शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

जनवादी नाटक

नाटक साहित्य

जनवादी नाटक

मनोज कुमार

ग्राम्यजीवन का स्तर का स्तर ऊंचा करने के उद्देश्य से साम्यवादी चेतना का रंगमंचों पर भी प्रभाव पड़ा। समसामयिक जीवन की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि समस्याओं को नाटक का कथानक बनाया जाने लगा। ऐसे यथार्थवादी नाटकों की एक शाखा, जो राजनीतिक स्तर पर मार्क्सवादी विचारधारा के प्रतिबद्ध थी, जनवादी नाटक कहा जाने लगा। 1942-43 में इस विचारधारा से जुड़े विचारकों और कलाकारों ने जन नाट्य संघ (इप्टा - इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) की स्थापना की।

जनवादी नाटकों का मूलतः लक्ष्य था साम्राज्यवादी और पूंजीवादी नीतियों का घोर विरोध करना। संकीर्णता की सभी सीमाओं को तोड़ते हुए सम्पूर्ण पिछड़े जनसमाज को साथ लेकर चलना इनका अभीष्ट था। सत्ताधारी राजनीति की गतिविधि से उत्पन्न विभीषिकाओं का चित्रण कर लोगों को सचेत करना जनवादी नाटककारों का लक्ष्य था। ये समस्याओं की केवल ऊपरी सतह पर ही नहीं बल्कि गहराई में जाकर विवेचन करते थे। जनता को आकृष्ट करने के लिए वे लोक मुहावरे, लोकगीत, लोकनृत्य और लोक कथा का सहारा लेते थे।

मार्क्सवादी विचारधारा में जिसे सर्वहारा वर्ग कहा गया है, उसी के लिए यहां ‘जन’ शब्द का प्रयोग हुआ। जन नाट्य संघ के कलाकारों ने हिंदी, बंगला, मराठी, गुजराती और अन्य भारतीय भाषाओं में लोगों के बीच जनवादी चेतना जगाने के लिए नाट्य प्रदर्शन स्थानीय भाषा में करते रहे। शुरु में इस नाटक संघ का मुख्य उद्देश्य दूसरे विश्वयुद्ध का विरोध प्रदर्शन था। हिटलर का अधिनायकवाद सर्वहारा वर्ग के हितों का विरोधी था। इसी उद्देश्य से सरवालकर कृत नाटक “दादा” और जाफ़री कृत नाटक “यह ख़ून किसका है” जन नाट्य मंच द्वारा मुंबई में खेला गया। बाद में इस मंच द्वारा ऐसे नाटक प्रस्तुत किए गए जिनमें सर्वहारा वर्ग के शोषण के मार्मिक चित्र प्रकट थे। इनका उद्देश्य था लोगों में व्यवस्था के ख़िलाफ़ जनाक्रोश जगाना। 1944 में बंगाल के मानव निर्मित अकाल ने इस नव चेतना के लिए उर्व भूमि प्रदान की।

जन नाट्य मंच के अधिक सार्थक नाटक बंगला में साहित्य में ही रचे गए। विजन भट्टाचार्य के नाटक “जबानबन्दी” और “नवान्न” ने इस तरह के सृजन को गति प्रदान की। इनके अनुकरण पर हिंदी, मराठी, गुजराती आदि में भी इसी ढ़र्रे पर नव लेखन का सिलसिला चला।

कुछ महत्त्वपूर्ण नाटक

सज्जाद ज़हीर कृत “तूफान से पहले” – 1946 में इस नाटक को उपेन्द्र नाथ अश्क मे निर्देशन में खेला गया।

ख़्वाज़ा अहमद अब्बास कृत “मैं कौन हूं?” – 1947 में इस नाटक की रचना हुई।

राजेन्द्र सिंह बेदी कृत “नकले मकानी”, “जादू की कुर्सी (1948)

हबीब तनवीर कृत : “शतरंज के मोहरे”, आगरा बाज़ार

विश्वामित्र कृत : “दखन की रात” (1949)

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : बकरी

आज़ादी के बाद के जनवादी नाटककारों ने बंटवारे के समय की सम्प्रदायिक अमानवीयता को अपने नाटकों का विषय बनाया। भीष्म साहनी कृत “भूत गाड़ी” इस दौर का बहुचर्चित हिंदी जनवादी नाटक है।

