बुधवार, 7 दिसंबर 2011

अंक-12 हिन्दी के पाणिनि – आचार्य किशोरीदास वाजपेयी


अंक-12

हिन्दी के पाणिनि – आचार्य किशोरीदास वाजपेयी


आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में आपने पढ़ा कि सम्मेलन का वह हरिद्वार अधिवेशन आचार्य जी के साहस, बुद्धि, धैर्य, चतुराई व सहिष्णुता से किस प्रकार सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन के पश्चात आचार्य जी काम की तलाश में प्रयाग रवाना हो गए क्योंकि सारी जमा पूँजी समाप्त हो चुकी थी। यहाँ तक कि पत्नी के गहने तक बिक चुके थे और कर्ज भी हो गया था। रोजी-रोटी की जुगत तो करनी ही थी।

उस समय सम्मेलन के प्रधानमंत्री डॉ. राम प्रसाद त्रिपाठी थे जो बाद में सागर विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर भी हुए। जब आचार्य जी उनसे मिले (पं. भगीरथ प्रसाद दीक्षित के साथ) तो उन्होंने आचार्य जी से सम्मेलन के लिए कुछ पुस्तकें लिखने का अनुरोध किया। आचार्य जी ने रस, अलंकार तथा व्याकरण पर विषयों पर मौलिक पुस्तकें लिखना स्वीकार किया क्योंकि उनके अनुसार उस समय इन विषयों की बड़ी दुर्गति थी और ठोस कार्य का अभाव था। त्रिपाठी जी ने इससे सहमत होकर सम्मेलन के साहित्य-मंत्री श्री राम चन्द्र टण्डन के नाम एक चिट्ठी लिख दी। आचार्य जी टण्डन जी से मिले और उनके यह पूछने पर कि वह प्रारम्भ कहाँ से करेंगे, आचार्य जी ने पहले व्याकरण पर कार्य करने इच्छा प्रकट की। उस समय व्याकरण पर पं. कामता प्रसाद गुरु का ग्रंथ आ चुका था, सो टण्डन जी ने मौलिक कार्य किए जाने पर संशय प्रकट किया। आचार्य जी ने विश्वास के साथ कहा -

मैं उन व्याकरणों को जानता हूँ, तभी तो कहता हूँ कि हिन्दी में एक व्याकरण-ग्रंथ की जरूरत है। गुरु जी का वह व्याकरण तो एकदम गलत आधार पर बना है और उसी के आधार पर बने ये शतशः - सहस्त्रशः व्याकरण जो देश भर में चल रहे हैं, एकदम कूड़ा करकट हैं ! अज्ञान फैला रहे हैं। जी हाँ, हिन्दी के सभी प्रचलित व्याकरण गलत हैं। वस्तुतः हिन्दी का व्याकरण अभी तक बना ही नहीं है।

टण्डन जी को उनकी यह उक्ति बड़ी विचित्र लगी, फिर भी उन्होंने उनकी बात धैर्य से सुनी। रस और अलंकार पर तो वे आचार्य जी के अधिकार से सहमत थे पर व्याकरण विषय पर वे कोई चूक नहीं होने देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. बाबू राम वर्मा सरीखे विद्वानों से परामर्श करने की सलाह दी। आचार्य जी का कथन था कि उनके विचार पूर्णतया मौलिक हैं, अतः केवल इस आधार पर कि वे बड़े नाम हैं, उनके सामने दबकर उनसे कोई परामर्श नहीं लेंगे। यह भी सम्भव हो सकता है कि परामर्श से वे लोग उनकी कुछ मौलिक चीजें ले लें और उनकी पुस्तक आने के पहले ही लेख आदि के रूप में कहीं प्रकाशित करा दें। यह न भी हो तो वह (टण्डन जी) पुस्तक की भूमिका में उन परामर्शदाता विद्वानों का नाम अवश्य देंगे और उनकी (आचार्य जी की) हैसियत एक क्लर्क से अधिक नहीं बचेगी। यह आचार्य जी को स्वीकार नहीं था, अतः बात नहीं बनी। यद्यपि आचार्य जी का कहना था कि उनके ग्रंथ से पहले वाले ग्रंथों की भ्रांतियों का निराकरण भी हो सकता है।

इस तरह, बात न बनने से आचार्य जी को कुछ चिन्ता हुई, लेकिन फिर विचार कर वे और दीक्षित जी पुस्तक लेखन का प्रस्ताव लेकर रामनारायणलाल जी के यहाँ कटरा पहुँचे। ब्रजभाषा का व्याकरण लिखने पर सहमति बनी और पाँच सौ रुपए नकद भी मिल गए। उन्होंने दो सौ रुपए खर्च के लिए घर भेज दिए। पचास रुपए अपने लिए रखे और ढाई सौ रुपए कागज आदि खरीदने के लिए हिन्दी प्रेस के मालिक को दे दिए। लेखन और प्रकाशन कार्य एक साथ प्रारम्भ हो गया। तब तक आचार्य जी को यह पता नहीं था कि ब्रजभाषा का व्याकरण पर डॉ. धीरेन्द्र वर्मा कार्य कर चुके हैं। जब उनका ग्रंथ पूर्ण हुआ तब लखनऊ में रहने वाले उनके एक रिश्तेदार पं. गिरिजा प्रसाद द्विवेदी से यह ज्ञात हुआ। वे थोड़ा घबराए कि कहीं पिष्ट-पेषण तो नहीं हो गया। पता होता तो वह क्यों नाहक श्रम करते। उन्होंने डॉ. वर्मा का ग्रंथ मँगवाया। उनकी दृष्टि में वह भी कूड़े का ढेर ही था। उन्होंने अपने ग्रंथ के परिशिष्ट में उसका परिचय दिया। साथ ही भूमिका में पं. कामता प्रसाद गुरु के हिन्दी का व्याकरण की जमकर आलोचना की। इससे साहित्य जगत में भूचाल सा आ गया। उनके अनुसार इसके पश्चात हिन्दी के नए व्याकरण की माँग उठने लगी तथापि ब्रजभाषा का व्याकरण साहित्य जगत में युग परिवर्तनकारी ग्रंथ के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

