि

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  2. शुक्ल जी प्रायः पहले ठेठ समाज के प्रतिनिध्त्व करने वाले रचनाकार हैं जिन्हें ज्ञानपीठ का पुरस्कार दिया गया है. यह उनके व्यंग्य के सामर्थ्य को दर्शाता है. विनम्र श्रधांजलि !

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  3. श्री लाल शुक्ल की बिमारी और उन्हें ज्ञानपीठ का पुरस्कार संबंधी जानकारी आदरणीय सलिल जी से मिली थी...कल रात में ब्लॉग जगत से ही उनके निधन के बारे में पता चला...

    उनका साहित्य हमें उनकी हमेशा याद दिलाता रहेगा...वे राग दरबारी के कारण प्रसिद्ध हुए...और आपने भी उन्हें इसी नाम से याद करते हुए उनके संबंध में अच्छी जानकारी दी है...

    शुक्ल जी को विनम्र श्रद्धांजलि...

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  4. श्री लाल शुक्ल को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे।
    दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि भरी अभिव्यक्ति के लिेए आभार।

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