हिंदी जन नाट्य मंच ने मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों का रूपांतर करके पर प्रस्तुत किया। जनवादी मंच पर ‘गोदान’, ‘सेवासदन’, ‘कर्मभूमि’, ‘कफ़न’, ‘ईदगाह’, ‘सवा सेर गेहूँ’ का सफल मंचन किया गया। राजेन्द्र सिंह रघुवंशी ने नाट्य रूपांतर तैयार किया।

उत्पलदत्त के नाटकों “पीरअली’’ और “प्लानिंग” का भी हिंदी जन नाट्य मंच के रंगर्मियों ने जगह-जगह मंचन किया। जन नाट्य मंच पर अभिनीत नाटकों में अधिकांश की कोई विधिवत पांडुलिपी नहीं होती थी। लेखक प्रदर्शन के लिए नाटक का एक काम चलाऊ ढ़ाँचा तैयार कर देते थे, रंग निर्देशक और अभिनेता उसमें अपने ढ़ंग से रंगभर कर प्रस्तुत करते थे। ‘इप्टा’ ने नाटक की विषयवस्तु और अभिनेताओं की क्षमता पर बल देकर, बिलकुल सादे काले परदे के सामने नाटक करके, यांत्रिक और दिखावटी सज्जा के मोह पर पहला तीव्र आघात किया। ‘इप्टा’ के नाटक साधनहीनता के बावज़ूद, अपने कथ्य और तात्कालिकता, सार्थकता तथा गंभीरता के बल पर प्रभावी हुए।

जन नाट्य मंच की प्रदर्शन शैली लोक नाट्य की प्रदर्शन के काफ़ी क़रीब थी इसलिए इसमें माटी के अभिनय की गंध मिलती थी। इसने न्यायमूलक नवचेतना को जगाया। नई मानवीयता की दृष्टि को आगे बढाया। हालाकि मार्क्सवाद से प्रतिबंधित राजनीतिक चेतना के कारण इसे व्यापक स्वीकृति नहीं मिली और 1960 तक आते-आते इस रंगमंच के क्रियाकलाप लगभग समाप्त हो गए, फिर भी नया नाटक लेखन की समाजोन्मुखी धारा को प्रभावित करने में इसका काफ़ी योगदान है। दशरथ ओझा कहते हैं, “यदि जनवादी नाटक ग्रामीण जीवन के भिन्न वर्गों में कलह के स्थान पर सौमनस्य स्थापित करने का मार्ग निकाल पाता तो इसका भविष्य उज्ज्वल होता। महान नाट्य कृतियां समाज को विश्रृंखल नहीं करतीं अपितु जोड़ती चलती हैं ; उनका उद्देश्य नैराश्य को दूर कर जिजीविषा उत्पन्न करना होता है।”

6 टिप्‍पणियां:

  1. जानकारी भरी पोस्ट,जनवादी नाटक के विविध आयामों को स्पष्ट करते हुए आपने एक निष्कर्ष तक पहुँचने की कोशिश की है.....आपका आभार

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  2. बढ़िया विश्लेषण ||

    जनवादी नाटको के प्रस्तुतीकरण में जरुर थोड़ी चूक हुई है ||
    समरसता के बजाय वैमनस्यता बढ़ी ||

    आभार ||

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  3. जनवादी नाटकों पर विस्तार से कहा है ..अच्छी जानकारी देती पोस्ट

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  4. जनवादी नाटकों और उनके मंचन का इतिहास बताती एक उम्दा प्रस्तुति। लेख से टंकण संबंधी किंचित अशुद्धियां दूर कर दी जाए, तो लेख अति-उत्तम रहा।

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  5. 'जनवादी नाट्य संघ'-IPTA की स्थापना और कृत्यों पर विवेचन उत्तम और समीचीन है। इसके संस्थापकों मे से एक राजेन्द्र रघुवंशी जी (जिनका आपने विशेष उल्लेख किया है) को हमने आगरा मे खूब सुना और उनके लिखे नाटकों का मंचन देखा है और उनके बड़े पुत्र डॉ जितेंद्र रघुवंशी जी (आगरा यूनिवर्सिटी मे के एम मुंशी विद्यापीठ मे 'विदेशी भाषा विभाग के अध्यक्ष)से व्यक्तिगत संपर्क रहा है जो अपने भाई-बहनों के साथ आज भी IPTA के कार्यों मे संलिप्त हैं।

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  6. शिवराम की चर्चा नहीं है इसमें।
    देखें http://ravikumarswarnkar.wordpress.com/

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