इस अंक में बस इतना ही।

14 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य किशोरीदास बाजपेयी के योगदान के बारे में अच्छी जानकारी से अवगत करवाने के लिए विशेष धन्यवाद । मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है ।

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  2. आचार्य किशोरीदास बाजपेयी अप्रतिम मेधा के एक अलग ही व्यक्तित्व थे:) पढना जारी है ....

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  3. आचार्य किशोरी दास वाजपेयी की विद्वत्ता पर कोई प्रश्न नहीं है। हम जितना उनके समीप जाते हैं, ज्ञान-सागर में से कुछ मोती हाथ लग ही जाते हैं। इसके अतिरिक्त उनकी जो बात अत्यधिक प्रभावित करती है वह है उनकी निर्भीकता, समर्पित जीवन और निस्वार्थ सेवा। पद, प्रतिष्ठा की अपेक्षाओं से नितांत निरपेक्ष। आर्थिक कठिनाइयाँ भी उनको अपने सिद्धांतों से डिगा नहीं सकीं। उन्हें जो ठीक लगा, जरूर किया और व्यक्त भी किया। कभी किसी से दबे नहीं, किसी से डरे नहीं। भले ही सामने कितना ही बड़ा पदधारी क्यों न हो।

    आचार्य वाजपेयी का स्मरण सदा आत्मिक सुख देता है।

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  4. अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी !
    आभार !

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  5. आचार्य किशोरीप्रसाद वाजपेयी जी के बारे में रोचक और जानकारीपूर्ण पोस्ट!

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  6. एक आचार्य जी आचार्य जी की बात बता रहे हैं कि गुरुजी की किताब कूड़ा है। आखिर बात क्या थी? जानने की इच्छा तीव्र हो रही है।

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  7. मूल काम संस्कृत में ही हुआ है जहां से हिंदी के धुरंधरों ने अच्छी नकल की है। मगर,इस काम में,मैथिली,भोजपुरी और वज्जिका के व्याकरणाचार्यों ने जबरदस्त मूर्खता का प्रदर्शन किया है।

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  8. बहुत खूब ...मेरी रचना भी देखे .......

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  9. आदरणीय कुमार राधारमण जी,

    1915 में जब कामता प्रसाद गुरू ने हिन्दी व्याकरण नहीं लिखा था, उस वक्त भोजपुरी के ठेठ व्याकरण लिखी जा चुकी थी। भोजपुरी अकादमी ने उसे छापा भी है। कैसे कह सकते हैं कि जबरदस्त मूर्खता का प्रदर्शन किया था। क्योंकि भोजपुरी को तो कभी भाषा जैसा सम्मान ही नहीं मिला, तब व्याकरण की क्या बात करें?

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  10. आचार्य वाजपेयी जी की गाथा आत्मविश्वास से भरी है.. और यही आत्मविश्वास उन्हें तत्कालीन शीर्षस्थ कहे जाने वाले मनीषियों के ऊपर स्थित करता है, जिसका परिणाम है कि आज हम उनकी चर्चा यहाँ कर पा रहे हैं!!
    बहुत ही सुन्दर श्रृंखला!!

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  11. इस शृंखला का उद्देश्य आचार्य वाजपेयी के जीवन से जुड़े जाने-अनजाने पहलुओं को प्रकाशित करना है, उनके वक्तव्यों की पुष्टि करना नहीं। गुरु जी के व्याकरण के संन्दर्भ में उपर्युक्त उक्ति आचार्य वाजपेयी के मूल विचार हैं और इन्हें उन्हीं के शब्दों में यहाँ प्रस्तुत किया गया है। आचार्य वाजपेयी के अनुसार उन्होंने पं. कामता प्रसाद गुरु के व्याकरण के संबन्ध में अपने विचार ब्रजभाषा का व्याकरण नामक अपने ग्रंथ में व्यक्त किय़े हैं।

    संस्कृत व हिन्दी के संन्दर्भ में भ्रांति के निराकरण के लिए समय मिलने पर एक स्वतंत्र पोस्ट में चर्चा की जाएगी।

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  12. मैं " हिंदी शब्दानुशासन " पुस्तक खरीदना चाहता हूँ .. है कोई जानकार जो बता दे की दिल्ली मैं कहाँ मिलेगी ?

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