गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

रजत रश्मियों की छाया में

 

आदरणीय गुणीं जनों को अनामिका का सादर नमस्कार !

[164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_n%255B4%255D.jpg]अनामिका

साथियो आज बहुत दिनों बाद अपनी तबीयत के कोप से बच कर आप की दुनियां में लौटना हो पाया और कैसे ना लौटती आखिर आप सब की टिप्पणियां प्यार स्वरुप ही तो है जो मुझे यहाँ खींच लाती है, तो बताइए फिर  भला मैं  आप सब को कैसे नाराज़ कर सकती हूँ और वृहष्पतिवार के आपके इंतजार को और कैसे  बढ़ा सकती हूँ? . लेकिन आज अपनी ऐसी तबियत के चलते अपनी  लिखी एक कविता प्रयाण...   याद आ रही है जिसकी  कुछ पंक्तियाँ आप के साथ सांझा कर  रही हूँ...

दीपक मंद हो चला है
टिमटिमाना धीमा हो गया है
आयु का जल भी सूख चला है
लौ की उपर उठने की शक्ति क्षीण है
आंखो की ज्योति , शरीर की शक्ति ,
मस्तिष्क की विस्मृति , शमशान सा मौन,
विकृति की नीरस शांति
प्रयाण के लिये
सब साजो - सामान जुटा चुकी है !

क्रमशः .....प्रयाण...

तो चलिए आज फिर से अंतरजाल की दौड़ में शामिल हो जाती हूँ ....और अपना काम आरम्भ करते हुए  अपने ब्लॉग अनामिका की सदायें ...पर भी एक रचना लगाते हुए महादेवी जी के जीवन रुपी आभामंडल को विस्तार देती हूँ ...

महादेवी वर्मामहादेवी वर्मा 

प्रयाग विश्विद्यालय से संस्कृत में एम. ए . करने के पश्चात इन्होंने अपनी रुचि के अनुकूल कार्य समझकर प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या का पदभार ग्रहण कर लिया और चाँद का निशुल्क सम्पादन भी करने लगीं. अब तक उनकी द्वितीय काव्यकृति 'रश्मि' भी प्रकाशित हो चुकी थी. 'रश्मि' में उनकी आध्यात्मिक अनुभूतियों को दर्शन का दृढ़ आधार मिल जाता है और 'नीहार' का धुंधलापन निखर उठता है. जिज्ञासा और कौतुहल की अधिकता इसमें भी है, पर इसके समाधान दृढ़ और अडिग हैं. 'रश्मि' प्रकृति विस्मय की सृष्टि करने वाली न होकर कवि-व्यक्तिगत-सापेक्ष हो जाती है. इस कृति का आह्लादात्मक  बोध वेदना को माधुर्य -मंडित करने में सक्षम है. इसकी रहस्यानुभूतियाँ स्पष्ट और साधना- समर्थित हैं. भावुकता प्रौढ़ दार्शनिकता में बदल गयी है. अज्ञात का आकर्षण ज्यों का त्यों बना है, किन्तु उसकी अभिव्यक्ति के विभिन्न स्वरों में सामंजस्य की गरिमा बढ़ गयी है. जीवन, मृत्यु, मुक्ति, अमरत्व, प्रकृति और मानव आदि की द्वंदात्मक स्थितियों में साम्य का सूत्र संग्रथित हो गया है और भाषा भावाभिव्यक्ति में अधिक सफल और सघन हो गयी है.  इस कृति में वेदांत और बौद्ध दर्शन का प्रभाव स्पष्ट है, किन्तु कवयित्री ने अपने स्वतन्त्र चिंतन को अक्षुष्ण रखा है. बौद्ध दर्शन की मूल प्रवृत्ति व्यक्तित्व की निर्विशेषता को इन्होंने कहीं स्वीकार नहीं किया  -

‘पर न समझना देव हमारी लघुता है जीवन की हार !'  

इसी तरह उपनिषद के सुख -दुख - समन्वय को साधना का स्वरुप न मानकर दोनों को व्यापक सत्य के अंग रूप में स्वीकार किया है -

छिपाकर उर में निकट प्रभात,

गहनतम होती पिछली रात,

सघन वारिद अम्बर से छूट,

सफल होते जल-कण में फूट !

वस्तुतः 'रश्मि' में सर्ववाद-दर्शन की भावात्मक अथवा सृजनात्मक अभिव्यक्ति का प्राचुर्य है. आत्मा, प्रकृति और परमात्मा (ब्रह्म) की अन्तर्हित एकता ही 'रश्मि' का मूलाधार है.

कविता के साथ-साथ बचपन से ही इन्होने गद्य लिखना भी आरम्भ कर दिया था. और 'पर्दा-प्रथा' पर लिखित निबंध -प्रतियोगिता में उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग से पुरस्कृत भी हो चुकी थीं. 'भारतीय नारी' नामक नाटक भी कई जगह अभिनीत हो चूका था, कतिपय संस्मरण भी लिखे जा चुके थे, परन्तु चाँद के सम्पादकीय रूप में लिखित गद्य अपना एक अलग महत्त्व रखता है.  उपेक्षित प्राणियों में नारी का स्थान शीर्षस्थ है. महादेवीजी के लिए यह स्वाभाविक था की इस वर्ग के प्रति किये गए अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध वे आवाज़ उठातीं . इन निबंधों में इन्होने भारतीय नारी की सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं का एक समाजशास्त्री की भांति अत्यंत गहन विश्लेषण- विवेचन किया. 'श्रृंखला की कड़ियाँ' नामक कृति में ये निबंध संग्रहीत हैं. इन निबंधों में महादेवीजी ने जिस क्रन्तिकारी दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया है, वह बड़े से बड़े समाज-सुधारक में भी विरल है. सामान्य नारी की स्थिति का विश्लेषण करते हुए इन्होने विधवाओं, वेश्याओं और अवैध संतानों की समस्या पर भी अपने साहसी और निर्भीक विचार व्यक्त किये हैं -

'अनेक व्यक्तियों  का विचार है कि यदि कन्याओं को  स्वावलंबी बना देंगे  तो वे विवाह ही न करेंगी, जिससे दुराचार भी बढेगा और गृहस्थ धर्म में भी अराजकता उत्पन्न हो जाएगी. परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि स्वाभाविक रूप से विवाह में किसी व्यक्ति के सहचर्य की इच्छा प्रधान होनी चाहिए, आर्थिक कठिनाइयों की विवशता नहीं ! '


आज अपनी लेखनी से ज्यादा ना परिश्रम करवाते हुए यहीं विश्राम देती हूँ...आगे के प्रसंग वर्णन के लिए कोशिश करुँगी की अगले वृहष्पतिवार हाज़िर हो जाऊ लेकिन त्यौहारों का समय है......दीपावली की तैयारियों में समय मिल पायेगा या नहीं...कहा नहीं जा सकता. फिर भी कोशिश जारी रहेगी...तब तक के लिए आज्ञा..

रजत रश्मियों की छाया में

रजत रश्मियों की छाया में धूमिल घन सा वह आता;

इस निदाघ से मानस में करुणा के स्रोत बहा जाता.

             उसमे मर्म छिपा जीवन का

             एक तर अगणित कम्पन का,

             एक सूत्र सब के बंधन का,

संसृति के सूने पृष्ठों में करुन्काव्य वह लिख जाता !

             वह उर में आता बन पाहुन,

             कहता मग से 'अब न कृपण बन',

             मानस की निधियां लेता गिन,

दृग द्वारों को खोल विश्व भिक्षुक पर, हंस बरसा आता !

             यह जग है विस्मय से निर्मित,

            मूक पथिक आते जाते नित,

            नहीं प्राण प्राणों से परिचित,

यह उनका संकेत नहीं जिसके बिन विनिमय हो पाता !

            मृग मरीचिका के चिर पथ पर,

            सुख आता प्यासों के पग धर,

            रुद्ध ह्रदय के पट लेता कर,

गर्वित कहता 'मैं मधु हूँ मुझ से क्या पतझर का नाता' !

            दुख के पद छू बहते झरझर,

           कण कण से आंसू के निर्झर,

           हो उठता जीवन मृदु उर्वर,

लघु मानस में वह असीम जग को आमंत्रित कर लाता !

सभी मित्रों को दीपावली की शुभकामनाएं!

14 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. बहुत अच्छा लिखा है। किन्तु स्थानों पर टंकणगत अशुद्धियाँ, जिससे पढ़ने में अटपटा लगता है, विशेषकर कविता में। आभार।

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  3. सुन्दर जानकारी से भरी हुई सार्थक प्रस्तुति .....आपको भी दीवाली की शुभकामनाएँ

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  4. अच्छी प्रस्तुति है!
    महीयशी महादेवी वर्मा को नमन!

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  5. अच्छी प्रस्तुति...........
    आपको भी दीवाली की शुभकामनाएँ !

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  6. मेरी तो मान्यता है कि साहित्य के प्रति आपकी समर्पित अनुरागिता महादेवी वर्मा जी के हृदयकुँज में प्रवेश कर कुछ ऐसे संवेदनशील पहलुओं को उजागर कर जाती हैं कि किसी भी साहित्य प्रेमी का मन उनके बारे में कुछ सोचने के लिए बाध्य कर देता है । पूर्ववर्ती पोस्टों की तरह यह पोस्ट भी बहुत अच्छा लगा । मुझे आपके अगले पोस्ट का इंतजार रहेगा । दीपावली की अशेष शुभकामनाओं के साथ । मेर पोस्ट पर आकर मेरा भी मनोवल बढाएं । धन्यवाद ।

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  7. आपकी इस श्रृंखला के माध्यम से महादेवी जी के जीवन के विभिन्न पहलुओं से अवगत हम हो रहे हैं।
    साथ ही उनकी लिखी एक से एक अच्छी कविताओं को भी पढ़ने का मौक़ा मिल रहा है।

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  8. महादेवी जी के बारे में जितना पढ़ा जाये कम ही लगता है ! उनकी रचनाओं का प्रभाव तो मानस पर अक्षुण्ण ही होता है ! आभार उनके बारे में लिखने के लिये !

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  9. आप स्वस्थ रहें ,और इस शुभ-कार्य के आगे के चरण
    पूर्ण होते रहें !

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